सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३७

सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३७

भरतं पतितं दृष्ट्वा शत्रुघ्नं विव्यधुः शरैः । तं चापि विरथं कृत्वा दद्रुवुर्लक्ष्मणं नृपाः ॥४०॥
ववर्षुर्निशितैर्बाणैश्चक्रुस्तं व्याकुलं रणे । राघवञ्च गधर्वं चापि शरैराच्छादयन्नृपाः ॥ ४१॥
ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि लीलया समरांगण । पश्यन्सु आन्ध्रश्च कौसल्याद्यासु मातृषु ॥४२॥
सीतायां भ्रातृपत्नीषु पित्रा मन्त्रिषुलेष्ष्वपि । टणंकृत्य महच्चापं वायव्यास्त्रञ्च तान्नृपान् ॥४३॥
शुष्कपर्णवदुद्धूय प्राक्षिप्ताब्धेरोधसि । मोहनास्त्रेण शेषान् हि मोहयामास राघवः ॥४४॥
लुलुंठ सकलं सैन्यं हस्त्यश्वरथसंकुलम् । ततो मूर्च्छितमालोक्य भरतं कैकयी रणे ॥४५॥
करिष्याः शीघ्रमुत्प्लुत्य शुशोचांके निधाय तम् । ततो दशरथोऽपि कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥४६॥
सांत्वयित्वाऽथ तान्रामः सौमित्रिं प्राह भवत । इतो विदूरे सौमित्रे मुद्गलस्य तपोनिधेः । ४७।
आश्रामोऽस्ति हितत्र स्वं गत्वा वल्लोः शुभानहाः । सञ्जीवन्यादिकाः सर्वा शीघ्रमानय लक्ष्मण ॥४८॥
मुनेस्तपःप्रभावेण बहवः संति तत्र वै । तथेति लक्ष्मणो गत्वा स्यदनस्थस्त्वरान्वितः ॥४९।
अवरुह्य रथाद्वीरः प्रविवेशाश्रमं मुनेः । निवारितः स वटुकैः समाधिविग्मे मुनेः ॥५०।
याश्रां कृत्वा शुभा वल्लीः प्राप्स्यसे त्वं न चान्यथा ।
कालातिक्रमभीत्या स लक्ष्मणेऽपि रघूत्तमम् ॥५१॥
वृत्तं निवेदयामास पुनस्तं राघवोऽब्रवीत् । निवारयित्वा वटुकान् विना शस्त्रैस्त्वरान्वितः ॥५२।
आनय त्वं शुभा वल्लीर्मा शङ्कां च मुनेः कुरु । सोऽपि राम ज्ञया गत्वा निवार्य वटुकान् क्षणात् ॥५३ ।
बलात्कारेण ता वल्लीर्गृहीत्वा राममागतः । भरतं जीवयामास विशल्यं कृत्य सानुजम् ॥५४।
ततः समुत्थितं दृष्ट्वा कैकेयी भरतं मुदा । संतोशं परमं चक्रे कैकेयी पितर गदा । ५५॥
राघवं मा समालिंग्य भरतं परिषस्वजे । ततो राजऽतेमदृष्टः समालिंग्य रघुत्तमम् । ५६।

