श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५६१
सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५६१
अद्य तद्वचनं निशायां बुद्धिमत्तम । श्रुत्वा विचार्य पश्चान्मां प्रष्टव्यं यत्तु रोचते ॥ ५ ॥
तथेति रामवचनमन्वे गत्वा निजं निजम् । गेहं ते स्वस्थचित्ताश्च स्वस्त्रीभिर्मन्त्रकादिषु ॥ ६ ॥
दूतवाक्ये दत्तकर्णा रात्रौ तच्छ्रुन्निद्रिताः । नावचं गमहस्ताश्च सार्द्धयामे सदीवकाः ॥ ७ ॥
धृतशस्त्रा दण्डहस्ता नानावाहनसंस्थिताः । गजेषु दुन्दुभीन्घ्नन्तः तथा वाद्यान्यनेकशः ॥ ८ ॥
धृत्व्या पृथक् पृथङ्नानायान्येषु मंगुलानि हि । राजमार्गेशु सर्वत्र दीर्घशब्दानुदीरयन् ॥ ९ ॥
हे जनाः शृण्वत सर्व्वे किं मोहेन विनिद्रिताः । नेयं निद्रा सर्व्वार्चाना कश्चाऽनर्थो भविष्यति ॥ १०॥
स्वस्थचित्तास्सवय सर्व्वे शृण्वन्तु श्रूयतां वचः । नवद्वाराण्ययोध्यायामेकं तु लघु वर्त्तते ॥ ११॥
१मगज्ये भयं नेति कारणाद्द्वाररक्षकैः । दीयन्ते वा न दीयन्ते कवाटादीनि वै तदा ॥ १२॥
मार्गला शृङ्खलादीनि मन्ति द्वारेषु को जनः । कृष्णवर्जो महाँश्चोरो याम्यादाशायं स्थितस्त्विति ॥ १३॥
श्रूयते न कदा दृष्टः केनापि भुवि सांप्रतं । एव सत्यपि नोपेक्षा रोगशान्त्यै प्रकार्यते ॥ १४॥
गुप्तरूपास्तस्य दूताः साकेते विचरन्ति हि । न ह्यप्रत्ते कदाऽस्माभिनगरा द्वेष संस्थितः ॥ १५॥
आगतश्चेद्वरी दूतोऽप्येके दुर्गे तदा क्षणात् । भेदं कृत्वा तु सर्वत्र दुर्गपालो निहन्यते ॥ १६॥
इत्थं भनं महाऽस्माभिसन्नसन्त्रप्पां सहस्रशः । वर्त्तन्ते पादूताश्च नानावेषधरा जनाः ॥ १७॥
जीवेच्चयं चिरं राजा एवं सत्यपि नो भयम् । अयोध्यायां जायते हि तद्वलं को वदिष्यति ॥ १८॥
एभिर्हूतैस्तस्य शत्रु आत्मारामस्य चात्र हि । कर्त्तव्यं प्रभोः किं हि सच्चिदानन्दरूपिणः ॥ १९॥
तेषां भय तु युष्माकं दुर्बलानां सदाऽस्ति हि । अजापुत्रो दुर्बलोऽत्र बल्यर्थे दीयने जनैः ॥ २०॥
दत्तो बलिस्तु सिंहस्य कदा केन श्रुतोऽत्र न । अतो यूयं हीनबलाः किं निशायां विनिद्रिताः ॥ २१॥
रहते हैं, सो क्या आप नहीं जानते ? अस्तु, जो समय गया सो गया। आज सब लोग रातको ध्यानसे मेरे दूतोंकी बातें सुनें और उनपर विचार करें। इसके बाद जो आप लोगोंको इच्छा हो सो पूछिएगा ॥ ४ ॥ ५ ॥
