श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३
पीतशुक्लरक्तकृष्णवर्णानि यत्र पदानि च । भद्रोर्ध्वं शेषभूतानि तानि युक्त्या प्रपूरयेत् ॥१३१॥
तिर्यग्भद्रमुमुख्याद्यैः पीतचित्रे च ते स्मृते । एतदष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमीशितुम् ॥१३२॥
एकं मन्त्राशून्यं मरुत्समुदनिधिं सच्चिदानन्दरूपं
मायायोगेन विश्वात्मकमिदममलं ब्रह्मविष्ण्वीशसंज्ञम् ।
सृष्टिस्थित्यन्तरहेतुं निगमकुविदृतं मन्त्रभूतात्मभूतं
सर्वज्ञं सर्वशक्तिं गुणगणममलं तन्महो भावयेऽहम् ॥१३३॥
नत्वा श्रीदेशिकेन्द्रस्य पादाब्जमप्रदम् । वक्ष्ये चाध्यात्मिकीं मुक्तिं सतां चित्तचमत्कृतिम् ॥१३४॥
पशूनां मत्सगोमादि सर्वमर्थाय कल्पते । मृगस्य नरदेहस्य सृष्टिदोषोयदोदितः ॥१३५॥
एकमेवामुना साध्यं ज्ञानं यन्मध्यरूपदम् । तद्विना तु पशुभ्यश्च नरो हीनतरो मतः ॥१३६॥
प्रतिभागान्पुण्यतमः श्रद्धावान् गुरूबोधते । कोटिष्वेकः स्वयं साक्षादङ्गे नारायणो भवेत् ॥१३७॥
केचिद्रामतोभद्रं मुद्रा मद्रिवदन्त्यिदम् । गयाकिना च मंवद्गं विविच्यन्ते च ते उभे । १.८।
लोकाः सप्त यथाऽङ्गेऽस्मिंस्तथा सप्त प्रकीर्तिताः । तेनैव रचना तुल्या ज्ञेया हस्तसमुद्भवैः । १३९॥
ब्रह्मांडं रामतोभद्रं मुद्रामूतानि मन्महे । रामशेषेणयुक्तानि सम्मतानि तु सूरिभिः ॥ १४०॥
यस्यां स्यान्मुद्रित वस्तु या मुद्रेति निगद्यते मुद्रेव पिहितं चाथ विहितं यदधो भवेत् ॥१४१॥
तद्वन्मवासु चैतासु ब्रह्ममुद्रितमुच्यते । तथाप्यासां मवाद्भातिचैतन्यः संप्रकाशनं ॥१४२।
आच्छादितोऽपिकनकश्चेत् स्फटिकैऽन्तर्बहिः किल । दीपः प्रकाशते क्कन्न लोपयेच्च नतथ्वते । १४३॥
मृण्मयिखनं ताम्रग्मं तदाकारं प्रपद्यते तथा ब्रह्म निगकारं मुद्राकारं विभायते ॥१४४॥
रङ्गका कमल रहेगा। उस कमलके रङ्ग बताये जायेंगे ॥ १३० । पीले, सफेद, लाल और काले
रङ्गको परिमित रहेंगे। भद्रमें बाकी बचे जिनन काष्ट हों, उन्हें युक्ति के साथ रङ्गोंसे पूर्ण कर दें ॥१३१॥ इसकी
शृङ्खला तथा भद्र पीले और विविध रङ्गके होंगे ॥ १३२ ॥ मैं आत्माके उस रूपका ध्यान करता हूँ जो
सदात्म अकेला है, समस्त सुखका विधान है, सच्चिदानन्दरूप आनन्दकन्द है। जिसने अपनी मायाके योगसे इस
निर्मल विश्वके प्रपञ्चोंको ब्रह्मा, विष्णु और शिवके नामसे अंगीकार कर रक्खा है। जो सृष्टि, पालन और
विनाशका हेतु है। जिसके ऋषिलाग बार-बार शास्त्रोंके अनुसार पाणिपात्रका प्राप्त हैं, जो सब कुछ
जानता है, जिसके पास सब प्रकारकी शक्तियां हैं, जो परमात्मा अनन्त और अमृतरूप है ॥ १३३ ॥ अब
मैं श्रीदेशिकेन्द्रके भ्रमरपद प्राप्त करानेवाले चरणकमलोंको प्रणाम करके सज्जनोंके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न
करनेवाली आध्यात्मिक मुक्तिका वर्णन करूँगा ॥१३४॥ मृत पशुओके नललोम आदि सब पदार्थ
काम आ जाते हैं, किन्तु मनुष्यके मर जानेपर यह किसी काम नहीं आता है कि विधाताने इसकी
सृष्टि करके बड़ा भारी अपराध किया है ॥१३५ । इस शरीरसे आत्माका स्वरूप पहचान्नेकी साधना
की जा सकती है। यदि यह काम नहीं किया तो यह मनुष्य पशुसे भी हीन माना जायगा ॥ १३६ । करोड़ों
मनुष्योंमें कहीं कोई एक मनुष्य पवित्र गुरु तथा भगवद्भक्त रत्न रूप होता है। जो ऐसा होता है, वह