राजाओने बाणोंसे भरतका बांधकर मूर्छित कर दिया और वरथसे गिर पड़े । ३७-३९ ॥ भरत-
को पृथ्वीपर गिरा देखकर राजाओने राक्षस शत्रुघ्नको भी विद्ध किया । उनको भी गिराकर वे राज
लक्ष्मणकी ओर दौड़े ॥ ४० ॥ उनपर भी बाणोंकी वर्षा करके व्याकुल कर दिया । इसी प्रकार राघव
रामको भी राजाओने बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ४१ ॥ बादमे श्रीरामचन्द्रने समरके मैदानमे
पालकियोंकी खिडकियोंमें लगी हुई चिकामैसे देखती हुई कौसल्या आदि माताओंके, सीताके तथा
अपने भाइयोंकी स्त्रियोंके समक्ष राजाओ और मन्त्रियाके सामने अपने बड़े भारी धनुषका टंकोर करके उस-
पर वायव्यास्त्र चढ़ाकर उससे उन राजाओंको सूख पत्तांकी तरह उड़ाकर समुद्रके किनार फेंक दिया। बाकी
लोगोंका रामने महूनास्त्रसे मूर्छित कर दिया ॥ ४२-४४ ॥ हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदलोकी समस्त सेना-
को जमीनपर लिटा दिया । रणमें भरतका मूर्छित देख कैकयी हथिनीसे उतरी और उनका गादमें
लेकर विलाप करने लगी । तदनन्तर राजा दशरथ तथा उनकी स्त्रिय कौसल्या आदि भी विलाप करने
लगी ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ तब रामने सबको आश्वासन देकर कहा-लक्ष्मण ! यहाँस कुछ दूरपर एक तपोषिधि
मुद्गलमुनिका आश्रम है । वहाँ जाकर तुम कल्याणकारिणी वर्जपनी आदि बूटियोंको ले आओ
॥ ४७ ॥ ४८ ॥ मुनिके तपके प्रभावसे वहाँ अनेक प्रकारका जडिय उगी हुई हैं। बहुत अच्छा' कहकर वाट
लक्ष्मण रथपर चढ़कर शीघ्र मुनिके आश्रममे गये । वहाँके ब्रह्मचारियोंने उनका बूटिये लेनेसे
रोका और कहा कि तुम मुनिके समाधिसे उठनेपर उनसे पूछकर ही बूटियों ले जा सकते हो; - अन्यथा
नहीं । समय बीत जानेके डरसे लक्ष्मणने आकर-रामसे सब हाल कहा । रामने फिर कहा कि उन
बटुकोंको अस्त्रके बिना हाथसे हटाकर शीघ्र ही उन शुभ जड़ियोंको ले आओ । मुनिसे मत डरो । रामकी
आज्ञा पाकर वे वहाँ गये तथा बलप्रयोगके बिना ही वटुकोंको हटाकर उन जड़ियोंको लेकर रामके पास
लौट आये । तब रामने भरतके शरीरसे बाण निकालकर उन्हें अहर्दा जीवित किया । भरतको स्वस्थ देखकर
कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई । उसने रामका आलिंगन करके भरतको छातीसे लगा लिया । राजाने भी प्रसन्न

३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ४

दर्शनान्मोत्सवांस्तत्र चकार गुरुणा द्विजैः । ततस्ते वटवः सर्वे हाहाकृत्य मुनीश्वरम् ॥ ५७॥
इमं निवेदयामासुः समाधिंविगमे मुनेः । स मुद्गलोऽपि तच्छ्रुत्वा विस्मयेनाब्रवीद्वटून ॥ ५८॥
को लक्ष्मणः किमर्थं कम्प्याज्ञया सोऽहरद्द्रुमम् । विदित्वा सकलं वृत्तमागच्छध्वं त्वरान्विताः ॥ ५९॥
तथेति ते दशरथं गत्वा प्रोचुस्त्वरान्विताः । कस्त्वं किमर्थमानीता वल्ल्यो लक्ष्मणहस्ततः ॥ ६०॥
तान्दृष्ट्वा क्रोधसंयुक्तान् राजा चिन्तायुतोऽब्रवीत् । अहं दशरथो वल्ल्यो भरतार्थे ममाज्ञया ॥ ६१॥
आनीता मुनये सर्वे ब्रूध्वं नतिपुरःसराः । अहमप्यागमिष्यामि मुनिं सांत्वयितुं जवात् ॥ ६२॥
ततस्ते मुनये सर्वं वृत्तान्तमथवर्णयन् । श्रुत्वा गमस्य पितरं क्रोधं संहृत्य वेगतः ॥ ६३॥
दर्शनार्थं मतिं चक्रे तावद्ददृशे नृपः पुरः । दृष्ट्वा करपुटं तं प्रणमंतं नृपोत्तमम् ॥ ६४ ॥
प्रार्थयन्तं समुत्थाय पूजयामास सादरम् । रामाद्या नृपपुत्राश्च कौसल्याद्या नृपस्त्रियः ॥ ६५॥
प्रणम्यथ मुनिं स्तुन्वा तस्थुमुद्गलभार्यया । सुमत्य पूजिताः सर्वा राजदारा विशेषतः ॥ ६६॥
ततो दशरथः प्राह मुनिं स्तुत्वा पुनः पुनः । मयाऽपराधितं राज्ञा क्षम्यतां तत्त्वया मुने ॥ ६७॥
मुनिर्दशरथं प्राह ह्युपकारो महान् कृतः । नोचेत्कथं दर्शनं मे ध्यानस्थस्य सुतस्य ते ॥ ६८॥
भार्यास्य समीपस्थ नृवेषस्य हि मायया । इति तस्य वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा तुष्टं मुनीश्वरम् ॥ ६९॥
उवाच नृपतिर्नत्वा किंचित्प्रष्टुमना मुनिम् । ज्ञात्वा नृपस्य स मुनिर्हृद्गतं प्रष्टुकामुकम् ॥ ७०॥
एकांते तुलसीखण्डे नीत्वा तं नृपमेव सः । पप्रच्छ किं ते वाञ्छाऽस्ति वदस्व कथ्यते मया ॥ ७१॥
तमब्रवीद्दशरथः श्रीरामस्य हि भावि यत् । हिताहितं सविस्तारं ज्ञातुमिच्छे मुनीश्वर ॥ ७२
नृपस्य वचनं श्रुत्वा राजानं मुनिरब्रवीत् ।
मुद्गल उवाच
साक्षान्नारायणो विष्णुः सर्वव्यापी जनार्दनः ॥ ७३ ॥

