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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

३६६ मनुस्मृति।
प्रतिकुर्याच्च तत्सर्वं पञ्च दद्याच्छतानि च ॥ २८५ ॥
अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा ।
मणीनामपवेधे च दण्डः प्रथमसाहसः ॥ २८६ ॥
समैर्हि विषमं यस्तु चरेद्वै मूल्यतोऽपि वा ।
समाप्नुयाद्दमं पूर्वं नरो मध्यममेव वा ॥ २८७ ॥
बन्धनानि च सर्वाणि राजा मार्गे निवेशयेत् ।
दुःखिता यत्र दृश्येरन् विकृता पापकारिणः ॥ २८८ ॥
प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च पूरकम् ।
द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ २८९ ॥
अभिचारेषु सर्वेषु कर्त्तव्यो द्विशतो दमः ।
मूलकर्मणि चानाप्ते कृत्यासु विविधासु च ॥ २९० ॥
अबीजविक्रयी चैव बीजोत्कृष्टं तथैव च ।
मर्यादा भेदकश्चैव विकृतं प्राप्नुयाद्वधम् ॥ २९१ ॥
चिकित्सा करनेवाले उलटी चिकित्सा करें तो पशु आदि के
विषय में ढाई सौ पण और मनुष्यों के विषय में पांच सौ पण दण्ड
करे। नदी के पुलका काठ, राजपताका का दण्डा और मूर्तियों
को तोड़नेवाला, उन सबको फिर बनवावे और पांच सौ पण दण्ड
देवे। अच्छी वस्तु को दूषित करने, तोड़ने और मणियों के बुरा
बेधने में, ढाई सौ पण दण्ड करे। जो समान-मूल्य की वस्तुओं
से न्यूनाधिक मूल्य की वस्तुओं का व्यवहार करे, वह मनुष्य पूर्व
वा मध्यम साहस दण्ड पावे। राजा मार्ग में बंदीघर को बनवावे
जहां दुःखी और पापी सबको दीख पड़े। लफील को तोड़नेवाले
और उसकी खाई को भरनेवाले और राजद्वारों को तोड़नेवालों
को तुरंत देश से निकालदेय । सब तरह के मारणों से यदि जिस

नवां अध्याय । ३६७

नवां अध्याय । ३६७
के ऊपर किया गया हो वह न सरे, वशीकरण, उच्चाटन आदि से
कोई काम न सिद्ध हो तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे । खराब
बीजों को बेंचनेवाला या अच्छे में बुरा मिलाकर बेंचनेवाला और
हद तोड़नेवाले को अंगच्छेद का दण्ड देय ॥ २८४-२६१ ॥
सर्वकण्टकपापिष्ठं हेमकारं तु पार्थिवः ।
प्रवर्त्तमानमन्याये छेदयेल्लवशः क्षुरैः ॥ २६२ ॥
सीताद्रव्यापहरणे शस्त्राणामौषधस्य च ।
कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्॥ २६३॥
सब चोरों में महापापी सुनार यदि कोई दुराचार करे तो
उसको चाकू से टुकड़े टुकड़े करवादे । खेती के हल, कुदाल
आदि शस्त्र और औषध चुराने पर राजा समयानुसार दण्ड
करे ॥ २६२-२६३ ॥
स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्रं कोशदण्डौ सुहृत्तथा ।
सप्तप्रकृतयो ह्येताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥ २६४ ॥
सप्तानां प्रकृतीनां तु राज्यस्यासां यथाक्रमम् ।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं जानीयाद्व्यसनं महत् ॥ २६५ ॥
सप्ताङ्गस्येह राज्यस्य विष्टब्धस्य त्रिदण्डवत् ।
अन्योन्यगुणवैशेष्यान्न किञ्चिदतिरिच्यते ॥ २६६ ॥
तेषु तेषु तु कृत्येषु तत्तदङ्गं विशिष्यते ।
येन यत्साध्यते कार्यं तत्तस्मिन् श्रेष्ठमुच्यते॥ २६७॥
चारेणोत्साहयोगेन क्रिययैव च कर्मणाम् ।
स्वशक्तिं परशक्तिं च नित्यं विद्यान्महीपतिः ॥२६८ ॥
पीडनानि च सर्वाणि व्यसनानि तथैव च ।

