श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४८९
सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४८९
भो भो तुलसि नो नाथस्त्वया रामो निरीक्षितः । बद श्वावास्त्व त्वं नोऽने रामो निरीक्षितः ॥५१॥
त्वं कोकिल सदा शब्दान् करोषि परमान् शुभान् ।
वदाद्य जानकीकान्तस्त्वयाऽरण्ये निरीक्षितः ॥५२॥
भो कदंब वदस्व त्वं तत्र पृच्छामहे वयम् । दीनानाथो रमानाथाः र्सोवानाधस्त्वयेक्षितः ॥५३॥
पिक त्वमुत्तरं देहि सदा शब्दान् करोषि हि । पीतंर्नः श्रीपतिः संतापातेदृष्टोऽथवा न वा ॥५४॥
भो वरग मदोन्मत्त शृंगारजसमः प्रभुः ।
सप्तद्वीपपतिः श्रीमान् रामोऽरण्ये निरीक्षितः ॥५५॥
शुक नः कथयाद्य त्वं प्रभुर्दृष्टोऽथ वा न वा ।
वद पुण्ये सरिच्छ्रेष्ठे किं तूष्णीं संस्थिताऽधुना ॥५६॥
नः प्रभुः सप्तद्वीपानां प्रभुश्च निरीक्षितः ।
भो वायो कथयाद्य त्वं सीताराम्रो निरीक्षितः ।५७॥
श्रीरामदास उवाच
एवं ता रामविश्लेषसंभ्रांताः शुशुचुर्वने । ततस्ता गडकीतीरं गत्वा गीतं प्रचक्रिरे ॥५८॥
स्त्रिय ऊचुः
किं प्रभो त्वया जानकी यदा तेन रक्षसाऽरण्यमभ्यतः ।
स्वस्थयं हृता गौर्त्रानीतटात्तत्कृते त्वया नैव शोचितम् ॥५९।१॥
त्वद्वियोगतप्तममानसाः सर्वतो वने शोकमग्नगाः ।
एकदा प्रभो देहि दर्शनं देहि नो वरान् माऽस्तु वै रतिः । ६०।२॥
नो वाञ्छामो राघव त्वत्तो रतिमद्य यद्वहत्तं भूमूरजाम्प्यो वरदानम् ।
तद्वत्त्वंस्त्वं पूरय कामान्वरदानैर्वाञ्छामस्ते सेवनमग्रये जननेऽपि ॥६१।३॥
पूछती जाती थी कि तुमने हमारे पति रामको तो इधर कहीं नही देखा है ? । ४६ । वे कहती थी कि हे वृक्षोंके राजा विप्लवदेव ! हमें बताओ कि तुमने रामको तो नही देखा है ? हम आपकी शरणम हैं ॥५०॥ हे तुलसी देवी ! तुमने तो रामको नहीं देखा है ? हे वानरगण इस वनमें तुमन कहीं रामका तो नहीं देखा है ? ॥ ५१ ॥ हे कोकिल ! तू वहीं मीठा वाणी बोलता है, अब उसी भाषण हम यह बताव कि तून वनम कहीं रामचन्द्रको तो नही देखा है ? ॥ ५२ ॥ हे कदम्ब तुझम हम सब स्त्रियां यही पूछना चाहती है कि तूने सीतापति रामको तो कहीं नहीं देखा ? ॥ ५३ । अरे पिक ! तू सदा पीकहा पीकहा बोलता रहता है। अब हमें यह बता कि तूने कहीं जानकीवल्लभ रामको देखा है ? देखा हो तो बतला व ॥ ५४ ॥ हे मतवाले गजराज ! मन्दोधाम हाथोके समान श्रेष्ठ रामचन्द्रजीको तो तूने नहीं देखा है ? ॥ ५५ । हे शुक ! तू ही बता दे कि इस वनमें कहीं रामको देखा है ? हे पवित्र नदी ! तू क्या चुप है, मन्दोदक अशोकवर और हम लोगोंके प्रभु रामचन्द्रजी को तो नूत नही देखा है ? यदि देखा हो तो बता दे । हे वायो ! कहो, तुमने इस वनमें कहीं सीतापति रामको देखा है ? । ५६ ॥ ५७ ॥ श्रीरामदास कहते यन—इस प्रकार रामके वियोगसे पगली सी होकर वे स्त्रियां विलाप करती हुई चलती-चलती गण्डकी नदीके किनारे जाकर इस तरह प्रार्थनाभरे गायन गाने लगी - ॥ ५८ ॥ हे प्रभो ! जब रावण वनमेंसे समाका हरण करके अपनी राजधानी लङ्काको ले गया था, तब क्या उनके लिए आपने कोई शोक नहीं किया था ? ॥ ५९ । १ हे नाथ ! आपके वियोगसे हमारा हृदय जला जा रहा है। शोकमें व्याकुल होकर हम सब इस वनम आ पहुँची हैं। हे प्रभो ! हमें एक बार अपना दर्शन दे दें और कुछ वरदान भी दे दें.... तुमसे प्रेम नहीं करना चाहते ता न करिए ॥ ६० ॥ २ । हे राघव जबतक हम यहाँ हैं तबतक आपका दर्शन चाहती थी । अब उसकी इच्छा भी नहीं रह गयी ! जिस प्रकार आपने केतु (सीता) को वरदान दिया था, उसी
४३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ११
अस्माभिर्यच्चञ्चलभावादापराधं कृतं त्वं नः स्मर एवं करुणातः ।