"तथास्तु" कहकर वे सब अपने अपने घर गये और अपना अपना स्त्रिय के साथ पलङ्गपर पड़े-पड़े जागते हुए रामके दूतोंके वचनपर कान लगाय रहे । ३॥ पहर रात बीतनेपर हाथीपर दीपक लिये, दण्ड तथा अनेक प्रकारके शस्त्र धारण किय, एक हाथीपर दुन्दुभी तथा विविध प्रकारके बाज बजाते हुए गलियो तथा राजमार्गोंपर घूमते और उन बाजोंका घोर निनाद करते हुए वे दूत जाय और कहने लगे—॥ ६-९ ॥
हे पुरवासियो क्या तुम मोहनिद्रामें पड़े सो रहे हो ? यह नींद अच्छी नहीं है। इससे कभी बड़ा भारी अनर्थ हो जायगा। आज तुम लोग स्वस्थ चित्तसे मेरा बात सुनो। इस अयोध्यामें कुल नौ द्वार हैं और एक छोटा सा दसवाँ द्वार भी है। १० ॥ ११ ॥ रामके राज्यमें कोई भय नहीं है। इस ख्यालसे द्वारपाल कभी द्वार बन्द करते हैं, कभी नहीं भी बन्द करते। १२॥ इन द्वारोंमें न कोई अर्गलादण्ड हैं और न जंजीरें ही लगीं हैं। सुनते हैं कि नगरके दक्षिण ओर कोई एक काला चोर रहता है, किन्तु इस नगरमें आज तक उसे किसीने नहीं देखा। यह होते हुए भी रोगशान्तिके विषयमें उपेक्षा न करनी चाहिए ॥ १३ ॥ १४ ॥ उसके दूत गुप्तरूपसे अयोध्या में घूमते रहते हैं। यदि हम लोग असावधान रहे और उसका एक भी दूत किसीम घुस आया तो वह क्षणभरके भीतर हमारा भेद लेकर सब दुर्गपालोंको मार डालेगा। १५ ॥ १६ ॥ हमने यह भी सुना है कि उस चोरके हजारों दूत नाना प्रकारके वेष धारण करके घूमते हैं ॥ १७ ॥ हमारे राजा राम चिरञ्जीव हों। जिनके प्रतापसे उस शत्रुओंके इतना करनेपर भी कोई भय नहीं है उन रामके बलका वर्णन कौन कर सकता है। १८। शत्रूके दूत इन आत्माराम और सच्चिदानन्दरूप रामका क्या कर सकते हैं? ॥ १९॥ हाँ, उन दूतोंसे यदि कुछ भय है तो वह तुम्हारे जैसे दुर्बलोंको है संसारी लोग दुर्बल जीव बकरेका ही बलिदान करते हैं ॥ २० । आज तक कहीं यह नहीं सुना गया किसीने सिंहकी बलि दी हो। इस प्रकार निर्बल होकर भी तुम लोग रातको सो रहे हो ? ॥ २१ ॥
५६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
कदा कृत्वाऽत्र ते भेदं चोरमत्रानयति हि । स कालो ज्ञायते नैव तस्मान्निद्रा शुभा न हि ॥२२॥
स्वस्थचित्तास्त्यक्तनिद्रास्त्वस्यां पुर्यामहर्निशम् । यूयं भूत्वा सदा खड्गं शितां धार्यः स्वसन्निधौ ॥२३॥
कवचानि शरीरेषु सदा धार्याणि भो जनाः । धैर्यं धृत्वा न भेतव्यं यो जागर्ति निरन्तरम् ॥२४॥
अयोध्यायां न तस्यास्ति चोरादपि कदा भयम् नैतद्विस्मरणीयं हि मदाऽस्माकं वचः शुभम् ॥२५॥
सावधानाः सावधानाः सावधानाः सदा जनाः । भवतध्वं चात्र माकेतपुरि स्थेहि निरन्तरम् ॥२६॥
इत्युक्त्वा ते राजदूतः कृत्वा दुंदुभिनिःस्वनान् । वादयमासुर्वाद्यानि मङ्गलानि महान्ति च ॥२७॥