साक्षात् नारायण ही है ॥ १३७॥ कुछ लोग ऊपर वरणन किये हुए रामतोभद्रकी रचना करके उसमें साठ कोठकीकी
मुद्रा बनाकर इस प्रकार विवेचना करते हैं— ॥ १३८ । जिस प्रकार ऊपर कहे हुए सातों लोक हैं, ठीक उसी तरह यह
रामतोभद्र भी है ॥ १३९ । रामतोभद्र ब्रह्माण्ड है। इसका मुद्रा में ही प्रतिरूपमद् बनता है। उसमें रामरूप
चैतन्य (जीव) है। ऐसा कितने ही तत्त्वदर्शियोंने कहा है ॥ १४० ॥ जिसमें कोई वस्तु मुद्रित हो (अर्थात्
लपेटकर रक्खी हो) उसे लोग मुद्रा कहते हैं। मुद्रितका अर्थ है—पिहित या विहित (घिराया हुआ)।
यह शरीरादिमें ब्रह्मसे मुद्रित है। फिर भी इसके बाहर चैतन्यका प्रकाशन हो रही है ॥ १४१ ॥ १४२॥
स्फटिक मणिका कलश बना और उसके भीतर दीपक रखकर चाहे वह चारों ओरसे ढॉक दिया जाय, फिर
भी दीपकका प्रकाश कोई लुप्त नहीं कर सकता। ठीक यही दशा इस ब्रह्माण्डकी भी है ॥ १४३ ॥ जिस तरह कि
५९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
पुश्चक्रे प्रभुः सर्व्वाः पुरः पुरुष आदिशन्। इत्युक्तं जन्मचाभावात्प्रन्यवापि हि पञ्चमे १४४॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मेति श्रुतेर्वचः। एको देवः सर्वभूतेष्विति चैवापरा श्रुतिः॥१४५॥
पुरः सृष्ट्वा परेशोऽन नैन ताभिरतुष्यथ म सृष्ट्वा मानुषीं मुद्रो परं तोषमगात् सः १४६॥
देवताश्चास्सृजत्पूर्वं दृष्टेमों पौरुषीं तनुम्। रूप तादृक्ष सुकृत बतेति श्रूयते स्फुटम् १४७॥
पुरुषं त्वेवाविशन्मात्मेत्याद श्रुतिः स्वयम्। पुग सृष्टैः सर्वभूतैरगृहायः स्वरट् ॥१४८।
श्रद्धावल्लोमणिगण नग दृष्ट्वा मुदं गतः। इत्थस्माभिर्विष्णुतत्व श्रूयते भगवद्वचः ॥१५०।
मुदं करोति देवस्य द्रावयेद्दुःखसञ्चये। इति मुद्रानिरुक्तिश्च मन्त्रशास्त्रेऽपि श्रूयते ॥१५१।
अतः सर्वेषु देहेषु मनुष्याणां नृणाम् स्वर्गापवर्गयोरादाऽधिकारोऽस्मिन्न चेतरे। १५२॥
लोके प्रसिद्धिर्र्यः कश्चिद्राजमुद्राङ्कितो नरः। अधिकारीति मन्यन्ते पूज्यश्चामरादिभिः १५३।
तथान्याङ्कितो जीवोऽधिकार्थं शास्त्रभूमिषु। नान्याभिर्गो विनिर्ज्ञासु शक्यन्ते म्वस्ममनः पदम् १५४॥
तस्मिंश्चैष सोपाधौ पदानि षडि गनि हि । तानि संक्षेपतः सम्यक् प्रदर्श्यन्तेऽवरुद्धये ।१५५॥
अविद्याकामकर्माणि भोक्तृभोगी सुषुप्तिश्च। एतादृशनि न षडानि देहे कारणसञ्ज्ञके । १५६॥
तमोऽज्ञानमविद्येति शब्दा एकार्थवाचिनः। अत्र गुणत्रयो नाव दृश्यते पदमु मो द्विज । १५७।
लिंगे पुर्यष्टकेऽविद्याऽऽकामकर्मत्रयं स्मृतः। न साधनं तु हेतुत्वान्त्रयाणां ग्रहणं कृतम् ॥१५८॥
कार्यमस्त्वेष्वथवान्य नाहकारणे कारणात्मना। कामस्य कर्मणश्चात्र स्थितिस सूक्ष्मरूपता १५९॥
अविद्या या मुख्यतोऽत्र विद्यते कारणात्मना। दृश्यतान्तु न कामोऽत्र कामना वा श्रूयेर्तनम् ॥१६०॥
सुवर्णसे साभा ढाला जाता है ता सब उसमें अपने आप पिघल जाता है यही दृष्टान्त इस निराकार ब्रह्मकी भी
है ॥ १४४ ॥ प्रभुने पहले इन जीवोंको नासृष्ट किया । उस समय उस पुरुषमें समावेश किया । ऐसा कथन अन्य
कहा गया है अन्य स्थान में भी इन पूर्व वाक्यों से नहीं होता उसका ऐसा कहना है ॥ १४५ ॥ श्रुतिका कथन
है कि सब प्राणियोंके अन्तरूप में रहनेवाला एक ही परमात्मा है । दूसरी श्रुति भी इस बातकी पुष्ट करती
