श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१
तवाग्रे कथ्यते शिष्य सङ्क्षेपेणाद्यया प्रभोः । न शक्तोऽहं यदर्थं च रामेणाज्ञापितस्त्वरम् ॥८६॥
वक्तुं स्वचरितं पुण्यं रम्यमानन्ददायकम् । वाल्मीकिश्चरितं रम्यं आवयोः संवादमात्रयोः ॥८७॥
यः पूर्वं विरचितवान् स्वीयकालेऽत्र भूतवत् । यथा रामस्य चरितं पूर्वं रामावतारतः ॥८८॥
एवं संवर्णितं कृत्स्नं गोप्यं यच्च कृतं रहः । न वाल्मीकिप्रभः कश्चित्केवलो भविष्यति ॥८९॥
इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डेऽत्तराधे
रामोत्तरज्ञानं तथा रामादीनां वंद्यकरणं नामैकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥
द्वाविंशः सर्गः
(सीता द्वारा टूटा तुलसीपत्र पुनः डालमें जोड़ना)
श्रीरामदास उवाच
इदानीं रामचन्द्रस्य लीलाकौतूहलावहाम् । अन्यद्रम्यं कथ्यते हि मया तच्छृणु सादरम् ॥ १ ॥
एकदा राघवस्तस्थौ सभाशालायां चोपरि । बन्धुभिर्मन्त्रिभिश्चैव पौरैर्जानपदैः सह ॥ २ ॥
पुत्राभ्यां च सुहृद्भिश्च मित्रैर्मन्त्रिजनेः सह । एतस्मिन्नन्तरे भूरिकीर्त्तिना सुहृदा चरैः ॥ ३ ॥
द्राक्षाफलादिभिः पूर्णास्तथा पुष्पैः सुतूलिताः । करण्डिकाः प्रेषिताश्च रम्यार्थे मन्त्रतः ॥ ४ ॥
ताः सर्वा राघवो दृष्ट्वा प्रेषयामास चान्तिके । युक्ता यामविना सीता क्रीडाभवनसंस्थिता मुदा ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा करण्डिकाः सन्ति चेत्यभूत्कुतूहला । ततो रामोपलभ्यन्तं दृष्ट्वा पद्मं हि जानकी ॥ ६ ॥
करेणादाय पद्मं च राघवायानर्पणं विना । सा तन्मुगन्ध्यं जिघ्रन्ती वारं वारं मुदान्विता ॥ ७ ॥
काण्डिकां पूर्ववच्च समाच्छाद्य विहस्तया । स्थापयामास गेहेऽथ मोचयित्वा करण्डकाः ॥ ८ ॥
तद्वृत्तं रामचन्द्रोऽथ ज्ञात्वा सभास्थितः । विममर्श विचारं च मनसा मुदान्वितः ॥ ९ ॥
नातश्चेदं कृतं कर्म योग्यं शुचे स्मृतं न हि । घ्राणार्थं मे निवेद्यान्ते कृतं कार्य्यार्थं तथा ॥१०॥
हैं ॥८४॥८५॥ क्योंकि प्रभुन मुझे आज्ञा दी थी कि शीघ्र जा कर कहो। इसलिए भगवान्ने स्वयं मुख कथा सुननेकी आज्ञा की थी। और वाल्मीकिजीका ही जो चरित्र है सिर्फ हम दोनोंके परस्पर सुनानेके लिए भूतकालकी तरह भविष्यका सारा वृत्त पूर्व रामके जन्मसे ही लिख दिया था॥८६-८८॥ वह वर्णन भी इतना अच्छा किया कि रामने जो गुप्त में किया था, वह भी सब लिख दिया। वाल्मीकिके समान न कोई कवि हुआ है न होगा। इस प्रकार आनन्दरामायणान्तर्गत राज्यकाण्डोत्तर-रामोत्तरज्ञान वन्दिकरण नामक इक्कीसवां सर्ग समाप्त हुआ॥२१॥
श्रीरामदासने कहा- अब मैं तुम्हें रामकथा एक दूसरा आनन्द और कौतुकका सुनाता हूँ। उसे आदरपूर्वक सुनो ॥१॥ एक समय रामचन्द्रजी सिंहासनपर बैठे हुए थे। उस समय उनके समस्त भ्राता, मन्त्री, पुरवासी, दोनों पुत्र सम्बन्धी तथा मित्र आदि भी उपस्थित थे। उस समय उनके सुहृद् राजा भूरिकीर्तिने दूतों द्वारा अंगूर आदि विविध प्रकारके फलोंसे भरी हुई बहुमूल्य पेटियां भेजीं ॥२-४॥ उनको देखकर रामने उसे भीतर सीताके पास भेजवा दिया। उस समय सीता अपने सखियोंके साथ क्रीडाभवनमें थीं ॥