श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १७ ] गद्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९७
सर्गः १७ ] गद्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९७
ययुर्देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽपि समाययुः ॥ ३ ॥
यदा सभायामानीता हेमालङ्कारभूषिता । आरुह्य शिविकायां तु रुक्मवर्णा वरानना ॥ ४ ॥
नवरत्नमयीं मालां बिभ्रती सा स्वयम्बरा । ददर्श नृपनीम्बांश्चपुत्रामश्वविशारदान् ॥ ५ ॥
तद्भ्रचापविनिर्मुक्तेस्तत्कटाक्षपवत्रिभिः । सम्भग्नस्ते नृपाः सर्वे के वयं न विदुस्तदा ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्रान्वितपायसुतो महान् । चित्रांगदो सभायाश्च तां जहार कुशात्मजाम् ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा कार्पान्तगन्धर्व्वान्नानादीग्वेंगसञ्चरः । मोहनास्त्रेण सकलान्वीरान् हन्त्वातिममोहितान् ॥ ८ ॥
रथे निवेश्य तां हेमां हेमाभां वेगवत्तरः । चित्रांगदो बहिर्गत्वा क्रोशमात्रे स्थितोऽभवत् ॥ ९ ॥
किं तृष्णीं चौरवन्नेया मयेयं कुशबालिका । इति निश्चित्य मेधावी तस्थौ चित्रांगदो महान् ॥१०॥
एतस्मिन्नन्तरे पुर्यां हाहाकारो महानभूत् । नीता हेमा योधवरैः पुत्रेणातिबलीयरसा ॥११॥
नृपाः सर्वे महोत्सृष्टुः सभायां खिन्नमानसाः । उपसंहृते तेन मोहनास्त्रेऽतिसम्भ्रमात् ॥ १२।
चित्रांगदेन योद्धुं ते स्वम्हैर्निन्यैर्युतैनृपाः । बहिः साकेतनगरात् क्रोधादारक्तलोचनाः १३।
तूष्णीमेत्रोप्रवाहुः स ददर्श पुत्रकौतुकम् । एतस्मिन्नन्तरे सर्वे तद्रथं पार्थिवोत्तमाः ॥१४।
सर्वेष्ट्य कोटिशः शस्त्रैर्ववर्षुश्चोग्रवाहूजम् । तदा चित्रांगदो वीरो वायव्यास्त्रेण पार्थिवान् ॥१५।
गमने भ्रामयामास वाहनाथैः समन्वितान् । ततो राजाज्ञया सह लक्षाद्या निर्ययुः पुरात् ॥१६।
उत्सवार्थं समायाताः स्वस्वराज्यान् बालकाः । अनुराध्या निजैः सैन्यैः सङ्गताः सङ्गरं ययुः ॥१७॥
तदा बभूव तुमुलं युद्धं सह्नोमहर्षणम् । चित्रांगदं वनंगुस्ते नानास्त्राणि राघवदाः ।१८।
चित्रांगदः स्ववर्णार्थमिश्च्छ। शस्त्राणि तानि हि । निजवाणैर्युपकेतुं चकार विरथं सपात् ॥१९॥
तथा चकार विरथं सुबाहुं पुष्करं तथा । तद्युक्तं चित्रकेतुं च सङ्गदं बलवत्तरः ॥२०॥
आसनेपर बैठे। यह बात राजाओं ही तक नह। थी, बल्कि देवता, गन्धर्व, ऋषि-मुनि, विद्याधर, नाग, किन्नर भी आ-आकर उस उत्सवमें सम्मिलित हुए थे। इन सबके आ जानेपर एक सुवर्णकी पालकीमें बैठो सुमुखी सुन्दरी हेमा हाथमें नवरत्नोंसे बना माला लिय आ पहुंची। सभाके प्राङ्गणम पहुंचकर उसने वहाँपर बैठे हुए समस्त राजाओं तथा राजपुत्रोंको भार प्रकारसे देखा ॥ १-५ ॥ हेमाकन भौंहरूपी धनुषस छूटे हुए कटाक्ष-रूपी बाणोसे घायल होकर सबके सब राज अपन अपक भूल गये। उनको यह भी ज्ञान न रहा कि हम कौन हैं। उसी समय अरिनन्दनके राजा अग्रबाहुका पुत्र चित्राङ्गद कुशकी पुत्रीका हरण करके ले भागा। उसने देखा कि गन्धर्वादि सर्व वृतान्त वर्ताव व्याप्त है। उस उसन एक महनास्त्र छोड़ा। जिससे वहाँ निम्नस्थानमें आये हुए राजे मोहित हो गये। तब वह सुवर्णके समान तेजस्विनी हेमाको रथपर बिठाकर भग ले गया और वहाँसे एक कोसकी दूरीपर जाकर रुका । उसने अपने मनमें सोचा कि चोरोंकी तरह हेमाको लेकर भग जाना ठीक नहीं है। इसलिए वहीं वह ठहर गया ॥६-१०॥ उधर सारी पुरीम यह हाहाकार मच गया कि राजा उग्रबाहुका पुत्र चित्रांगद हेमाका हरण कर के गया ॥ ११ ॥ चित्रांगदक द्वारा मोहनास्त्रका संवरण हो जानेपर सब राजे होशमे आकर उठे और अपनी-अपनी सेना लेकर क्रोधमें लाल-लाल आंखें किये अयोध्यासे बाहर निकले । १२ ॥ १३ ॥ वहींपर हीं बैठा हुआ राजा उग्रबाहु अपने पुत्रका कौतुक देख रहा था। उसी समय सब राज चित्रांगदके पास पहुंचे और उसका रथ बाणों औरमे घेरकर शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। तब चित्रांगदने वायव्य अस्त्र चलाया। जिससे सब राजे अपनी सेना तथा वाहनके साथ आकाशमण्डलमें उड़न लगे। इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे सब आदि सतो भट शहरसे निकल पड़े। उनके अतिरिक्त उत्सव-में आये हुए राजकुमार भी अपनी-अपनी सेना लेकर लड़नेको चल दिये। उस समय चित्रांगदके साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाला तुमुल युद्ध होने लगा। रघुवंशके वे बालक चित्रांगदपर विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलाने लगे ॥ १४- १७। अपने बाणोंसे प्रहार बचाते हुए चित्रांगदने अपने बाणोंके द्वाराझटवें यूपकेतुका रथ ध्वस्त कर डाला। उस वीर बालकने थोड़ी ही देरमें सुबाहु, पुष्कर, तक्ष, चित्रकेतु तथा आंगदको भी विरथ कर
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तद्दृष्ट्वा कौतुकं तस्य ज्ञात्वा तपसः फलम्। लवश्चिच्छेद बाणैर्हस्तस्थं दिव्यमुत्तमम् ॥२१॥
ततो लवः स्वबाणौघैरुग्रबाहुसुतं मुदा। चकार व्याकुलं शीघ्रं तद्दृष्ट्वा लवचेष्टितम् ॥२२॥
उग्रबाहुर्ययौ योद्धुं लवेन वेगतस्त्वरः। लवस्तमपि बाणौघैश्चकार विरथं क्षणात् ॥२३।
उग्रबाहुस्तदा वीरोऽन्ये रथे चारुरोह सः। ववर्ष निशितैर्बाणैर्मूर्च्छयामास तं लवम् ॥२४॥
लवं विमूर्च्छितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्। तदा ययौ कुशो योद्धुमुग्रबाहुनृपेण वै ॥२५।
कुशमागतमाज्ञाय बद्धाद्यास्तदा पुनः। रथस्था युयुधुस्तेन उग्रबाहुनृपेण वै ॥२६॥
पुनस्तानङ्गदादींश्च चकार विरथान्नृपः। तदा कुशः स्वबाणौघैरुग्रबाहुं नृपं क्षणात् ॥२७।
चकार विरथं वीरांश्चिच्छेद तस्य कार्मुकम्। उग्रबाहुस्तदा व्यग्रो बभूव चकितस्तदा ॥२८॥
तं धृत्वा स कुशस्तोषाह्वादयामास दुन्दुभीम्। अथोग्रबाहु मसुनं निन्ये श्रीरामसन्निधौ ॥२९॥
रामस्तं मोचयामास मत्वा तं सुहृदं वरम्। तदा रामो विजायिने कङ्कणं मुनिनाऽर्पितम्। ३०।