हृाकर रामको हृदयसे लगाया। उस समय उन्होंने आनन्दस गुरु तथा ब्राह्मणो द्वारा अनेक उत्सव कराये। उधर समाधिस निवृत्त होनेपर सब वटुकोंने हाहाकार करके मुनिको सब हाल सुनाया। तब मुद्गल मुनि विस्मित होकर वटुकोंसे कहने लगे— ॥ ५४-५८ ॥ जाओ, यह लक्ष्मण कौन है, किस लिये और किसके कहनस बूटियों सं गया है। शीघ्र इस बातका पता लगाकर आओ ॥ ५९ ॥ 'अच्छा' कहकर उन्होंने दशरथके पास जाकर पूछा कि तुम कौन हो और तुमने लक्ष्मणक द्वारा जड़िय क्यों मंगवायी हैं ? ॥ ६० ॥ उन्हें क्रुद्ध देखकर राजा चिन्तापूर्वक कहने लगे कि मैं राजा दशरथ हूँ, लक्ष्मण मेरे कहनेसे भरतके लिये जड़िये ले आया है। मेरा नमस्कार कहकर मुनिसे यह सब वृत्तान्त कह दें। मैं भी मुनिकंपे समझानेके लिये शीघ्र ही आ रहा हूँ ॥ ६१ ॥ ६२ । लौटकर वटुकन मुनिका राजाका नाम आदि कह सुनाया। रामके पिताका नाम सुना ता मुनिने क्रोधको रोक तथा शीघ्र जाकर राजासे मिलनेका विचार किया ही था कि इतनेमें राजा दशरथ स्वयं आकर सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़ प्रणाम करके प्रार्थना करने लगे। तब खड़े होकर मुनिन उनका सादर पूजा की । राम आदि राजार्क पुत्र तथा कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियं भी मुनिका प्रणाम करके उनका स्तुति करती हुई खड़ी हो गयीं। मुद्गल मुनिको भार्या सुमतिने विशेषरूपसे राजाकी स्त्रियांका सत्कार किया ॥ ६३-६६ । राजाने बारम्बार स्तुति करके मुनिसे कहा-हे मुनि ! मुझसे जो अपराध हुआ है। उसको क्षमा करें ॥ ६७ । मुनिने महाराज दशरथसे कहा कि नहीं, तुमने मेरा बड़ा भारी उपकार किया है। नहीं तो ध्यानयोग्य और मायासे मनुष्यका रूप धारण किये हुए, सीताके सहित आपके पुत्र र मका दर्शन मुझे कैसे मिलता ? मुनिके वचन सुन तथा उन्हें प्रसन्न देखकर राजाने नमस्कार करके उनसे कुछ पूछना चाहा । इतनेमें मुनि राजाके हृदयकी बात जान गये और एक ओर तुलसीकी झाड़ीमे ले जाकर वे स्वयं राजासे कहने लगे—हे राजन् ! कहो, तुम्हारी क्या पूछनेकी इच्छा है, मैं उसका उत्तर दूंगा । ६८-७१ । राजाने कहा—हे मुनीश्वर ! रामका भविष्य कैसा है ? मैं उसका