५॥ उन पिटारियोंको देखा तो बड़ी उत्सुकताके साथ खोल-खोलकर कुछ पिटारियाँ देखीं, किन्तु उनके भीतर कमलका फूल भरा दीख पड़ा ॥ ६॥ तब प्रसन्न मनसे उसने उनमें से एक कमलका फूल निकाला और रामको अर्पण किये बिना ही सूंघ लिया ॥७॥ तदनन्तर पिटारियोंको पहलेकी तरह ठीक करके घरमें रखवा दिया ॥ ८॥ सभा में बैठे-बैठे ही रामको यह बात मालूम हो गयी। उन्होंने बार-बार इसपर विचार किया ॥९॥ तब उन्होंने सोचा कि सीताने यह ठीक नहीं किया, जो मेरे सूंघे बिना ही कमल सूंघ
५३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२
अग्रेऽप्येवं स्त्रियः सर्वाः करिष्यन्त्यत्र वै भुवि। मत्कार्यदर्शनार्थाय तस्मात्किञ्चित्करोम्यहम् ॥११॥
एवं मनसि निश्चित्य ततः स रघुनन्दनः । हर्षयंश्च गृहं गत्वा पूर्ववज्जानकीं मुदा ॥१२॥
रञ्जयामास विविधैर्नानाच्छाद्यादिकौतुकैः । संप्रदर्श्य पेटिकाश्च सर्वास्तच्चक्रे महन्महः ॥१३॥
आनीय दर्शयामास फलपुष्पादिपूरिताः । रामोऽपि दृष्ट्वा ताः सर्वाः समुद्घाट्य पृथक् पृथक् ॥१४॥
प्रेषयामास भवने गेहेषु दश पञ्च च । फलादीनां पेटिकाश्च नानावाद्यैर्विचित्रिताः ॥१५॥
मातृणां सकलानां च गृहेष्वपि तथा पुनः । गुरुयोः सुहृदां चापि मन्त्रिणां च गृहेस्तथा ॥१६॥
पौराणां चापि गेहेषु सेवकानां गृहेष्वपि । दासीभ्यश्च शुभा दत्त्वा पेटिकाः सप्त पञ्च च ॥१७॥
सीतायै शतशो दत्त्वा मुदा तभ्यो रघूत्तमः। फलानि दश पञ्चाथ स्वयं भुक्त्वा तत परम् ॥१८॥
पद्मादीनि सुपुष्पाणि विभज्य पूर्ववत्पुनः । सीतायै धनशो दत्त्वा स्वयमङ्गीचकार ताम् ॥१९॥
अज्ञात इव तद्वृत्तं गोपयन्मायि चेतसि । अथैकदा जनकजा हरिदिन्यामुपोषणम् ॥२०॥
कृत्वाऽपरे दिने स्नात्वा ययौ वृन्दावनं द्रुतम् । तुलसीं पूजयित्वा तां सा चकार प्रदक्षिणाः । २१॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता त्रिगुणाङ्ग श्रमान्विता । त्यक्त्वा प्रदक्षिणामार्गं किंचिदेव चचाल सा ॥२२॥
चलितायाश्च सीतायाः पल्लवेन हि वाससः । पत्रमेकं तुलस्याश्च पपात भुवि वै तदा ॥२३॥
तन्दृष्ट्वा जानकी दृष्ट्वा द्वादश्यां त्रुटितं शुभम् । ज्ञात्वाऽधर्मः कृतश्चेति संप्राप्ताऽऽप्तत्रसा तदा ॥२४॥
ततः सा तत्करेणैव गृहीत्वा पत्रमुत्तमम् । नत्वा वृन्दावनं सीता चिक्षेप पश्चादरात् ॥२५॥
ततः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयित्वा मुहुर्मुहुः । तुलसीं सा ययौ गेहं रञ्जनाय राघवम् ॥२६॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र नारदश्च समाययौ । वीणावाद्यस्वनेनैव कुर्वन्कीर्तनमुत्तमम् ॥२७॥
पालय मां दीनेमिति राघवेति पुनः पुनः । पालय मां दीनेमिति मनुं पञ्चदशाक्षरम् २८॥
