श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
सर्गः १३ ]
सर्गः १३ ]
मनोहरकाण्डम्
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अद्वैतानन्दचैतन्यशुद्धसत्त्वैकलक्षणः । बहिराः सुतीक्ष्णात्र रामचन्द्रः प्रकाशते ॥ ५० ॥
सत्त्वविद्यार्थिनो नित्यं रमते चित्सुखात्मनि । इति रामपदेनाभौ परब्रह्मभिधीयते ॥ ५१ ॥
जय रामेति यन्नाम कीर्तयन्ननिशं नयेत् । सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम् ॥ ५२ ॥
श्रीरामेति परं मन्त्रं तदेव परमं पदम् ।
तदेव तारकं विद्धि जन्ममृत्युभयापहम् । श्रीरामेति वदन् ब्रह्मभावमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ५३ ॥
अस्य श्रीरामकवचस्य अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः सीताक्ष्मणोपेतः श्रीरामचन्द्रो देवता
श्रीरामचन्द्रप्रसादसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि सर्वाभीष्टफलप्रदम् । नीलजीमूतसङ्काशं विद्युद्वर्णाभ्वरावृतम् ॥ ५४ ॥
कोमलाङ्गं विशालाक्षं पुन्नामनिगुन्दुरम् । सीतासौमित्रिसहितं जटामुकुटधारिणम् ॥ ५५ ॥
सासितूणधनुर्बाणपाणि दानवमर्दनम् । सदा चोरभये राजभये शत्रुभये तथा ॥ ५६ ॥
ध्यात्वा रघुपतिं युद्धे कालानलसमप्रभम् । चीरकृष्णाजिनधरं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ॥ ५७ ॥
आकर्णाकृष्टसशरकोदण्डञ्चमडितम् । रणे रिपून् रावणादींस्तीक्ष्णमार्गद्वृष्टिभिः ॥ ५८ ॥
महद्रथं महावीरसुग्रीवेन्द्रव्यपस्थितम् । लक्ष्मणायंर्महद्वीरैर्वृतं हनुमदादिभिः ॥ ५९ ॥
सुग्रीवार्यभदावीर्यैः शैलवृक्षकरोद्यतैः । दैत्यान्करालहुङ्कारैर्भुम्डुकारमहारवैः । ६० ॥
नदद्भिः परिपादाद्भिः समरे रावणं प्रति । श्रीराम शत्रुमपान्ये हन मर्दय खादय । ६१ ॥
भूतप्रेतपिशाचादीन् श्रीरामाशु विनाशय । एवं ध्यात्वा जपेद्रामकवचं सिद्धिशायकम् ॥ ६२ ।
सुतीक्ष्ण यच्चकवचं श्रृणु वक्ष्याम्यनुत्तमम् । श्रीरामः पातु मे मूर्ध्नि पूर्वं च रघुवंशजः ॥ ६३ ॥
दक्षिणे मे रघुवरः पश्चिमे पातु पावनः । उत्तरे मे रघुपतिर्भालं दशरथात्मजः ॥ ६४ ॥
मुनीक्षण ! सुनिए, मैं आज सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाला रामकवच बतलाऊँगा ॥ ४९ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! इस संसारके बाहर-भीतर सब व्योमोर व अद्वैत, आनन्दस्वरूप, शुद्ध और सत्त्वगुणमय रामचन्द्रजी प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ५० ॥ परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखनेवाले लोग जिसके चिन्मयरूप आनन्द लूटते हैं, वे ही परब्रह्म 'राम' इस नामसे पुकारे जाते हैं ॥ ५१ ॥ जो मनुष्य 'जय राम' इस मन्त्रका कीर्तन करता है, वह सब पापोस छूटकर विष्णुभगवान्के परम पदको प्राप्त होता है । ५२ ॥ श्रीराम यह सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है, यह परमपद है, यह मृत्यु-भय आदिको दूर कर देता है और 'श्री राम' कहता हुआ प्राणी परब्रह्मको प्राप्त होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। विनियोगके बाद सब कामनाओंका पूर्ण करनेवाला ध्यान बतला रहा हूँ। जिनका नील मेघके समान श्याम शरीर है, जो बिजलीके समान चमकते हुए पीले वस्त्रको धारण किये हुए हैं, जिनके कोमल अङ्ग हैं, बड़ी-बड़ी आंखें हैं, जो अतिशय सुन्दर और पुष्ट हैं, जिनके साथ सीता और लक्ष्मण विद्यमान हैं, जो जटा-मुकुट धारण किये हैं, तलवार, तरकस, धनुष-बाण हाथमें लिये हैं और जो दानवोंका संहार करते हैं। मनुष्यको चाहिए कि राजभय, चोरभय और संग्रामका भय आ जाय तो कालानलके समान क्रुद्ध रामचन्द्रजीका ध्यान करे। जो पीताम्बर तथा कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं और धूलिसे जिनका शरीर धूसरित हो रहा है ॥ ५३-५७ । कानतक जिन्होंने धनुषकी डोरी खींच रक्खा है संग्रामभूमिमे रावण आदि राक्षसोंपर जो तीक्ष्ण बाणवृष्टि कर रहे हैं ॥ ५८ ॥ इन्द्रके रथपर बैठे जो महावीर शत्रु का संहार करनेमें लगे हुए हैं और जो लक्ष्मण हनुमान्जी आदि वीरोंसे घिर हुए हैं ॥ ५९ ॥ जिनके साथ सुग्रीव वादि योद्धा हाथमें पाषाणखण्ड और बड़े-बड़े वृक्ष लिये शत्रुओंका संहार कर रहे हैं। ऐसे हे राम ! इसको मारो—इसको खा-जाओ और भूत प्रेत, पिशाच आदिको नष्ट कर दो। इस प्रकार रामचन्द्रजीका ध्यान करके सिद्धिदायक रामकवचका जप करे ॥ ६० । ६१ । ६२ ॥ अगस्त्यजी कहते हैं कि हे सुतीक्ष्ण ! मैं अतिशय उत्तम रामकवच कहता हूँ। श्रीराम मेरे मस्तक और पूर्व दिशाकी रक्षा करें। दक्षिणकी ओर रघुवर तथा
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| ७१६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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भ्रुवोर्दूर्वादलश्यामस्तयोर्मध्ये जनार्दनः । श्रोत्रं मे पातु राजेन्द्रो दृशौ राजीवलोचनः ॥६५॥
घ्राणं मे पातु राजर्षिर्गण्डं मे जानकीपतिः । कर्णमूले खरध्वंसी भालं मे रघुपल्लभः ॥६६॥
जिह्वां मे वाक्पतिःपातु दन्तपङ्क्ती रघूत्तमः । ओष्ठौ श्रीरामचन्द्रो मे मुखं पातु परात्परः ॥६७॥
कण्ठं पातु जगद्वन्द्यः स्कन्धौ मे रावणांतकः । वक्षो मे पातु काकुत्स्थः पातु मे हृदयं हरिः ॥६८।
सर्वाङ्ग्यंगुलिपर्वाणि हस्तौ मे राक्षसांतकः । वक्षो मे पातु काकुत्स्थः पातु मे हृदयं हरिः ॥६९॥
स्तनौ सीतापतिः पातु पार्श्वो मे जगदीश्वरः । मध्यं मे पातु लक्ष्मीशो नाभिं मे रघुनायकः ॥७०॥
कौसल्येयः कटिं पातु पृष्ठं दुर्गतिनाशनः । गुह्यं पातु हृषीकेशः सक्थिनी सत्यविक्रमः ॥७१॥
ऊरू शार्ङ्गधरः पातु जानुनी हनुमत्प्रियः । जंघे पातु जगद्व्यापी पादौ मे ताटिकांतकः ॥७२॥
सर्वाङ्गं पातु मे विष्णुः सर्वसन्धीननामयः । ज्ञानेन्द्रियाणि प्राणादीन्पातु मे मधुसूदनः ॥७३॥
पातु श्रीरामभद्रो मे शब्दादीन्विषयानपि । द्विपदादीनि भूतानि मत्सम्बन्धीनि यानि च ॥७४॥
जामदग्न्यमहादर्पदलनः पातु तानि मे । सौमित्रिपूर्वजः पातु वागादीनीन्द्रियाणि च ॥७५॥
रोमांकुरण्यशेषाणि पातु सुग्रीवराज्यदः वाङ्मनोबृद्धयहंकारैर्ज्ञानाज्ञानकृतानि च ॥७६॥