सर्गः ४ ] सारकाण्डम् १९


भूभारहरणार्थाय तत्रापि वरदानतः । अवतीर्णोऽस्ति न्यक्को हि तव पुण्यमहोदयात् ॥७४॥
अधर्मस्य विनाशं च वृद्धिं धर्मस्य सादरम् । निर्दलनं हि दुष्टानां सज्जनानां च पालनम् ॥७५॥
करिष्यति महानेष तव पुत्रो रघूत्तमः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । ७६
करिष्यति महद्राज्यं गते त्वयि दिवं नृप । सप्तद्वीपपतिर्भार्ये भविष्यति नृपो महान् ॥७७॥
द्वौ तौ भविष्यतः पुत्रौ चतस्रश्च स्नुषास्तथा । चतुर्विंशतिपौत्राश्च पौत्र्यस्तु द्वादशैव हि । ७८।
असंख्याताः प्रपौत्राद्या भविष्यान्त सूनस्य ते । कियदिनेय्यं दंडार्ण भोक्तुं हि दंडके ॥७९॥
गमिष्यति ततः पश्चान्महद्राज्यं करिष्यति । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा नृपः प्राह मुनिं पुनः ॥८०॥

दशरथ उवाच
का वृंदा कस्य भार्या सा कथं शप्तो हरिस्तया । तन्यत्रं विस्तरेणैव कथयस्व मुनीश्वर ॥८१॥

मुद्गल उवाच
पुरा जलंधरेणामीद्युद्धं श्रीशंकरस्य च । ईशापातिव्रतबलाद्रक्षितं विष्णुना तदा ॥८२॥
ज्ञात्वा तद्दक्षितपथा पार्वत्या घर्षणादिना । जालंधरपुरं गत्वा तद्द्न्यपुटभेदनम् । ८३.
पातिव्रत्यस्य भंगाय वृंदायाश्चाकरोन्मतिम् अथ वृंदारका देवी स्वप्नमध्ये ददर्श ह ॥८४.
भर्तारं महिषारूढं तैलाभ्यक्तं दिगंबरम् । दक्षिणाशागतं मुण्ड तमसाऽप्यावृतं तदा ॥८५।
ततः प्रबुद्धासा बाला सं स्वप्नं स्वं विचिन्तती । कुत्रापि नालभच्छर्म गोपुराट्टालभूमिषु । ८६।
वनः सखीद्वययुता नगरेयानमागता । वनाद्वनान्तरं याता ददर्शातीव भीषणौ ॥८७॥
राक्षसौ सिंहवन्नादौ दंष्ट्रानयनभीषणौ । तौ दृष्ट्वा विह्वलाऽतीव पलायनपरा तदा ॥८८।
ददर्श तापसं शांतं मशिष्यं मौनमास्थितम् ततस्तत्कण्ठम सज्य निउबाहुलती मयात् ॥८९।
मुने मां रक्ष शरणभागतामित्यभाषत । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा ध्यान मुक्त्वास वै मुनिः ॥९०।