एवं सर्वत्र पुर्यां ते विचेरू रामसेवकाः । एवं निशायां नैर्दनैश्चास्र किंचिद्गतम् ॥२८॥
पौराश्च बोधिताः प्रापुर्ज्ञानं तस्य विचारतः । ततः प्रभाते ते सर्वं पौरा जानपदादयः ।२९॥
सभायां राघवं नत्वा तुष्टाः प्रोचुः पुरः स्थिताः राम राजीवपत्राक्ष त्वद्दूतवचनानि हि ॥३०॥
श्रूयन्तेऽद्य सदाऽस्माभिने विचारस्तदा कृतः । अद्यास्माभिर्निशायां हि त्वद्दूतवचनं शुभम् ॥३१॥
श्रुत्वा कृतो विचारो हि हृदि बुद्ध्या नराज्ञया । लब्धं ज्ञानं प्रभोऽस्माभिस्त्वज्ञानं नद्यत हि नः ॥३२॥
नैदानीमुपदेशं हि त्वत्तो वांछाम राघव । इति तेषां वचः श्रुत्वा तान्रामः प्राह सस्मितः ॥३३॥
कथं लब्धं हि तज्ज्ञानं किं भतं किं विचिन्तितम् तन्मेऽग्रे कथनीयं हि विस्तरेण यथाक्रमम् ॥३४॥
इति रामवचः श्रुत्वा जनाः प्रोचुर्मुदान्विताः । शृणु राम महाबाहो यन्लब्धं ज्ञानमुच्यते ॥३५॥
मोह एव निशा ज्ञेया निद्रा भ्रान्तिस्तु कथ्यते । नैय भ्रान्तिः समाचीनाऽनर्थो मृत्युर्भविष्यति । ३६॥
अयोध्येयं स्वीयदेहस्तत्र छिद्राणि वै नव । लघु मन्मस्तके ज्ञेयं दंताया द्वाररक्षकाः ॥३७॥
पक्ष्मौष्ठादीनि द्वारेषु कपाटानरितानि च । प्राणाश्च ते राजदूताः पुर्यां नित्यमटति हि ॥३८॥
न जाने कब ये तुम्हारा भेद लेकर उस चोरको यहां बुला लावे । उस समयको कोई जान नहीं सकता। इसलिए इस प्रकार सोना ठीक नहीं है ॥ २२ ॥ तुम सब निद्रा त्यागकर रात दिन इस पुरीमें जागते रहो और अपने पास एक तीक्ष्ण खड्ग रखो ॥ २३ ॥ शरीरपर कवच धारण करो, हृदयमे धैर्य रक्खो, किसीसे डरो नहीं । जो इस तरह जागता है ॥ २४ ॥ उस इस अयोध्यामे उस चोरसे कोई डर नहीं है। हमारे इस हितकर वचनोका कभी भूलना मत ॥ २५ ॥ हे अयोध्यावासियो ! फिर भी तुमसे कहता हूं सावधान । सावधान ॥ इस पुरीमे सदा सावधान होकर रहना ॥ २६ ॥ इतना कहकर वे दूत दुन्दुभी तथा अन्यान्य मङ्गलमय वाद्य बजाने लगे । २७ । इस रीतिसे दूत रातभर सारी अयोध्यामें घूम-घूमकर थोड़ी-थोड़ी देरमें तीन-तीन बार लोगोंको वही बात सुना-सुनाकर सजग करते रहे । २८ ॥ दूतोंकी बतायी बातांपर विचार कर-करके वे सब नगरनिवासो ज्ञानी हो गये । सब नागरिक और जनपदवासी सभामें रामके पास पहुंचे और प्रणाम करके कहने लगे हे राजीवपत्राक्ष राम ! वैसे तो हम नित्य आपके दूतोंकी बातें सुनते थे । किन्तु अभीतक उसपर विचार नहीं किया था । आज रात्रिमें उनकी बातें सुनकर हमने उनपर आपके आज्ञानुसार विचार भी किया है हे प्रभो ! अब हमारा अज्ञान नष्ट हो गया और ज्ञान प्राप्त हो गया है ॥ २९-३२॥ हे राघव । अब मैं आपसे उपदेश नहीं सुनना चाहता इस तरह उनकी बात सुनकर मुस्कराते हुए राम कहने लगे-॥ ३३ ॥ अच्छा हमें यह तो बताओ कि वह ज्ञान तुम्हे कैसे प्राप्त हुआ और तुम लोगोंने उसपर किस प्रकार विचार किया है सो विस्तारसे कह सुनाओ ॥ ३४ ॥ रामका प्रश्न सुनकर वे लोग प्रसन्नतासे कहने लगे हे राम ! जो ज्ञान प्राप्त हुआ है, सो हमलोग कहते हैं । सुनिय । ३५। मोह रात्रि है और भ्रान्ति निद्रा है। यह भ्रान्ति कभी अच्छी नहीं मानी जा सकती । इसके फेरमें पड़नेसे अनर्थ यह होगा कि एक न एक दिन मृत्यु घेर दवायगी ॥ ३६॥ अयोध्या अपना शरीर है। इसमें मुंह-कान आदि नौ द्वार हैं और दसवां द्वार मस्तकमें है । जिसे लोग ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और दांत आदि इन द्वारोंके रक्षक हैं ३७ ॥ आँखकी पलकें और ओंठ आदि इनके दरवाजे हैं। प्राण ही राजदूत है। जो सदा इस पुरीमें चक्कर लगाते
सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५५३
आत्मा ज्ञेयस्त्वत्र राजा जीवश्चेन्द्रियदेवताः । प्रजाश्च देहनगरे पौरास्तत्र नृशंसकः ॥३९॥
कालो ज्ञेयो महाबीरः त्रिदोषाद्या गदाश्च ये । कालस्य सेवका ज्ञेया नागरं इव संस्थिताः ॥४०॥
दुर्बलास्तेऽत्र जीवाद्यास्तेषामेवास्ति संशयम् । किं मोहे पतिता ज्ञात्वा कालप्रज्ञानयन्ति ते ॥४१॥
न ज्ञायते मृत्युकालस्तस्माद्भांति शुभाऽत्र न । ज्ञानमेव महाशस्त्रो वैराग्यं तीक्ष्णता भ्रमेः ॥४२॥
सच्छीलं कवचं भूयं धैर्यं भक्तिर्दृढा मयि । आत्मज्ञानेन जागर्ति न तस्यास्ति भयं कदा ॥४३॥
सावधानं शास्त्रनिष्ठं भक्तिनयं सताऽत्र हि । वाद्यानि रचनान्येव माधवं बोधदानि वै ॥४४॥
सदा धृतानि हृदये तानि बुद्ध्याऽवलोकयेत् । मोहक्षयः प्रभावोऽप्यमिदानीं त्वन्पुरः स्थितः ॥४५॥
त्वमेवात्मा ममेयं ते नित्यामस्थानरीरितम् । तवाग्रे ये स्थिताः सर्वे वयं त्वां मुक्तिमागताः ॥४६॥
किमिदानीं ने द्रष्टव्य वोपदेश्यं त्वयाऽथ किम् । तव कीर्तनमात्रेण नग मुक्ति लभंति हि ॥४७॥
वयं त्वदन्तिकाः सर्वे मुक्ता एव न संशयः । इति तेषां वचः श्रुत्वा सस्मितः प्राह राघवः ॥४८॥
सम्यग्बुद्ध्या परिज्ञातं सुखे ध्येयं सदा जनाः ।
नान्यथा स्वमतिः कार्याऽऽत्मनो राम पृथक् स्थितम् ॥४९॥
इत्युक्त्वा सकलानामो ययौ सीतागृहं मुदा । पौराया गतमओहास्ते चात्मवान् मेनिरे परम् ॥५०॥
एवं राधेष भोः शिष्य दूतवाक्यं सुबोधिताः । पौराः सर्वे यथा तच्च मया ते विनिवेदितम् ॥५१॥