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३६८ मनुस्मृति ।

आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥ २६६ ॥
राजा, मन्त्री, राज्य, देश, खजाना, दण्ड और मित्र, राज्य-शक्ति ये सात
प्रकृतियों में क्रम से पहली से अगली अगली श्रेष्ठ है । इसलिए पहले
अङ्ग की हानि होने से आगे के अङ्ग पर बड़ा दुःख आपड़ता है ।
जैसे तीन दण्ड, एक दूसरे के आधार पर रुके रहते हैं, वैसे सात
अङ्गवाला राज्य भी प्रत्येक अङ्गके आधार पर टिका रहता है।
प्रत्येक अङ्ग अपनी विशेषता से समान हैं। जिससे जो काम सधता है
उसमें वही श्रेष्ठ कहा जाता है । राजा नित्य दूतों के द्वारा सेनाको
उत्साह देवे, सब कार्यों को ठीक रक्खे अपने और शत्रुकी शक्तिको
जाना करे । सब प्रकार की पीड़ा और व्यसनों का गौरव-लाघव
विचार कर कार्य का आरम्भ करे ॥ २६४-२६६ ॥
आरभेतैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ।
कर्माण्यारहमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते ॥ ३०० ॥
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च ।
राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ ३०१ ॥
कलिः प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम् ।
कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ ३०२ ॥
इन्द्रकार्यस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च ।
चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं नृपश्चरेत् ॥ ३०३॥
राजा राज्यवृद्धि के कार्यों को धीरे धीरे करताही रहे । क्योंकि
कर्म करनेवाले को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है । सत्ययुग, त्रेतायुग,
द्वापरयुग और कलियुग, सब राजा के कार्यों पर हीं आधार रखते
हैं क्योंकि राजा ही भले-बुरे समय का कारण है-युगस्वरूप
है । जब राजा आलस्य, निद्रा में समय बितावे तो कलियुग, जब
सावधानी से राज्य करे तो द्वापर, जब अपने कार्यों में लगा रहे
तब त्रेता और जब शास्त्रानुसार कर्मों का संपादन करे तब सत्ययुग

नवां अध्याय । ३६६

नवां अध्याय । ३६६
होता है । इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्र, अग्नि और
पृथ्वी के तेजोमय-प्रकाशमान आचरणों से जगत् में व्यवहार
करे ॥ ३००-३०३ ॥
वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
तथाभिवर्षेत्स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ ३०४ ॥
अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
तथा हरेत्करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ ३०५ ॥
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ ३०६ ॥
यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति ।
तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम्॥३०७॥
जैसे इन्द्र वर्षा में चार मास जल वर्षा करके प्रजामनोरथ पूर्ण
करता है वैसे राजा-इन्द्र के आचरण से अपने देशकी प्रजा को
सन्तुष्ट करे । जैसे आठ मास सूर्य अपने तेजसे पृथिवीका जल खींच
लेता है, वैसे राजा सूर्य की भांति आचरण करके प्रजा को दुःख
न देकर राज्य-करलेवे । जैसे वायु प्राणरूप से सब प्राणियों में
विचरता है, राजा भी दूतों से अपने देशका समाचार लेता रहे ।
जैसे यम समयपर मित्र-शत्रु सबको शिक्षा देताहै, वैसे राजा-
यम के समान सारी प्रजाका शासन करे ॥ ३०४-३०७ ॥
वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते ।
तथा पापान्निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ ३०८ ॥
परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ ३०६॥
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात्पापकर्मसु ।
४७