हित-अहित जानना चाहता हूँ ॥ ७२ ॥ राजाकी बात सुनकर मुनि मुद्गल कहने लगे—साक्षात् नारायण तथा शय्याश्रो जनार्दन विष्णुभगवान् पृथ्वीका भार उतारने तथा पूर्वजन्ममें आपको वरदान देनेके कारण आपके पुण्य-प्रतापसे स्वयं अवतरे हैं। ये अधर्मका नाश करके धर्मकी वृद्धि करेंगे। रामचन्द्रजी दुष्टोंका दलन करके सज्जनोंका पालन करेंगे हे नृप ! आपके देवलोक चले जानेपर ये दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य करेंगे। ये सप्तद्वीपके अधिपति और महान् राजा होंगे ॥ ७३-७७ ॥ इनके दो पुत्र और चार पुत्रवधुएं होंगी। चौबीस पौत्र और बारह पौत्रिए होंगी। आपके पुत्र रामके पश्चात् असंख्य होंगें । कुछ दिनोंके लिए ये दण्डकारण्यमें दंड प्राप्त शास्ता पुडात जायंग उसके बाद विशाल राज्य करेंगे । यह सुनकर राजाने फिर मुनिसे कहा ॥ ७८-८० ॥ राजा दशरथ बोले- वृन्दा कौन थी तथा किसकी स्त्री थी ? उसने भगवान्‌को क्या शाप दिया ? हे मुनीश्वर ! यह सब विस्तारपूर्वक कहें ॥ ८१ । मुद्गल बोले- पूर्वकालमें जलन्धर नामका एक दैत्य था। तृष्णा उसका बड़ी पतिव्रता स्त्री थी। उसके पातिव्रतके बलसे वह शिवजीके साथ युद्ध करके भी नहीं हारा। तब भगवान् विष्णु पार्वतीसे उसका कारण जानकर उनके कथनानुसार जालन्धरपुर गये। वहां धर्मध्वजका भरण करके वृन्दाका पातिव्रत भङ्ग करनेके लिए उन्होंने उसके साथ भोग करनेका विचार किया, तभी वृन्दारवीने स्वप्नमें अपने पति को तेलसे नहाये, नंगे शरीर, भैंसेपर चढ़कर दक्षिण दिशाको जाते, सिर मुड़ाये तथा तमेंसे आच्छादित देखा। जब वह बाला जागी तो स्वप्नपर विचार करने लगी। गोपुर छत तथा अटारी आदिवर उसे कहीं चैन नहीं मिला ॥ ८२-८६ ॥ तब वह अपनी दो सखियोंको साथ लेकर नगरके बाहर बागमें मन बहलाने लगी । वहाँ एकसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें वह जब फिरने लगी, तब उसको भयानक सिंहके समान गर्जन करनेवाले और भयंकर दांत तथा नेत्रवाले दो राक्षस दिखाई दिये । उनका देख तथा विह्वल होकर वह इधर-उधर भागने लगी। उसे वहाँ सहसा शिष्योंसे युक्त एक मौनव्रतधारी शांत तपस्वी दिखायी दिये। तब वह अपनी दोनों भुजारूपिणी

४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

उन्मील्य नयने वृन्दां हृदि दृष्ट्वाऽब्रवीद्गुरुः । तिष्ठ त्वं बालिके ह्यत्र मा भयं कुरु सर्वथा ॥९१॥
इत्युक्त्वा पुरतो दृष्ट्वा राक्षसौ मुनिसत्तमः । निर्भर्त्सयन्तौ हुंकारैः क्रोधेन महता वृतः ॥९२॥
तौ तहुंकारस्रस्तौ पलायनपरौ तदा । तत्सामर्थ्यं मुनेर्दृष्ट्वा सा विस्मयावृता ॥९३॥
प्रणम्य दण्डवद्भूतौ मुनिं वचनमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
रक्षिताऽद्य त्वया घोराद्भयादस्मान्कृपानिधे । ९४॥
किंचिद्विज्ञप्तुमिच्छामि कृपया तद्वदस्व यत् । जलंधरो हि मे भर्ता रुद्रं योद्धुं गतः प्रभो ॥९५॥
स तत्रास्ते कथं युद्धे तन्मे कथय सुव्रत । मुनिस्तद्वाक्यमाकर्ण्य कृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥९६॥
तावत्कपा समायातौ तं प्रणम्याग्रतः स्थितौ । उत्तमाङ्गाभूलतासंज्ञाप्रयुक्तौ भगनांतरात् ॥९७॥
गत्वा क्षणाद्गोदारस्य वानरावग्रतः स्थितौ । शिरःकरद्वयञ्चैव दृष्ट्वाऽन्विततनयस्य सा ॥९८॥
पपात मूर्च्छिता भूमौ भर्तृव्यसनदुःखिता । कमंडलुजलैः सिक्त्वा मुनिनाऽऽश्वासिता तदा ॥९९॥
रुदित्वा सुचिरं वृन्दा तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
कृपानिधे मुनिश्रेष्ठ जीवयैनं मुने प्रियम् ॥१००॥
त्वमेवास्य पुनः शक्तो जीवनाय मदो दम ।
मुनिरुवाच
नायं जीवयितुं शक्यो रुद्रेण निहतो युधि ॥१०१॥
तथापि स्वकृपाविष्टः पुनः संजीवयाम्यहम् । इत्युक्त्वान्तर्दधे यावत्तावत्सागरनन्दनः ॥१०२॥
हृदाश्लिष्य तद्वक्त्रं चुचुंब प्रीतमानसः । अथ वृन्दाऽपि भर्तारं दृष्ट्वा हर्षितमानसा ॥१०३॥
रेमे तद्वनमध्यस्था तद्युक्ता बहुवासरम् कदाचित्सुरतास्यान्ते दृष्ट्वा विष्णुं समेव हि ॥१०४॥

