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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २४ ] राज्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ५५३

सर्गः २४ ] राज्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ५५३


अस्माभिर्भेदृशो दण्डो यतोऽस्माकं कृतस्त्वया । तदा तान्माधवः प्राह दिनान्यप्युर्नवास्व हि ॥१३॥
वर्तन्ते शेषभूतानि कथमद्यैव नीयते । भविष्यन्ति दिनान्यग्रे यदा नव यमानुगाः ॥१४॥
तदाऽऽनेयः सुखेनैषं न निषेधं करोम्यहम् । इति रामवचः श्रुत्वा तमूचुस्ते यमानुगाः ॥१५॥
अपूर्वमभवज्जन्म सुमन्त्रस्यास्य राघव । मातुर्योन्या बहिस्तस्य मुखं हस्तौ विनिर्गतौ ॥१६॥
पूर्वं तनोजस्य दशमे दिवसे दैवयोगतः । उदरादीन्यथोऽङ्गानि पदांशानि शनैः शनैः ॥१७।
विनिर्गतानि धीराश्च सुमन्त्रं रक्षिणो बुधैः । यस्माज्जन्मन्ययं तस्मात्सुमन्त्राख्याऽस्यमार्पिता १८॥
अतः पूर्वदिनारभ्य संख्ययाऽऽयुः प्रपूरितम् । अस्य तद्दिनादारभ्य संख्यया दिवसा नव ॥१९॥
शेषभूताश्च भवता कीर्त्यन्ते ये रघूत्तमः । अतोऽस्माकं नापराधः संदिग्धं जन्म चास्य हि ॥२०॥
वृथाऽयं नीयते राम वृथा शिक्षाऽपि नः कृता । इति तेषां वचः श्रुत्वा रामः प्राह यमानुगान् ॥२१॥
अस्य मौल्यदिनो ज्ञेयोऽप्रथमो हि यमानुगाः । यस्मिन् दिने सुप्रसूतिर्भवदस्यैव मातृकात् ॥२२॥
जन्माहदिवसो ज्ञेयः स एव जातकं तथा । तस्मिश्चैव दिनेऽप्यत्र कृतं पित्रा द्विजोत्तमैः ॥२३॥
ज्योतिर्विदा जन्मपत्रे स एव लिखितो दिनः । अतः शेषदिनाः मन्ये ऽस्यास्त्वद्याप्युतो नव ॥२४॥
अतो युष्माभिर्गन्तव्यं नेयोऽयं दशमे दिने । पुनरागत्य सान्निध्यान्मे निषेधं करोमि न ॥२५॥
इति रामवचः श्रुत्वा तूष्णीमेव यमानुगाः । साध्वसाच्च छिन्नाङ्गा यमराजं शनैर्ययुः ॥२६॥
रामोऽपि परिवर्त्याथ ययौ स्वनगरीं प्रति । स्त्रीभिर्निराजितो मार्ग विवेश मन्त्रिणो गृहम् ॥२७॥
तावत्सर्वान्प्रमुदितान्सुमन्त्रेण समन्वितान् । ददर्श रामचन्द्रः स तावद्दृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥२८॥
प्रणनाम सुमन्त्रः स पूजयामास राघवम् । ततो रामो ययौ गेहं सर्वे स्युर्मुदिताननाः ॥२९॥
दिनानि नव शेषापुर्ज्ञात्वा दानादिकं सुधीः । चकार प्रत्यहं भक्त्या सुमन्त्रो राघवाज्ञयाः ॥३०॥


