श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७
सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७
इत्युक्त्वा तत्करे सीता ददौ श्रीराममुद्रिकाम् । ततस्तां मारुतिः पृष्ट्वा नत्वा शीघ्रं ययौ पुनः ॥२७९॥
आरुरोह सुवेलाद्रिं चूर्णं तमकरोद्द्रुतम् एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा ददौ पत्रं सविस्तरम् ॥२८०॥
यद्यत्कृतं मारुतिना रक्षार्थं तस्य सूचकम् । तद्गृह्य मारुतिर्गन्त्वा पृष्ट्वा विधिं पुनः ॥२८१॥
तत उड्डीय वेगेन ययावाकाशवर्त्मना । कुर्वन् शब्दं महाघोरं कपीनामूर्ध्वतस्तदा ॥२८२॥
उदग्दिश्यतग किंचिन्पपात भुवि मारुतिः । ततो दृष्ट्वा कपीन्द्रस्तं ददृशे मुनिसत्तमम् ॥२८३॥
किंचिद्भ्रममाविष्टस्तं मुनिं प्राह मारुतिः । मया श्रीरामकार्यं तु कृतमस्ति मुनीश्वर ॥२८४॥
पानीयं पातुमिच्छामि दर्शयस्व जलाशयम् । तर्जन्या दर्शयामास मुनिस्तस्मै जलाशयम् ॥२८५॥
ततः स मारुतिर्मुद्रां मणिं पत्रं मुनेः पुरः । संस्थाप्य नीरं पातुं वै ययो कासारमुत्तमम् । २८६॥
ततस्तत्र कपिः कश्चिन्मुद्रिकां मुनिसंनिधौ । कमण्डलौ प्रक्षिपन्म पयो तारञ्च मारुतिः ॥२८७॥
गृहीत्वा तं मणिं पत्रं मुनिं पप्रच्छ मुद्रिकाम् । मुनिर्नूनेत्रसंज्ञया तस्मै कमण्डलुमदर्शयत् ॥२८८॥
दत्तः कमण्डलीं तूर्णं मुद्रिकामवलोकयन् । तावद्ददर्शान्वनेयस्तस्मिन् भोगममुद्रिकाः ॥२८९॥
दृष्ट्वा सहस्रशस्तत्र चकितः प्राह तं मुनिम् । कुतस्त्विमा मुद्रिकाश्चवद का मम मुद्रिका ॥२९०॥
एतासु त्वं मुनिश्रेष्ठ तदा तं मुनिरब्रवीत् । यदा यदा वायुपुत्रः सीतां तां राघवाज्ञया । २९१॥
लङ्कां गन्त्वा समानीता शुद्दिमुद्राम्तदा तदा । मदग्रे स्थापितास्ताश्च कपिभिश्च कमंडलौ ॥२९२॥
निक्षिप्तास्तास्त्विमाः सर्वा पश्यताम् स्वमुद्रिकाम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा गतगर्वस्तमब्रवीत् ॥२९३॥
कियंतो राघवाश्चात्र ममापाता मुनीश्वर । मुनिस्तं प्राह निष्कास्य गणयस्वाद्य मुद्रिकाम् । २९४॥
पर सवार हो जायें, तो मैं आपको ले चलकर आज ही रामका दर्शन करा दूँ ॥ २७७ ॥ जानकीने कहा—मुझे दूसरा कोई छुड़ाकर ले जाय, इस बातको भगवान राम सहन नहीं कर सकेंगे। इसलिए तुम इस अंगूठीको ले जाकर रामको दे दो । २७८ । इतना कहकर साताजीने हनुमानके हाथमें वह मुद्रिका दे दी । तब हनुमानजी सीताकी आज्ञा ले तथा नमस्कार करके शीघ्र ही लौट पड़े ॥ २७९ ॥ उन्होंने समुद्रके किनारे-वाले पर्वतपर चढ़कर उसे चूर्ण कर डाला । उस समय ब्रह्माने विस्तारपूर्वक एक पत्र लिखकर उन्हें दिया । २८० । जिसमें यह लिखा था कि लंकाम जाकर मारुतिने क्या-क्या काम किया है। उसको लेकर ब्रह्माकी आज्ञा ले तथा उन्हें नमस्कार करके हनुमान् पुन वहाँ से उड़कर आकाशमार्गसे घोर तथा महान् वानरोकी तरह शब्द करते हुए जोरसे चल पड़े ॥ २८१ ॥ २८२ ॥ उत्तर दिशाकी ओर कुछ दूर आगे जाकर नीचे उतरे या वहाँ उन्होंने एक मुनिको विराजमान देखा ॥ २८३ ॥ तब कुछ श्रमसे मारुतिने कहा हे मुनीश्वर ! मैं श्रीरामका काम करके आ रहा हूँ । २८४ । यहाँ मैं पानी पीनेकी इच्छासे आया हूँ मुझे कोई जलाशय बतलाइये । तब मुनिने उन्हें तर्जनी अंगुल से जलाशय बतला दिया । २८५ तदन्तर हनुमान् अंगूठी, चूडामणि तथा पत्र मुनिके पास रखकर उस उत्तम तालाबकी ओर जल पीने गये ॥ २८६ । इतनेमें किसी बन्दरने आकर रामकी मुद्रिकाको मुनिके पास रक्खे कमण्डलुमें डाल दिया । उधरस हनुमान्जी आ आ पहुंचे । २८७ ॥ चूडामणि तथा पत्रके विषयमें उन्होने मुनिसे पूछा कि मुद्रिका कहां गयी ? मुनिने भौंहोके संकेतसे कमण्डलु दिखाया ॥ २८८ ॥ जब हनुमान्ने कमण्डलुमें देखा तो उसमे श्रीरामकी हजारों मुद्रिकाएं दिखायी दीं । तब हनुमान्ने आश्चर्यचकित होकर मुनिसे पूछा कि इतनी अंगूठियें कहाँसे आयीं, सो बताइए ॥ २८९ ॥ २९० ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आप यह भी कहिये कि इनमेंसे मेरी मुद्रिका कौन-सी है ? मुनिने उत्तर दिया कि जब-जब श्रीरामकी आज्ञासे हनुमान् लंकामें जाकर सीताका पता लगाया है और अंगुलियें मेरे सामने रक्खी हैं तब-तब बन्दरोंने उन्हें इस कमण्डलुमें डाल दी हैं। वे ही ये सब हैं। इनमेंसे तुम अपनी अंगूठी खोज लो । मुनिके इस वाक्यको सुनकर हनुमान्का गर्व खर्च हो गया । तब उन्होंने मुनिसे कहा— ॥ २९१ ॥ २९२ । हे मुनीश्वर ! यहाँ कियन राम आये हैं ? मुनिने कहा—कमण्डलुमेंसे अंगूठियें निकालकर
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कमण्डलौर्जलिभिश्चाऽथ मुद्रिका मुहुः। बहिः क्षिपन्मारुतिर्न नांतं तासां ददर्श सः ॥२९५॥
पुनः कमण्डलीं कृत्वा मुनिं नत्वा कपिः क्षणम् । चिंतयामास मनसि मादृशैः शतशः पुरा ॥२९६॥
समानीतास्ति सीतायाः शुद्धिः का गणनाऽद्य मे। इति निश्चित्य मनसि गतगर्वस्तदा कपिः ॥२९७॥
पुनर्दक्षिणमार्गेण ययौ यत्रांगदादयः । प्रायोपवेशनस्थास्ते तं दृष्ट्वा तुष्टमानसाः ॥२९८॥
बभूवुर्वानराः सर्वे समालिंग्याथ तं मुहुः । ज्ञात्वा तन्मुखतः सीता दृष्टाऽशोकवने त्विति ॥२९९॥
ययुस्ते राघव भ्रातृ मार्गे सुग्रीवपालितम् । दृष्ट्वा मधुवनं सर्वे दृष्ट्वा तं वालिनंदनम् ॥३००।
फलानि भक्षयामासुर्दधिषक्त्रो न्यषेधयत् । तनस्ते ताडयामासुर्दधिषक्त्र कपीश्वरम् ॥३०१।
ज्ञात्वा तं मातुलंमपि सुग्रीवस्यांगदादयः । स गत्वा सकलं वृत्त सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥३०२।
सोऽपि श्रुत्वा जनकजा दृष्टा तैरित्यमन्यत । नोचेन्मधुवनं रम्य कथमश्नन्ति वानराः ॥३०३।
ततो विसर्जयामास दधिषक्त्रं कपीश्वरः मानिषेधस्त्वया कार्यश्चं द्राद्य प्रेषयस्व तान् ॥३०४॥
ममांतकं ततो गत्वा दधिषक्त्रस्तथाऽकरोत् । ततः सुग्रीववचनं श्रुत्वा तेन समीरितम् । ३०५।
युयुस्ते वानराः सर्वे गम वन्ता पुरःस्थिताः । ततो हर्षान्मार्ह्रुतः म ब्रह्मपत्र न्यवेदयत् ।३०६॥