तः प्राणास्ते दर्शनहेतोस्तनुमध्ये तिष्ठन्ति त्वां पदशङ्खत्रयाच्ञा क्रियतेऽद्य ॥६२॥४॥
भो भो राघव मा रुषं त्वं क्रोधं मा मत्र दर्शयश्च ।
पर्याप्तं न हि दर्शनार्थं वाञ्छामो न हि त्वत्तः कामम् ॥६३॥५॥
देहि त्वं निजदर्शनलाभं जन्मान्तरेऽर्पय नो वरदानम् ।
पाहि न्द शरणं प्रपन्नानां सर्वाङ्गाग्र्यै र्नः प्रणामार्थः ॥६४॥६॥
राम त्वं किं निर्दयहृदयस्त्वयि नः किं नायान्येष स्त्रीजनकरुणा हृदये ते ।
इत्थं क्रोधं त्यज्यदयुगले पतितासु कर्तुं विष्णो नार्हसि वरदो भव नोऽद्य ॥६५॥७॥
बाले दीने स्त्रीजनविमले तनये श्व नो कुर्वन्त्यन्यं बहुविभवज्ञा मतिसंतः ।
क्रूरं क्रोधं त्वं त्यज वरदो भव नोऽद्य बार बार करकमलैस्त्वां प्रणामम् ॥६६॥८॥
हे नाथ राघव रमेश्वर रावणारि सीतापते रिपुनिषूदन कञ्जनेत्र ।
त्वं देहि राम निजदर्शनमद्य विष्णो दुःखार्णवान्नस्तर नय कामिनीर्नः । ६७॥९॥
भवत्पादपद्मवरसेवनमर्थयामो जन्मान्तरे कुरु दयां करुणासमुद्र ।
नोचेत्तवाद्य विरहाद्विजनास्तितानि त्यक्ष्याम एव नियतं महताऽद्य नद्याम् ॥६८।१०॥
श्रीरामदास उवाच
नारीगीतं राघवोऽपि श्रुत्वा प्रत्यक्षीऽभूत्कामिनीनामथाग्रे ।
दृष्ट्वा रामं ताः स्त्रियाऽतिसंतुष्टाः प्रोत्फुल्लास्यास्तं प्रणेमुः शिरोभिः ॥६९॥११॥
नारीगीतं मानवश्चापि श्रुत्वा समान् कामान्प्राप्नुयान्निश्चयेन ।
तस्मादेतन्सर्वदा कीर्तनीयं श्लोकार्धाद्यं प्राप्य छन्दांश्चतस्रः ॥७०॥१२॥
अच्छे वरदान देकर हमारी भी कामना पूर्ण कर। हम किया अगले जन्ममें ही आपकी सेवा करना चाहती हैं ॥६२। ३॥ हमने करुणावश अथवा चञ्चलतास कोई अपराध किया हो तो उस आप भूल जायें । मेरे प्राण आपके दर्शनार्थ आकुल हैं। इस समय हम आपके दर्शन का ही भीख मांग रही हैं ॥६२ ॥ ४ ॥ हे राघव ! आप नाराज न हों और दाक्षिण्योपर क्रोध न दिखलायं । हम सब आपस कामवासनाकी पूर्ति नहीं चाहती ॥ ६३ ॥ ५ ॥ इस समय आप हमें अपना दर्शन और दूसरे जन्मके लिय वरदान दें। हम सब आपकी शरणमे हैं। आप हमारी रक्षा करक हमारा निस्तार करिए। हम आपको प्रणाम करती हैं ॥ ६४ ॥ ६॥ हे राम ! क्या आप इतने निर्दयो हैं कि जो हम स्त्रियोंको इस प्रकार दुःखी देखकर भी आपके हृदयमे दया नहीं आती ? हे विष्णो ! आपके पैरोंमे पड़ी हुई हम अबलाओपर आपको इस प्रकार कोप नहीं करना चाहिए। हमपर दया करके हमें वरदान दीजिए । ६५ । ७ । बुद्धिमान् लोग बच्चोंपर, गरीब स्त्रियोंपर तथा अपनी सन्तानपर इस प्रकार कोप नहीं किया करने, इस कारण अपने क्रूर कोपका प्रत्याहार कीजिए । हम सब हाथ जोडकर प्रणाम करती हैं, हमें वरदान दीजिए । ६६ ॥ ७॥ हे नाथ ! हे राघव ! हे रमेश्वर ! हे रावणारि ! हे सीतापते ! हे रिपुनिषूदन ! हे कञ्जनत्र ! हे विष्णो ! हे राम ! अपना दर्शन देकर आप हम कामिनियोंको दुःखसंसारसे पार कीजिए॥६७॥६॥ हे करुणाके समुद्र ! अब दया कीजिए। हम दूसरे जन्ममें आपकी सेवा करनेकी इच्छुक हैं । हम आपसे यही भिक्षा माँगती हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो आपके विरहदुःखसे दुःखित हम सब स्त्रियाँ इसी गण्डकी नदीमें कूदकर अपन प्राण त्याग देंगे ६८ । १० ॥ रामदासने कहा- इस प्रकार उन कामिनीयोंका विलाप सुनकर रामचन्द्रजी उनके सामने प्रकट हो गये। रामको प्रत्यक्ष देखकर वे स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुई ओर विकसित वदन होकर बार बार प्रणाम करने लगीं ॥ ६९ ॥ ११ ॥ प्रत्येक मनुष्य इस नारीगीतको सुनकर अपनी अभिलषित कामनाएं पूर्ण कर सकता है। इसलिए लोगोको चाहिए कि सदा इस नारीगीत-