कहा—हमने आपका क्या अपराध किया था, जिसके लिए आपने हमें ऐसा दण्ड दिया ? रामने कहा कि अभी इसके जीवनके नौ दिन बाकी हैं ॥ १०-१३॥ तब तुम आज ही इसे क्यों लिये जा रहे हो ? जब इसके दिन पूरे हो जायें, तब आकर आनन्दपूर्वक ले जाना। तब मैं भी कुछ नहीं बोलूँगा इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर यमके अनुचर कहन लगे-॥ १४। १५। हे राघव ! इसका जन्म भी एक अपूर्व प्रकारसे हुआ था। पहिले दिन माताकी योनिसे इसके दोनो हाथ तथा मुख बाहर निकल आया था। तदनन्तर दशवें दिन धार-धारे इसके और अङ्ग निकल ये ॥ १६ ॥ १७ ॥ तबसे धीरोंने दैवियोगसे इसको रक्षा कर ली थी। अतएव इसका सुमन्त्र नाम पडा था ॥ १८ ॥ इसके पूर्व दिनसे अर्थात् जिस दिन इसका हाथ तथा मस्तक बाहर आया, उस दिनसे लेकर आज तकमें इसकी आयु समाप्त हो गयी। आप जो इसके नौ दिन बाकी बतलाते हैं, वे संदिग्ध हैं। इसलिए हे राम ! हमारा कुछ दोष नहीं है ॥ १९ ॥ २० ॥ आप व्यर्थ इसे छीने लिये जात हैं, हमपर व्यर्थ आपक भाग भी है। उनकी बात सुनकर यमदूतोंसे रामने कहा—॥ २१ । हे यमानुचर ! वह अन्तका दिन अर्थात् जिस दिन माताके गर्भसे इसका अच्छी तरह जन्म हुआ है, वही जन्मका दिन माना जायगा ॥ २२ ॥ जिस दिन इसके जन्मका उत्सव मनाया गया है, वास्तव-में वही जन्मदिन है। उसी रोज इसके पिता तथा ज्योतिर्विदोंने इसका जन्म लिखा है। इसलिए अभी इसके नौ दिन बाकी हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम लोग जाओ और दसवें दिन आकर इसे ले जाना । तब मैं तुम लोगोंको नहीं रोकूँगा ॥ २५ ॥ रामकी बात सुन और छिप्तअङ्ग होकर शोचोम आंसू भरे हुए वे दूत यम-लोकको लौट गये ॥ २६ ॥ राम भी लौटकर अयोध्या चले आय। वहीं स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और राम सुमन्त्रके घर गये ॥ २७ ॥ वहाँ सब लोगोंको सुमन्त्रके साथ प्रसन्न देखा। सुमन्त्रने रामको देखते ही प्रणाम किया और उनकी पूजा की । इसके बाद राम अपने भवन गये । तबसे सब लोग परम प्रसन्न रहे ॥ २८ ॥ २९ ॥ सुमन्त्रने अपने जीवनके केवल नौ दिन बाकी जानकर रामके आज्ञानुसार खूब दान-पुण्य

