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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७१७

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७१७

भोः सुतीक्ष्ण यथा पृष्टं त्वया मम पुरा शुभम् । तथा श्रीरामकवचं मया ते विनिवेदितम् ॥८२।
श्रीरामदास उवाच
एवं शिष्य त्वया पृष्टं श्रीरामकवचं वरम् । हनुमत्कवचं चापि तथा ते विनिवेदितम् ॥८३॥
वायुपुत्रस्य रामस्य कवचञ्च नरैर्भुवि । विना सीताकवचेन पठनीयं न वै कदा ॥८४॥
आदौ पठित्वा कवचं वायुपुत्रस्य धीमतः । पठनीयं ततः सीताकवचं सौख्यवर्धनम् ॥८५॥
ततः श्रीरामकवचं पठनीयं महत्तमम् । एवमेव हि मंत्राश्च जपनीयास्त्रयः क्रमात् ॥८६।
विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि सीतायाः कवचं शुभम् । तथान्यान्यपि वैदेह्याः स्तोत्रादीनि वदस्व तत् ॥८७ ।
सीतायास्तोषदं भूम्यां तत्सर्वं विस्तरेण च ।
श्रीमहादेव उवाच
इति तद्वचनं श्रुत्वा रामदासोऽब्रवीद्वचः ॥८८॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे कवचद्वयवर्णनं नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥


चतुर्दशः सर्गः

( सीताकवच आदिका निरूपण )
श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि सीतायाः कवचं शुभम् । पुरा प्रोक्तं सुतीक्ष्णाय पृच्छते कुंभजन्मना ॥ १ ॥
एकदा कुंभजन्मानं सुतीक्ष्णः प्राह वै मुनिः । रहः स्थितं गुरुं दृष्ट्वा प्रणम्य भक्तिपूर्वकम् । २ ।
सुतीक्ष्ण उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि सीतायाः प्रीतिदानि हि ।
यानि स्तोत्राणि कर्माणि तानि त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
अगस्तिरुवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । भादौ वक्ष्याम्यहं रम्यं सीतायाः कवचं शुभम् ॥ ४ ॥


॥ ८१ । हे सुतीक्ष्ण ! जैसा तुमने मुझसे पूछा था, मैन श्रीरामकवच तुम्ह सुना दिया। ८२ ॥ श्रीरामदास कहते हैं-हे शिष्य ! तुमने हमसे श्रीरामकवच और हनुमत्कवच पूछा था, सो मैन कह सुनाया ॥ ८३ ॥ रामकवच तथा हनुमत्कवचका पाठ सीताकवचके बिना न करना चाहिए ॥ ८४ ॥ पहले बुद्धिमान् वायुपुत्रके कवचका पाठ करके सुख बढ़ानेवाले सीताकवचका पाठ करना चाहिए ॥८५॥ उसके बाद सर्वश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रकवचका पाठ करना चाहिए । इस तरह इन तीनों कवचोंका एक साथ पाठ करे । ८६ ।। विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! मैं सीताकवच तथा सीताके अन्यान्य स्तोत्रोंको सुनना चाहता हूँ, सो आप मुझसे कहिए ॥ ८७ ॥ जिससे सीताजी प्रसन्न हो सकें, वह सब स्तुतियाँ विस्तारपूर्वक कहें। श्रीमन्महादेवजीने कहा कि इस प्रकार विष्णुदासकी बात सुनकर रामदास बोले । ८८ ।। इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

श्रीरामदास कहने लगे-हे शिष्य ! अब मैं सीताकवच बतलाता हूँ, जिसे अगस्त्यजीने सुतीक्ष्णसे कहा था ॥ १ ॥ एक बार जब कि अगस्त्यजी एकान्तमें बैठे थे, सुतीक्ष्णने जाकर भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और कहा-हे गुरो ! मैं सीताजीको प्रसन्न करनेवाले स्तोत्र और कवच सुनना चाहता हूँ। आप कृपा करके

७१८आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

या जाताऽवनिमतस्ततः स्वतनयारूपेण मन्दारिना पद्माक्षनृपतेः सुता लङ्कां गता या मातुलुङ्गोद्भवा ।
या रत्ने लयम् गता उदधौ नृपगृहे जाता पुनर्या या नामाङ्गलवना शशाङ्कमुखा मां पातु रामप्रिया ॥ ५ ॥

