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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ६५१

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ६५१

गता दंता गते नेत्रे श्लथा जाता त्वगत्र हि । कृष्णकेशाः सिता जाता मृत्युर्ज्ञेयः पुरःस्थितः ॥१३६॥
दाने विलंबो नो कार्यः कार्यं चित्तं सुनिर्मलम् । तुषद्वच्च धनं देयं मा कार्पण्यात्प्रसङ्गत्वम् ॥१३७॥
एवं श्रीरामदूतास्ते सप्तद्वीपांतरस्थितान् ।
श्रावयित्वा गधवाज्ञां महादुंदुभिनिःस्वनैः ॥१३८॥
अयोध्यां स्वां ययुः सर्वे रामं वृत्तं न्यवेदयन् ।
संश्राविता तवाज्ञास्मिन्नाज्ञा भग्नान् जनान्मुहुः ॥१३९॥
सप्तद्वीपेषु सर्वत्र दुंदुभीनां महास्वनैः । दत्तेशं वचनं श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽभवत्तदा ॥१४०॥
एवं रामेण भूम्यां हि चरित्राणि महान्ति च । आचरित्राण्यनेकानि कस्तान्प्रवक्तुं वदिष्यति ॥१४१॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं राज्यकांडं मनोहरम् ।
चतुर्विंशत्सुवर्गैश्च महामङ्गलकारकम् ॥१४२॥
राज्यकांडं नृपा यत्र पठन्ति भक्तिसत्पराः । न ते राज्यात्परिभ्रष्टा भवन्ति हि कदाचन ॥१४३॥
राज्यकांडं महापुण्यं महामांगल्यदायकम् । ये शृण्वंति नरा भूम्यां ते मांगल्यं भजन्ति हि । १४४॥
एकैकरधितैः सर्गेरैकैकेन क्षयेन च । मन्त्रवत्पंचाशिद्दिनानुष्ठानं सुसिद्धिदम् ॥१४५॥
आधिपत्यं नराः प्राप्य राज्यकांडं पठन्ति ये ।
आधिपत्यान्परिभ्रष्टा न भवन्ति कदाचन ॥१४६॥
राज्यकांडं पठित्वा तु रणे वादे जयो भवेत् । शरणं शत्रवः शीघ्र यान्त्येतत्कवचादिना । १४७॥
आनन्दरामायणमध्यमार्थं ये राज्यकांडं मनुजाः पठन्ति ।
राज्याच्च्युता राज्यपदं लभन्ते भवन्ति भ्रष्टा न तु ते पदस्थाः ॥१४८॥
आनन्दरामायणमेतदुत्तमं तत्रापि कांडेपु विचित्रमुत्तमम् ।
श्रीराज्यकांडं परमं सुखौघ्यदं महाऽतिभक्त्या श्रवणोपमादगात् ॥१४९॥