५७५आनन्दरामायणे[सर्गः २४

अथ ते यमदूताश्च साश्रुनेत्राः समागताः । तूष्णींपाणिस्तैः कोपादास्फाल्य भुवि चाब्रवन् ॥३१॥
कथं करोष्यधिकारं तवाज्ञाकारिणां न्विमाम् । दृष्ट्वाऽवस्थां न लज्जा ते जायते हृदये यम ॥३२॥
तस्मादस्माकं राघवेण सुमन्त्रो मोचितः पथि । दिनानि नव शेषायुः पूर्त्यर्थमधुना वयम् ॥३३॥
वैहस्यां जले कूर्मो न जीविष्याम भो यम । तद्दूतवचनं श्रुत्वा प्रजज्वाल यमस्तदा ॥३४॥
प्राह दूतानद्य रामं बध्ध्वा दण्डं करोम्यहम् । चोरनीयानि सैन्यानि देवेन्द्रं सूचयाम्यहम् ॥३५॥
इत्युक्त्वा त्वरितो गत्वा वृत्तान्तमिन्द्रं न्यवेदयन् । पुनर्देवं यमः प्राह साहाय्यं क्रियतां मम ॥३६॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा देवेन्द्रो यममब्रवीत् । किं भ्रान्तोऽसि यमाद्य त्वं विष्णुना योद्धुमिच्छसि ३७॥
गच्छ तूष्णीं संयमनीं रामस्य किं करिष्यसि । मद्भिया हि पुरा दत्तौ मया तौ सुरपादपौ ॥३८॥
एवं तद्वचनं श्रुत्वा वह्निलोकं ययौ यमः । अग्निना चाप्युक्तमेवं निर्ऋतिं वरुण तथा ।३९॥
वायुं कुबेरमीशानं रविं चन्द्रं बुधं गुरुम् । शुक्रं शनैश्चरं राहुं केतुं भूमिसुतं प्लवम् ॥४०॥
प्रार्थयामास युद्धाय साहाय्यं क्रियतामिति । उपगच्छीन्द्रवन्मर्त्ये दुर्द्धर्षान्नं यमं हि ते । ४१॥
ततो गत्वा विधिं चापि पातालान्गत्वाभिभिः । मण्डैर्निवामिनश्च यमः सप्रार्थयन्नृपन् ॥४२॥
तैरुच्युतुर्न करिष्यामः साहाय्यं राघवस्यतः । ततः क्रोधममाविष्टः स्वसैन्येन समन्वितः ॥४३॥
रामेण सङ्गरं कर्तुमयोध्यां स यमो ययौ । स्वगणैः सह वेगेन महामहिषसंस्थितः ॥४४॥
अयोध्यां वेष्टयामास नवद्वारविराजिताम् । नवप्राकारसहितां शतघ्नीयन्त्रसंयुताम् ॥४५॥
नवभिः परिखाभिश्च समन्तात्परिवेष्टिताम् । दृढरत्नकपाटाढ्यां रत्नभित्तिविराजिताम् ॥४६॥
सरयूवेष्टितां रम्यां रविकोटिसमप्रभाम् । नजायासत्पुष्पैश्च पताकाध्वजशोभिताम् ॥४७॥

धारण कर दिया ॥ ३० ॥ उधर वे यमदूत यमके आगे पहुंचे और अपनी पगड़ी जमीनपे फेंककर कहने लगे— ॥ ३१ ॥ हे यमराज ! तुम कैसे अपने अधिकारकी रक्षा करते हो ? अपने आज्ञाकारी हम सेवकोंकी यह दशा देखकर तुम्हें लाज नहीं आती ? ॥ ३२ । रास्तेमे रामने मारकर सुमन्त्रको छुड़ा लिया । क्योंकि उसके बीतनेके नौ दिन बाकी थे । राम वह नौ दिन पूरा कर लेनेपर सुमन्त्रको आने देंगे ॥ ३३॥ अब हम लोग जलमें डूबकर अपने प्राण दे देंगे । इस प्रकार दूतोंकी बात सुनकर धर्मराज मारे क्रोधके लाल हो गये ॥ ३४ ॥ उन्होंने दूतोंसे कहा— घबड़ाओ मत, आज ही रामको बांधकर मैं उनकी इस धृष्टताका दण्ड दूँगा । तुम जाकर सेना तैयार करो । तबतक मैं इन्द्रको सूचित करता आऊँ । ३५ ॥ ऐसा कहकर यमराज तुरंत इन्द्रके पास गये । उन्हें सारा हाल सुनाया और सहायता करनेकी प्रार्थना की ॥३६॥ यमराजकी बात सुनकर इन्द्रने कहा— यमराज ! क्या तुम पागल हो गये हो, जो विष्णुभगवान्‌के साथ युद्ध करना चाहते हो ? ॥ ३७ ॥ चुपचाप अपनी संयमनी नगरीको लौट जाओ । रामका तुम क्या कर लोगे ? उनके डरकर मैंने अपने हाथोंसे पारिजात और कल्पवृक्ष इन दोनों देववृक्षोंको उठाकर दे आया था ॥ ३८ ॥ ऐसा वचन सुनकर यम अग्निलोक गये, उनसे सहायता माँगी तो अग्निने भी वैसा ही उत्तर दिया इसके अनन्तर निर्ऋति, वरुण, ॥ ३९ ॥ वायु, कुबेर, ईशान, रवि, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु तथा मङ्गललोक गये ॥ ४० ॥ सर्वत्र उन्होंने सहायताकी प्रार्थना की, किन्तु उस प्रस्तावपे यमराजको सबने इन्द्रके समान ही शुष्क उत्तर दिया ॥ ४१ ॥ तब यमराज लौटकर ब्रह्माके पास गये । पातालमे रहनेवाले राजाओं तथा सर्पलोकोंके राजाओंसे भी आकर सहायताकी प्रार्थना की । ४२ ॥ किन्तु उन्होंने भी कहा कि रामके विरुद्ध मैं तुम्हारी सहायता नहीं करूँगा । इसके बाद क्रोधाविष्ट होकर यमराज अपनी ही सेना लेकर रामके साथ युद्ध करने अयोध्या चले । उस समय उनके समस्त गण साथ थे और धर्मराज एक बड़े भारी भैंसेपर सवार थे ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने चारों ओरसे उस अयोध्या नगरीको घेर लिया। जिसमें नौ बड़े बड़े फाटक थे और नौ ही खाइयाँ खुदी थीं । कितनी ही बन्दूकें और तोपें रक्खी थीं जिनमें रत्नजटित कपाट लगे थे और रत्न ही की दीवार चुनी हुई थी ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ जिसके उत्तर सरयू बह रही थी और करोड़ों सूर्योंके प्रकाशकी नाई जिसकी