अस्य श्रीसीताकवचमन्त्रस्य अगस्त्य ऋषिः । श्रीरामा देवता । अनुष्टुप्छन्दः । रामेति बीजम् । जनकजेति शक्तिः । अवनिजेति कीलकम् । पद्माक्षनुतेत्यस्त्रम् । मातुलुङ्गीति कवचम् । मूलकणुरुधेति मन्त्रः । श्रीमत्परमचन्द्रान्वयसकलकामदासिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ अङ्गुलिन्यासः— ॐ ह्रीं सीतायै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं रामायै तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ह्रीं जनकजायै मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं अवनिजेत्यै अनामिकाभ्यां नमः ॐ ह्रां पद्माक्षनुतायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः अः मातुलुङ्गे करपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः कार्यः ।

अथ ध्यानम्

सीतां कमलपत्राक्षीं विद्युत्पुञ्जसमप्रभाम् । द्विभुजां सुकुमाराङ्गीं पीतकौशेयवासिनीम् ॥ ६ ॥
सिंहासने रामचन्द्रवामभागस्थितां वराम् । नानालङ्कारसंयुक्तां कुण्डलद्वयधारिणीम् ॥ ७ ॥
चूडाकङ्कणकेयूररशनादिसुशोभिताम् । श्रीमन्तं रुचिरं बिभ्रतीं तिलकेन च ॥ ८ ॥
मयूराकारनेत्राग्रं मण्डलाग्रं शोभितां शुभाम् । हरिद्रां कज्जलं दिव्यं कुङ्कुमं कुसुमानि च ॥ ९ ॥
बिभ्रतीं सुगन्धिद्रव्यं सुगन्धस्नेहमुत्तमम् । स्मितवदनां गौरवर्णीं मन्दारकुसुमं करे ॥ १० ॥
बिभ्रन्तीमपरं हस्ते मातुलुङ्गमुत्तमम् । रम्यनासां च बिम्बोष्ठीं चन्द्रवाहनलोचनाम् ॥ ११ ॥
कलानाथसमानास्यां कम्बुकण्ठमनोहराम् । मातुलुङ्गोद्भवां देवीं पद्माक्षदुहितां शुभाम् ॥ १२ ॥
मैथिलीं रामदयितां दासीभिः परिवेष्टिताम् । एवं ध्यात्वा जनकराज्ञीं हेमकुम्भपयोधराम् ॥ १३ ॥
सीतायाः कवचं दिव्यं पठनीयं शुभावहम् ॥ १४ ॥
श्रीसीता पूर्वतः पातु दक्षिणेऽवतु जानकी । प्रतापरूपा तु वैदेही पातूदीच्यां च मैथिली ॥ १५ ॥
अधः पातु मातुलुङ्गी ऊर्ध्वं पद्माक्षजाऽवतु । मध्येऽवनिमुता पातु सर्वतः पातु मां रमा ॥ १६ ॥


कहिए ॥ २ ॥ ३ ॥ अगस्त्यजीने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सावधान होकर सुनो । पहले मैं सीताजीका कवच सुनाता हूँ ४ । जो सीता पृथ्वीसे उत्पन्न हुईं और मिथिलानरेशके द्वारा पाली-पोसी गयीं, जो मातुलुङ्गीसे उत्पन्न होकर पद्माक्ष नामक राजाकी पुत्री कही गयीं, जो समुद्रके रत्नोंमें लीन हुईं और बार बार लङ्का गयीं, ऐसी मन्दारकी, शूलहस्ता और रामकी प्रेयसी सीता मेरी रक्षा करे ॥ ५ ॥