ददौ कुशाय प्रीत्या स पुनः कुम्भजन्मनः। कुशस्तदाऽतिशुशुभे वरकङ्कणमण्डितः ॥३१॥
तदा कुशो मुनिं प्राह नत्वा तं कुम्भसम्भवम्। त्वया लब्धं कुतश्चेदं कङ्कणं वद मां मुने ॥३२।
तत्तस्य वचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह कुशं मुदा। पुरेन्द्ररिपवो वत्स बहवः सागरेण हि। ३३॥
कृताः स्वौर्वनिवामाश्च तदाऽहं नाकपार्थिनः। कृत्वा सन्तुलनंऽब्धिं तं पीतवाँल्लीलयैव हि । ३४॥
ततो मुमो द्वीपयोर्हि मर्यादां मध्यवर्तिनीम्। दृष्ट्वा पुनर्नार्कपेन प्रार्थितो ह्यवधृणा ॥३५॥
मूत्रवन्तामरं भीमं सजीवं मुक्तवानदम्। तदाऽब्धिनाऽर्पितं मह्यं कुश यत्कङ्कणं वरम् ॥३६॥
नानारत्नविचित्रं च सूर्यतेजोवगर्जितम्। तद्रामस्यार्पितं पूर्वं मया तेन त्वयार्पितम् ॥३७॥
दिया। इस कौतुकको देखकर लवने समझ लिया कि यह सब चमत्कार उसकी तपस्याका है। यह विचार-
कर लवने अपने बाणवर्षास चित्रांगदके उस उत्तम धनुषको काट डाला और इतनी शीघ्रतासे बाणवर्षा की
कि चित्रांगद व्याकुल हो गया ॥ १६-२२। ऐसी अवस्थाम उपबाहु चित्रांगदका पिता, स्वयं लवके साथ
युद्ध करनेके लिय रणमे उतर पड़ा, किन्तु लवने थोड़ी ही देरमें उसका भी रथ ध्वस्त कर दिया तब उप्रबाहु
तुरन्त एक दूसरे रथपर बैठकर युद्ध करने लगा और अपने तीक्ष्ण बाणोंका मारस लवको मूर्च्छित कर दिया।
उसे मूर्च्छित देखकर संग्रामभूमिमें हाहाकार मच गया। तभी उधर कुश युद्ध करनेके लिए रामका दूसरा पुत्र कुश
भी आ पहुंचा। कुशको आया देखकर वे अङ्गद आदि रघुवंशी राजकुमार रथोंपर बैठ बैठकर उत्साहपूर्वक
उग्रबाहुस युद्ध करने लग। किन्तु उपबाहुने अपने युद्धकौशलस था। ड़ी दरमें अङ्गद आदि सभी राजकुमारोकि
रथोंको नष्ट कर डाला। उधर अपने भ्राताओंपर प्रहार करते देखकर कुशने उपबाहुको क्षणभरमे विरथ
कर दिया और उसका धनुष काट डाला। उग्रबाहु इस समय आश्चर्यके साथ व्यग्र हो उठा ॥ २३-२७ ॥
तब कुशने झटपट उन बाण-बेगको बन्दी बना लिया और अपनी विजयदुन्दुभी बजवा दी। चित्रांगद तथा
उग्रबाहुको अपने साथ लेकर कुश रामचन्द्रजीके सामने गये। वहाँ पहुँचनेपर उग्रबाहुको अपना मित्र समझ-
कर रामने छुड़ा दिया और विजयी कुशको अगस्त्य ऋषिके समक्ष अगस्त्यका ही दिया हुआ कङ्कण दिया। उस
कङ्कणके पहिननेसे कुशकी शोभा ओर भी बढ़ गयी २८-३१ ।। इसके बाद कुशने अगस्त्यऋषिसे कहा-
हे मुने आपने यह कङ्कण कहाँ पाया था ? यह हमसे कहिए । ३२ । कुशकी बात सुनकर अगस्त्यने कहा-
हे वत्स ! आजके बहुत समय पहले इन्द्रके बहुतरे शत्रु समुद्रके भितर घर बनाकर रहा करते थे। इन्द्रके
प्रार्थना करनेपर मैंने समुद्रको चुल्लुक भरकर पी लिया। जब इन्द्रने अपने सारे शत्रुओंको मार डाला, तब दो
द्वीपोंके मध्यकी सीमाको नष्ट देखकर इन्द्रने मुझसे समुद्रको फिर पूर्ववत् बना देनेकी प्रार्थना की ॥३३-३५॥ तब