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४५


यमेन वेष्टितां दृष्ट्वा पुरीं रामो महामनाः । लवमाज्ञापयामास गच्छ योद्धुं यमेन हि ॥४८॥
लवस्तदा रथारूढो दुन्दुभीनां महास्वनैः ।
अयोध्याया बहिर्गत्वा चकार सङ्गरं महत् ॥ ४९ ॥
तदा लवशराघातच्छिन्नदेहा यमानुगाः । निपेतुः क्षणमात्रेण कोटिशो रणभूमिषु ॥५०॥
तान्सर्वान्निहतान् दृष्ट्वा यमो महिषसंस्थितः । चकार तुमुलं युद्धं लवेन क्रोधभासुरः ॥५१॥
स्वबाणौघैर्धनुः शीघ्रं रथं सूतं दृढं धनुः ।
कवचं मुकुटं चापि चिच्छेद स लवस्य च ॥५२॥
तदा लवश्चातिक्रुद्धः स्वसैन्येन स्थित पुनः । चकार सङ्गरं घोरं यमेनातिभयंकरम् ॥५३॥
तदामरा विमानस्था ददृशुर्युद्धकौतुकम् । ततो लवः स्वबाणौघैर्महिषं मूर्च्छितं भुवि ॥५४॥
कृत्वा तं ताडयामास शतबाणौघैर्म जवात् ।
ततो यमोऽप्यतिक्रुद्धो यमदण्डं मुमोच तम् ॥५५॥
तं दण्डं मोचितं दृष्ट्वा ब्रह्मास्त्रं सन्दधे लवः । ब्रह्मास्त्रमागतं दृष्ट्वा यमदण्डो न्यवर्तत ॥५६॥
तदा यमोऽपि विकलः पलायनपरोऽभवत् । ब्रह्मास्त्रं तस्य पृष्ठे तप्यौ कालानलप्रभम् ॥५७॥
तदा दृष्ट्वा रविः शीघ्रं स्त्रीयो भिन्नो प्रकल्प च ।
रथे मूर्त्ति ययौ वेगात् प्रार्थयामास तं लवम् ॥५८॥
रे रे बाल यमं त्राहि चोपसंहाराद्य हि । त्वयोग्मृष्ट ब्रह्मास्त्र त्वमेवास्त्रविदां वरः ॥५९॥
त्व मे वंशसमुद्भूतन्म्वयं मे तनयो यमः कथं स्वपूर्वजं त्वद्य न्व यमं हन्तुमिच्छसि । ६०॥
येदेको मूर्खतां यातः सर्वे मूर्खा भवन्ति न ।
शत्रुं रणात्पशीअंश्च वीरान्न रघ्यन्ति हि ॥६१॥