लिया । १० । यदि मैं इस समय ना रह जाता हूँ तो सीताके दिखाये हुए मार्गपर चलकर सब स्त्रियाँ ऐसा ही करने लगेंगी। इसलिए मन्ताका हलका करना बचा है । ११ । ऐसा निश्चय करके राम पूर्ववत् सीताके घर पहुंचे ॥ १२ ॥ वहां सदाकी तरह विविध प्रकारके फल-कौतुक करके उन्होंने सीताको प्रसन्न किया। सीताने भी वह सब पिटारियां मँगवाकर उनके आगे रख दीं। वे सब नाना प्रकारके फलों फूलोंसे भरी थीं। रामने भी उन्हें अलग-अलग खोलकर देखा । १३ । १४ । उनमेंसे पन्द्रह पिटारियाँ भाइयोंके यहाँ भिजवा दीं। इसके बाद सब माताओंके पास भेजीं। तथा वैसी ही जोड़ों सुग्रीवादि के, मन्त्रियों, गुरुजनों, पुरवासियों, सबको तथा दासियोंके घर भी पांच सात पिटारियाँ भिजवायीं । इसके अनन्तर सैकड़ों पिटारियां सीताको दीं और उनमेंसे स्वयं भी दस पाँच फल निकालकर खाए ॥ १५ ॥ १८ ॥ इसके बाद कमल आदि श्रेष्ठ-श्रेष्ठ फूलोंका पूर्ववत् विभक्त करके सैकड़ों फूल सीताका दिये और स्वयं भी लिये ॥ १९ ॥ किन्तु सीताने रामकी शपथ दिला दी थी अतः मुंह मूंद लिया था उस बातको जानते हुए भी राम अनजान जैसे बन रहे। इसके अनन्तर एक दिन सीताने एकादशीका व्रत किया २०। दूसरे दिन वे वृन्दावन ( तुलसीका बगीचा ) में गयीं। वहाँ तुलसीकी पूजा करके प्रदक्षिणा करने लगीं ॥ २१ ॥ उस समय एकादशीका व्रत करनेसे उन्हें थकावट-सी लगी थी। उसस प्रदक्षिणाका मार्ग छोड़कर वे दूसरी ओर चलने लगीं ॥ २२ ॥ चलते-चलते सीताके कपड़ेका पल्ला लगनेसे तुलसीका एक पत्र टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २३ ॥ द्वादशीके दिन उस गिरे पत्रको देखकर सीताने सोचा—'ओह ! मैनें बड़ा भारी अधर्म कर डाला' यह सोचकर वे कुछ भयभीता-सी हो गयीं ॥ २४ ॥ इसके पश्चात् सीताने वह पत्र उठा लिया और उसे प्रणाम करके आदरसे उसी वृन्दावनमें फेंक दिया ॥ २५ ॥ ऐसा करनेके बाद प्रदक्षिणा करके बारम्बार प्रार्थना की, फिर महलमें जाकर रामचन्द्रजीका मनोरंजन करने लगीं ॥ २६ ॥ इसी समय वीणा बजाते और हरिकीर्तन करत हुए नारदजी वहाँ आ पहुँचे ॥ २७ ॥ वे आते ही "मुझ दीन-
सर्गः २१] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) २५३
कीर्तयामास स मुनिर्वारं वारं मुदान्वितः । कलकण्ठस्वरेणैव महापातकनाशनम् ॥ २९॥
॥ पालय मां दीनं राघव पालय मां दीनम् ॥ इति मन्त्रः
तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्याथ भक्तितः । नत्वाऽऽसने मणिनये वासयामास सादरम् ॥३०॥
ततः प्रक्षाल्य दम्पती सीतया रघुनन्दनः । धेनुं निवेद्य गायेन्द्रीं पूजयामास तं मुनिपुङ्गवम् ॥३१॥
हेमपात्रं भोजनार्थं मुनेरग्रे निवेश्य च । परिवेशणार्थं श्रीरामः प्राह सीतां जानकीम् ॥३२॥
सीताऽपि कामधेनूत्थपरमान्नानि विगृह्य सा । हेमपात्रे नरोत्कृष्टानानेतुं परिवेशकम् ॥३३॥
कर्तुं कङ्कणमञ्जीरकिङ्किणीनूपुरस्वना । सा ययौ नारदः प्राह श्रीरामवं तदा ॥३४॥
राम राजीवपत्राक्ष नाहं सीतासमर्पितम् । दिव्यमन्नमहं चाद्य करिष्यामि नृपोत्तम ॥३५॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा सीताऽऽसीच्चकिता तदा । प्रहृतं च समादाय भ्रमेण मुन तदा ॥३६॥
पप्रच्छ कारणं व्यग्रः सर्वकर्ता स्वयं प्रभुः । किं कारणं वद मुने किमर्थमनयाऽर्पितैः ॥३७॥
अभुङ्क्त्वं भोजनं नाद्य करोषि मुनिपुङ्गव । इति रामवचः श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥३८॥
नारद उवाच