दत्त्वा चूडामणिं राम काकवृत्तं न्यवेदयत् , सन्छ्रुत्वा सकल वृत्त ज्ञात्वा मारुतिना कृतम् ॥३०७॥
लङ्कायां वायुपुत्रेण रामस्तुष्टो बभूव सः समालिंग्य हनूमंतं राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३०८॥
त्ववोपकारिणश्चाऽहं न पश्याम्यद्य मारुते । कर्तुं प्रत्युपकारं ते धन्योऽसि जगतीतले ॥३०९॥
परिरंभो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः । अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुत्रक ॥३१०॥
यत्पादपद्मयुगलं तुलसीदलाद्यैः संपूज्य विष्णो पदवीमतुलां प्रयांति ।
गिन लो ॥ २९३ ॥ २९४ ॥ अब हनुमान् कमण्डलुमे अञ्जली भर-भरकर बारम्बार अँगूठियें बाहर निकालने लगे । पर कहीं उनको अन्त नहीं हुआ ॥ २९५ ॥ तब फिरसे उन्हें कमण्डलमें भर दिया और मुनिको नमस्कार करके क्षणभरके लिए वे मनमें विचार करने लगे कि आह ! पहिले मेरे जैसे सैकड़ों हनुमान् जाकर सीताकी खबर ले आये हैं तो मेरी कौन-सा गिनती है यह निश्चय करके वीर मारुति घमण्डको त्याग-कर दक्षिणमार्गमें जहाँ अङ्गदादि वानर बैठे थे, वहाँ गये। उपवासावस्थामें बैठे हुए वे सब वानर हनुमान्को देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ २९६-२९८ ॥ वे सब उभय बारम्बार हृदयसे लगाने लगे और उनके मुखसे यह सुनकर कि मैं सीताको अशोकवाटिका में देख आया हूँ ॥ २९९ । तब सबक सब तुरन्त रामका ओर चल पड़े, रास्ते में उन्हें सुग्रीवका सुरक्षित मधुवन दिखाई दिया। तब सब वानर बालिक पुत्र अङ्गदसे पूछकर । ३०१ ॥ उस वनके फल खाने लगे। जब उसके रक्षक दधिमुखने रोका तो वे उसको मारने लगे। ३०० ॥ यह जानकर भी कि यह सुग्रीवका मामा है तथापि उसे पीटकर ही छोड़ा तदनन्तर दधिमुखने जाकर सब हाल सुग्रीवको कह सुनाया। यह सुनकर सुग्रीवने समझ लिया कि उन्होंने जनकतनयाका पता पा लिया है नहीं तो वे लोग मधुवनके फल तोड़कर खाते ॥ ३०२ ॥ ३०३ ॥ पश्चात् कपीश्वर सुग्रीवने दधिमुखको समझाकर भेजा और कहा कि उन्हें रोका मत, यहाँ भेज दो ॥ ३०४ ॥ सुग्रीवकी बात मानकर उसने वैसा ही किया। पश्चात् वे सब वानर दधिमुखसे सुग्रीवका आदेश सुनकर ॥ ३०५ ॥ रामके पास गये तथा हर्षित होकर उनके सम्मुख खड़े हो गये, तब हनुमान्ने सहर्ष ब्रह्माका दिया हुआ पत्र रामको अर्पण किया और चूडामणि देकर काकका वृत्तान्त कह सुनाया। सो सुनकर राम श्रीराम हनुमान्का किया हुआ सब कार्य जानकर ॥ ३०६ । ३०७ । ब्रह्माके पत्रसे राम अतिशय सन्तुष्ट हुए तदनन्तर राम हनुमान् को हृदयसे लगाके बोले- ॥ ३०८ ॥ हे मारुते तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है इस उपकारका प्रत्युपकार करनेके लिये मुझे कुछ नहीं सूझता । सचमुच तुम संसारमें धन्य हो ॥ ३०९ ॥ इस संसारमें साक्षात् परमात्माका मेरा परिरम्भ ( आलिङ्गन ) दुर्लभ है, वह तुमको प्राप्त हो गया। इस कारण हे हरि-पुत्रक ! तुम प्रिय भक्त हो । ३१० ॥ जिन विष्णुके दोनों चरणकमलोंका तुलसीपत्र तथा जल आदिसे पूजन