"अस्य श्री" से लेकर "एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः" यहां तक विनियोग तथा अङ्गन्यासका विधान बतलाया गया है । इसके बाद ध्यान है । जिसका भाव इस प्रकार जानना चाहिए—कमलकी पखुडियोंके समान जिनके नेत्र हैं, विद्युत्पुञ्जके समान जिनकी कान्ति है, जिनके दो भुजाये हैं और जो पीताम्बर पहने हैं । जो सिंहासनपर रामके वामभागमें बैठी हैं, कानोंमें कुंडल पहने हैं कुन्द चूड़ामणि भुजाओंमें केयूर तथा कमरमें करधनी पहने हैं, जिनके समन्ताद्भाग सूर्य-चन्द्रमाके समान आभूषण सुशोभित हो रहे हैं माथेमें तिलक लगा हुआ है नाकमें मयूरके आकारका सुन्दर आभूषण पड़ा है ॥ ६-९ ॥ हरिद्रा, काजल, कुंकुम, विविध प्रकारके फूल तथा तरह तरहके सुगंधित द्रव्य और इत्र आदि चमक रहे हैं, जिनका मुस्कराता हुआ मुखमण्डल है, गौर वर्ण है, जो एक हाथमें मन्दारक फूल लिये हैं, दूसरे हाथमें उत्तम मातुलुङ्ग विराजमान है, जिनकी मृदु मुस्कान है, बिम्बके समान ओष्ठ हैं मृगके नेत्रोंके समान जिनके नेत्र हैं, चन्द्रमाके समान मुख है, शङ्खके समान जिसकी गाढी वाणी है, जो मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) से उत्पन्न होनेवाली पद्माक्ष नृपतिकी पुत्री और रामकी भामिनी हैं, जिन्हें दासियाँ पंखा झल रही हैं, सुवर्णकलशके समान जिनके स्तन हैं, ऐसी सीताका ध्यान करके इस दिव्य सीताकवचका पाठ करना चाहिए ॥ १०-१४ ॥ पूर्वकी ओर सीता मेरी रक्षा करें, दक्षिणकी तरफ जानकी रक्षा करे, पश्चिमकी वैदेही रक्षा करें, उत्तरकी मैथिली रक्षा करें ॥ १५ ॥ निचला

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् [ ७१९

स्मितानना शिरः पातु पातु भालं नृपात्मजा । पद्माऽवतंसाऽधोर्ध्वञ्चे मृगाक्षी नयनेऽवतु ॥१७॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामवल्लभा । नासाग्रं मक्षिका पातु पातु वक्त्रं तु राजसी ॥१८॥
तामसी पातु दन्तानी पातु जिह्वां पतिव्रता । दन्तान् पातु महामाया चिबुकं कनकप्रभा ॥१९॥
पातु कण्ठं सौम्यरूपा स्कंधौ पातु सुगन्धिनी । भुजौ पातु वरारोहा करौ कंकणमण्डिता ॥२०॥
नखान् रक्तनखा पातु कुक्षी पातु लघूदरा । पृष्ठं पातु गदापानी पार्श्व गन्धप्रमोदिनी ॥२१॥
पृष्ठदेशे वह्निगुप्ताऽवतु मां सर्वदैव हि । दिव्यप्रदा पातु नाभिं कटिं राक्षसमोहिनी ॥२२॥
गुह्यं पातु रत्नगुप्ता लिंगं पातु हरिपिया । ऊरू पातु रमेशानी जानुनी विषमप्रभा ॥२३॥
जंघे पातु सदा सुभ्रूर्गुल्फौ चामरवीजिता । पादौ कल्पलता पातु पादांगानि कृशोंदिका ॥२४॥
पादांगुलीः सदा पातु मम नूपुरनिःस्वना । रोमाण्यवतु मे नित्यं पीतकोशेयवासिनी ॥२५॥
रात्रौ पातु कालरूपा दिने दर्शनतत्परा । सर्वकालेषु मां पातु मूलकासुरघातिनी ॥२६॥
एवं सुतीक्ष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् । इदं प्रातः समुत्थाय स्नात्वा नित्यं पठेत्तु यः ॥२७॥
जानकीं पूजयित्वा च सर्वान्कामानवाप्नुयात् । धनार्थी प्राप्नुयाद् द्रव्यं पुत्रार्थी पुत्रमवाप्नुयात् ॥२८॥
स्त्रीकामार्थी शुभां नारी सुखार्थी सौख्यमवाप्नुयात् । अष्टवारं जपनीयं सीतायाः कवचं यदा ॥२९॥
अष्टभ्यो विप्रवर्य्येभ्यो नमः प्रीत्याऽर्पयेन्मनः । फलपुष्पादिसहितानि यानि दानि पृथक् पृथक् ॥३०॥
सीतायाः कवचं चेदं पुण्यं पापनाशनम् । ये पठन्ति नरा भक्त्या ते धन्या मानवा भुवि ॥३१॥
पठति रामकवचं सीतायाः कवचं विना । तथा विना लक्ष्मणस्य कवचेन वृथा स्मृतम् ॥३२॥
तस्मात्तु सदा संजप्यं कवचानां चतुष्टयम् । आदौ तु वायुपुत्रस्य लक्ष्मणस्य ततः परम् ॥३३॥
ततः पठेच्च सीतायाः श्रीरामस्य ततः परम् । एवं सदा जाप्यं कवचानां चतुष्टयम् ॥३४॥
इति सीताकवचम् ।


