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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ६ ]

सर्गः ६ ]
मनोहराकाण्डम्
६४१


तदा सा मारुतेर्धातुमयी मूर्तिः शुभावहा। गत्वाऽऽकाशे गर्जनां वै चकारातिभयंकराम्॥१९०॥
तां गर्जनां महावीरा ग्रामस्याथ बहिः स्थिताः। श्रुत्वाऽतिभयसन्त्रस्ता मृताः सर्वे क्षणेन हि॥१९१॥
अश्वा नागा वृषाश्चाथ मृताः सर्वे तदा क्षणात्। सर्वद्रव्यमये वह्नेवाऽपि परं पुरुषसञ्चितम् ॥१९२॥
पुत्रगर्भाश्च नारीणां सर्वे प्रापुः क्षयं तदा। तदा स पुरुषस्त्वेको न मृतो ब्राह्मणोत्तमः॥१९३॥
कृपया रामचन्द्रस्य मारुतेः कृपयाऽपि च। ततः प्रभाते ता नार्यः सर्वास्त्वपुरुषान्वितान्॥१९४॥
दृष्ट्वाऽतिविस्मयं प्रापुर्नाशनं स्वप्रभो बहिः। तदा विप्रं जीवितं तं दृष्ट्वाऽङ्केऽपि मारुतिम् ॥१९५॥
इतितं विस्मयाविष्टाः पप्रच्छुस्तं द्विजोत्तमम्। ततः स सकलं वृत्तं नारीः सभाषयतदा ॥१९६॥
ततस्ताः प्रार्थयित्वा तं चक्रुः स्त्रीयुगपाधिपम्। सोऽपि रामानुज्ञाया राज्यं चकार तन्पुरस्य च ॥१९७॥
पुरस्थितानां नारीणां स एवामान्यतितदा। तन्मारुतेर्गर्जनं हि काले काले तु पूर्ववत् ॥१९८॥
अद्यापि श्रूयते तस्मिन्नगरे घनशन्दवत्। तच्छ्रुत्वा पुत्रगर्भाश्च स्रवन्तीति हि योषिताम्॥१९९॥
स्त्रियः सहस्रशश्चासन् पुरुषस्त्वेक एव सः। तद्राज्यं तन्महीराड्यं कथ्यते मानवोत्तमैः॥२००॥
ततः कालान्तरेणैव स विप्रश्च मृतो यदा। तदा स्वपूर्वपुण्येन विष्णोः सायुज्यमाप सः॥२०१॥
ततस्ताभिस्तु नारीभिः कश्चित्पार्थः समागतः। स एव क्रियते भर्ता न न ता मोचयति हि॥२०२॥
ज्ञात्वा तं गर्जनाकालं पुरुषान्नित्ररेषु हि। गोपयित्वा दुन्दुभीनां शंखानां निःस्वनादिभिः॥२०३॥
न श्रावयति तेषां तं ध्वनिं मारुतसम्भवाम्। अतिक्रान्तेऽथ तत्काले तान्पुनर्जीवितान्विति॥२०४॥
मत्वा नानोन्मदैः हृद्य तंर्भास ता भर्जति हि। नातः तद्यप्रभ्यते राज्यं सदैव द्विजसत्तम ॥२०५॥
स्त्रीणामेव महोत्पत्तिर्जायते पुरुषस्य न। तद्राज्यनिकटस्था ये देशास्तेष्वपि भो द्विज॥२०६॥