अवस्था भी चली जायगी, यह सोचकर यमके कठोर शासनका स्मरण करे ॥ १३४ ॥ १३५ ॥ दांत टूट गये, आँखोंसे कम सूझने लगा, शरीरके चमड़े ढीले पड़ गये और काले-काले बाल श्वेत हो गये । तब यह समझे कि अब मृत्यु सामने आकर खड़ा है ॥ १३६ ॥ दानमें विलम्ब न करे और अपना चित्त निर्मल रक्खे । भूसीकी तरह समझकर धनका दान करे । कंजूस बनकर उसकी रक्षा न करे ॥ १३७ ॥ इस तरह सातों द्वीपोंमें रहनेवालोंको रामकी आज्ञा सुनाकर वे दूत रामके पास लौट गये और उनको सब समाचार सुनाते हुए कहने लगे- हे राघव ! हमने सप्तद्वीपके निवासियोंको दुन्दुभीकी गर्जनाके साथ आपकी आज्ञा सुना दी । उनकी बात सुनकर राम प्रसन्न हुए ॥ १३८-१४० ॥ इस प्रकार रामने इस पृथिवीतलपर कितने ही बड़े-बड़े काम किये । उन सबको पूरी तरह बतलानेवाला कौन है ? ॥ १४१ ॥ हे शिष्य ! इस रीतिस मैंने तुम्हें चौबीस सर्गोंमें महा मङ्गलकारक मनोहारी राज्यकाण्ड सुनाया ॥ १४२ ॥ भक्तिपरवर होकर राजा लोग यदि इस राज्यकाण्डको पढ़ेंगे-सुनेंगे तो वे कभी भी अपने-अपने राज्यसे च्युत न होंगे ॥ १४३ ॥ यह राज्यकाण्ड बड़ा पवित्र और महामङ्गलदायक है । जो मनुष्य पृथिवीतलपर इसे सुनेंगे, उनका सदा कल्याण होगा ॥ १४४ ॥ प्रतिदिन एक-एक सर्ग बढ़ाता हुआ और पूरा होनेपर एक-एक कम करता हुआ यदि इसका अनुष्ठान करे तो यह सब प्रकार-की सिद्धियां प्रदान करता है ॥ १४५ ॥ कहींका आधिपत्य पाकर जो इसका पाठ करते हैं, वे अपने आधिपत्यसे कभी भी भ्रष्ट नहीं होते ॥ १४६ ॥ राज्यकाण्डका पाठ-पूजन आदि करनेसे शत्रु शीघ्र अपनी शरणमें आ जाते हैं ॥ १४७ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस राज्यकाण्डको जो लोग पढ़ते हैं वे यदि राज्यसे भ्रष्ट हो गये हों तो फिर राज्याधिकारी हो जाते हैं । फिर कभी वे उससे भ्रष्ट नहीं होते ॥ १४८ ॥ पहले तो आनन्दरामायण ही उत्तम है, फिर उसके सब काण्डोंमें यह राज्यकाण्ड उत्तम है । यह हर तरह सुखदायक

५५२आनन्दरामायणे[ सर्गः २४

राज्यस्थित्यर्था व्यवसायतत्परैः सदैत चैतच्छ्रवणींयमादरात् ।
उत्साहकाले प्रनयेन्थमङ्गले विवाहकाले पठनीयमुत्तमम् ॥१५०॥
श्रीराज्यकाण्डं भुवि सौख्यदायकं पुण्येषु कालेषु पठन्ति ये नराः ।
लभन्ति सौख्यान्यभिमङ्गलानि त गच्छन्ति विष्णोर्परमान्त्याः पदम् । १५१॥
पुण्यं पवित्रं परमं विचित्र श्रीरामचन्द्रस्य कथानकं सदा ।
भक्त्या मुनीनामपि मङ्गलप्रदं श्रोतव्यमेतत्पठनीयमादरात् ।१५२।

इति श्रीमत्कौशिके रामायणे आनन्दरामायणे राज्यकाण्डे उत्तरार्धे उमामहेश्वरसंवादे तथा रामदशाकथनंनाम तीर्थवर्णनं नाम चतुर्विंश सर्ग ॥२४॥

है, इसलिए इस काम में उत्साह पाने के लिए जो लोग उद्योग में लगे हों, उन्हें यह काण्ड सुनना चाहिए। तथा जब कोई विवाह अथवा कोई उत्साहका समय हो, तब इसे अवश्य सुनें ॥ १५० ॥ जो मनुष्य इस काण्ड को किसी पवित्र समयमें पढ़ते या सुनते हैं, वे अंत समयमें विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको जाते हैं। १५१ ॥ परम पवित्र और अति विचित्र श्रीरामचन्द्रका यह कथानक मुनि तथा भक्तगण सादर इसका पठन और श्रवण करना चाहिए । १५२ ॥
इति श्रीमत्सकलपण्डितमण्डलाग्रगण्य पं० रामेश्वरपाठकविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे चतुर्विंशः सर्गः ॥ २४ ॥

। इति राज्यकाण्डं उत्तरार्द्धं समाप्तम् ।

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

श्रीसीताप्तये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


मनोहरकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

( लघुरामायण )