सीतयाऽद्य कृतं पापं किन्न वेत्सि नृपै प्रभो । यदि त्वं नैव जानासि तर्हि शृणु वदामि त ॥३९॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रमनयाऽद्य निकृन्तितम् । यद्यसत्यं तर्हि पश्य गत्वा वृन्दावने प्रभो ॥४०॥
संक्रमेषु चतुर्दश्योर्द्वादश्योः पानपर्वसु । तुलसीं न हरेन्मर्त्योभृग्वङ्गारकवासरे ॥४१॥
नष्टे सूर्येन्दुग्रहणे प्रसूतावशचे तथा । तुलसीं ये निकृन्वन्ति च्छिन्दन्ति हरेः शिरः ॥४२॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रं धात्रीपत्रं तु कार्तिके । लुनाति यो नरो गच्छेन्नारकानतिगर्हितान् ॥४३॥
अकाले तुलसीपत्रं छेदयेत्तपः श्रियः पुमान् । पत्रमेकं ब्रह्महत्यासममाहुर्मनीषिणः ॥४४॥
एवं तु वचनं सर्वमुनिभिर्हि प्रकीर्तितं । पुरुषाणामयं दोषस्तत्र स्त्रीणां कथाऽत्र का ॥४५॥
की रक्षा करो, हे राघव ! मेरा पालन करो" इस महापातक नाशक पञ्चदशाक्षर मन्त्रका सहर्ष उच्चारण करने लगे ॥ २८ ॥ २९ ॥ 'पालय मां दीनम्, राघव पालय मां दीनम्' यह पञ्चदशाक्षर मन्त्रका स्वरूप है । राम नारदको देखते ही उठ खड़े हुए । उन्होंने आगे बढ़कर प्रणाम किया और आसनपर बिठाला । तब सादर पूजन किया ॥ ३० ॥ सीताके साथ रामने मुनिवर पैर धोय और गोदान दिया इसके पश्चात् उनके सामने सुवर्णका पात्र रक्खा और सीतासे परोसनेके लिये साम्प्रत कहा ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ सीता भा कामधेनुसे उत्पन्न अच्छे अच्छे मिष्टान्न परोसनेके लिये कङ्कण मञ्जीर तथा नूपुरका ध्वनि करती हुई चलीं। सीताको चलती देखकर नारदने रामसे कहा हे राम ! हे राजन्पद्माक्ष !! मैं आज सीताके हाथसे परोसे हुए दिव्यान नहीं खाऊंगा ॥ ३३-३५ ॥ मुनिकी बात सुनकर सीता घबरा गयी और सब कुछ करनेवाले स्वयं प्रभु राम-ने भी अनजान बनकर विस्मित हो व्यग्रभावसे पूछा-कहो मुनिराज ! आज आप सीताके हाथका अन्न क्यों नहीं ग्रहण करते ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर नारदने कहा-॥ ३६-३८ ॥ आज इन्होंने एक बड़ा पाप किया है। सो क्या आपको नहीं मालूम है ? अच्छा मैं ही सुनाता हूं ॥ ३९ ॥ आज द्वादशीको इन्होंने तुलसी-पत्र तोड़ डाला है। यदि आप मेरी बात सच न मानते हों तो स्वयं चलकर देख लीजिये ॥ ४० ॥ संक्रान्ति, चतुर्दशी, द्वादशी, प्रतिदिन सबेरे-सांझके समय, भृगु और मङ्गलके दिन तथा दोपहरके बाद, सूर्य-चन्द्रग्रहणके समय, घरमें सन्तति होनेपर या किसीका देहान्त होनेपर जो लोग तुलसीका पत्र तोड़ते हैं, वे मानो तुलसीका पत्र न तोड़कर भगवान्का सिर काटते हैं ॥ ४१ । ४२ । जो द्वादशीको तुलसीपत्र तोड़ता है या कात्तिकमासमें आंवलेकी पत्तियां तोड़ता है, वह अतिशय निन्दित नरकमें जाता है ॥ ४३ ॥ जो लोग असमयमें तुलसीका एक भी पत्र तोड़ते हैं। विद्वान् लोग ऐसोंको ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ४४ ॥ इस प्रकारका वचन समस्त मुनियोंने कहा है। फिर जब पुरुषोंके लिये ऐसा नियम बना हुआ है तो स्त्रियोंके लिये क्या
५३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२