३७० मनुस्मृति ।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ ३१० ॥
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ ३११ ॥
एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः ।
स्तेनान् राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ ३१२ ॥
जैसे वरुण अपराधियों को अपने पाशों से बाँधता है, वैसे राजा
वरुण होकर पापियों को दण्ड देवे । जैसे मनुष्य पूर्ण चन्द्रबिम्ब
को देखकर खुश होते हैं, वैसे प्रजामण्डल जिस राजा को देख
कर खुश हो वह राजा चन्द्रव्रतधारी है। पापियों पर अग्नि के
समान प्रताप रक्खे, दुष्ट मन्त्रियों को मरवा दे यह अग्निव्रत है।
जैसे पृथ्वी सर्व प्राणियों को सम-भाव से धारण करती है,
वैसे राजा भी सम-भाव से प्राणियों का पालन करे । इन सब
और दूसरे भी उपायों से बर्ताव करे और स्वराज्य या परराज्य
के चोरों को दण्ड देवे ३०८-३१२ ॥
परामप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् ।
ते ह्येनं कुपिता हन्युः सद्यः सबलवाहनम् ॥ ३१३ ॥
यैः कृतः सर्वभक्ष्योऽग्निरपेयश्च महोदधिः ।
क्षयी चाप्यायितःसोमःको न नश्येत्प्रकोप्य तान्॥३१४॥
लोकानन्यान सृजेयुर्ये लोकपालांश्च कोपिताः ।
देवान्कुर्युरदेवांश्च कः क्षिएवंस्तान्समुद्ध्नुयात् ॥ ३१५॥
ब्राह्मण-माहात्म्य ।
खजाना की कमी आदि विपत्ति में पड़कर भी राजा ब्राह्मणों
को नाराज न करे क्योंकि वे लोग कुपित होकर राज्य का नाश
कर देते हैं। जिन ब्राह्मणों ने कुपित होकर अग्नि को सर्वभक्षक,

नवां अध्याय । ३७१

नवां अध्याय । ३७१
समुद्र को न पीने योग्य और चन्द्रमा को क्षयरोगी करके पीछे पूर्ण
किया उन ब्राह्मणों को कुपित करके कौन नष्ट न होजायगा ? जो
ब्राह्मण रुष्ट होकर दूसरे लोक और लोकपालों को रच सकते हैं
और देवताओं को शाप देकर नीचयोनि में डाल सकते हैं, उन
को दुःख देकर कौन बढ़ सकता है ? ॥ ३१३-३१५ ॥
यानुपाश्रित्य तिष्ठन्ति लोका देवाश्च सर्वदा ।
ब्रह्म चैव धनं येषां को हिंस्यात्तान् जिजीविषुः॥३१६॥
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् ।
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥ ३१७ ॥
श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते ॥ ३१८ ॥
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु ।
सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमं दैवतं हि तत् ॥ ३१६ ॥
स्वर्गादि लोक और देवता, जिनके आश्रय से टिके रहते हैं
और वेद ही जिन का धन है उन ब्राह्मणों को कौन मारना चाहेगा?
जैसे अग्नि वेदमन्त्रों से, या दूसरे प्रकार से प्रकट हो पर महान्
देवता है, वैसे ब्राह्मण विद्वान् या मूर्ख हो महान् देवता है । ते-
जस्वी अग्नि श्मशान में भी दूषित नहीं होता किंतु यज्ञ में हवन
किया हुआ फिर वृद्धि को प्राप्त होता है । इसी प्रकार ब्राह्मण
सब निंदित कामों के करने पर भी सर्वथा पूज्य हैं, महान्
देवता हैं ॥ ३१६-३१६ ॥
क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणान् प्रतिसर्वशः ।
ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात्क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम् ॥ ३२० ॥
अद्द्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् ।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ ३२१ ॥

३७२ मनुस्मृति ।
नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्म वर्धते ।
ब्रह्मक्षत्रं च संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ ३२२ ॥
दत्त्वा धनं तु विप्रेभ्यः सर्वदण्डसमुत्थितम्।
पुत्रे राज्यं समासृज्य कुर्वीत प्रायणं रणे ॥ ३२३ ॥
क्षत्रिय यदि ब्राह्मण को दुःख दे तो ब्राह्मण ही उनको किसी
उपाय से अपने वश में रक्खें । क्योंकि ब्राह्मणों से ही क्षत्रिय
उत्पन्न हैं। जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय, पत्थर से लोहा पैदा
हुआ है। इनको पैदा करनेवाला व्यापक तेज अपने कारण में
शान्त होजाता है। ब्राह्मण की सहायता विना क्षत्रिय नहीं बढ़ता
और क्षत्रिय की सहायता विना ब्राह्मण की उन्नति नहीं होती इस
लिये दोनों मिलकर रहें तभी लोक-परलोक में वृद्धि पाते हैं ।
राजा दण्ड का सम्पूर्ण धन ब्राह्मणों को देकर और पुत्र को राज्य
समर्पण करके रण में प्राणत्याग करे ॥ ३२०-३२३॥
एवं चरन्सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः ।
हितेषु चैव लोकस्य सर्वान् भृत्यान्नियोजयेत् ॥३२४॥
एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः ।
इमं कर्मविधिं विद्यात्क्रमशो वैश्यशूद्रयोः ॥ ३२५ ॥
इसप्रकार राजा सदा आचरण करके राजधर्मों का पालन करे
और लोकहित के कामों में सब कर्मचारियों को नियुक्त करे । ये
सब राजा का सनातन-कर्तव्य कहा गया है अब वैश्य और शूद्र के
कर्तव्यों को क्रम से सुनो ॥ ३२४-३२५ ॥
वैश्यस्तु कृतसंस्कारः कृत्वा दारपरिग्रहम् ।
वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात्पशूनां चैव रक्षणे ॥ ३२६ ॥
प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।