हुई कहती है कि वह एक ही परमात्मा है, जो सबतरफ सब प्राणियोंमें विद्यमान रहता है ॥ १४६ ॥ सृष्टिकर्त्तान
पहिले अनेक तरहकी सृष्टियाँ कीं, किन्तु उससे उस ईश्वरको तृप्ति हुई। फिर जब उसने इस मानुषी मुद्राकी
सृष्टि की, तब उसे बडा प्रसन्नता हुई ॥ १४७ ॥ अगणित क्षण करके लिए देवताओंने पुरुषका शरीर देखा
तो इससे सन्तुष्ट होकर बोले कि आपने यह बहुत अच्छा किया जा इसपर सब लोग सन्तोष करते हैं ॥ १४८॥
विस्तारविशाल मुख्य आत्माका ही श्रुतिने पुरुष कहा है उस परमात्माने अग और प्राणियोंकी सृष्टि की, किन्तु
उसका दृश्य प्रसन्न नहीं हुआ और जब उसने इस मानव शरीरका रूप देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुए ।
हे विष्णुदास इस प्रकार इन भगवान् प्रभुका कथन सुनते हैं ॥ १५०॥ वह उन रचनाओंको प्रसन्न
करता हुआ सब दुःखों और पापों को धोने वाला जान फल कहा जाता है इस प्रकार मुद्रांकी निरुक्ति मन्त्रशास्त्र-
में भी की गयी है ॥ १५१ ॥ इसलिए उसने सब देहों में मनुष्यों पर अधिकार दिया है । स्वर्ग और अपवर्गका
अधिकार भी इसी नरजातिका दिया गया है—औरौंकी नहीं ॥ १५२॥ संसारमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि
जिस मनुष्यके पास राजाकी मुद्राका प्रमाणपत्र होता है। उसे लोग अधिकारी समझते हैं और उसकी
पूजा करते हैं । १५३ । ईसी प्रकार इस राजमुद्रापदकी मुद्रा से अङ्कित जीव शास्त्रभूमिका अधिकारी
माना जाता है, अन्य योनिके जीव अवश्य-धरता आत्मपद नहीं जान सकते । १५४ ॥ इस आत्मा उपाधिमें कुल
साठ पद हैं । उनकी जानकारी के लिए यहाँ स्वच्छ तरह बतलाते हैं । १५५ । कारणसंज्ञक देहमं अविद्या,
काम, कर्म भोक्ता भोग और सुषुप्तिके स्थान हैं ॥ १५६॥ हे द्विज तम, अज्ञान और अविद्या इन तीनों
शब्दोंका एक ही मतलब है। इसमें इसमें किस गुणका ग्रहण किया जाना मुझे दीखता ॥ १५७॥ सातवें
शरीररूपमें अविद्या, काम और कर्मका ग्रहण किया गया है। फिर भी कारण रूप इन तीनोंको ग्रहण ही
करना पड़ता है ॥ १५८॥ कामणका चाहे कोई कार्य हो वा न हो, वहीं कारणरूपसे रहता ही है।
सर्गः ४ ] मनोहराकाण्डम् ५१५
अष्टत्रिंशत्पदानि ह विद्यन्ते सूक्ष्मदेहके । दशेंद्रियाणि पञ्चैव प्राणा बुद्धिम॑हंकृतिः ॥ १६१॥
सप्तदशात्मकं लिंगं प्रसिद्धं शास्त्रसम्मतम् । पञ्चविंशत्यनेण पञ्च कर्मक्रियात्मनः ॥ १६२॥
एष प्राणांख्यव्यापारः सकलश्च निश्वयान्मतिः । ममांश चैव धर्माः प्रसिद्धाः शास्त्रसम्मतः । १६३॥
स्वप्नाभिमानी भोर्गी रजश्चेति चतुष्टयम् । देवानामिंद्रियाणां च व्यापारश्चर्तुरुत्तर पदो १६४।
स्थूलदेहे षोडशैव पदानि सम्मतानि हि । गुणाः सप्तदश तेषामपानव्यानयोः पदे ॥ १६५॥
पायूपस्थस्थानयोर्द्वये वाचोऽपि निकेतने । प्राणस्य मनसश्चापि बुद्धिस्थाने पदं विदुः ॥ १६६॥
पदानि द्वादशे मानि धीमद्भिर्येन तथा गुणः अवस्था जागृतिश्चैताः कथितानि मनीषिभिः ॥ १६७॥
मुद्रामेतादृशीं प्राप्य वेद वेदान्तार्थाम्पदम् । तस्य जन्म कृतार्थ स्यान्महतो नहिन्यथा । १६८॥
मुद्रारूपं विविच्यैव यन्नाम्नां भांकिनोनि च । उक्तं तदधुना किंचित्संक्षेपेण निरूच्यते ॥ १६९॥
रामेति लोकरमणाद्रमन्ते योगिनोऽमले । परमानन्दरदं नित्यं तेन राम इतीर्यते । १७०॥