मैंने मूत्रके मार्गसे फिर समुद्रको सजीव करके बहा दिया। उसी समय समुद्रने मुझे उपहारके रूपमें यह कङ्कण
दिया था ॥ ३६ ॥ अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित तथा सूर्यके तेजकी नाई तेजोमय यह कङ्कण मैंने रामको दे
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सत्युनेर्वचनं श्रुत्वा कुशस्तं प्राह वै पुनः । लवस्य जीवनोपायं वद मह्यं भो मुने ॥३८॥
कुशस्य वचनं श्रुत्वाऽगस्तिस्तं प्राह सादरम् । विमूर्च्छितो यदा पूर्वं भरतः पथि पार्थिवैः ॥३९॥
मूर्च्छितः पतितश्चास्ति रणे रिपुशरैर्हतः मुद्गलाश्रमतः कल्याणदायिन्यो लताः शुभावहाः ॥४०॥
सौमित्रिणा तदाऽऽय त्वं मुद्गलाश्रमतः पुनः । महौषधी समानीय जीवयैनं लवं जवात् ॥४१॥
अथवा त्वं हनूमंतं प्रेषयस्वाश्रमं मुनेः । एवं यावच्च स मुनिः कथयामास तं कुशम् ॥४२॥
राघवप्लवगश्चन श्रुत्वा मुनेर्माहातिना क्षणात् । ममानीयाश्रमाच्छीघ्रंमुद्गलस्य तपोनिधेः ॥४३॥
ताभिस्तं जीवयामास लवं सैन्यसमन्वितम् ।
विष्णुदास उवाच
गुरो ऽस्यैव च मुनेर्मुद्गलस्याश्रमे कथम् ॥४४॥
मृतसंजीवनीवन्त्यादिका सन्त्योऽत्र निमंताः । कथ ना हि समीपस्था विस्मृत्य द्रोणपर्वतम् ॥४५॥
प्रेषितोऽञ्जनिपुत्रः स तेन जांबवता पुरा । अमुं मे संशयं छिंधि कृपां कृत्वा मुनीश्वर ॥४६॥
श्रीरामदास उवाच
यदा मातृविमोक्षार्थममृतस्य खगाधिपः । कलशं स्वमुखे धृत्वा नाकलोकान्समानयत् ॥४७॥
तदा तत्कलशाद्वेगाद्विंदुस्तत्रापतद्भुवि । तद्देशोमुद्गलस्यापि मुनेस्तपःप्रभावतः ॥४८॥
आसन् वल्ल्यश्च तस्यैव चाश्रमे हि द्विजोत्तम । नैना वेद शुभा कश्चिर्जीवदान्स वनेचरः ॥४९॥
द्रोणाचल स्ततस्तेन प्रेषितो वायूनन्दनः । इति त्वया यथा पृष्टं तथा ते विनिवेदितम् ॥५०॥
इदानीं शृणु शिष्य त्वं शुभा तां प्राक्तनीं कथाम् । ततो लवादिकाः सर्वे ययुस्ते स्वपुरीं मुदा ॥५१॥
नत्वा मुनिं च रामादींस्तत्पुः श्रीराघवाग्रतः । तता महोत्सवश्चासीत्पुर्यां तल्लवदर्शनात् ॥५२॥
ततो दृष्ट्वा लवं रामो जीवितं वायुजेन हि । समालिंग्य रढं प्रेम्णा परं तोषमवाप सः ॥५३॥
दिया और रामने इस आज तुम्हे दिया है ॥ ३७ ॥ मुनिकी बात सुनकर कुशने कहा अब हमें कोई ऐसा उपाय बतलाइए, जिससे लव जीवित हो जाय । ३८ ॥ वह इस समय शत्रुओंके अस्त्रोंसे घायल होकर रणभूमिम पड़ा हुआ है। कुशकी प्रार्थना सुनकर अगस्त्यने कहा—उस समय जब कि जनकपुरके मार्गमे राजाओंने भरत-को मूर्छित कर दिया था, तब मुद्गल ऋषिके आश्रमसे कल्याणदायिनी लताएं लक्ष्मण द्वारा लायी थी उसी प्रकार आज तुम मुद्गलके आश्रमसे वह लता लाकर लवको जी वित कर लो ॥ ३९-४१॥ अथवा हनुमानजीको भेज दो। ये ही वह लता ले आयगे । मुनिकी बात सुनते ही हनुमान्जी चल पड़े और थाड़ा ही दूरपर मुद्गल-ऋषिके आश्रमसे रह लता लाकर रख दी और उन्ही लताओंसे कुशने क्षणमात्रम सेना समत लवको जीवित कर लिया। इतनी कथा सुनकर विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! ये मृतसञ्जीवनी लताएं मुद्गल ऋषिके आश्रमपर आकर कैसे उग गयीं। फिर जब वे इतना समीप थी, तब लक्ष्मणकी मूर्छाके समय जाम्बवान्ने हनुमान्जीको द्रोणाचलपर क्यो भेजा—हे मुनीश्वर ! मेरे ऊपर कृपा करके मेरी इस शंकाका समाधान कीजिये ॥ ४२-४६ ॥ श्रीरामदासने कहा—जिस समय अपनी माताको छुड़ानेके लिए गरुड स्वर्गसे ओषम अमृतकलश लेकर चले तो मुद्गल ऋषिके आश्रमपर जाते ही कलशमस अमृतक एक बूंद यहाँ गिर पड़ी। इसीलिए और ऋषिके तपाबलसे उसी स्थानपर वे मृतसञ्जीवनी बल्लरियां उग गयीं। वनचर जाम्बवान् इस स्थानकी लताओंको जानते ही नहीं थे। यही कारण हनुमान्जीका द्रोणाचलपर भेजा या । ४७ ॥ ५० । जैसा तुमने प्रश्न किया, मैंने उसका उत्तर दे दिया। अच्छा, अब अपनी पुराना कथापर आ जाओ—उसे सावधान मनसे सुनो। उस औषधिसे जीवित लव आदि वीर लौटकर सहर्ष अपनी अयोध्यापुरीमे आ गये ॥ ४१-५१ ॥ रामकी सभामें पहुँचकर लव आदिने वसिष्ठजीको प्रणाम किया और रामके सामने बैठ गये । लवको देखने से उस रोज पुरीभरमें बड़ा उत्साह था। जब रामने देखा कि हनुमान्जीके पुरुषार्थसे लघ जीवित होकर
५०० आनन्दरामायणे [सर्गः १७
ततो रामो वायुजाय कङ्कणे रत्नमण्डिते। ददौ परमसंतुष्टस्ताभ्यां स शुशुभे कपिः ॥५४॥
ततो लवाय श्रीरामस्तत्परं कङ्कणं वरम्। ददावगस्त्यिना दत्तं पूर्वं यद्रत्नमण्डितम् ॥५५॥
लवस्तेनातिशुशुभे रत्नकङ्कणमण्डितः। लवस्तदा मुनिं प्राह नत्वा तं कुम्भसम्भवम् ॥५६॥
त्वया लब्धं कुतश्चेदं कङ्कणं वद मे मुने। ततस्तद्वचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह लवं मुदा ॥५७॥
एकदा दण्डकारण्येडहं स्नातुं हि गतः सरः। तस्मिन्स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तत्र स्थितः क्षणम् ॥५८॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र खात्स्वर्गी समुपागतः। दिव्यं विमानमारूढः शतस्त्रीपरिवेष्टितः ॥५९॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धादिचर्चितः। स स्वर्गी खात्समायातो यावत्तावत्सरोवरम् ॥६०॥
शवं विनिर्गतं श्रेष्ठं स्फीतं हि मर्यकण्ड्। दुर्गन्धसहितं दुष्टं प्राप्तं तत्परमप्लवम् ॥६१॥
अवरुह्य विमानाच्चाप्य स्वर्गी तच्छवं ययौ। छित्त्वा तच्छवमांसं वै भक्षयामास सादरम् ॥६२॥
ततः पीत्वा जलं स्वर्गी विमानं चारुरोह सः। निमग्नं तच्छवं चापि पुनस्तस्मिन्सरोवरे ॥६३॥
स्वर्गेण गन्तुकामं स दृष्ट्वाहं चातिविस्मितः। अब्रुवं मधुरं वाक्यं रे रे दिव्यस्वरूपधृक् ॥६४॥
क्षणं तिष्ठोत्तरं देहि कौतुकं मे मवेक्षितम्। ईदृशस्ते शवाहारः कथं स्वर्गीनवामिनः ॥६५॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा स स्वर्गी प्राह मां तदा। सम्यक् पृष्टं त्वया ब्रह्मन् शृणु सर्व मयोच्यते ॥६६॥
सुदेवाख्यो हि वैदर्भो नृपोऽभूत्प्रवरोऽभवम्। तत्पुत्रौ श्वेतसुरथौ श्वेतोऽहं पार्थिवोऽभवम् ॥६७॥