एकदा कैकयी राममागत्य प्रणिपत्य सा । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विनयात्पुरतः स्थिता ॥५२॥
राम राजीवपत्राक्ष मया यदपराशितम् । पुराऽज्ञानावशात्तच्च सव्वं सन्तव्यं वै कृपालुना ॥५३॥
अहं ते शरणं प्राप्ता मामुद्धर जगत्पते । किञ्चिदुपदिशस्व त्वं येनाज्ञानं विनश्यति ॥५४॥
रहते हैं ॥ ३८ ॥ इनमें आत्मा राजा है और जीव तथा इन्द्रियां इस नगरके निवासी हैं ॥ ३९ ॥ काल महान् वीर है और वात पित्त कफ आदि उसके सेवक पूरे देशमें नागरिकोंकी तरह रहते हैं ॥ ४० ॥ इस नगरमें जीव आदि नागरिक दुर्बल हैं। अतएव उन्हींको चोरका विशेष भय रहता है। यदि वे नागरिक मोहग्रस्त होकर भ्रममें पड़ जायं तो अवसर पाकर वे चोरके सेवक अवश्य अपने स्वामी कालका तृण लावेंगे ॥ ४१ ॥ मृत्युका समय किसीको मालूम नहीं है। इस कारण गाफिल रहना ठीक नहीं है। इसके लिए ज्ञान शस्त्र है और वैराग्यको उसकी तीखी धार समझनी चाहिए ॥ ४२ ॥ सदाचार कवच है और अपने दृढ़ भक्तिका होना ही धैर्य है। जो मनुष्य आत्मज्ञानपूर्वक नित्य जागता रहता है उसे कभी किसी प्रकारका भय नहीं रहता ॥ ४३ ॥ सदा सब लोगोंको शास्त्रनिष्ठ होना चाहिए, यही सावधान रहनेका मतलब है। साधुजन आनन्ददायक बाजाके समान उन दूतोंके बाजे हैं ॥ ४४ ॥ सब लोगोंको चाहिए कि इन बातोंको हृदयमें रक्खें और अपनी बुद्धिमें इन्हें देखें। इस प्रकार हे राम ! आज हमारे मोहनाशका प्रभाव आपके सामने उपस्थित है ॥ ४५ ॥ आप ही आत्मा हैं और यह सभा आपका निवासस्थान है। आपके सामने हम जितने लोग उपस्थित हैं, सब मुक्त हो गये हैं ॥ ४६ ॥ और आपसे क्या पूछना है और क्या हमारे लिए आपको उपदेश देना है ? हमारा तो यह विश्वास है कि आपके नामके स्मरणमात्रसे प्राणी मुक्त हो जाते हैं ॥ ४७ ॥ आपके समीप पहुंचे हुए हम सब लोग मुक्त हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। इस तरह उनका बात सुनकर मुसकाते हुए राम बोले— ॥ ४८ ॥ तुम लोगोंने अपनी बुद्धिसे सब कुछ समझ लिया है। सब सानन्दपूर्वक रहो। कभी अपनी बुद्धिमें यह बात न आने देना कि राम मुझसे अलग हैं ॥ ४९ ॥ ऐसा कहकर राम प्रसन्नतापूर्वक सीताके महलमें चले गये । जितने पुरवासियोंका किसी प्रकारका अज्ञान था, अब वह सब नष्ट हो गया और वे आत्मज्ञानी बन गये ॥ ५० ॥ हे शिष्य ! जिस तरह रामके दूतोंसे उनका मति जागृत हुई, वह सारा कथ मैंने कह सुनायी । ५१ । एक समय कैकेयी रामके पास गयी और प्रणाम करके मीठी-मीठी बातोंमें कहने लगी—॥ ५२ ॥ हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले राम ! मैंने उस समय अज्ञानवश जो अपराध किया था, उसे क्षमा कर दो। क्योंकि तुम कृपालु हो ॥ ५३ ॥ मैं जगत्पते ! हे तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। मेरा उद्धार करो और मुझे कोई ऐसा उपदेश