जन्मान्तरे कृतानीह पापानि विविधानि च तानि सर्वाणि दग्ध्वाशु हरकोदण्डखण्डनः ॥७७॥
पातु मां सर्वतो रामः शार्ङ्गबाणाधरः सदा इति श्रीरामचन्द्रस्य कवचं वज्रसंमितम् ॥७८।
गुह्याद्गुह्यतमं दिव्यं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा समाहितः ॥७९॥
स याति परमं स्थानं रामचन्द्रप्रसादतः । महापातकयुक्तो वा गोघ्नो वा भ्रूणहा तथा । ८०॥
श्रीरामचन्द्रकवचपाठनाच्छुद्धिमाप्नुयात् ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ।८१।
पश्चिमकी पवन ( पवनपुत्र ) रक्षा करे। ऊपरकी ओर सूर्य्यास्त और ललाटकी दशरथात्मज रक्षा करें दूर्वादलके समान श्याम जनार्दन भौंहोंके मध्यभागकी रक्षा कर कानोंको राजेन्द्र आँखोंकी राजीवलोचन ॥ ६३-६५ ॥
नाककी राजर्षि, गंडस्थलकी जानकीपति, कर्णमूलकी खरध्वंसी और रघुपल्लभ ललाटकी रक्षा करें ॥ ६६ ॥
उसी प्रकार जिह्वाकी रक्षा वाक्पति, दन्तपङ्क्तिके रघूत्तम दोनों ओंठों ओर मुखकी रक्षा परात्पर भगवान् करें ॥ ६७ ॥ कण्ठकी जगद्वन्द्य दोनों कन्धा रावणाम्तक ओर मेरी दोनों भुजाओंकी रक्षा शास्तिको मारनेवाले धनुर्बाणधारी राम करें ॥ ६८ ॥ मेरी सब उँगलियों और दोनों हाथोका रक्षा राक्षसान्तक, वक्षस्थलको काकुत्स्थ ओर हरिभगवान् मेरे हृदयकी रक्षा करे । ६९ ॥ दोनो स्तनोंका सीतापति, पार्श्वभागको जगदीश्वर, मध्यभागकी लक्ष्मीपति ओर नाभिकी श्रीरघुनायक रक्षा करें ॥ ७० ॥ कमरकी कौसल्येय, पीठकी दुर्गतिनाशन, गुह्यभागकी हृषीकेश और सत्यविक्रम भगवान् हड्डियोंकी रक्षा करें ॥ ७१ ॥ शाङ्गधर भगवान् दोनों घुटनोंकी, हनुमानजीके प्रिय दोनों जानुभागका, जगद्व्यापी दोनों जंघाओंकी ओर ताड़काका नाश करनेवाले भगवान् मेरे पैरोंकी रक्षा कर ॥ ७२ ॥ विष्णुभगवान् मेरे सब अङ्गोंकी, अनामय मेरे शरीरकी, सन्धियोंकी और मधुसूदन भगवान् मेरे प्राणादि तथा ज्ञानेन्द्रियोंकी रक्षा कर । ७३ ॥ श्रीरामभद्र मेरे शब्दादि विषयोंकी रक्षा कर मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले जितन दो पैरके जन्तु ( मनुष्य ) हों, उनकी रक्षा महान् दर्पको नष्ट करनेवाले परशुराम भगवान् करें सौमित्रिपूर्वज ( राम ) मेरी वाक् आदि इन्द्रियोंकी रक्षा कर ॥ ७४ ॥ ७५ ॥
सुग्रीवको राज्य देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी मेरे सारे रोमकूपोंकी रक्षा करें। मन, बुद्धि, अहङ्कार, ज्ञान एवं अज्ञानस किय हुए इस जन्म तथा जन्मान्तरके पातकोंका जलाकर भस्म करते हुए शिवजीका धनुष तोड़नेवाले धनुर्बाणधारी श्रीराम मेरी सब ओर रक्षा कर । हे मुनिसत्तम सुतीक्ष्ण ! यह वज्रसदृश रामकवच गूढ़से भी गूढ़ है। जो प्राणी इसे पढ़ता, सुनता या दूसरोंको सुनाता है, वह रामचन्द्रकी कृपासे परम धामको प्राप्ति करता है। वह चाहे महापातकी, गोघाती या भ्रूणहत्याकारी ही क्यों न हो ॥ ७६-८० ॥ इस श्रीरामकवचका पाठ करनेसे प्राणी शुद्ध होकर ब्रह्महत्या आदि पातकोंसे भी मुक्त हो जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है