नैव दानं मया तस्मिन् जन्मन्पत्र कृतं कदा। स्वीयराज्यमदोन्मत्तः पापकर्मरतः सदा ॥६८॥
ततोऽपुत्री त्वहं राज्ये कृत्वा तं सुरथानुजम्। वार्धके तु वनं प्राप्तस्तपस्तीव्रं समाचरम् ॥६९॥
एकदा स्नातुमुद्युक्तो निमग्नोऽहं सरोवरे। ततो मृतो दिवं प्राप्तस्त्वहं स्वीयतपोबलात् ॥७०॥
सामने बैठे हैं तो प्रेमपूर्वक वाल्मीकिको छातीसे लगा लिया और बड़े प्रसन्न हुए ॥ ५२॥ ५३॥ इसके बाद रामने हनुमान्जीको रत्नोंसे खचित दो कङ्कण दिये। जिन्हें पहनकर हनुमान्जी बहुत सुन्दर दीखने लगे। फिर रामजीने एक दूसरा कंकण जिसे अगस्त्यजीने दिया था, वह लवको दे दिया। उस बहुमूल्य कंकणको पहि-
नकर लव भी अतिशय शोभायमान हुए। तब लवने अगस्त्यजी का प्रणाम करके कहा- ॥ ५४-५६ ॥ हे मुनिराज ! यह कंकण आपको कहाँ मिला था ? सो हम बतलाइये। इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर अगस्त्य परम प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे ॥ ५७ ॥ एक बार मैं दण्डकारण्यमें एक सरोवरपर स्नान करने गया। वहाँ स्नान-नित्यकर्म आदि कर तीर्थपर थोड़ी देरके लिए बैठ गया ॥ ५८ ॥ इसी बीच आकाशमार्गसे एक स्व-
र्गीय प्राणी सैकड़ों स्त्रियोंसे घिरा हुआ दिव्य विमानपर आरूढ़ होकर वहीं आया ॥ ५९ ॥ वह दिव्य माल्य आदि धारण किये हुए दिव्य गन्धसे चर्चित था। उस स्वर्गकि आते ही सरोवरसे एक भयानक दूषित तथा दुर्गन्धपूर्ण शव निकलकर तटपर आ लगा ॥ ६० ॥ ६१ ॥ इसके अनन्तर वह स्वर्गीय प्राणी अपने विमानमें उतरकर उस शवके पास पहुँचा और उसके मांसको उसने बड़े प्रेमसे खाया। फिर जल पिया और अपने विमानपर जा बैठा। उधर शव फिर डूब गया। उस गमनोन्मुख स्वर्गीके पास पहुंचकर मैंने उससे कहा-
हे दिव्यस्वरूपधारिन् ! थोड़ी देरके लिए रुककर मेरी बातोंका उत्तर देते जाओ। तुम्हारे इस कार्यको देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ है। अच्छा हमें यह बताओ कि इस प्रकार स्वर्गीय प्राणी होकर भी तुम मुर्दा क्यों खाते हो ? ॥ ६२-६५ ॥ मेरा बात सुनकर उसने उत्तर दिया हे ब्रह्मन् ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। सुनो, मैं सब बतलाता हूँ पूर्वसमयमें विदर्भ देशके अधिपति सुदेव नामके एक राजा थे। उनके श्वेत और सुरथ नामके दो पुत्र थे। जिनमें श्वेत मैं था और राज्य भी मेरे ही हाथोंमें था ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ उस समयमें राज्यमदसे मत्त होकर मैंने कोई दान नहीं किया। हमेशा पापकर्ममें रत रहा ॥ ६८ ॥ मेरे कोई सन्तति नहीं थी। इसलिए वृद्धावस्थामें अपने छोटे भाई सुरथको मैंने राज्यासनपर बिठा दिया और जंगलमें जाकर कठोर तपस्या करने लगा। एक बार स्नान करनेके लिए एक सरोवरमें डूबने लगातो सो वहीं डूबकर मर गया। मरनेके बाद अपनी तपस्याके प्रभावसे मैं स्वर्गलोकमें पहुँचा। तपस्याके फलस्वरूप वहां