लगाम् उनके गलम डालकर भयभीतभावसे कहने लगी हे मुने ! आपकी शरणमें आया हुई मुझ अबलाकी रक्षा करिए । उनके इस आर्त बचनको सुना तो ध्यान छोड़कर मुनिने उसे अपने हृदयसे लिपटी हुई पाया । तब वे उससे कहने लगे-बालिके ! तुम यहीं निर्भय होकर रहो । ॥८-९१ ॥ उसे इस प्रकार समझाकर मुनिश्रेष्ठने डराने तथा हुंकार करते हुए उन दोनों राक्षसोंको अपने सामने देखा तब क्रुद्ध होकर वे भी हुंकार करने लगे । उनके हुंकारसे त्रस्त होकर वे दोनों राक्षस भाग गये मुनिके इस अद्भुत सामर्थ्यको देखा तो वृन्दा आश्चर्यचकित होकर भूमिपर दण्डवत् प्रणाम करके कहने लगी, वृन्दा बोली हे कृपानिधे ! मुझ नापन इस घोर संकटसे बचा लिया । अब मै आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ । सो कृपा करके कहिये । हे प्रभो ! मेरा पति जलंधर शिवजीसे युद्ध करने गया है । हे सुव्रत ! वह वहाँ किस दशामें है, यह मुझे बताइए । मुनिने उसको बात सुनकर कृपापूर्वक ऊपरकी ओर देखा तो ऊपरसे दो बन्दर आये और मुनिको प्रणाम करके सामने खड़े हो गये । उनके हाथों में वृन्दाने अन्चितनय जलन्धरका कठा सिर, हाथ तथा धड़ देखा । यह देखनेके साथ ही वह पतिवियोगके दुःखसे दुःखित तथा मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। तब मुनिने उसने मुँहपर कमण्डलुका जल छिड़का और सचेत करके शांत किया ॥ ९२-९९ ॥ बहुत समय तक रोनेके वाद वृन्दा कहने लगी – हे कृपानिधे ! हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मेरे प्रिय पतिको जीवित कर दें ॥ १०० ॥ मेरी समझमें आप ही इसको जिलानेमें समर्थ हैं। मुनि बोले - युद्धमें शिवजीके द्वारा निहत जलन्धरको जीवित करना असम्भव है । फिर भी तुमपर दया करके मै इसे जीवित करता हूँ। ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये। इतनेमें सागरनन्दन जलन्धर प्रगट हो गया और आनन्दसे वृन्दाका आलिङ्गन करके मुख चुम्बन करने लगा। वृन्दाने भी अपने पतिको देखा ही प्रसन्न होकर उस वनमें बहुत दिनोंतक उसके साथ रमण करती रही । एक दिन सम्भोगके अनन्तर उसी जलन्धरको विष्णु के रूप में