रसेनेवामुना सर्वे जीवा जीवन्ति नान्यथा । इमं रमणथ लब्ध्वा भवन्त्य नन्दिनोऽखिलाः ॥ १७१॥
विशता येन विश्वेषु सर्वं चेतयते जगत् । न तं चेतयते कश्चिन्न राम इति कीर्त्यते । १७२॥
सत्ता येनाखिले विश्वे म देवोऽत प्रकीर्त्यते । अमन्मनाप्रदः साक्षाद्राम इत्यभिधीयते । १७३॥
यथा प्रसिद्धं रामेति ब्रह्मणो नामनायकम् तथा लिंग पदं व्योम निष्कलः परमात्मातः ॥ १७४॥
लीयन्ते यत्र भूतानि निर्गच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिंग पद व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥ १७५॥
इति शास्त्रविदां वाणी श्रूयते तत्त्वदर्शनाम् । अतः सर्वाणि नामानि स्थाण्वन्तान्तरात्मनः ॥ १७६॥
सति तेन शब्दभेदं रूपभेदेऽपि सर्वथा । तत्त्वतो नैव भेदोऽस्ति व्यर्थैकस्य वस्तुनः ॥ १७७॥
उस शरीरमे काय और कर्म ये दोन तु मलगम रहते है । १५९॥ इस कारणात्मामे अविद्याकी प्रधानता है । आत्मसवे मे इसमे काम रहता है भोक्तृत्व भावका हा रहता है । यह ज्ञानका सिद्धान्त है १६० । इस सूक्ष्म देहमें कुल साठ पद हैं। दस इन्द्रियका पाँच ५ प्राणका, बुद्धि, मन और १ अहङ्कारका सत्रह पद शास्त्रों-में कहा गया है। पाँच ५ विषय ग्रहण करनेवाली इन्द्रियांका, पांच कर्मकारियोंका और पाँच प्राणोंके व्यापाराका कुल सत्रह होकर अड़तालीस पद होते हैं। १६१ - १६३। स्वप्न, अभिमानी, भोग और रज ये चार देवताओं और इन्द्रियोंमें प्रवृत्ति न करने वाले इमलिय स्वप्न अवस्था सम्बन्धी साठ ही पद माने गये हैं। किन्तु गुण सत्रहका ही रहेगा। उनमेंसे दो पद अपान और व्यान वायुका है ॥ १६४। १६५। पायु और उपस्थस्थानका दो पद, वाणी और रसनाका दो पद, प्राण, मन तथा बुद्धिका एक-एक पद ॥ १६६॥ ये बारह पद मान्त्रा और अंतम पांच ५ इन्द्रियोंके गुण, अवस्था तथा जागृति कहा है। १६७। इस प्रकारकी मुद्रा प्राप्त करके प्राणी वेदान्त अर्थवाली पद पाता है। इसको पाकर जन्म कृतार्थ हो जाता है। अन्यथा नष्ट ही हो जाता है॥ १६८। मुद्राके रूपका विवेचन करके उसके नामोंसे संकेतित मुद्राओंकी बात संक्षेप रूपसे बतलाते हैं॥ १६९ । संसारके प्राणियोंको आनन्द देनेके कारण भगवानका 'राम' नाम पड़ा है। योगीलोग इसी अमल परमानन्द पदमें आनन्द लेते हैं। इस लिए भी राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७०। इसी प्रकार संसारके सब जीव जीते हैं, इस सरस पदको पाकर लोग आनन्दमय हो जाते हैं ॥ १७१। जो भगवन् प्रविष्ट होकर सारे जगत्को चैतन्य कर देता है। जिन रामको चैतन्य करनेवाला कोई भी नहीं है, व ही राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७२। जिन भगवान्की सत्ता समस्त विश्वमें है। वे इसी कारण सर्वेश कहलाते हैं। वे भगवन् जगत्में भी अपनी सत्ता बनाये रखते हैं। अतएव लोग उन्हें राम कहते हैं ॥ १७३॥ जिस तरह उनका राम यह नाम प्रसिद्ध हुआ। उसी तरह परमात्माके लिङ्ग और रूप भी हैं।॥ १७४॥ लिंग लिंगका अर्थ इस प्रकार करते हैं-जिसम जगत्के सब प्राणी अन्तमे लीन होते और सृष्टिके आदिमे जिससे प्रादुर्भूत होते हैं उसकी लिंग संज्ञा है। वह लिंग, शून्य निष्कल और परम कल्याणकारी है ॥ १७५॥ इस प्रकार तत्त्वदर्शी शास्त्रोंकी बातें सुनायी पड़ती हैं। इससे यह
५९६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