भालको नृपात्मजा, ऊपर पद्मावतंसा, अधोभागको अनतिसुता और मृगी और दृग रक्षा करें ॥ १७ ॥
स्मितानना मुखकी, नृपात्मजा मस्तककी, भौंहोंके बीचमें पद्मा और दृग तथाकी मृगाक्षी रक्षा करे ॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी प्रेयसी कपोल और कर्णमूलकी रक्षा करे, नासिकाके अग्रभागकी राजसी मुखकी,
तामसी वाणीकी, पतिव्रता जिह्वाकी, महामाया दाँतकी, कनकप्रभा चिबुककी, सौम्यरूपता कण्ठकी, सुगन्धिता
कन्धोंकी, वरारोहा बाहुकी और कंकणमण्डिता हाथोंकी रक्षा करे ॥ १८-२० ॥ रक्तनखा नाखुनोंकी, लघूदरा
कुक्षिकी, गदापाणी पीठकी, पार्श्वभागकी गन्धमोदिनी और वह्निगुप्ता सदा मेरे पृष्ठदेशकी रक्षा करे ।
दिव्यप्रदा मेरी नाभिका और राक्षसमोहिनी कमरकी रक्षा करे ॥ २१-२२ ॥ रत्नगुप्ता गुदाकी और हरिप्रिया
लिंगकी रक्षा करे। रमेशानी दोनों घुटनोंकी और विषमप्रभािणी जानुभागकी रक्षा करे ॥ २३ ॥ सुभ्रू जंघोंकी,
चामरवीजिता गुल्फकी तथा कृशाङ्गिका शरीरके सब अङ्गोंकी रक्षा करे ॥२४॥ कल्पलता पैरोंकी उँगलियों-
की और पीताम्बरधारिणी मेरे रोमांकी रक्षा करे ॥ २५ ॥ रात्रिके समय कालरूपा, दिनको दर्शनतत्परा और
सब समय मूलकासुरघातिनी मेरी रक्षा करे । २६ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सीता कवच सुनाया ।
जो प्राणी सवेरे स्नानाके बाद नित्य इसका पाठ करके जानकीजीका पूजा करता है, वह अपनी सब इच्छायें
पूर्ण कर लेता है। धनको चाहनेवाला धन और पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र पाता है ॥ २७ ॥ २८ ॥
स्त्रीकी कामनावाला सुन्दरी स्त्री और सुख चाहनेवाला सौख्य पाता है। उपासकको चाहिए कि सदा आठ
बार सीता-कवचका जप करे । आठ ब्राह्मणोंको फलपुष्प आदि वस्तुयें पृथक-पृथक् दान दे ॥ २९ ॥ ३० ॥
यह सीतकवच बड़ा पवित्र और पापोंका नाशक है । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे
प्राणी संसारमें धन्य हैं ॥ ३१ ॥ जो लोग सीता तथा लक्ष्मणकवचका पाठ करते हैं, उनका वह पाठ व्यर्थ हो
जाता है ॥ ३२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा इन चारो कवचोंका पाठ करे । इसका क्रम इस प्रकार है-
पहले हनुमान्जीका, फिर लक्ष्मणका, इसके बाद सीताका, तदनन्तर श्रीरामकवचका पाठ करना चाहिए