विष्णुदास उवाच

गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि यत्तत्त्वं वक्तुमर्हसि । वेदवाक्यं पुरा प्रोक्तं नारदेन महात्मना ॥ १ ॥
रामायणं वाल्मीकये संक्षेपच्चेति मेऽकथि । तावदेवार्थमादाय श्लोकरूपं वदस्व माम् ॥ २ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु यत्पृष्टं च त्वया सर्वं तद्वदामि तवाग्रतः ॥ ३ ॥
नारदाद्वेदवाक्यञ्च यथा वाल्मीकिना श्रुतम् । तावदेवार्थमादाय तेन वाल्मीकिना पुरा ॥ ४ ॥
शतश्लोकमितं रामचरितं पापनाशनम् । शतकोटिमितार्थां स्वकवितानां मनोरमम् ॥ ५ ।
आदावेवैकमेवास्ति तत्तवाग्रे वदाम्यहम् । शतकोटिमित्ते रम्यं लघुरामायणाह्वयम् ॥ ६ ।
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥ ७ ॥
वाल्मीकेर्मुनिसिंहस्य कवितावनचारिणः । शृण्वन्रामकथानादं को न याति परां गतिम् ॥ ८ ॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! मै आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि वेदवाक्योंका सारांश लेकर संक्षेपमें नारदजीने महर्षि वाल्मीकिसे कौन सी रामायण कही थी ? उसी सार वस्तुको श्लोकरूपमें बनाकर वाल्मीकिने आपको सुनाया था, वह हमसे भी कहिए । १ ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा-हे वत्स ! तुमने अच्छा प्रश्न किया है अब सावधान होकर सुनो तुमने जो प्रश्न किया है उसका उत्तर तुम्हारे आगे कह रहा हूँ ॥ ३ ॥ जब वाल्मीकिजीने नारदके मुखसे वेदवाक्योंसे संकलित रामचरित्र सुन लिया तब उसी अर्थको लेकर उन्होंने सौ श्लोकोंमें पापनाशक लघुरामायणकी रचना की और अपने रामायणके आदिमें उन्होंने उसी लघुरामायणको स्थान दिया। वही सौ श्लोकोंवाला लघुरामायण आज मैं तुम्हारे आगे कह रहा हूँ ॥ ४-६ ॥ कवितारूपिणी शाखापर बैठकर मीठे मीठे अक्षरोंमें रामनामका गान करनेवाले वाल्मीकिरूपी कोकिलको मैं वन्दना करता हूँ ॥ ७ ॥ कवितारूपी वनमें विहार करनेवाले तथा मुनियोंमें सिंह-सदृश वाल्मीकिकी रामकथारूपिणी गर्जनाको सुनकर संसारमें कौन ऐसा प्राणी है, जो उत्तम गतिको न

५५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

यः पिबन्सततं रामचरितामृतसागरम् । अतृप्तस्तं मुनिं वन्दे प्राचेतसमकल्मषम् ॥ ९ ॥
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् । रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥१०॥
अञ्जनीनंदनं वीरं जानकीशोकनाशनम् । कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम् ॥११॥
उल्लंघ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः ।
आदाय तेनैव ददाह लंकां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥१२॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं मनसा स्मरामि ॥१३॥
रामाय भद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥१४॥
जितं भगवता तेन हरिणा लोकधारिणा । अनेन विश्वरूपेण निर्गुणेन गुणात्मना ॥१५॥
इति मंगलाचरणम्

तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् । नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम् ॥ १ ।
को न्वस्मिन्सांप्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः । २ ॥
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः । विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकः प्रियदर्शनः ॥ ३ ॥
आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयकः । कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥ ४ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे । महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् । ५ ॥
श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः । श्रूयतामित्यामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः । मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तः श्रूयतां नरः ॥ ७ ॥