प्रकाश था। उसने नाना प्रकारके महल बने थे और वह पुरी बहुत-सी पताकाओं तथा ध्वजाओंसे अलंकृत थी ॥ ४७ ॥ यमराजसे घिरी अयोध्याको देखकर रामने लवसे कहा—तुम यमराजसे युद्ध करनेके लिए जाओ ॥ ४८ ॥ तब दुन्दुभीके विकराल निनादके साथ लव रथपर आरूढ़ होकर अयोध्याके बाहर आये और यमराजके साथ भयङ्कर युद्ध किया ॥ ४९ ॥ उस समय लवके बाणोंसे विद्ध होकर यमके करोड़ों अनुयायी क्षणमात्रमें धराशायी हो गये ॥ ५० ॥ उन सबोंको मरा देखकर रथमें नयनमग्न हुए यमराजने स्वयं लवके साथ तुमुल युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ ५१ । यमराजने अपने विकराल बाणोंकी वर्षासे शीघ्र लवके रथ, सारथी, धनुष, कवच तथा मुकुटको काट डाला ॥ ५२ ॥ तब अत्यन्त कुपित लवने एक दूसरे रथपर आरूढ़ होकर यमराजके साथ महाभयंकर युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ ५३ ॥ उस समय समस्त देवता अपने विमानोंपर आरूढ़ होकर समराङ्गणमें आये और वह युद्ध देखने लगे । इसके अनन्तर लवने अपने बाणोंकी वर्षासे यमराजके भैंसेको मूर्छित कर पृथ्वीपर लौटा दिया और बणके साथ बाण चलात हुए सौ बाणोंकी वर्षासे यमराजपर प्रहार किया तब यमराजने अतिशय क्रुद्ध होकर लवपर यमदण्ड छोड़ा ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ यमदण्डको देखकर लवने ब्रह्मास्त्र चला दिया, जिससे यमदण्ड लौट पड़ा। तब यम विकल होकर भाग निकले और कालानलके समान ब्रह्मास्त्र उनके पीछे-पीछे चला ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ उस ब्रह्मास्त्रको देखकर सूर्यने समझा कि इससे यम नहीं बच सकता। मेरा बेटा अवश्य मारा जायगा तब सूर्यदेव स्वयं रथपर आरूढ़ होकर लवके पास आये और प्रार्थना करने लगे ॥ ५८ ॥ सूर्यने कहा—अरे अरे हे बच्चे ! इस अस्त्रको लौटाकर यमको बचाओ। तुम्हींने इसे चलाया है और तुम्हीं इसका निवारण भी कर सकते हो। तुम अस्त्रविद्या जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हो ॥ ५९ ॥ तुम हमारे वंशमें उत्पन्न हुए हो और यम भी मेरा ही पुत्र है। क्या अपने पूर्वज यमको ही तुम मार डालना चाहते हो ? ॥ ६० ॥ यदि एक लड़का मूर्ख हो गया तो क्या उसके साथ सब मूर्ख हों