७२०आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

परं सुतीक्ष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् । अतः परं शृणुष्वान्यन्सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥३५॥
यस्मिन्नष्टोत्तरशतं सीतानामानि संति हि । अष्टोत्तरशतं सीतासाम्नां स्तोत्रमनुत्तमम् ॥३६॥
ये पठंति नरास्त्वत्र तेषां च सफलो भवः । ते धन्या मानवा लोके ते वैकुंठं व्रजंति हि ॥३७॥
अस्य श्रीसीतानामाष्टोत्तरशतमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । रमेति बीजम् । मातुलुंगीति शक्तिः । पद्माक्षजेति कीलकम् । अवनिजेत्यस्त्रम् । जनकजेति कवचम् । मूलकासुर-मर्दिनीति परमो मन्त्रः । श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे सकलकामनासिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
अथांगुलिन्यासः । ॐसीतायै अंगुष्ठाभ्यां नमः ! ॐरमायै तर्जनीभ्यां नमः । ॐमातुलुङ्ग्यै मध्यमाभ्यां नमः । ॐपद्माक्षजायै अनामिकाभ्यां नमः । ॐअवनिज्ञायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ! ॐजनकजायै करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अथ हृदयादिन्यासः । ॐसीतायै हृदयाय नमः । ॐरमायै शिरसे स्वाहा । ॐमातुलुङ्ग्यै शिखायै वषट् । ॐपद्माक्षजायै नेत्रत्राय वषट् । ॐजनकत्मजायै अस्त्राय फट् । ॐमूलकासुरमर्दिन्यै इति दिग्बन्धः ।
अथ सीतानामाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ।
वामांगे रघुनाथस्य रुचिरे या संस्थिता शोभना या विप्रान्धिव्यान्नगम्यनयना या विप्रपद्मानना ।
विद्युत्पुंजविराजमानवसना भक्तातिसंखण्डना श्रीमद्राघवपादपद्मयुगलन्यस्तेक्षणा साऽवतु ॥३८॥
श्रीसीता जानकी देवी वैदेही राघवप्रिया । रमाऽवनिसुता रामा राक्षसान्तप्रकारिणी ॥३९॥
रत्नगुप्ता मातुलुङ्गी मैथिली भक्ततोषदा । पद्माक्षजा कंजनेत्रा स्मितास्या नूपुरस्वना ॥४०॥
वैकुंठनिलया मा श्रीर्मुक्तिदा कामपूरणी । नृपात्मजा हेमवर्णा मृद्वङ्गी सुभाषिणी ॥४१॥
कुशांबिका दिव्यदा च लवमाता मनोहरा । हनुमद्वन्दितपदा मुग्धा केयूरधारिणी ॥४२॥
अशोकवनमध्यस्था रावणादिकमोहिनी । विमानमध्यस्था सुभ्रूः सुकेशी रत्ननान्विता ॥४३॥

॥ ३३ । ३४ ॥ अगस्त्यजी कहते हैं—हे सुतीक्ष्ण ! इस तरह मैने तुम्हें सीताकवच सुनाया। इसके अनन्तर सीताजीका एक दूसरा स्तोत्र सुनाता हूँ ॥ ३५ ॥ जिसमें एक सौ आठ सीताके नाम गिनाये गये हैं। इसलिए इसका नाम "सीतानामाष्टोत्तरशतनाम" रखा गया है । ३६। जो मनुष्य इसका पाठ करते हैं, उनका जन्म सफल हो जाता है। वे मनुष्य धन्य हैं और वे अन्तमें वैकुण्ठलोकको जाते हैं ॥ ३७ ॥ "अस्य श्रीः" यहाँसे "मूलकासुरमर्दिन्यै" यहाँ तक विनियोग तथा अङ्गन्यास आदिका विधान बतलाया गया है ॥ अथ ध्यानम् ॥ जो एक सुन्दर सिंहासनपर रामके वामांगमें बैठी हैं, पूणके नेत्रोंकी भाँति जिसके नेत्र हैं, जो चन्द्रवदनी हैं, जो बिजलीके समूहकी तरह चमकनेवाले कपड़े पहने हैं, जो अपने भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेमें कुछ भी कसर नहीं रखतीं, जिनके नेत्र श्रीरामचन्द्रजीके चरणमें लगे हुए हैं, वे सीता हमारी रक्षा करें ॥ ३८ ॥ अब यहनाम शतनाम कहता हूँ। जैसे—(१) श्रीसीता, (२) जानकी (३) देवी, (४) वैदेही अर्थात् विदेह जनककी पुत्री, (५) राघवप्रिया, (६) रमा (७) अवनिसुता (पृथ्वीकी कन्या), (८) रामा, (९) राक्षसान्तप्रकारिणी (राक्षसों- का नाश करनेवाली), (१०) रत्नगुप्ता, (११) मातुलुङ्गी (१२) मैथिली, (१३) भक्ततोषदा (भक्तोंको प्रसन्न करनेवाली) (१४) पद्माक्षजा (पद्माक्षनामक राजाकी कन्या) (१५) कंजनेत्रा (कमलके समान नेत्रोंवाली), (१६) स्मितास्या (जिसका मुस्कराता हुआ मुख है), (१७) नूपुरस्वना, (१८) वैकुण्ठानिलया (वैकुण्ठलोकमें निवास करनेवाली), (१९) मा (२०) श्री, (२१) मुक्तिदा, (२२) कामपूरणी (अपने भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेवाली), (२३) नृपात्मजा, (२४) हेमवर्णा, (२५) मृद्वङ्गी (जिसका कोमल अङ्ग है), (२६) सुभाषिणी ॥ ३९-४१ ॥ (२७) कुशांबिका (कुशकी माता (२८) दिव्या (लंकासे लौटनेपर रामके कटु वाक्य सुनकर शपथ खानेवाली, २९) लवमाता, (३०) मनोहरा, (३१) हनुमद्वन्दितपदा (हनुमान्जीने जिसके चरणोंकी वन्दना की थी), (३२) मुग्धा (३३) केयूरधारिणी, (३४) अशोकवनमध्यस्था (अशोकवनमें निवास करनेवाली