नवां अध्याय । ३७३

नवां अध्याय । ३७३
ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ ३२७ ॥
न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ।
वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथंचन ॥ ३२८ ॥
मणिमुक्ताप्रवालानां लोहानां तान्तवस्य च ।
गन्धानां च रसानां च विद्यादर्घबलाबलम् ॥ ३२६ ॥
बीजानामुप्तिविच्च स्यात्क्षेत्रदोषगुणस्य च ।
मानयोगं च जानीयात्तुलायोगांश्च सर्वशः ॥ ३३० ॥
वैश्य-शूद्रकर्त्तव्य ।
वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार के बाद विवाह करके नित्य व्यापार
और पशुरक्षा में तत्पर रहे । प्रजापति ने पशुओं की सृष्टि करके
रक्षार्थ वैश्यों को सौंपा और ब्राह्मण, क्षत्रिय को प्रजा को सौंपा ।
इसलिए पशुपालन न करने की इच्छा वैश्य न करे, जबतक वैश्य
पालन करे, दूसरे वर्ण को कभी न चाहिए । मणि, मोती, मूँगा,
लोहा, सूत की वस्तु, कपूर और मीठा, घी आदि रसपदार्थों का
भाव वैश्य सदा विचार में रक्खे । सब बीजों के बोने की विधि,
खेतों के गुण-दोष और सब तरह की नाप-तौल को जाना
करे ॥ ३२६-३३० ॥
सारासारं च भाण्डानां देशानां च गुणागुणान् ।
लाभालाभं च पण्यानां पशूनां परिवर्धनम् ॥ ३३१ ॥
भृत्यानां च भृतिं विद्याद्भाषाश्च विविधा नृणाम् ।
द्रव्याणां स्थानयोगांश्च क्रयविक्रयमेव च ॥ ३३२ ॥
धर्मेण च द्रव्यवृद्धावातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ।
दद्याच्च सर्वभूतानामन्नमेव प्रयत्नतः ॥ ३३३ ॥

३७४ . मनुस्मृति ।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् ।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥
शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ ॥
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः ।
आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
गल्ले के अच्छे-बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण
आदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा आदि और पशुओं के
बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण,
अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेंचने का ढंग
जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों
को अन्न देय यह सब वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्,
गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शूद्र का परम सुखदायी
धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक,
मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है, वह
क्रम से उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में
चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में
चारों वर्णों का बर्त्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६ ॥
नवां अध्याय पूरा हुआ ।

अथ दशमोऽध्यायः ।
अधीयीरंस्त्रयोवर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः।
प्रब्रूयाद् ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ १ ॥
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्युपायान् यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् ॥ २ ॥
वैशेष्यात्प्रकृतिश्रैष्ठ्यान्नियमस्य च धारणात् ।
संस्कारस्य विशेषाच्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ३ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ ४ ॥
दशवां अध्याय ।
संकीर्ण-जातिभेद ।
अपने अपने धर्म कर्मों के अनुसार रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय
और वैश्य वेदों को पढ़ें । इन में ब्राह्मण सब को पढ़ावै और क्ष-
त्रिय, वैश्य पढ़ें, पढ़ावै नहीं, यह निर्णय है। ब्राह्मण सब वर्णों को
उनकी जीविका के उपायों को बतलावे और खुद भी अपने कर्त्तव्यों
को जाने । जाति की विशेषता परमात्मा के मुखसे उत्पत्ति नियमों
का धारण और जातकर्मादि संस्कारों की विशेषता से ब्राह्मण
वर्णों का स्वामी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विजाति *