एतन्निमित्तं श्रीराम सीतया परिकीर्तितैः । स्रानभोजन मद्य करिष्यामि नसंशयः ॥४६।
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः मुने त्वमेव सीतां मे पूतां कर्तुमिहार्हसि ॥४७।
वरदानं व्रतं वाऽपि येन पूता भवेच्छुभाम् । त्वामहं प्रार्थयाम्यद्य स्वीयं पल्लवमुत्तमम् ॥४८।
इत्युक्त्वा शिरसा चापि नमस्कृत्य पुनः पुनः । तद्रामवचनं श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥४९।
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृत्यर्थे मुनीश्वरैः । प्रायश्चित्तानि चोक्तानि संति नानाविधानि च ॥५०॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रच्छेदनाद्यप्रशंसये । प्रायश्चित्तं मया नैव दृष्टं रघूत्तमोत्तम ॥५१॥
उपायस्त्वेक एवात्र वर्तते रघुनन्दन । पातिव्रत्यबलाम्भोता पत्रं तत्तुलसीं पुनः ॥५२॥
योजयिष्यति संजोड्य तदि पूता भविष्यति क्षणादेव न सन्देहः सत्यमेत द्वचो मम ॥५३॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा रामः सीतां व्यलोकयत् । तदा सीताऽब्रवीद्वाक्यं शृणु ब्रह्मसुतोत्तम ॥५४॥
अद्याहं योजयिष्यामि पत्रं तज्जलसीं पुनः । पातिव्रत्यबलेनैव तथाद्य पश्य कौतुकम् । ५५॥
इत्युक्त्वा जानकी देवी यन्पात्रमन्तपूर्णकम् । पाकस्थाने पुनर्नीत्वा स्थापयामास वेगतः ।५६॥
ततो वृंदावनं सीता ययौ नूपुरनिश्वना । नारदो रामचन्द्राद्या ययुर्वृन्दावनं प्रति ।५७।
तदा ता ऊर्मिलाद्याश्च शषिकाद्याः स्त्रियो ययुः । लक्ष्मणाद्या बंधवश्च कुशश्चाथ लवस्तथा ॥५८॥
तेषां मध्यगता सीता तदा वृंदावनस्थिता । नत्वा तां तुलसीं भक्त्या प्राह वाक्यं मयीयुता ।५९।
भो भो तुलसि मद्वाक्यं शृणुष्याद्य सुशोभने । पातिव्रतबलं पूर्ण मयि यद्यस्ति पावनम् ॥६०।
तर्ह्यस्य तव पत्रस्य मयि सन्धिरर्भविष्यति । एवमुक्त्वा जानकी मा यात्रन्पश्यन्ति वै पुरः ॥६१।
तावत्पत्रं तुलस्यां मत्सन्धि नैव गतं तदा । तदा खिण्णा मा सीता बभूव चकिताऽपि च । ६२ ।
तदा देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नराः । गुह्यका ऋषयः सर्वे तद्द्रष्टुं कौतुकं ययुः ।६३।
एतः सीतां विषण्णां तां दृष्ट्वास नारदो मुनिः । एकांते जानकीं नीत्वा बोधयामास सादरम् ।६४॥
कहना ॥ ४१ ॥ इसी कारण आज व्रतका पारण करके समय में सीताका दर्शन अब नहीं करूंगा ॥ ४६ ॥
इस प्रकार नारदकी बात सुनकर रामने कहा हे मुने ! तब तुम ही सीताको पवित्र कर दो । ४७ ॥ यह वरदान
तथा व्रत जिस उपायसे पवित्र हो सके, वैसा कर । एतदर्थ में हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ और मस्तक
झुकाकर पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ । रामका विनय सुनकर नारदने कहा- ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ ब्रह्महत्यादि
पापोंसे छुटकारा पानेके लिये तो मुनीश्वरोंने अनेक प्रकारके प्रायश्चित्त बतलाये हैं ॥ ५० ॥ किन्तु द्वादशीको
तुलसीपत्र तोड़नेसे जो पातक होता है। उसका प्रायश्चित्त तो मैंने कहीं देखा ही नहीं ॥ ५१ ॥ हे रघुनन्दन !
