श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् १२७
सर्गः ६ ] मनोहरकाण्डम् १२७
षष्ठः सर्गः
(रामनोभद्रमें देवताओंकी स्थापनाविधि तथा रामनवमीकी कथा)
अथ सर्वतोभद्र तद्देवताश्च लिख्यन्ते । प्राणानायम्य देशकालौ स्मृत्वा रामतोभद्रदेवतास्थापनं वा रायलिंगतोभद्रदेवतास्थापनं वा रमानामनोभद्रदेवतास्थापनं वा रमानामनोभद्रदेवतास्थापनं करिष्य इति संकल्प्य । ब्रह्मजज्ञानमिति मन्त्रस्य वामदेवऋषिः त्रिष्टुप्छन्दः ब्रह्मदेवता ब्रह्मस्थापने विनियोगः ॥ 'ब्रह्मजज्ञान०' सर्वतोभद्रमध्ये ब्रह्माणमावाहयामि ॥ १ ॥ उत्तरे वापीप्राणनामे 'आप्यायस्व०' सोमाय नमः सोममावाहयामि ॥ २॥ ईशान्यौ खंडेन्दौ 'तमीशानं०' ईशानाय नमः ईशानमावाहयामि । ३ ॥ पूर्व्वस्यां वाप्यां 'त्रातारमिन्द्र०' इन्द्राय नमः इन्द्रमावाहयामि ॥ ४ ॥ आग्नेय्यां खंडेन्दौ 'अग्निदूतं०' अग्नये नमः अग्निमावाहयामि ॥ ५ ॥ दक्षिणस्यां वाप्यां 'यमायत्वांगिर०' यमाय नमः यममावाहयामि । ६ ॥ नैर्ऋत्यां खंडेन्दौ 'असुन्वंत०' निर्ऋतये नमः निर्ऋतिमावाहयामि ॥ ७ ॥ पश्चिमायां वाप्यां 'तत्त्वायामि०' वरुणाय नमः वरुणमावाहयामि ॥ ८ ॥ वायव्ये खंडेन्दौ 'आनो नियुद्भिः०' वायवे नमः वायुमावाहयामि ॥ ९ ॥ शम्भुसोममध्ये मन्त्रे 'निवेशनेोवंगमरोवनां०' ध्रुवं अध्वा सोम आपः अनिलं अनल प्रत्यूष प्रभासमित्यष्टवसूनावाहयामि ॥ १० । सोमेशानमध्ये मन्त्रे 'नमस्ते रुद्र०' वीरभद्र शम्भु गिरीशं अजैकपादं अहिवुध्न्यं पिनाकिनं भूरनाधीश्वर कपालिन दिक्पति स्थाणुं रुद्रमित्येकादश रुद्र्रानावाहयामि ॥ ११ ॥ ईशानेंद्रमध्ये मन्त्रे 'आकृष्णेन०' भगं वरुण सूर्य वेदांग भानु रवि तमासि हिरण्यरेतसं दिवाकर मित्र आदित्य विष्णुनिति द्वादशादित्यानावाहयामि । १२ । इन्द्रामिमध्ये मन्त्रे 'अश्विना तेजसा चक्षु०' अश्विनीकुमाराभ्यां नमः अश्विनौ देवावावाहयामि ॥ १३ ॥ अग्नियममध्ये मन्त्रे 'समावर्त्तणितूंतो०' सर्व्वऋतॄन् देवानावाहयामि ॥ १४ ॥ यमनिर्ऋतिमध्ये मन्त्रे 'अमितवं देव०' मरुद्भ्यो नमः मरुतानावाहयामि ॥ १५ ॥ निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये मन्त्रे
अब सर्वतोभद्र और उसके देवताओंके आवाहन तथा स्थापनकी विधि बतलाते हैं। प्राणायामपूर्वक देश काल आदिका उच्चारण करके "रामतोभद्रके देवताका स्थापन, लिंगातोभद्रके देवताका स्थापन, रामनामतोभद्रके देवताका स्थापन अथवा रमारामतोभद्रके देवताका स्थापन करूँ।" ऐसा संकल्प करके "ब्रह्मजज्ञानम्" आदि मंत्रको पढ़ता हुआ विनियोग करे । "ब्रह्मजज्ञानम्" यह मंत्र पढ़कर ब्रह्माका आवाहन करे । उत्तर वापीके पास 'आप्यायस्व' यह मंत्र पढ़कर सोमका आवाहन करे ॥ १ ॥ २ ॥ ईशानके खण्डेन्दुमें 'तमीशानं' इस मंत्रसे ईशका आवाहन करे । ३ ॥ पूर्वकी वापीमें 'त्रातारं' इस मंत्रसे इन्द्रका आवाहन करे ॥ ४ ॥ अग्निकोणके इन्दुमें 'अग्निदूतं इस मंत्रसे अग्निका आवाहन करे ॥ ५ ॥ दक्षिण वापीमें 'यमायत्वा' इस मंत्रसे यमका आवाहन करे ॥ ६ ॥ नैर्ऋत्यके खण्डेन्दुमें 'असुन्दंत' इस मंत्रसे निर्ऋतिका आवाहन करे ॥ ७ ॥ पश्चिम वापीमें 'तत्त्वायामि' इस मंत्रसे वरुणका आवाहन करे ॥ ८ ॥ वायव्य कोणके खण्डेन्दुमें 'आनो नियुद्भिः' इस मंत्रसे वायुका आवाहन करे । ९ ॥ शंभु और सोमके मध्यवाले भद्रमें 'निवेशनीहं०' इस मंत्रसे ध्रुव, अध्वर, सोम आदि आठ वसुओंका आवाहन करे ॥ १० ॥ सोम और ईशानके मध्यवाले भद्रमें 'नमस्तेरुद्र' इस मंत्रसे वीरभद्र, शम्भू, गिरीश, अजैकपाद, अहिवुध्यं, पिनाकी, भूतानामीश्वर, कपाली, दिक्पति, स्थाणु और रुद्र इन एकादश रुद्रोंका आवाहन करे ॥ ११ । ईशान और इन्द्रके मध्यवाले भद्रमें 'आकृष्णेन' इस मन्त्रसे भग, वरुण, सूर्य, वेदांग, भानु, रवि, गभस्ति, हिरण्यरेतस, दिवाकर, मित्र, आदित्य और विष्णु इन द्वादश सूर्योंका आवाहन करे ॥ १२ ॥ इन्द्र और अग्निके मध्यवाले भद्रमें 'अश्विना तेजसा' इस मन्त्रसे अश्विनीकुमारोंका आवाहन करे ॥ १३ ॥ अग्नि और यमके मध्यवाले भद्रमें 'समावर्षणः
६२८ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
'आयंगौः०' भूतगणेभ्यो नमः भूतानागानावाहयामि ॥ १६ । वरुणवायुमध्ये भद्रे नदीभ्यः पौञ्जिष्टं गन्धर्वाप्सरोभ्यो नमः गन्धर्वाप्सरस आवाहयामि ॥ १७ ॥ ब्रह्मसोममध्ये वाप्यां 'यदक्रंदः प्रथमं०' स्कन्दाय नमः स्कन्दमावाहयामि ॥ १८ । 'नमः शंभवे०' नंदीश्वराय नमः नंदीश्वरमावाहयामि ॥१९। 'भद्रं कर्णेभिः०' शूलाय नमः शूलमावाहयामि ॥ २० । 'विश्वकर्मा- ह्यज०' महाकालाय नमः महाकालमावाहयामि ॥ २१ ॥ ब्रह्मैशानमध्ये वल्लीषु 'आदितिद्यौँ०' ऋक्षादिभ्यो नमः ऋक्षादीनावाहयामि ॥२२। ब्रह्मंद्रमध्ये वाप्यां 'श्रियस्ते०' दुर्गायै नमः दुर्गामा- वाहयामि ॥ २३ ॥ 'इदं विष्णु०' विष्णवे नमः विष्णुमावाहयामि । २४॥ ब्रह्माग्निमध्ये वल्लीषु 'उदीरिता०' स्वधायै नमः स्वधामावाहयामि । २५ । ब्रह्मयममध्ये वाप्यां 'अरन्मयो०' मृत्यवे नमः मृत्युमावाहयामि ॥ २६ ॥ ब्रह्मवरुणमध्ये वाप्यां 'गणानांत्वा०' गणपतये नमः गणपति- मावाहयामि ॥२७॥ ब्रह्मवरुणमध्ये वाप्यां 'शन्नोदेवी०' अद्भ्यो नमः अप आवाहयामि । २८ ॥ ब्रह्मवायुमध्ये वल्लीषु 'मरुतोयस्य०' मरुते नमः मरुतमावाहयामि ॥ २९ ॥ ब्रह्मणः पादमूले कर्णिकाधः 'स्योनापृथिवि०' पृथ्व्यै नमः पृथिवीमावाहयामि ॥३०॥ तत्रैव 'पञ्च नद्यः सरस्वती०' गंगादिसर्वनदीरावाहयामि ॥ ३१। तत्रैव धाम्नोद्याम्नोजगंस्ततोवरुण०' सप्तसागरेभ्यो नमः सप्त- सागरान्वावाहयामि ॥३२॥ ततः कर्णिकोपरि नाममंत्रेण मेरवे नमः गदामावाहयामि । ३३ । ततः पीतपरिधौ सोमादिसन्निधौ क्रमेण आयुधानि सोमसमीपे गदायै नमः गदामावाहयामि ॥ ३४ ॥ ईशानसमीपे शूलाय नमः शूलमावाहयामि ॥३५॥ इन्द्रसमीपे वज्राय नमः वज्रमावाहयामि ॥३६॥ अग्निसमीपे शक्तये नम शक्तिमावाहयामि ॥३७॥ यमसमीपे दंडाय नमः दंडमावाहयामि । ३८॥ निर्ऋतिसमीपे खङ्गाय नमः खड्गमावाहयामि ॥ ३९ । वरुणसमीपे पाशाय नमः पाशमावाह- यामि ॥४०॥ वायुसमीपे अंकुशाय नमः अंकुशमावाहयामि ॥४१॥ पुनः सोमस्योत्तरे सदा समीपे
इस मन्त्रसे सर्वरूप विश्वेदेवका आवाहन करे। १४॥ यम और निर्ऋतिके बीचवाले भद्रमे 'अग्नियं देव' इस मन्त्रसे यक्षोंका आवाहन करे ॥ १५ ॥ निर्ऋति और वरुणके बीचवाले भद्रमे 'आयंगौ' इस मन्त्रसे भूतों और नागोंका आवाहन करे ॥ १६ ॥ वरुण और वायुके मध्यमें नदीभ्यः' इस मन्त्रसे गन्धर्वों और अप्सराओं- का आवाहन करे ।। १७ ।। ब्रह्मा और सोमके मध्यवाली वापामे 'यदक्रन्दः' इस मन्त्रसे स्कन्दका आवाहन करे ! १८ ।। 'नमः शंभवे' से नन्दीश्वर, 'भद्रं कर्णेभिः' से शूल और 'विश्वकर्मा' इस मन्त्रसे महाकालका आवाहन करे । १९ ॥ २० ॥ २१ ॥ ब्रह्मा और ईशानके मध्यवाली वल्लियोंमे 'आदितिद्यौ' इस मन्त्रसे नक्षत्र आदिका आवाहन करे ।। २२ ।। ब्रह्मा और इन्द्रके मध्यवाली वापीमे 'श्रियस्ते' इस मन्त्रसे दुर्गाका आवाहन करे ॥ २३ ॥ 'इदं विष्णुः' इस मन्त्रसे विष्णुका आवाहन करे ॥ २४॥ ब्रह्मा और अग्निके मध्यवाली वल्लीमे 'उदीरिता' इस मन्त्रसे स्वधाका आवाहन करे ॥ २५ ॥ ब्रह्मा और यमके मध्यवाली वापीमें 'अरं मृत्यो' इस मन्त्रसे मृत्युका आवाहन करे । २६ ॥ ब्रह्मा और निर्ऋतिके मध्यवाली वल्लियोंमे 'गणानां त्वा' इस मन्त्रसे गणपतिक। आवाहन करे । २७। ब्रह्मा और वरुणके मध्यवाली वापीमे 'शन्नो देवी' इस मन्त्रसे जलका आवाहन करे ॥ २८ ॥ ब्रह्मा और वायुके मध्यवाली वल्लियोंमें 'मरुतो यस्य' इस मन्त्रसे मरुत्का आवाहन करे ॥ २९ ॥ ब्रह्माके पाँवके पासवाला कर्णिकाके नीचे 'स्योना पृथिवि' इस मन्त्रसे पृथ्वीका आवाहन करे ॥ ३० ॥ वहीं ही पञ्चनद्यः' इस मन्त्रसे गंगा आदि सब नदियोंका आवाहन करे ॥ ३१ । वहीं ही 'धाम्नो धाम्नो' इस मन्त्रसे सप्त सागरोंका आवाहन करे ॥ ३२ ॥ इसके बाद कर्णिकाके ऊपर नाममन्त्रस मेरका आवाहन करे ॥ ३३ ॥ पीत परिधिमे सोम आदिके पास क्रमशः आयुधोंका आवाहन करे । गदाके नाम- मन्त्रसे गदाका, ईशानके समीप शूलके नाममन्त्रसे शूलका, इन्द्रके समीप वज्रका, अग्निके पास शक्तिका यमके समीप दण्डका, निर्ऋतिके पास खड्गका और वरुणके पास पाशका आवाहन करे ॥३४-४०॥ फिर वायुके