बगीचेमें रख दिया और बायें हाथसे हनुमानजीकी पूंछ पकड़कर बड़े क्रोध और बैरके साथ आकाशमें उछालकर फेंका ॥ १८८ ॥ १८९ ॥ हनुमान्जीकी वह धातुमयी मूर्ति आकाशमे पहुंचकर बड़े जोरसे गरजी ॥ १९० ॥ वह भीषण गर्जना उन सिपाहियों, दीवानों तथा बाह्रवालोंको भी सुनाई दी। उसे सुनते ही सब घबड़ा-घबड़ाकर मर गए । उस गर्जनसे ही हाथी और बैल आदि पुरुषनामधारी जितने जीव थे उनमेंसे उस ब्राह्मणके सिवाय और कोई नहीं बचा। यहाँ तक कि स्त्रियोंके गर्भमें जो बच्चे थे, वे भी मर गये। किन्तु श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और हनुमानजीकी दयासे वह ब्राह्मण ज्योंका त्यों खड़ा रह गया । सबेरा हुआ तो उन नारियोंने, जिनके पति गतका मर गए व अपने स्वामीको मृत देखा ता बड़ी चक-शायीं। तदनन्तर जब उन्होंने उस ब्राह्मणकें जीवित तथा हनुमान्जीकी मूर्ति कीअङ्कमे पड़ी देखी तो उस ब्राह्मणसे वे सब पूछने लगीं। ब्राह्मणने उन स्त्रियोंको रात्रिका सारा हाल कह सुनाया । १९१ १९६ ॥ इसके अनन्तर उन स्त्रियोंने प्रार्थना करके ब्राह्मणका उस नगरीका राजा बना दिया। रामचन्द्रजीकी आज्ञासे वह विप्र वहाँका राज करने लगा ॥ १९७॥ उस समय उस नगरीकी सब स्त्रियोंका वही पति था। हनुमान्जीकी वह गर्जना कभी-कभी त्रिशशूल अशनिजनके समान अब भी सुनाई पड़ जाया करती है। उस सुनकर जिन स्त्रियोंके उदरमें पुत्र रहता है, उनका गर्भ गिर जाया करता है ॥ १९८। १९९॥ इस विप्रके राम हजारों स्त्रियां थी और उनके बीचमे वह अकेला पुरुष था। तर्षीस लोगोने उसे स्त्रीराज्य कहना आरम्भ कर दिया। कुछ दिनो बाद जब उस विप्रक मृत्यु हुई तो अपने पूर्वार्जित पुण्यके प्रभावसे उसे विष्णुके सायुज्य मुक्ति मिली ॥२००॥॥२०१॥ इसके बाद जो कोई रही पुरुष मिल जाता, उस ही वे स्त्रियां अपना रति बन लिया करती थी और उसे किसी तरह नही छोडता थी ॥२०३॥ यदि कभी हनुमान्जीका गर्जनका समय आ जाता तो वे स्त्रियां उस पुरुषको बिरमे लिखादिया करतीं जिसमें उसे वह गर्जना न सुन पड़े इसलिए नखारे शंख आदि बाजे बजाने लगती थीं । जब वह समय कुशलपूर्वक बीत जाता तो नारियां अपने पतिमीको पुनर्जीवन जानकर बड़ी खुशियांको मनातीं और उसीके बाद भोग करती हुई अपना समय बिताया करता थी। हे द्विजो-त्तम ! तबसे सदा वहाँपर स्त्रियोंका ही राज्य रहता है। स्त्रियों ही वहाँकी प्रजापर शासन करती हैं

६७२ आनन्दरामायणे [सर्गः ६

मारुतेः शब्दसंस्पर्शश्रवणात् व्यंघ्रिणा नराः । षण्ढका एव जायन्ते न तेभ्योऽन्यत्सुपौरुषम् ॥२०७॥
अतस्तेषामशक्तानां वीर्यं हीणंतदा द्विज । भवन्ति दुहितर एवं कश्चित्पुत्रः प्रजायते ॥२०८॥
आधिक्ये रजसः कन्या शुक्राधिक्ये सुतो भवेत् । नपुंसकः समत्वेन यथेच्छा वाऽथेश्वरेशे ॥२०९॥
अन्यत्ते कारणं वच्मि न भवन्ति सुता यतः । कारणं शृणु तस्येदं विष्णुदास द्विजोत्तम ॥२१०॥
तेषु देशेषु नार्यश्च निजराज्यमदेन हि । रतिकालोऽधः पुरुषं कृत्वा क्रीडां भजन्ति ताः ॥२११॥
न स्त्रीणां रतिकाल ताः पृष्ठं भूमिसपृशन्ति हि अतएव रतिकाल शुक्रं तु स्रवते वहिः ॥२१२॥
सूक्ष्मच्छिद्रं तथा गर्भस्थाने तन्नैव गच्छति । नासानायनकर्णानां द्वे द्वे रन्ध्रे प्रकीर्त्तिते ॥२१३॥
मेहनपादचवक्त्राणामेकैकं रन्ध्रमुच्यते । दशमं मस्तक प्रोक्तं रंध्राणीति नृणां विदुः ॥२१४॥
स्त्रीणां त्रीण्यधिकानि स्युः स्तनयोर्गर्भवर्त्मनः । मुचिक अग्रमान्येव तानि छिद्राणि सन्ति हि ॥२१५॥
गर्भच्छिद्रं रतिकाल किंचिद्विकसितं द्विज । भुन्त्रा मार्ग तु वीर्यस्य ददाति पुरुषस्य च ॥२१६॥
तन्मार्गेण गतं वीर्यं चेत् सम्यक् पुरुषस्य च । गर्भस्थाने तदा पुत्रो जायते नात्र संशयः ॥२१७।
स्तन्यं प्रविष्टं वीर्यं च तदा कन्या प्रजायते । रजमधिक्येन जानीह्येवं विनिश्चयम् ॥२१८।
तस्माद्यदाऽधः शेते वै तद्देशेषु नरोत्तमः । रतिकाल तस्य वीर्यमूर्ध्वं गच्छति नैव तत् ॥२१९॥
यदि दैववशात्किंचिद्रनं सोर्ध्वमार्गगः । तदा दैववशात्पुत्रो जायते सोऽपि पङ्गवत् ॥२२०॥
अतएव हि तद्देशे बहूकन्या भवन्ति हि । एवं ते कारणं प्रोक्तं कन्योत्पत्तेर्द्विजोत्तम ॥२२१॥
एवं सर्वेषु देशेषु चेन्नार्या अधिकं बलम् । अस्ति तर्हि भवेत्कन्या पुत्रः पुरुषसारतः ॥२२२।