५६३ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
तन्मथ्या वचनं श्रुत्वा रामो राजीवनोचनः। उवाच कैकयीं वाक्यं मधुरं प्रहसन्निव ॥५५॥
न त्वया मेऽपराधो हि मच्छन्दात्तच्च सम्भवौ । स्थित्वा गवाक्ष्ये मा प्राह वरय स्वेदि यत्पुरा ॥५६॥
त्वं च कैकेयि शुद्धोऽसि मयि क्रोधो न मेऽस्ति ते । धन्यां नीत्वोपदेशं हि कारयिष्यति लक्ष्मणः ॥५७॥
इत्युक्त्वा तां विसर्जनार्थं लक्ष्मणं गयचोऽब्रवीत् । शिविकास्था हि कैकेयी यः प्रयाते निशामम ॥५८॥
त्वया नेया वहिः पुर्याः सरय्वाश्च तटं प्रति । अविप्रमूहसंस्थानं वर्तते यत्र तत्र हि ॥५९॥
अविबृन्दान्तिकं नीत्वा कैकेयीं शिविकास्थिताम् । प्रविवाक्यं नि श्राव्याणि मुहुर्ते मम वाक्यतः । ६०,
आनेयव्या ततश्चैव कैकेयी मम मन्निधौ । इति तद्ब्राह्मवचनं श्रुत्वा स लक्ष्मणोऽपि च ॥६१॥
तथेत्युक्त्वा तदा रामं तूर्णां तस्थौ तदग्रतः । अथ प्रभाते सौमित्रिर्गत्वा भरतमन्दिरे । ६२ ।
शिविकायां स कैकेयीं समारुह्य सुसञ्चिताम् । दासीभिः सेवकैश्चैव वेष्टितां वेत्रपाणिभिः । ६३।
तां निनाय बहिः पुर्याः सरय्वाश्च तटे वरे । अविपुर्धानीकं यानं स्थापयामास लक्ष्मणः । ६४ ।
मुम्नातां कैकयीं विप्रास्ते ज्ञात्वा दक्षिणेच्छया । दद्रुवुः शिविकारूपुष्ठे लक्ष्मणस्तानन्यवारयत् । ६५।
अतिमात्रार्थं पञ्चाद्या ये ते ज्ञेया द्विजातयः । दानाहः पण्डिता नते श्रोत्रिया न प्रतिष्ठिता । ६६॥
ततो दूतान्निर कृत्य मुक्ताजालानि लक्ष्मणः । ऊर्ध्वं कृत्वा स्वहस्ताभ्यां कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ६७।
पश्य कैकेयि मातस्त्वमविथूयं पुरःस्थितम् । रामेण प्रेषितोऽस्मि त्वामुपदेशामम ददातु ६८॥
तन्मात्रैर्वचः श्रुत्वाऽऽश्चर्ययुक्ताऽथ कैकयी । प्रतारितोऽहं रामेण किमत्र प्रेष्य मादरम् ॥६९॥
इति तर्कान्कुर्व्वन्ती सा तस्थौ तूष्णीं भृशं तदा । तावच्छुश्राव सा मे मे स्वविश्राव्याणि वै मुहुः ७० ।
तानि श्रुत्वाऽथ कैकेयी तदा चिन्तेऽविगाहतत् । मे मे त्विति मुहुश्चात्र किमर्थं वचनानि हि । ७१॥
अव्यक्तः सर्व्व एवायमत्र गूढार्थस्त्वत्र वर्तते । ततो निभाल्य कैकय्या नेत्रं ध्यात्वा क्षण हृदे । ७२.