  • ब्राह्मण आदि जातिवाचक शब्द ऋग्वेद में भी हैं, जैसा—'ब्राह्मणस्त्वा
    शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ।' 'पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम्' इति । यहां पञ्चजन
    शब्द चारों वर्ण के लिए है, ऐसा निरुक्त में यास्कमुनि ने लिखा है। जातिभेद
    वैदिक युग का है, नवीन नहीं है ।

स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।

३७६ मनुस्मृति ।
कहलाते हैं और चौथा शूद्र एकजाति कहलाता है। पाँचवां वर्ण
कोई नहीं है ॥ १-४ ॥
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु ।
आनुलोम्येन संभूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ॥ ५ ॥
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।
सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ॥ ६ ॥
अनन्तरासु जातानां विधिरेष सनातनः ।
द्वयेकान्तरासु जातानां धर्म्यं विद्यादिमं विधिम् ॥७॥
ब्राह्मणादि वर्गों की अक्षतयोनि स्त्रियों में क्रम से जो पुत्र पैदा
हों, उनको उसी जाति का जानना चाहिए। ब्राह्मणादि के अपने
से एक श्रेणी नीचे जाति की स्त्री में पैदा हुए पुत्र पिता के समान
जाति के गिने जाते हैं—क्योंकि वे माता के दोष से निन्दित हैं।
अपने से एक एक श्रेणी नीचे की जाति में उत्पन्न पुत्रों की यह
सनातन विधि है और अपने से दो दो जाति नीचे की स्त्रियों में
पैदा पुत्रों की विधि इसप्रकार है:—॥ ५-७॥
ब्राह्मणाद्वैश्यकन्यायामम्बष्ठो नाम जायते ।
निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥ ८ ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां क्रूराचारविहारवान् ।
क्षत्रशूद्रवपुर्जन्तुरुग्रो नाम प्रजायते ॥ ६ ॥
विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु नृपतेर्वर्णयोर्द्वयोः ।
वैश्यस्य वर्णे चैकस्मिन् षडेतेऽपसदाः स्मृताः॥ १० ॥
क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः ।
वैश्यान्मागधवैदेहौ राजविप्राङ्गनासुतौ ॥ ११ ॥

दसवाँ अध्याय। ३७७

दसवाँ अध्याय। ३७७
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम्।
वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसंकराः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण से वैश्यकन्या में अम्बष्ठ जाति का पुत्र होता है और
शूद्रकन्या में निषाद * ओर पारशव कहा जाता है। क्षत्रिय से
शूद्रकन्या में क्रूर आचारवाला पुत्र उग्रजाति का कहलाता है,
क्योंकि उसका शरीर क्षत्रिय और शूद्रा से हुआ है। ब्राह्मण के
क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र जाति की कन्या से, क्षत्रिय के वैश्य-शूद्र-
कन्या से और वैश्य के शूद्र जाति की कन्या से उत्पन्न हुए पुत्र
अपसद-नीच कहलाते हैं। क्षत्रिय से ब्राह्मणीकन्या में पैदा हुआ
पुत्र जाति से सूत होता है। वैश्य से ब्राह्मणी में वैदेह जाति का
और वैश्य से क्षत्रिया में मागध जाति का होता है। शूद्र से
वैश्या, क्षत्रिया और ब्राह्मणी में क्रम से अयोगव, क्षत्ता और चा-
ण्डाल जाति के पुत्र होते हैं और ये मनुष्यों में अधम-वर्णसङ्कर
कहलाते हैं ॥ ८-१२ ॥
एकान्तरे त्वानुलोम्यादम्बष्ठोग्रौ यथा स्मृतौ ।
क्षतृवैदेहकौ तद्वत्प्रातिलोम्येऽपि जन्मनि ॥ १३ ॥
पुत्रा येऽनन्तरस्त्रीजाः क्रमेणोक्ता द्विजन्मनाम् ।
ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते ॥ १४ ॥
ब्राह्मणादुग्रकन्यायामावृत्तो नाम जायते ।
आभीरोऽम्बष्ठकन्यायामायोगव्यां तु धिग्वणः ॥ १५ ॥
एक एक जाति के अन्तर से अर्थात् ब्राह्मण से वैश्या में अनुलोम
से उत्पन्न पुत्र जैसे अम्बष्ठ और उग्र कहे हैं वैसे प्रतिलोम से
अर्थात् शूद्र से क्षत्रिया में उत्पन्न पुत्र क्षत्ता और वैदेह कहलाते