५५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २४


इत्यादिनानावचनैः प्रार्थितो रविणा यदा ।
तदा लवेोऽपि संहारं चक्रास्त्रस्य ब्रह्मणः ॥६२॥
ततो लवं पुरस्कृत्य यमेन तपनः पुरीम् । विवेश रघुनाथस्य दर्शनार्थं मुदान्वितः ॥६३॥
तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । लवं ववर्षुरमरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥६४॥
पौरनार्यो लवं मार्गे दवर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । गोपुराट्टालमस्थाश्च ददृशुस्तं मुहुर्मुहुः ॥६५॥
नेदुनानासुवाद्यानि ननृतुर्वारयोषितः । तुष्टुवुर्मगधाश्चाथ जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥६६॥
एवं नानामहोत्साहैः स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ।
ययौ स विजयी बालः प्रननाम रघूत्तमम् ॥६७॥
रविमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्य रघूत्तमः । नत्वा रविं करे धृत्वा सभायां सन्निवेश्य ह ॥६८॥
ततः सिंहासने भानुं निवेश्य स्वीयपूर्वकम् । पूजयामास श्रीरामः षोडशैरुपचारकैः ॥६९॥
बद्धाऽञ्जलिर्द्विविं रामः सभायां पुरतः स्थितः ।
पूर्वजस्त्वं क्षमस्वाथ यल्लवेनापराधिनाम् ॥७०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा शमं प्राह रविस्तदा । त्वन्नाभिकमलाद्ब्रह्मा समुद्भूतो रघूत्तम ॥७१॥
मरीच्याद्या विधेः पुत्रा मरीचेः कश्यपः सुतः ।
कश्यपस्य च ममोत्पत्तिः पौत्रपौत्रस्त्वहं तव ॥७२॥
क्षमस्व मम पुत्रेण यद्यमेनापराधिनाम् । एवं संप्रार्थ्य श्रीरामं चासने संन्यवेशयत् ॥७३॥
यमेन कारयामास रघुनाथाय वन्दनम् । तदा समाययुर्देवा नेमुः सर्वे रघूत्तमम् ॥७४॥
रामोऽपि सकलान्देवान्पूजयामास सादरम् ।
ततो रामाज्ञया चेन्द्रः सुधावृष्ट्या रणे मृतान् ॥७५॥
शीघ्रमुत्थापयामास सर्वान्वीरान्सवाहनैः । ततो रामो यमं प्राह यावद्राज्यं करोम्यहम् ॥७६॥

पावेंगे । वीर लोग संग्रामभूमिसे भागे हुए शत्रुकी भी रक्षा ही करते हैं ॥ ६१ ॥ इस प्रकार कितनी ही बातोंके सूर्यके प्रार्थना करनेपर लवने ब्रह्मास्त्रका संम्हरण कर लिया ॥ ६२ ॥ इसके अनन्तर लवको आगे करके यमराजके साथ-साथ सूर्य रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिए हर्षपूर्वक अयोध्या नगरीमें गये ॥ ६३ ॥ उस समय देवताओंने अपने बाजे बजाये, लवपर फूलोंकी वर्षा की और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ६४ ॥ पुरवासिनी स्त्रियें भी रास्तेमें कोठेपरसे फूल बरसाती हुई बार-बार लवको निहार रही थीं । ६५ ॥ उस समय विविध प्रकारके बाजे बजे, गणिकाय नाचने लगीं और मागध, गन्धर्व तथा किन्नरगण स्तुति करने लगे ॥ ६६ ॥ इस तरह अनेक उत्सवके साथ रास्तेमें आरती उतरवाता हुआ वह विजयी बालक लव रामके पास पहुंचा और प्रणाम किया ॥ ६७ ॥ रामने सूर्यभगवानका आगमन सुनकर उनकी अगवानी की, प्रणाम किया और हाथ पकड़कर सभाभवनमे ले गये ॥ ६८ ॥ इसके अनन्तर अपने पूर्वज सूर्यको रामने सिंहासनपर बिठलाया और षोडशोपचारसे उनकी पूजा की । ६९ ॥ फिर रामने सूर्यभगवान्से कहा—आप हमारे पूर्वज हैं। अतएव लवने जो कुछ अपराध किया हो, सो क्षमा कीजिये ॥ ७० ॥ रामकी ऐसी बात सुनकर सूर्यने भगवान्से कहा—हे रघूत्तम ! आपकी नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए थे और उनसे अत्रि आदि उत्पन्न हुए मरीचिसे कश्यप हुए और कश्यपसे मैं उत्पन्न हुआ हूं । अतएव मैं आपके पौत्रका पौत्र हूं ॥ ७१ ॥ ॥ ७२ ॥ हमारे पुत्र यमने जो अपराध किया हो, सो क्षमा करिये । इस प्रकार विनय करके सूर्यने रामको आसनपर बिठलाया और यमसे प्रणाम करवाया । इसके बाद समस्त देवतावृन्द वहां आ पहुंचे और उन्होंने रामचन्द्रजीकी वन्दना की ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ रामने भी सादर सब देवताओंकी पूजा की । इसके बाद रामकी आज्ञासे इन्द्रने संग्राममें मरे हुए लोगोंपर अमृतकी वर्षा की और वाहनसमेत समस्त वीरोंको उठा-