प्राप्त होता हो ? कोई नहीं ॥८॥, जो निरन्तर रामचरितरूपी अमृतरूपसागरका पान करते हुए भी कभी नहीं तृप्त होने वाले, ऐसे कल्मषरहित श्रीवाल्मीकि मुनिको मैं प्रणाम करता हूँ । विशाल समुद्रको जिन्होंने गोके खुर डूबने योग्य बनाया, राक्षसको मच्छर समझा और जो इस रामायणरूपिणी महामालाके रत्न हैं, उन हनुमान्‌जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९ । १० ॥ अञ्जनाके सूनून्, जानकीके शोकनाशक, वानरोंके प्रभु, अक्षयकुमारके संहारकारी तथा लंकाके लिए भयावने वीर मारुतिकी मैं वन्दना करता हूँ ॥११॥ जो हंस खेलमें समुद्रकी जलराशिको लांघकर लङ्का पहुंचे, वहीं सीताके शोकरूपी अग्निको लेकर उन्होंने उसान से ही लंकाका भस्म कर दिया, उन अञ्जनीनन्दनको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ जिनमे मनके समान वेग है, वायुके सदृश त्वरा है, जिन्होंने इन्द्रियां जीत ली है, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, ऐसे वायुके पुत्र, वानरसंघके मुखिया और श्रीरामके दूत हनुमान्‌को मैं मनमें स्मरण करता हूँ । १३ ॥ राम, रामभद्र, रामचन्द्र, विधातास्वरूप, रघुवंशके नाथ, जगन्नाथ और सीतापति रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥ भगवान्, संसारके पालक, अज, और विश्वरूप उन रामने निर्गुण होकर भी सगुणरूपसे सारे संसारको अपने वशमें कर लिया है ॥ १५ ॥
इति मङ्गलाचरणम् ।

विद्वानोंमें श्रेष्ठ, तपस्या और स्वाध्यायमे संलग्न मुनिश्रेष्ठ नारदसे तपस्वी वाल्मीकिने पूछा— ॥ १ ॥ इस संसारमें इस समय गुणवान्, वशपराक्रमशाली, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता और अपने व्रतपर दृढ़ कौन है ? ॥ २ ॥ कौन ऐसा है, जो सच्चरित्रयुक्त है ? कौन सब प्राणियोंके हितमें लगा हुआ है और कौन ऐसा है जो विद्वान् समर्थ तथा देखनेमें सुन्दर है ॥ ३ ॥ कौनमा ऐसा पुरुष है जो आत्मज्ञानी, क्रोधको वशमें किये हुए तथा तेजस्वी है और दूसरेसे ईर्ष्या नहीं करता ? संग्रामभूमिमें जिसके कुपित होनेपर देवता भी भयभीत होजाते, ऐसा कौन है ? ॥ ४ ॥ यह मैं सुनना चाहता हूँ। उसे जाननेके लिए मुझे बड़ा कौतूहल है । हे महर्षि ! आप उक्त प्रकारके पुरुषको जान सकते हैं ॥ ५ ॥ त्रिलोकीके ज्ञाता नारद वाल्मीकिकी बात सुनकर बोले—अच्छा, सुनो । इस तरह संबोधव करके महर्षि नारद कहने लगे—॥ ६ ॥ हे मुने ! आपने जिन गुणोंका वर्णन किया है, वे बहुत ही दुर्लभ हैं । फिर भी मैं अच्छी तरह विचार करके

सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५५५


इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्वशी ॥ ८ ॥
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः। विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥ ९ ॥
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः । आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ॥ १०॥
समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् । पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः ॥११॥
धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः । यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ॥१२॥
प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः । रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥१३॥
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता । वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः । १४॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् । सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । १५॥
सर्वदाऽभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः । आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ॥१६॥
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः । समुद्र इव गांभीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥१७॥
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः । कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥१८॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः । तमेवंगुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥१९॥
ज्येष्ठं ज्येष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथः सुतम् । प्रकृतीनां हिते युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥२०॥
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपतिः । तस्याभिषेकसंभारं दृष्ट्वा भार्या च कैकयी ॥२१॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनंमयाचत । विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥२२॥
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयतः । विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् । २३॥