इस विषयमें केवल एक उपाय है । वह यह कि माता अपने पातिव्रत्यके बलसे वह पत्र फिर वृक्षमें जोड दें तो
ये क्षणमात्रमें पवित्र हो सकती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। मैं जो कह रहा हूँ सो सत्य है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
नारदके ऐसा कहनेपर रामने सीता की ओर देखा । तब सीताने कहा-हे ब्रह्माके पुत्रोमें श्रेष्ठ पुत्र नारद ! ॥ ५४ ॥
अभी मैं आपके सामने ही अपने पातिव्रत्यके बलसे उस तुलसीपत्रको दालमें जोड़ दूंगी आप यह कौतुक देखें
॥५५॥ ऐसा कहकर सीता उस अन्नपात्र वेगके साथ लौटा ले गयी और रख दिया ।५६।। इसके अनन्तर वे वृन्दा-
वनमें गयीं । नारद और राम भी वहाँ पहुंचे ॥ ५७ ॥ ऊर्मिलादिक स्त्रियां तथा लक्ष्मणादि बन्धु एवं लव कुश
आदि पुत्र भी वृन्दावनमें पहुंचे ॥ ५८ ॥ उन सबके बीचमें सीताने उस तुलसीके वृक्षको प्रणाम किया और
भक्तिपूर्वक कहने लगी - ॥ ५९ ॥ हे सुशोभने तुलसि ! मेरी बात सुनो । यदि मुझम पातिव्रतका बल हो तो
यह टूटा हुआ पत्र फिर तुम्हारे अङ्गमें जुड़ जाय ऐसा कहकर सीताने सामने पत्र देखा तो वह जुटा नहीं,
यों ही पड़ा रहा । उस समय आश्चर्यके साथ-साथ सीताको बड़ा विषाद भी हुआ ॥ ६०-६२ ॥ समस्त देवता,
गन्धर्व, यक्ष, नाग, किन्नर, गुह्यक तथा महर्षिगण वह कौतुक देखनेको एकत्रित हो गये थे । ६३ ॥ जब सीताको
इस प्रकार कुत्सित देखा तो नारद मुनि उन्हें एकान्तमें ले गये और आदरपूर्वक समझाया । नारदने
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३५
शृण्वत्र कारणं सीते सर्वं त्वां मददावहम् । पतिव्रताभिनिर्णीतिर्विना स्वपतिना मुदा ॥ ६५ ॥
पुष्पादीनां सुगन्धोऽपि नान्यग्राह्यः कदाचन । सोऽद्यैकादिनः पूर्वं मुदा नाघ्रातमस्य च ॥ ६६ ॥
तद्वृत्तं बुद्ध्य्वा रामचन्द्रो मयैषा रचिताऽद्य हि । उद्दिश्यैतां तुलस्याश्च तन्पत्रं पतितं भुवि ॥ ६७ ॥
स्वद्भक्त्यैवापराधेन शिक्षां कर्तुं दयालु हि । रामस्यांतर्गतं ज्ञात्वा दोषारोपः कृतस्त्वयि ॥ ६८ ॥
मया सीते क्षमस्वाद्य मा क्रोधं भज मां प्रति । नारीणामुपकारार्थं तेन त्वमद्य शिक्षितम् ॥ ६९ ॥
नोचेद्वदहितं पथा स्त्रियः सर्वाः पतिं विना । लभेयुश्चान्नपुष्पादि नानाभोगांस्तदान्विताः ॥ ७० ॥
इदानीं शृणु मद्वाक्यं येन श्रीराघवप्रभोः । पत्रस्य च तुलस्याश्च दृढो मन्धर्भविष्यति ॥ ७१ ॥
वृन्दावने पुनर्गत्वा त्वं ब्रूहि कमलेक्षणे । विना पद्मसुगन्धस्याद्यपत्राद्यदे गभितम् ॥ ७२ ॥
पातिव्रत्यं मयाऽम्यत्र तद्यनूत्कुरमादलम् । तुलस्यां माऽम्रानातु नायकाप्नोतुवै विषयम् ॥ ७३ ॥
अनेन वचनेनाथ तत्पत्रं सन्धिनिपुणम् तुलस्याः क्षमभावण पूर्ववच्च भविष्यति ॥ ७४ ॥
अतस्त्वं याहि तुलसीं विषादं भज मा रमे । इत्युक्त्वा सीतया शीघ्रं तुलसी नाब्दो ययौ । ७५ ॥
सीताऽपि तुलसीं नत्वा शृण्वत्सु सकलेष्वपि । समक्षेषु सुराणां च देवादीनां वचोऽब्रवीत् ॥ ७६ ॥
विना पद्मसुगन्धस्याऽघ्राणाद्यदि रक्षितम् पातिव्रत्यं मयाऽप्यत्र तर्ह्येतत्तुलसीदलम् ॥ ७७ ॥
तुलस्याः सन्धिमाप्नोतु नोचेन्नाप्नोतु वै विदः । एवं वदति जानक्यां तत्त्वमेव समेन तत् ॥ ७८ ॥
प्राप्तं सन्धिं पूर्ववच्च पश्यत्सु सकलेष्वपि । तदा निनेदुर्वादित्राणि देवानामश्चतस्त्य च ॥ ७९ ॥
देवनार्यो विमानस्थे संस्थिताः पुष्पवृष्टिभिः । वर्णयामासुरूवी शमं विशा उच्चैर्जयस्वनान् ॥ ८० ॥