सर्गः १४] मनोहरकाण्डम् ७२१


रजोरूपा सत्वरूपा तामसी वह्निवासिनी । हेममृगापक्तचित्ता वाल्मीक्याश्रमवासिनी ॥४४॥
पतिव्रता महामाया पीतकौशेयवासिनी । मृगनेत्रा च विद्रोही धनुर्विद्याविशारदा ॥४५॥
सौम्यरूपा दशरथस्नुषा चामरवीजिता सुमेधादुहिता दिव्यरूपश त्रैलोक्यपालिनी ॥४६॥
अन्नपूर्णा महालक्ष्मीर्धीर्लज्जा च सरस्वती । शान्तिः पुष्टिः क्षमा गौरी प्रभाऽयोध्यानिवासिनी ॥४७॥
वसन्तशीतला गौरा रसातलमृतप्लावना रसानासमग्रसंस्था हेमकेयूरमण्डिता ॥४८॥
सुरार्चिता धृतिः कीर्तिः स्मृतिमंधा विभावरी । लघुदरा वरारोहा हेमकुण्डलमण्डिता ॥४९॥
द्विजपत्न्यर्पितनिजभूषा राघवतोषिणी । श्रीरामसेवनरता रत्नताटङ्कधारिणी । ५०।
रामवामांगसंस्था च राघवच्छेदकारणी शरयूरसक्रीडाकारिणी राममोहिनी । ५१॥
सुवर्णतुलिता पुष्पा पुण्यकीर्त्तिः कलस्वती । कलगण्ठा कम्बुकण्ठा २भेरूर्मजगामिनी । ५२.
रामचिन्तमना रामवन्दिता रामवल्लभा । श्रीरामपदचिह्नाङ्का रामरामेति भाषिणी ५३।
रामपर्यङ्कशयना रामांप्रिक्षालिनी वरा । कामधेनुप्रसन्तुष्टा मातुलुङ्गकरे धृता । ५४ ।
दिव्यचन्दनसंस्था श्रीमूककासुरमर्दिनी । एवमष्टोत्तरशतं सीतानाम्नां सुपुण्यदम् । ५५ ।
ये पठंति नरा भूमौ ते धन्याः स्वर्गगामिनः । अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् । ५६
जपनीयं प्रयत्नेन सर्वदा भक्तिपूर्वकम् । सन्ति स्तोत्राण्यनेकानि पुण्यदानि महान्ति च ॥५७॥