उन गुणान् युक्त मनुष्यको बतलाना हूँ। ७॥ जिसके विषयमे आप सब कुछ कहना चाहता है उन्हे लोग राम कहते हैं । वे आत्मज्ञानी, महाबली, तेजस्वी, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं ॥८॥ वे बुद्धिमानी, नीतिज्ञ, वक्ता, श्रीमान् और शत्रुओंके विनाशक हैं उनका खूब लम्बा-चौडा कन्धा है। लम्बी-लम्बी भुजायें हैं। शंखकी तरह उनकी ग्रीवा है और विशाल डाढ़े हैं ॥९॥ उनकी विशाल छाती है। वे हाथमें विशाल धनुष धारण किये रहते हैं उनकी पसलियां छिप रहती हैं। वे शत्रुओंका दमन करनेकी प्रबल शक्ति रखते हैं जानु (घुटनों) तक पहुंचनेवाले उनके हाथ हैं, सुन्दर माथा है, बलिष्ठ ललाट है, सराहनीय पराक्रम है, बराबर और सुडौल उनके अंग हैं, मनोहारीरंग है और उनका प्रताप भा साधारण नहीं है। उनकी सुदृढ छाती है, बडी-बडी आँखें हैं वे शोभासम्पन्न हैं और उनमें सभी शुभ लक्षण विद्यमान हैं ॥१०।११॥ वे धर्मज्ञ और सत्यसन्ध (अपनी प्रतिज्ञाको निभानेवाले) हैं। वे सदा प्रजाके हितमें रत रहते हैं। वे यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, पवित्र, वशी और समाधिमान् हैं ॥ १२॥ वे राम प्रजापतिके समान श्रीमान्, जगत्के पालक एवं शत्रुओंके विनाशक हैं। वे समस्त संसारकी तथा धर्मकी सर्वथा रक्षा करते हैं । १३ वे धर्मके रक्षक हैं और निज जनकी रक्षा करते हैं। वे वेद-वेदाङ्गोंके सारे तत्त्वोंको जानते हैं और धनुर्वेदमे एक असाधारण प्रतिभा रखते हैं ॥ १४। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ तथा तत्त्वको जाननेवाले, स्मृतिमान् प्रतिभाशाली, सबको प्रिय, साधु, उदानात्मा और पण्डित हैं ॥ १५ ॥ जैसे समुद्र नदियोंसे मिलता है वैसे ही वे सदा सज्जनोंसे मिलते हैं और उनका दर्शन सबको सुखदायी होता है ॥ १६। वे राम सर्वगुणसंपन्न, कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, समुद्रके तुल्य गम्भीर तथा हिमालयके समान धैर्यशाली हैं ॥ १७॥ वे वीर्य एव बलमें विष्णुके सदृश हैं, चन्द्रमाके सदृश सबको उनका दर्शन प्रिय है वे क्रोधमें कालानिके समान और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं ॥ १८॥ त्यागमे कुबेरके सदृश, सत्यमें दूसरे धर्मराजके समान तथा सब गुणोंसे युक्त हैं। सब पुत्रोंमे बड़े प्रजाके हितमें संलग्न एवं प्रजाप्रिय उन सत्यपराक्रम रामको राजा दशरथने प्रजाके हितके लिए युवराज बनानेका निश्चय किया । श्रीरामके अभिषेककी तैयारी देखकर पूर्वकालमें वरप्राप्त दशरथकी प्यारी रानी कैकेयीने उसी समय अपने पतिसे रामके निर्वासन तथा भरतके राज्याभिषेकका वर माँगा ॥ १६।२०।२१।२२॥ तदनुसार

५६६ । आनन्दरामायणे । [ सर्गः १

स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।
पितुर्वचननिर्देशात्कैकेय्याः प्रियकाम्यया ॥ २४॥

तं व्रजंतं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ।
स्नेहाद्विनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ २५॥

भ्रातरं दयितो भ्रातुः सौभ्रात्रमनुदर्शयन् ।
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ॥ २६॥

जनकस्य कुले जाता देवमायायेव निर्मिता ।
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥ २७॥

सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ॥ २८॥

शृङ्गवेरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् ।
गुहनामानं च धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ॥ २९॥

गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥ ३०॥

चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वन त्रयः ॥ ३१॥

देवगन्धर्वसंकाशास्तत्र ते न्यवसन्सुखम् ।
चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा ॥ ३२॥