तदा सीतां समालिङ्ग्य राघवो मुदिताननान् । आह तुष्टमनः श्रीमान् प्रमनाह्यभूपिता ॥ ८१ ॥
हे सीते कञ्जनयने मुनीनामपि मोहिनि । नेदं मया शिक्षितं ते सर्वस्त्रीणां सुशिक्षितम् ॥ ८२ ॥
धर्मसस्थापनार्थाय साधूनां पालनाय च । दुष्टानां च विनाशाय मयेदं रूपमाश्रितम् ॥ ८३ ॥
कहा-हे सीते ! इस पत्रक न जुड़नेका जो कारण है वह मैं बतलाता हूँ। पतिव्रता स्त्रियोंको चतुर कि यिः उनके पतिने सौंप के सुगन्धन दिया हो तो स्वंय भी पुष्पादिकका सगन्ध न लें। आपने इस रोज़ रातके सूघे बिना ही कमलका फूल सूंघ लिया था ॥ ६४-६६ ॥ रामका यह बात मालूम हो गयी थी। इसीसे उन्होंने यह मया रची है तुलसीका पत्र भी उन्हींकी इच्छासे गिर गया था ॥ ६७ ॥ आपको शिक्षा देने ही के लिए उन्होंने ऐसा किया है। रामकी इच्छा देखकर ही मैंने आपपर दोषारोप किया है। सां क्षमा करो। मेरे ऊपर कुपित न हो नारीजातिको शिक्षा दनक लिए ही उन्होंने यह कौतुक रचकर आपको उपदेश दिया है ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ व यदि ऐसा न करेंगे तो आपके बनाये मार्गके अनुसार संसारकी समस्त स्त्रियां अपने-अपने पतिको अल्य करके स्वयं विविध प्रकारके भोगोंका उपभोग करने लगेंगी ॥ ७० ॥ सुनिए, अब मैं बतलाता हूँ कि किस तरह यह पत्र वृक्षमें जुड़ेगा ॥ ७१ ॥ आप फिर वृन्दावनेमें जाकर कह कि उस कमलका फूल सूंघनेके सिवाय यदि मेरा पतिव्रत धर्म सुरक्षित हो तो यह पत्र जुड़ जाय और यदि मैं अपने धर्मको सुरक्षित न रख सकी होऊँ तान जुड़े ॥ ७२ । ७३ । आपके इस बचनसे तत्काल वह जुड़कर पहिलेकी तरह हरा-भरा हो जायगा ॥ ७४ । हे लक्ष्मीस्वरुपिणी सीते अब चलें किसी प्रकारका विषाद न करें। ऐसा कहकर नारदजी सीताके साथ-साथ उस कुञ्जमें वाग गये ॥ ७५ ॥ सीता जी जर समस्त परिवारके सभी लोग तथा सारे देवता एकत्र होकर सुन रहे थे, तब उन्होंने कहा--॥ ७६ ॥ यदि उस कमलका सुगन्ध लेनेके अतिरिक्त मेरा पातिव्रत धर्म सुरक्षित हो तो यह तुलसीदल अपने स्थानपर जुड़ जाय, अन्यथा नहीं जुड़े । सीत।के ऐसा कहते ही क्षणामात्रमें वह पत्र वैसे ही तरह पूर्ववत् जुड़ गया। सब लोग खड़े यह कौतुक देख रहे थे। पत्रके जुड़ते ही देवताओंने बाजे बजाये और देवांगनाओंने पुष्पवृष्टि की एवं ब्राह्मणोंने एक स्वरसे जयजयकार किया। ७७-८० । इसके बाद रामने सताको हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न मनसे कहा कि हे मुनियोंके भी मनको मोहनेवाली सीते ! यह मैने तुम्हींको नहीं समस्त नारीजातिको शिक्षा दी है। धर्मकी
५३६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २२
पातिव्रत्यं सदा स्त्रीभिः पालनीयं विशेषतः । मया ते शिक्षितं सीते मा विषादं भज प्रिये ॥८४॥
इत्याश्वास्य मुहुः सीतां कृत्वा ह्यपदिशङ्किताम् । विसर्जयामास तदा रङ्गाग्रतः सुग्रीवप्रमुखान्हरीन् ।८५।
ततः सर्वाङ्गसुन्दरीम् ताञ्श्री परिवेषणम् । वेगाच्चकार मुदिता स्वेदबिन्दूङ्कितानना ।८६।
ततः सर्वे व्यमृदंस्तत् भुक्त्वाऽऽचमनमुत्तमम् । ततो मुखवासं ताम्बूलं रामं तुष्टाव नारदः ॥८७॥
श्रीनारद उवाच
धीमन्तं मुनिश्रिञ्जमं जगदण्डं हृद्गतम् सीताऽऽननेन्द्यनयननगराजारामं घनश्यामम् ।
नागेन्द्रान्तकसिद्धिदं नितान्तं प्रविपन्नपालं रामं त्वां शिष्या मननं प्रणाम्यच्छेदेनमनालम् ।८८।
नाना राक्षसदूषनं शरधृतं जलनाथार्चनीमदभसागरबन्धननानाकीतुककनारम्
पाँगनन्दननारीतोषससुरापुनमद्रालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥८९