॥ २०३-२०५॥ वहाँपर विशेष करके अपाहिजोकी ही उत्पत्ति होती है, पुरुष तो बहुत ही कम होते हैं।
हनुमान्जीकी गर्जनासे मिली वायुके संस्पर्शसे उस गन्धर्व आश्रमवाले राज्यके लोग भी प्रायः षंढक
(नपुंसक होते हैं। इसलिए वहाँके पुरुषांका वार्य कमज़ोर होता है और अधिकांश कन्याय ही उत्पन्न होती हैं,
पुत्र तो शायद ही कभी कहीं हो जाता हो ॥ २०६॥ ०॥ २०७ ॥ जब कि स्त्रीके रजकी अधिकता होती
है तो कन्या और पुरुषके वीर्यकी अधिकता होती है, तब पुत्र होता है। यदि पुरुषका वीर्य और स्त्रीका रज ये
दोनों बराबर हो जाते हैं, तब नपुंसक उत्पन्न होता है । रज वार्याके सिवाय सबसे मुख्य बात तो यह है कि
परमेश्वरकी जैसी इच्छा होती है, वही होता है ॥ २०६॥ हे द्विजोत्तम विष्णदास ! यहाँ विशेष करके कन्याओकि
उत्पन्न होनेका एक कारण और भी है उसे सुनो ॥ २१० ॥ उस देशकी स्त्रियाँ अपने राज्यमदसे मत्तवाली
हो पुरुषको नीचे सुला तथा स्वयं ऊपर लटकर रति करती हैं रतिकालके समय वे अपनी पीठको जमीनमें
नहीं लगाने देतीं। इसीलिए पुरुषका वीर्य बाहर ही रह जाता है। गर्भाके सूक्ष्म छिद्रतक वह नहीं पहुंच पाता।
पुरुषके नाक, नेत्र और कान इनमें दो-दो छिद्र रहते हैं ॥ २११-२१३ । लिंग, गुदा तथा मुखम एक-एक
छिद्र रहता है ये सब मिलाकर नौ हुए और दसवाँ छिद्र ब्रह्मारन्ध्र होता है। ऐसा लोगोंने बतलाया है
॥ २१४। किन्तु स्त्रियोंके तीन छिद्र अधिक होते हैं। दो छिद्र दोनों स्तनोंमें और एक गर्भके रास्तेमें। गर्भके
मार्गवाला छिद्र सूईकी नोकके समान बारीक होता है ॥ २१५ ॥ किन्तु रतिकालमे गर्भवाला छिद्र कुछ
चौड़ा होकर पुरुषके वीर्यको भीतर जानेके लिये रास्ता दे देता है ॥ २१६ ॥ उस मार्गसे गया हुआ वीर्य
यदि अच्छी तरह अपने स्थान तक पहुंच जाता है, तब पुत्रकी उत्पत्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं है।
यदि उस समय गर्भाशयमे कम वीर्य जाता है तो कन्याकी उत्पत्ति हुआ करती है। क्योंकि ऐसी दशामे
स्त्रीका रज अधिक और पुरुषका वार्य कम पड़ जाता है ॥ २१७ ॥ २१८ ॥ इसास जब वहावाले पुरुष नीचे
लेटते हैं, तब उनका वीर्य गर्भाशयके छिद्र तक नहीं पहुंच पाता। यदि दैववश कभी थोड़ा-सा वीर्य उछलकर
ऊपर स्त्रीके गर्भाशय तक पहुंच भी जाता है तब नपुंसक उत्पन्न होता है । २१९। २२०॥ इसी कारण उस देशमे
अधिकांश कन्याय ही होती हैं। हे द्विजोत्तम ! मैंने इस प्रकार तुम्हें वहाँ विशेष कन्याओके उत्पन्न होनेका
कारण बतलाया ॥ २२१ ॥ यह प्राय सब देशोमे देखा जाता है कि जिस जगह स्त्री बलवती होती है तो कन्या