राजा दशरथः स्वर्गं जगाम विलपन्सुतम् ।
गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ॥ ३३॥

नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महाबलः ।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ॥ ३४॥

गत्वा तु सुमहात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अयाचद्भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृतः ॥ ३५॥

त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् ।
रामोऽपि परमोदारः सुमुखः सुमहायशाः ॥ ३६॥

न चैच्छात्पितुरादेशाद्राज्यं रामो महाबलः ।
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्त्वा पुनः पुनः ॥ ३७॥

निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः ।
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ॥ ३८॥

नन्दिग्रामेऽकरोद्राज्यं रामागमनकांक्षया ।
गते तु भरते श्रीमान्सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥ ३९॥

रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च ।
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान्प्रविवेश ह ॥ ४०॥


सत्यवचनरूपी दृढ बन्धनमें बंधे हुए राजा दशरथने अपने प्रिय पुत्र रामको निर्वासित कर दिया ॥ २३ ॥ वीर राम माता कैकेयीकी भलाई और पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके निमित्त उनकी आज्ञा मानकर वनको चल दिये ॥ २४ ॥ सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले स्नेह और विनयसम्पन्न प्रिय भ्राता लक्ष्मणने भाईको वन जाता देखा तो उन्होंने भी स्नेहवश उनका साथ दिया ॥ २५ ॥ सुमित्रानन्दन लक्ष्मण भली भाँति भ्रातृत्व निभाते थे और रामकी भार्या सीता सदैव रामको प्राणके समान प्रिय समझने हुई उनके हितमें संलग्न रहती थीं । वह जनकके कुलमें उत्पन्न देवमायासे निर्मित, सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त एवं सब नारियोंमें एक उत्तम नारी थीं ॥ २६-२७ ॥ जिस तरह रोहिणी चन्द्रमाका अनुगमन करती है सीताने भी रामका उसी प्रकार अनुगमन किया । उस समय पुरवासी तथा पिता दशरथ भी बड़ी दूरतक रामके साथ गये ॥ २८ ॥ गङ्गाके किनार शृङ्गवेरपुरमें पहुंचकर रामने सारथी (सुमन्त्र) को विदा किया और निषादोंके राजा धर्मात्मा एवं प्रिय मित्र निषादराजसे भेंट की । २९ ॥ निषाद, लक्ष्मण और सीताके साथ-साथ राम एक वनके बाद दूसरे वन तथा बड़ी-बड़ी नदियोंको पार करके भरद्वाजकी आज्ञासे चित्रकूट वनमें एक सुन्दर आश्रम बनाकर रहने लगे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ देवताओं तथा गन्धर्वो आदिके समान वे तीनों वहाँ आनन्द रह रहे थे । रामके वन जाने ही पुत्रवियोगमें शोकातुर राजा दशरथ पुत्र रामके लिए विलाप करते हुए अपने प्राण त्याग दिये । उनके देहावसानके अनन्तर वसिष्ठादि मुख्य मुख्य ब्राह्मणोंने राज्य ग्रहण करनेके लिए भरतसे बहुत कहा, किन्तु वीर भरत राज्यके प्रति अनिच्छा प्रगट करके रामको मनानेके लिए वनको चल दिये ॥ ३२-३४ ॥ भरतने पराक्रमी रामचन्द्रजीसे प्रार्थना करते हुए कहा—हे धर्मज्ञ ! आप ही अयोध्याके राजा बनें । परमोदार सुमुख और कीर्तिशाली रामचन्द्रने पिताकी आज्ञाका पालन अपना धर्म समझकर राज्यसे अनिच्छा प्रकट की और भरतको समझाकर राज्यके लिये अपनी पादुका दी और लौटनेका बार-बार अनुरोध किया । ३५-३७ ॥ इस प्रकार रामने भरतको लौटाया और अपनी कामना सफल होते न देख भरत भी रामके चरणोंका स्पर्श करके अयोध्या लौट आये ॥ ३८ ॥ तदनन्तर रामके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए भरत नन्दिग्राममें रहकर करने लगे । भरतके वन जानेपर सत्यसंध, श्रीमान् एवं जितेन्द्रिय