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सर्वकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 788, कुल 811 में से

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पृष्ठ 788
सर्गः १ ]पूर्णकाण्डम्७७१

यदा त्वया वरो दत्तस्तदा किं विदितं नव । नासीच्छ्रीरामसामर्थ्यं अधुना शाठ्यंस सुवा ॥७॥
त्वयि चेद्वर्तते किंचित्सारं धर्तुं रणं मया । तर्हि कुरुष्व साहाय्यं नलादीनां सुरैर्युतः ॥८॥
पश्या रणे ममाग्नेय्यं बलं पश्यतु राघवः । सीताऽपि पुष्पकासीना जालैरन्ध्रैश्च पश्यतु ॥९॥
एवं कुशस्य वचनं श्रुत्वा लज्जापूतो विधिः । सोमेनाथ बुधेनापि नलाद्यान्निन्द वेगतः ॥१०॥
रे रे मूढाः शृणुध्वं मे वचनं हि गतायुषः । साक्षान्नारायणं रामं यूयं योद्धुं समुद्यताः ॥११॥
केनेयं शिक्षिता बुद्धिः सर्वेषां घानकारिणी । गच्छध्वं शरणं राम नोचेद् मरिष्यथ ॥१२॥
ममायं जनकः साक्षाद्रावो विष्णुनं संशयः । इति धिक्कृत्य तान्वेधाः कुशं वचनमब्रवीत् ॥१३॥
यावद्यास्याम्यहं रामान्तिकंत्वां कुशबालक । तावच्चेन्मोक्ष्यसे बाणं तर्हि मां हतवानसि ॥१४॥
इत्युक्त्वा तं कुशं वेधा नलद्यैः परिवेष्टितः । ययौ रामं सुरैर्युक्तः पुरस्कृत्य वृषध्वजम् ॥१५॥
शिवमागतमाज्ञाय पुष्पकाद्रघुनन्दनः । प्रत्युद्गम्य शिवं नत्वा प्रणाम ततो विधिम् ॥१६॥
ततस्ताम्पूजयामास त्रिवाटीरघुनन्दनः । ततः सभायां रामस्य तिष्ठन्वेधा नलादिभिः । १७॥
प्रणामान्कारयामास सोमेन च बुधेन च । ततस्तान्महसोत्थाय रामचन्द्रः करेण हि । १८॥
श्रुत्वा तेषां हि नामानि विधेरास्यात्पृथक्पृथक् । ततः पप्रच्छ वेगेन ब्रह्माणं पुरतः स्थितम् । १९॥
सर्वे किमर्थमानीतास्त्वयैते सोमवंशजाः । बद त्वं कारणं शीघ्र सत्यमेव ममाग्रतः ॥२०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा रामं वेधा वचोऽब्रवीत् । राम राम महाबाहो पालयस्वाद्य मे वचः । २१॥
रक्षस्वैतान्नृपानद्य वरदानान्मम प्रभो । द्वापरान्तमजेयत्वं दत्तमस्ति मया पुरा ॥२२॥
ममास्त्रं सन्दधानं निवारय कुशं सुतम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा विहस्य रघुनायकः ॥२३॥
सभायामाह ब्रह्माणमजेयत्वं त्वयोदितम् । क गतं चाद्य समरात्किमर्थमिह बागताः ॥२४॥

जब आपने इनको वरदान दिया था तब क्या रामकी सामर्थ्यका आपको ध्यान नहीं था ? तब तो रामको कुछ समझे नहीं, अब मूठकी प्रार्थना करने आये हैं ॥ ७ ॥ मैं कहता हूँ कि यदि आपमें कुछ शक्ति हो तो देवताओंके साथ लेकर आप नल आदिकी सहायता करिए । मैं बालक साप चचाके साथ युद्ध करूं और रामचन्द्रजी तथा सीता पुष्पक विमानके झरोखेसे मेरा और आपका समर्थ देखें ॥ ८ ॥ ९ ॥ इस प्रकार कुशकी बात सुनी तो ब्रह्माजी लज्जित हो गये और नल आदिको फटकारते हुए कहने लगे—अरे मूढो ! जान पड़ता है कि तुम लोगोंकी वायु समाप्त हो गयी है, जो साक्षान्नारायणस्वरूप रामचन्द्रजीसे युद्ध करने आये हो ॥ १० ॥ ११ ॥ सर्वनाश उपस्थित करनेवाली यह दुर्बुद्धि तुमको किसने दी है ? अब यदि अपना कल्याण चाहते हो तो रामकी शरणमें जावो, नहीं तो एक-एक करके तुम सब मार डाले जाओगे ॥ १२ ॥ मेरे पिता विष्णुभगवान् ही तो रामरूपसे इस पृथ्वीतलपर अवतरे हैं । इस तरह उन लोगोंको डाँट-फटकार करके ब्रह्माजी कुशसे कहने लगे कि मैं रामके पास जा रहा हूँ । जबतक उनके पाससे न लौट आऊँ, तबतक बाणका प्रहार न करना । ऐसा करोगे तो मानो उनका नहीं, तुमने मेरा वध किया ॥ १३ । १४ ॥ ऐसा कुशसे कहकर ब्रह्माजी शिवजीको आगे करके नल आदिके साथ-साथ श्रीरामचन्द्रजीके पास गये । जब रामने सुना कि शिवजी आ रहे हैं तो पुष्पक विमानसे उतरकर उनका स्वागत और प्रणाम करके ब्रह्माजीको भी अभिवादन किया ॥ १५ ॥ १६ ॥ इसके अनन्तर रामने शिवजी आदिकी विधिवत् पूजा की और सब लोग सभामण्डपमें गये । वहाँ ब्रह्माने सोम और बुधसे श्रीरामको प्रणाम करवाया । तब रामने इनको अपने हाथोंसे उठा लिया और ब्रह्माजीके मुखसे उनका नाम सुना । कुछ देर बाद रामने ब्रह्मा से पूछा कि आप इन सोम-वंशियोंको यहाँ किस लिए लाये हैं ? जो इसका वास्तविक कारण हो, वह मुझे बतलाइए ॥ १७–२० ॥ रामकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा—हे राम ! हे महाबाहो ! आज आप मेरा बात मानकर इन नल आदि राजाओंकी रक्षा कीजिए । मैंने इन लोगोंको यह वरदान दे रक्खा है कि द्वापरपर्यन्त तुम लोग किसीसे पराजित नहीं होवोगे । २१ । २२ ॥ उधर कुश मेरे शस्त्र ( ब्रह्मास्त्र ) का सन्धान करके खड़े हैं। उन्हें भी