(३५) रावण निकृन्तयिनी, (३६) विमानगता (३७) मुदा (३८) मृगेशी, (३९) रत्नमण्डिता (४०) रजोरूपा (४१) सत्वरूपा (४२) तामसी, (४३) वह्निवासिनी (अग्निमें निवास करनेवाली), (४४) हेममृगा-सक्तचित्ता (सुवर्णके मृगमें जिनका मन आसक्त हो गया था) (४५) वाल्मीक्याश्रमवासिनी (वाल्मीकिके आश्रममें निवास करनेवाली) । ४४ ॥४० (४६) पतिव्रता (४७) महामाया, (४८) पीतकौशेयवासिनी (रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाला), (४९) मृगनेत्रा, (५०) विद्रोही, (५१) धनुर्विद्याविशारदा (धनु-विद्यामें निपुण) (५२) सौम्यरूपा (५३) दशरथस्नुषा (५४) चामरवीजिता, (५५) सुमेधादुहिता, (५६) दिव्यरूप, (५७) त्रैलोक्यपालिनी (५८) अन्नपूर्णा (५६) महालक्ष्मी, (६०) धी, (६१) लज्जा, (६२) सरस्वती, (६३) शान्ति, (६४) पुष्टि (६५) क्षमा (६६) गौरा, (६७) प्रभा, (६८) अयोध्या-निवासिनी, (६६) वसन्तशीतला, ७०) गौरा (७१) रसातलमृतप्लावना (वर्षाके ऋतुमें शीतलता होती उसके अनुसार हरण करनेसे सन्तुष्ट रहनेवाली (७२) रसानासमग्रसंस्था, ७३) हेमकेयूरमण्डिता, (७४) सुरार्चिता, (७५) धृति (७६) कीर्ति (७७) स्मृति, (७८) मेधा, (७६) विभावरी, (८०) लघुदरा, (८१) वरारोहा । ८२) हेमकुण्डलमण्डिता ॥ ४५-४९। (८३) द्विजपत्न्यर्पितनिजभूषा (जिसने अपने सब आभूषण एक ब्राह्मणीको दे दिये थे), (८४) राघवतोषिणी, (८५) श्रीरामसेवनरता, (८६) रत्नताटङ्क-धारिणी (रत्नके बने कर्णफूल पहननेवाली) ॥ ५० ॥ (८७) रामवामांगसंस्था, (८८) राघवच्छेदकारिणी, (८९) शरयूरसक्रीडाकारिणी (सरयूर्जाके जलमें विहार करनेवाला, ९०) राममोहिनी, (९१) सुवर्ण-तुलिता, (९२) पुष्पा (९३) पुण्यकीर्ति, (९४) कलस्वती, (६५) कलगण्ठा, (६६) कम्बुकण्ठा, ९७) गम्भीरा, (६८) गजगामिनी, (६९) रामचिन्तमना, (१००) रामवन्दिता, (१०१) रामवल्लभा, (१०२) श्रीरामपदचिह्नाङ्का (जिनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणका चिह्न विद्यमान है), (१०३) रामरामेतिभाषिणी (सदा राम राम कहनेवाली) (१०४) रामपर्यङ्कशयना, (१०५) रामांघ्रिक्षालिनी (रामके पैर धोनेवाली), (१०६) कामधेनुप्रसन्तुष्टा, (१०७) मातुलुङ्गकरधृता, (१०८) दिव्यचन्दनसंस्था शूलकासुरघातिनी (दिव्य चन्दनपर स्थित एवं शलकासुरका नाश करनेवाली) ये एक सौ आठ सीताजीके नाम बड़े पुण्यदायी हैं ॥ ५१-५५ ॥ जो लोग इस अष्टोत्तरशतनामक पाठ करते हैं, वे धन्य और स्वर्गगामी होते हैं । यह स्तोत्र सर्वोत्तम है ॥ ५६ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा भक्तिपूर्वक इसका पाठ किया करें । यद्यपि बहुतसे बड़े-बड़े और-और पुण्यदायक स्तोत्र हैं, किन्तु हे भूसुर ! वे सब इसके

७२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १४

दानेन सदृशानीह तानि सर्वाणि भूसुर। स्तोत्राणामुत्तमं चेदं भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥५८॥
एवं सुतीक्ष्ण ते प्रोक्तमष्टोत्तरशतं शुभम्। सीतानाम्नां पुण्यदं च श्रवणान्मङ्गलप्रदम् ॥५९॥
नरैः प्रातः समुत्थाय पठितव्यं प्रयत्नतः। सीतापूजनकालेऽपि सर्ववाञ्छितदायकम् ॥६०॥
अन्यत्सीतातोषदानि व्रतादीनि महान्ति च। यानि संत्यत्र ते शिष्य तानि सम्यग्वदाम्यहम् ॥६१॥
नारीभिस्तु सदा कार्यं सीतायास्तुष्टिहेतवे। वसन्तशीतलागौरीस्नानं तथै तु तत्कृते ॥६२॥
यत्र सीताकृतं तीर्थं रामतीर्थं न वर्तते। तथा लक्ष्म्याश्च गौर्याश्च सरस्वत्यादियोषिताम् ॥६३॥
तीर्थेषु च सदा कार्यं तदभावे नदीषु च। यत्र यत्र रामतीर्थं तद्वामे जानकीकृतम् ॥६४॥
ज्ञेयं तीर्थं तु सर्वत्र नैकं ज्ञेयं तु राघवम्। वसन्तशीतलागौरीस्नानं सौभाग्यवर्धनम् ॥६५॥
न कुर्वन्त्यथ या नार्यः स्नानन्ताः सप्तजन्मसु। भवन्ति विधवास्तस्मात्सदा स्नानं समाचरेत् ॥६६॥

सुतीक्ष्ण उवाच
भो गुरो शीतलागौरीस्नानस्योद्यापनं कथम्। स्त्रीभिः कार्यं वदस्वाद्य सविस्तारं शुभावहम् ॥६७॥