श्रीकान्तं जगतीकान्तं स्तुतमद्भक्तं षट्षट्कं सद्गृहदेवप्सितपूरकप्रयासं नृपजाकान्तम् ।
पूष्णीजपनिधिं मित्रमुनिविश्वादायनमच्छीलं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९० ।
सीतातोषितविश्वेशं धृतभूमाशं सुरलोकेशं प्रशमितरावणभयमपगतरावणकुलकेशम् ।
किष्किन्धाकृतसुग्रीवं प्लवगवृन्ताधिपमन्पालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९१ ।
श्रीनाथं जगती नाथं जगतानाद्यं नृपतीनाथं भुजंगासुरनिर्जग्गदगन्धर्वाधिकारमन्नाधम् ।
कोदण्डधृततूणीरन्तिरुपप्रमे कृतभूशालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् । ९२ ।
रामेशं जगतामीशं जम्बूद्दीपेशं नवलोकेंशं वन्दीकृतमन्मथमहर्षितभीतालालितवागीशम् ।
पृथ्वीसद्दहभूभारं नतयोगौद्र जगतीपालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥९३॥
स्थापना करने, सज्जनोंका रक्षा तथा दुष्टोंका विनाश करनेके लिए ही मैने यह अवतार लिया है। स्त्रियोंको अपना दुर्लभे पातिव्रत्य धर्मकी रक्षा करनी चाहिए। यह मैंने तुम्हें उपदेश दिया है। इससे कहीं कुपित न हो जाना ॥८१-८४॥ इस प्रकार वारम्बार सीताको आश्वासन देकर रामने उन्हें फिर हर्षित कर दिया और उन भये हुए हृदयके भयको दूर किया। फिर उन्होंने मद्यपियोंको साथ लेकर मङ्गलमय मद्य। यहाँ मन्त्रीमंण्डलके भाषण परस्पर ॥८५॥ इस अवसर पर महान् भोजन किया। फिर ताम्बूल खाकर नारद रामकी स्तुति करने लगे ॥८७॥ नारदने कहा- मैं उन रामको मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ जो मुनियों के विश्रामस्थान हैं, नियन्त्रकके हृद्गत हैं, उन का आनन्द देनेवाले, माताको प्रसन्न रखनेवाले, सुन्दर, सनातन, राजा राम, मेघके सदृश श्याम वर्णवाले, नागा आदिके वरदाता, विद्वान् प्रचित्र उन भूपाल रामको, जिनका प्रभाव आप देवताओं तक पहुँचाया गया, को प्रणाम करता हूँ । ८८ ।। अनेक राक्षसोंके बाण लगानेवाले, जलधके आधार, बाणोंके धारक, समुद्रपर सेतु बाँधने और अनेक प्रकारके कौतुक करनेवाले, सुग्रीवादिओको आनन्ददाता, नारियोंके प्रसन्नकर्ता और मध्यम कस्तूरीका तिलक लगानेवाले आप रामको मैं प्रणाम करता हूँ । ८९ ॥ लक्ष्मीके पति, जगत्पति, अच्छे-अच्छे भक्तोंके वन्दित, जिनके स्तुतसे सन्त हैं, जो मागनेपर मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा पृथ्वीकी पुत्री सीताके पति हैं विश्वामित्रकी सृष्टि से जिनका संकोच नष्ट हो गया है, ऐसे महान् सात तालके वृक्षोंको काटने-वाले आप रामको मैं मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ ॥९०। सीताको प्रसन्न करनेवाले समस्त विश्वके ईश, पृथ्वीके ईश देववृन्दोंके अधिपति, (सुग्रीवको) का भय दूर करनेवाले, रावणके विनाशकारी, रावणके भ्राता विभीषणका लंकाका राज्य देनेवाले, सुग्रीवको किष्किन्धाका अधिपति बनानेवाले, वानरोंके अधिपति सुग्रीवका भली भाँति रक्षण करनेवाले और महान् सात वृक्षोंको काटनेवाले रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९१ ॥ लक्ष्मीके नाथ, जगत्के नाथ, नृपनाथके नाथ, राजाओंके राजा, चित्र, असुर, देवता, पन्नग तथा गन्धर्वोके नायक, धनुष और तरकस लेकर तीव्रगमन महोत्साह से गता राम जिन्होंने महान् तालवृक्षोंको काट गिराया था, मैं उनको प्रणाम करता हूँ ॥ ९२ । ईश, जगत्के ईश, जम्बूद्वीपके ईश, समस्त लोकपालोंके