स ब्रह्मा स शिवश्चाथ स हरिः स सुरेश्वरः। सोऽक्षरः परमश्चैव स स्वराडिति वेदवाक् ॥१७८॥
यस्यैवै सच्चिदानन्दाः स व्यापी सर्ववस्तुषु, नेदानीं नु प्रियं भाति वस्त्वमात्रं प्रदृश्यते ॥१७९॥
वार्तायां च सर्वत्र रामनामाङ्ककीर्तनम्। अत्रिद्विद्यापमानेषु श्रूयते गुरुपुङ्गवात् ॥१८०॥
अग्रेत्वेक आत्मा वा इदमग्रः पुरा जनैः। आसीत्ततैव लोकानां पालानां सृष्टिरिच्छया ॥१८१॥
पुनश्च सर्वदेवानामनुकल्पार्थमीप्सितम्। इन्द्रायतनं तन्न सृष्टेस्तेभ्यस्ततः परम् ॥१८२॥
विचार्य स्वापदां पश्यन्त्सीमाशं प्रविष्टवान्। तदात्मानं ब्रह्म तत दृष्ट्वांशदेतो किल ॥१८३॥
कश्चैष मनि सप्रश्नं येन पश्यन्ति विन्दति। इत्यादिभिर्विभज्यैवं तदेतद्द्रष्ट्रादिभिः ॥१८४॥
संज्ञोऽन्तःसम्य नामानि चोक्त्वाऽन्यच्चेतसोऽयमा। एष ब्रह्मेत्यादिभिश्चेदंश्चोक्तं चाखिलं जगत् ॥१८५॥
प्रज्ञानेत्रं च प्रज्ञाने प्रतिष्ठितन्नेनेव हि। प्रज्ञानं ब्रह्म श्रुत्यान्ते त्रिकाले विनिश्चितम् ॥१८६॥
तद्राम सच्चिदानन्दघनानन्दं न संशयः। तैत्तिरीयस्यशाखायां ब्रह्मण लक्षणं पुरा ॥१८७॥
सत्यं ज्ञानमनन्तं सङ्कीर्त्य वेत्तुगुहादिकम्। यस्माद्वस्तुते कामानामंग्युपपद्येव हि ॥१८८॥
फलं ज्ञानस्य चोक्त्वाऽथ तस्माद्ब्रह्मात्मकं किल। क्रमोत्पत्तिर्हि शुभानां कोश निकवेदनम् ॥१८९॥
तत्फलं तदनात्मत्वं मदष्ट्यानन्दात्मनः पुच्छं ब्रह्मेति निर्णीय तदसत्समशीनितः ॥१९०॥
असन्नेद्भवति ज्ञेयं सत्तीर्त्य च तत परम्। कामयित नदेवेदं सृष्ट्वाऽभूत् जगदात्मना ॥१९१॥
कृत्वा तस्मिन् प्रविष्टेव मच्चामच्चाभवत्किल। अपानप्राणयोश्चेष्टा यस्या सीन्वे प्रजायते ॥१९२॥
अन्यायस्य त्वेव आनन्दयति चाखिलान्। भयहेतुस्तदेवेह त्रासादीनां प्रदर्शकम्। ॥१९३॥
मानुष्यारभ्य ब्रह्मान्ता आनन्दा ये शतोत्तराः। सिद्धस्तत्र परब्रह्मानन्दज्योतिं विनिश्चितम्। ॥१९४॥
सिद्ध हुआ कि उस सच्चिदानन्द ही नाम और रूपान्तर बहुत हुए भी वास्तवमें सब एक हैं। इसकी वास्तविक् स्थितिमें कोई भी अन्तर नहीं आता ॥१७८॥ १७९॥ वही ब्रह्मा, वे ही शिव, वे ही विष्णु और वे ही देवराज इन्द्र हैं। वे ही अक्षर ब्रह्म और वही सर्वव्यापक तथा विश्वरूप स्वराट् हैं ॥१७८॥ वे ही सब वस्तुमात्र रूप चित् और आनन्द रूपसे आनन्दरूप हैं। जिसके कारण सब चीज अच्छी लगती हैं ॥१७९॥ सब वेदोंमें रामरूपी ब्रह्मका कीर्तन विद्यमान है। गुरुकुल के अनुग्रहसे आदि, मध्य, अन्त सब समयमें रामहीका कीर्तन सुनायी पड़ता है ॥१८०॥ ऐतरेय उपनिषदमें लिखा है कि सर्वप्रथम यह आत्मा अकेला था। उसकी यह इच्छा हुई कि हम लोक और लोकपालोंकी सृष्टि करें ॥१८१॥ ऐसा विचार होनेपर उसने सृष्टिके अनन्तर नाना प्रकारके इन दानादिक और उत्तम प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की ॥१८२॥ तदनन्तर उन्होंने अपने-अपन स्वरूपमितका विचार किया और एक सधाम देवनगरोंके राजा इन्द्र बने ॥१८३॥ जो कि इस संसारका देवता तथा संसारको चलानेवाला कौनसा है वह कौन है? इसका ज्ञान आदि नाम बतलाते हुए "यह आत्मा ही सब कुछ है" आदि वाक्यसे उन्होंने इस प्रश्नको हल कराया ओर बतलाया कि सन्, चित्, आनन्दम् लेकर चुने नयन नाम हो गया है। पूर्व समय तैत्तिरीयक श्रुतिमें ब्रह्मका लक्षण बतलाते हुए रामने सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप उपाधि दी है। इस संसारमें जो कुछ दृश्य साधनका भोक्ता और खाने-पीनेका है, वह ब्रह्म ही है। इनमें से, यह ले पाया गया कि समस्त सृष्टि ब्रह्ममयी है। सब प्राणियोंका क्रम-उत्पांत, पंचकोशका ज्ञान और आत्माकी विभिन्नता आदि दिखाकर बतलाया है कि सत् और असत्का प्रतीयमान इन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है। १८४-१९०॥ फिर कहकर कहा कि सत् और असत् यह क्या वस्तु है? इस प्रश्नको हल करते हुए कहते हैं कि जो अदृश्य अव्यक्त और जगत्का आत्मा बनकर कामनाओंको धारणा हुआ उसमें लीन हो जाता है वही सत् है। जिसके अस्तित्त्वमें प्राण और अपानकी चेष्टा जायमान होती है, उसे असत् कहते हैं ॥१९१॥ १९२॥ यह आत्मा ही सारे संसारको आनन्दित करता है। वास्तविका एकमात्र ब्रह्म भयहेतु है ॥१९३॥ मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपर्यन्त तथा इसके भी आगे जो आनन्दविन्दु है, वह एकमात्र परब्रह्मानन्दका ही आभास है।
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् १९७
म यस्यायं नरोपाश्चादित्येवञ्च वर्तते । स एक इति ज्ञात्वा' पापं पुण्यं कृतञ्चने ॥१९५॥
न संतापयतस्स्वेवं सम्यक् सर्वं प्रकीर्तितम् । यत्प्रब्रह्म हेयापेक्ष्यः सङ्गत्स्येति न संशयः ॥१९६॥
छांदोग्येऽपि स वेदेति मन्त्रोपक्रम्य प्रक्रणः । तेजोऽन्नादिका सृष्टिः यन्मूला मा स्थितिरितिः १७ ।
जीवात्मना प्रवेशश्च व्याकृतिर्नाम रूपयोः अनेकत्वान्नपदस्य मन्यर्दनेकत्वताऽपि च ।
मदर्थभावना-! च मनुष्ये च बहूक्तिता । १९८।
लज्जाने च गुगेतांन ज्ञानन्मोक्षोःपुनर्भवः ।
मध्यब्रह्माभिमंन्ग्रन्येव मन्त्रब्रह्मकीर्तनम् । तद्रामान परं ब्रह्म सृष्टिस्थित्यन्तहेतुकम् ।।१९९।।
अन्यस्यामपि शाखायां प्रश्नप्र-युक्तिः स्फुटम् । मनःप्र, णेन्द्रियाणां यन्मनः प्राणैन्द्रियं हि तत् ॥२००॥
सर्वपामनुभूतेः सन्निष्टितारिद्वितात्परम् विषयो नेन्द्रियाणामित्युक्त्वा तस्य शभापनम्२०१ ।
सर्वदर्शी सर्ववेतृदेवना जयकारणम् । तदत्ताने च देवानां गुरुह्यानुपूर्णात्निता ॥२०२।
धैर्यन्न नान्यन्मानुष्यं प्राप्य जन्म न वेत्त चेत् । विनाष्टिमहती तस्य चेति प्रोक्त ततः परम् ॥२०३।
अध्यात्माधिदैवसिद्धा विद्यापाश्चमत्र च ब्रह्मज्ञालिन राज्ञाना हानिन्मन्प्रमितित्ययम् ॥२०४॥
मम्रजो महिमा श्रुत्या कीर्तितो ह्यामना मण्म् । तद्रामपि गुरोश्चेय नान्यथा ग्रन्थकाटिभिः ॥२०५॥
मुडकेऽपि परा विद्या शिष्या जय ब्रह्मणः । सृष्टिश्चानेकदृष्टांतरुक्ता तस्मिन्न मस्थिता ॥२०६॥
लपन्नासि हि सर्वत्र विश्वं मत्र हि गन्मयम् तारुण धनुषा चैव लक्ष्य आत्मानपर्ण तथा ।।२०७।
एषा लिखा है। जो मनुष्यका उपाधिय भूत विद्यमान है। उस एकमात्र प्रभुका ज्ञान सत्तपद कर्म-अधर्म तथा पाप पुण्य कुछ शेष नहीं रह जाता, १९४ । १९५, तब किसी प्रकारका सन्ताप नहीं करना पड़ता। ये सब गुण जिसमें हैं, वह ब्रह्म ही है। उसको आत्मा देखकर निश्चित होता है कि वह ब्रह्म आराधनकारी ही है। इसमें संशय नहीं है ॥१९६॥ छान्दोग्य उपनिषदमें यह कहा है कि ब्रह्मसे ही अन्नादिका सृष्टि हुई है और उसीके आधारसे इस जगत्का पालन-पोषण होता है । १९७ । जीवात्माके द्वारा ही जगतका प्रवेश होता है, किन्तु देहके अभाववश उसके नाम और रूपमें अन्तर पड़ जाता है। स्वस्वरूपका उसके विचार शिक्षा ही का विषय मात्र था, इसलिये साव एकता ज्ञान ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन है। जब तक मनु पदका ज्ञान नहीं होता, तब तक एकता रहता है और सद् ब्रह्म विद्यमान रहनेपर एकताके स्थानपर बहुत्व आ जाता है। उस मन् पदका ज्ञान होनेपर गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान प्राप्त होकर पुनर्जन्मविमुक्त मोक्षपद प्राप्त होता है॥ १९८॥ शाखाके सद्ब्रह्म जिसका कथन उपमानों है, उसका इतना ही यथार्थकीर्तन है कि वह राम ही परब्रह्म हैं। उन्हींके द्वारा इस जगत्की सृष्टि, पालन और प्रलय होता है ।१९९॥ अन्य शाखाओंमें भी प्रश्न और उत्तरके रूपमें अनेक प्रश्न और प्रत्युक्तियां हुई हैं। उनसे भी यही सिद्ध होता है कि मन, प्राण और इन्द्रियोंका जो मन, प्राण और इन्द्रिय है। वह ब्रह्म ही है। वह प्रत्यक्षदृश्य प्रकृत जन और अज्ञान इन दोनोंसे परे है। यह सबका अनुभव है। किन्तु वह इन्द्रियोंके विषयगोचर नहीं होता अर्थात् अनुभवसे ही जाना जाता है। यह कहकर उसका समापन किया गया है ।। २०० ।। २०१ ।। वह प्रत्यक्ष सब कुछ देखता है सब जानता है देवताओंके विजयका कारण है और वह देवताओंके लिए भी अज्ञात रहता है। गुरुका उपासन करनेसे ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ २०२॥ विद्या ही मनुष्यका मनुष्यत्व है। इस संसारमें जन्म पाकर जिसने विद्या नहीं पायी तो यह उसका एक बहुत बड़ा विनाश है। ऐसा कहा गया है ॥ २०३ ॥ अधिदैवका भी अदर्शन करनेवाला बह्मज्ञानका विद्याका साधन होता है, परोक्ष ज्ञान होता है और अन्तमें उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ।। २०४ ।। श्रुतिने स्वयं विस्तारपूर्वक ब्रह्मकी महिमाका गान किया है। इसलिए जिज्ञासुको चाहिए कि वह गुरुसे रामका ज्ञान प्राप्त करे। वैसे करोड़ों ग्रन्थ पढ़नेसे भी उनका सच्चा ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता ॥२०५॥ मुण्डक उपनिषदमें कहा गया है कि ब्रह्म और ब्रह्मका विषय जाननेके लिए गुरु प्रधान हैं। उक्त उपनिषदने अनेक दृष्टान्तोंसे सृष्टिका वर्णन किया है ॥ २०६ ॥ वह कहता है कि यह सारी सृष्टि उसी ब्रह्ममें स्थित है और अन्तमें उसीमें
५५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
महिमातिशयस्तस्य तद्भावा भाव्यशेषकम् । अगोचरं च सर्वेषां ध्यायमानोऽनुपश्यति ॥२०८॥
वेद हि तं गुहायां योऽविद्याग्रंथिं भिनत्त्यसः । कृपया वृणुते ब्रह्म यं कश्चित् सुमधस्करम् ॥२०९॥
तेनैव लभ्यतं साक्षान्नान्यथा यत्नतोऽपि हि । अथवा य परब्रह्म प्राप्तुमिच्छेन्न भावकः ॥२१०॥
तेनैव हेतुना लभ्यो नान्यथा साधनान्तरैः । दलहीनादिर्भानेदं लभ्यते तैस्तु लभ्यते ॥२११॥
मन्थामयोगतः सत्त्वं शुद्धं येषां विचारतः । ते परान्तेन कालेन परिमुच्यन्ति नान्यथा ॥२१२॥
यथा नद्यः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपतः । तथा विद्वान्कलावैद्यप्रतिष्ठाणं च भक्ष्यम् ॥२१३॥
प्रारब्धकर्मणां साक्षान्मोक्षमप्युपतेभवेत् । यो वेद परं ब्रह्म स ब्रह्म भवतीति च ॥२१४॥
सर्वं ममुदितं दृश्यानन्दामत्रकाचदूषणम् । पूर्णमदः पूर्णामिदं काण्डकाया सनातनः ॥२१५॥