दो, जिससे मेरा अज्ञान नष्ट हो जाय ॥५४॥ इस प्रकार कैकेयीकी बात सुनकर मंद २ हंसते हुए राम कहने लगे -, ५५ । हे माता ! तुमने हमारा कोई अपराध नहीं किया है । उस समय हमारी ही इच्छानुसारसंतान तुम्हारा दुराव बैठकर यह वर माँगाथा ॥ ५६ । हे कैकयी ! तुम शुद्ध हो, तुम्हारे ऊपर मेरे हृदयमें कुछ भी रोष नहीं है । कल लक्ष्मण तुम्हारे यहाँ से आकर उपदेश दिला देंगे ॥ ५७ ॥ ऐसा कहकर उसे विदा कर दिया और लक्ष्मणसे कहा कि हमारे कथनानुसार कल कैकेयीको नगरके बाहर सरयूतटपर जहाँ कि भेड़ें रहती हैं, वहाँ ले जाओऔर उन भेड़ेंके मुखसे ही पश्चात् उपदेशमय वाक्य सुनवाकर कैकेयीको यहाँ पर पास ले आओ। इस प्रकार रामका भाता सुनकर लक्ष्मणने वैसा करना स्वीकार कर लिया और चुपचाप रामके सम्मुख बैठ रहे। इसके अनन्तर सबेरे लक्ष्मण जी भरतके भवनमें पहुँचे ॥ ५८ ६२ । वहाँसे कैकेयीको पालकीमें बिठाकर दास-दासी तथा छत्र पर आदिके साथ उस अजाशालाके बाहर सरयूतटपर जहाँ कि भेड़ें रहती थीं, ले गये । वहाँ पहुंचकर उन्होंने रथ रोक दिया ॥ ६३ ।। ६४ । जबकि पुरवासीलोग लक्ष्मण पालकी के साथ जा रहे थे, तब अनेक ब्राह्मणोंने समझा कि कैकेयी स्नान करके लौट रही हैं। और दक्षिणा-सुवर्ण, वस्त्र हेताण दक्षिणा लेनेके लिये दौड़े वहे। लक्ष्मणने उन्हें रोका। क्योंकि वे सब ब्राह्मण लोभामूर्वे, पशु और अन्ध आदि थे। उनमेंसे कोई भी ब्राह्मण ऐसा न था, जो प्रतिष्ठित श्रोत्रिय रहा हो । ६५-६६। जब लक्ष्मणके मना करनेपर भी उन लोगोंने पीछा नहीं छोड़ा तब विवश होकर उन्होंने दोनों दूतों उन्हें हटाया और मोतियोंके लटकने वाले पर्देको अपने हाथसे उठाकर कैकेयीसे कहा-॥ ६७ । हे माँ कैकेयी ! सामने भेड़ोंका झुण्डकी ओर देखो। रामचन्द्रजी आदरपूर्वक तुम्हें इनसे उपदेश लेनेके लिये भेजा है ॥ ६८ ॥ लक्ष्मणकी बात सुनकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वह अपने मनमें सोचने लगी 'रामन यहाँ भेज कर मुझे धोखा तो नहीं दिया है।" इस प्रकार तरह-तरहके तर्क वितर्क करती हुई कैकेयी क्षणभर चुपचाप बैठी रही । तभी उसने कई बार भेड़ोंके मुखसे 'मे मे' की ध्वनि सुनी ॥६९ । ७० ॥ सो सुनकर कैकेयीने अपने मनमें सोचा कि भेड़ बार-बार 'मे मे' क्यों करती है। इसमें कोई न कोई गूढ़ भाव छुपा हुआ