अगस्तिरुवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सुतीक्ष्ण शृणु सादरम्। चैत्रमासे सिते स्त्रीभिस्तृतीयायाः षडाह्न वै ॥६८॥
कार्यं तु शीतलागौरीस्नानं त्रिंशद्दिनानि हि। वैशाखस्य सिते पक्षे द्वितीयायामुपोष्य च ॥६९॥
स्त्रीभिश्च विधिना कार्यं निशायामधिरोचनम्। पूर्वोक्तञ्च प्रकर्तव्यं मण्डपादिकमुत्तमम् ॥७०॥
तत्र रघूनामपदमष्टोत्तरसहस्रकम्। अथवाऽष्टोत्तरशतं वृक्षाणान्यन्यानि वा क्रमात् ॥७१॥
स्थापनीयं मध्यदेशे तन्मध्ये पद्मजोपरि। धान्यराशिं तोयपूर्णः स्थापनीयो घटः शुभः ॥७२॥
तन्मुखे ताम्रपात्रं च स्थापनीयं तु विस्तृतम्। आच्छाद्य पात्रं कौशेयवस्त्रेण तन्मनोरमम् ॥७३॥
तस्मिन्सीतारामयोश्च द्वे मूर्ती रूपविनिर्मिते। स्थापनीये पूजनीये षोडशैरुपचारकैः ॥७४॥
नवमाषात्मको रामः सीताऽष्टमाषनिर्मिता। निजशक्त्याऽथवा कार्ये द्वे मूर्ती रजतस्य वा ॥७५॥

बराबर नहीं हो सकते । यह स्तोत्र सब स्तोत्रोंमें उत्तम तथा भुक्ति-मुक्तिदायक है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
हे सुतीक्ष्ण ! इस तरह मैंने तुमसे सीताजीका अष्टोत्तरशतनाम कहा, जो पुण्यदायक और सुननेसे
मङ्गलदाता है ॥ ५९ ॥ लोगोंका चाहिय कि रोज सबेरे उठकर और सीताका पूजन करके अवश्य
इसका पाठ करें । ऐसा करनेसे उनके कामनाएं पूर्ण हो जायँगी । इसके अतिरिक्त और भी बहुतसे ऐसे व्रत
आदि हैं, जिनसे सीताजी प्रसन्न हो सकती हैं। हे शिष्य ! उन्हें आज मैं तुम्हें बतलाता हूँ । ६० । ६१ ॥ सीताजी-
को प्रसन्न करनेके लिए स्त्रियोंको चाहिए कि सीताके द्वारा स्थापित किसी भी तीर्थमें जाकर शीतलागौरीका
व्रत करे ॥ ६२ ॥ यदि आसपास कोई सीताकृत न हो तो लक्ष्मी, गौरी तथा सरस्वती आदि किसी भी
देवीके तीर्थमें उक्त जप करें । यदि वह भी न हो तो किसी नदीके तटपर जाकर व्रत करें । जहाँ-जहाँ
रामतीर्थ है, उसके वामभागमें सीतातीर्थ अवश्य रहता है। कहींपर भी अकेला रामतीर्थ नहीं रहता ।
वसन्तशीतला गौरी नामक व्रत स्त्रियोंका सौभाग्य बढ़ाता है ॥ ६३ ६४ ॥ जो स्त्रियां इस व्रतको नहीं करतीं,
वे सात जन्म तक नष्ट विधवा रहकर जीवन बिताती हैं। इससे स्त्रियोंको सदा शीतलागौरीका स्नान करना
चाहिए ॥ ६६ ॥ सुतीक्ष्णने कहा-हे गुरो ! इस शीतला गौरीका स्नान करनेके अनन्तर इसका उद्यापन कैसे
करना चाहिए। सो मुझे आप विस्तारपूर्वक बताइए । ६७॥ अगस्त्यजीने कहा-हे शिष्य सुतीक्ष्ण !
तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सुनो। चैत्रशुक्ल तृतीयासे लेकर तीस दिनतक शीतलागौरीका स्नान करें
और वैशाख शुक्ल द्वितीयाको उपवास करके रात्रिके समय पूर्वोक्त विधिके अनुसार मण्डप आदि बनावे
॥ ६८-७० । उसमें अष्टोत्तरसहस्रात्मक रघूनामतोभद्र, षष्टीत्तरशतात्मक या और कम संख्याका भद्र
बनाकर उसके मध्यमें कमलपर धान्यराशि रखकर जलसे भरा घट स्थापित करे । ७१ ॥ ७२ । कलशके
मुखपर एक बड़ा-सा ताम्रपात्र रक्खे और उसको रेशमी वस्त्रसे ढांक दे ॥ ७३ ॥ उसपर सुवर्णकी बनी हुई सीता