आदिमध्यावसानेषु पूर्णं ब्रह्मव निश्चितम् । पूर्णं पराक्षरूपेण ज्ञातं तत्पदमक्षिरम् ॥२१६॥
प्रत्यक्षं त्वपदारूप्येन स्थितं भूतमयेषु च । पूर्णातिरूपज्ञान्पूर्णं सोपाधिकमिहोच्यते ॥२१७॥
सम्पूर्ण शाखग्राम्दृष्ट्यां स्वाविद्यानाशतः स्वयम् । प्रत्यग्दण्डमय लक्ष्यावाशेषविशद्रिग ॥२१८॥
विगतापाधिकं सर्वं पूर्णमेवावशिष्यते । तद्रामं परमं ब्रह्म योगिध्येयं सनातनम् ॥२१९॥
सर्वधर्मानवेधंन श्रुतिगान परात्परम् । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥२२०॥
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव २२१
इत्याह भगवान् साक्षाद्वेदाव तज्जलानांते । एवं मयामु श्रुतिषु स्मृत्यादिषु यदीरितम् ॥२२२॥
लय सा हो जायगा क्योंकि समस्त विश्व उसका स्वरूप है ... कि जैसे धनुर्धारी एक
लक्ष्य-फोड़ धनुषसे लक्ष्य बंधना सीखता है। उसीतरह व ध र-२... ब्रह्मके लिए आत्मसमर्पण करना
सुगम ॥ २०७ ॥ उस ब्रह्मकी बड़ी महिमा है। उसका जन्म बहुत दूर सकता है। वह सबसे छुपा हुआ है,
किन्तु ध्यान द्वारा देखा भी जा सकता है॥ २०८ ॥ जो प्राणी हृदयके उस बन्द हुए ब्रह्मको जान
लेता है, वह अविद्याका कठिन पाश काट... सा है। वही
प्राणी इन सबनाम उसे साक्षात् उस प्राण... प्राप्त हो
सकता। इसके अतिरिक्त जिस किसी भी साधन द्वारा ईश्वरको प्राप्त करनेका अभिलाषी प्रयत्नपूर्वक
साधनासे ही वह प्राप्त हो सकता है अन्यथा कदापि नहीं ॥ ... प्राप्त कर
सकता। बहुधा, उद्धारका हित सकता है, विचार द्वारा जिसका चित्त एवं पवित्र व शुद्ध हो जाता है, वे सब लोग
महापदको प्राप्त होकर कल्पके अन्तमें मुक्त होते हैं ... । जिस तरह कि नदियाँ
नाम और रूपके साथ अन्तमें समुद्रमें जाकर मिल जाती हैं उसी प्रकार कलाके मोहका त्याग तथा कलाकी
प्रतिष्ठामें लीन हो जाता है ॥ २१३ ॥ वह अपने प्रारब्ध कर्मोंके भोगनेके पश्चात् ऐसा प्राप्त होता है कि जो उस
परब्रह्मको जानता है वह साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २१४ ॥ ... संसार बना है, वह सब ही
चिदानन्दरूप ब्रह्म ही है। काण्डक श्रुति भी संसारके लिए इस प्रकार कहा गया है कि बस, वह ही पूर्ण है बाकी
सब अपूर्ण है ॥ २१५ ॥ आदि, मध्य और अन्तमें सब पूर्ण ही पूर्ण है वह निर्विकल्प है पराक्षर रूप भी वही
पूर्ण माना जा चुका है। २१६ ॥ वह प्रत्यक्षमें सब प्राणमयमें रहता है। इस पूर्णके निरूपणसे वह
सोपाधि कहा जाता है ॥ २१७ ॥ वह शास्त्र और शाखा इन भारोंसे स्वयं अपनी अविद्यानावका नाश
करता हुआ उपनिषद्की आलोक आधारपर सब काम करता है ॥ २१८ ॥ जबकि उसकी उपाधि नष्ट हो
जाती है तो वह पूर्णरूपसे शेष होकर अकेला रह जाता है। जो दुख हरण करनेवाला है, वे योगियोंके ध्येय
एकमात्र राम हैं ॥ २१९ ॥ समस्त धर्मोका निर्णय करते हुए श्रुतियों द्वारा भगवान्ने स्वयं यह कहा है कि मैं
इस संसारका प्रभव (उत्पन्नकर्ता), और प्रलय (नाशक) हूँ ॥ २२० ॥ हे धनंजय मुझसे परे और कुछ
है ही नहीं। यह समस्त विश्व मुझमें उसी तरह पिरोया हुआ है, जैसे धागेमें मणियाँके दाने पिरोये रहते हैं
॥ २२१ ॥ ऐसा भगवान्ने वेदोंमें कहा है। उसी तरह श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी कहा है कि परब्रह्म राम जी