  • निषाद संकर जाति का बोधक है। निरुक्त में 'निषादः पञ्चमः' लेख है। यहां
    पर जो वैश्य और शूद्रकन्याओं का ग्रहण है उसको विवाहिता समझना चाहिए।
    क्योंकि याज्ञवल्क्य का वचन है:—‘विन्नास्वेष विधिः स्मृतः ।’
    ४८

३७८ मनुस्मृति ।
हैं। द्विजों के नीचे जाति की स्त्री में माता के दोष से उत्पन्न पुत्र
'अनन्तर' कहलाते हैं। ब्राह्मण से उग्र की कन्या में आवृत जाति
का अम्बष्ठकन्या में आभीर जाति का और आयोगवी में धिग्बण
जाति का पुत्र कहलाता है ॥ १३-१५ ॥
आयोगवश्च क्षत्ता च चाण्डालश्चाधमो नृणाम् ।
प्रातिलोम्येन जायन्ते शूद्रादपसदास्त्रयः ॥ १६ ॥
वैश्यान्मागधवैदेहौ क्षत्रियात्सूत एव तु ।
प्रतीपमेते जायन्ते परेऽप्यपसदास्त्रयः ॥ १७ ॥
जातो निषादाच्छूद्रायां जात्या भवति पुक्कसः ।
शूद्राज्जातो निषाद्यां तु स वै कुक्कुटकः स्मृतः ॥ १८ ॥
क्षत्तृर्जातस्तथोग्रायां श्वपाक इति कीर्त्यते ।
वैदेहकेन त्वम्बष्ठायामुत्पन्नो वेण उच्यते ॥ १६ ॥
द्विजातयः सवर्णासु जनयन्त्यव्रतांस्तु यान् ।
तान् सावित्री परिभ्रष्टान् व्रात्यानिति विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥
व्रात्यात्तु जायते विप्रात्पापात्मा भूर्जकण्टकः ।
आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च ॥ २१ ॥
झल्लो मल्लश्च राजन्याद्व्रात्यान्निच्छिविरेव च ।
नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च ॥ २२ ॥
वैश्यात्तु जायते व्रात्यात्सुधन्वाचार्य एव च ।
कारुषश्च विजन्मा च मैत्रः सात्वत एव च ॥ २३ ॥
आयोगव, क्षत्ता और चाण्डाल ये शूद्र से प्रतिलोमभाव से
पैदा तीन मनुष्यों में अधमहैं अपसदहैं । वैश्य से मागध और वैदेह
और क्षत्रिय से सूत, ये तीन भी प्रतिलोमभाव से पैदा होते हैं

अपसद् हैं। निषाद से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र 'पुक्कस' जाति का और
शूद्र से निषादकन्या में कुक्कुट जाति का पुत्र होता है। इसीप्रकार
क्षत्ता से उग्रकन्या में 'श्वपाक' और वैदेह से अम्बष्ठी में 'वेण'
कहलाता है। द्विजाति अपनी सवर्णा स्त्री में उत्पन्न पुत्रों का सं-
स्कार जो न करें तो वे गायत्रीभ्रष्ट 'व्रात्य' कहलाते हैं। व्रात्य
ब्राह्मण से पापी-भूर्जकंटक उत्पन्न होते हैं, उन की आवन्त्य, वाट-
धान, पुष्पध और शैखसंज्ञा होती है। व्रात्य-क्षत्रिय से उत्पन्न
पुत्र झल्ल, मल्ल, निच्छिवि, नट, करण, खस और द्रविड़ कहलाते
हैं। व्रात्य-वैश्य से उत्पन्न पुत्र सुधन्वाचार्य, कारुष, बिजन्मा, मैत्र
और सात्वत कहलाते हैं ॥ १६-२३ ॥
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च ।
स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसंकराः ॥ २४ ॥
संकीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान् प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २५ ॥
सूतो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः ।
मागधः क्षत्तृजातिश्च तथाऽयोगव एव च ॥ २६ ॥
एते षट् सदृशान्वर्णान्जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजात्यां प्रसूयन्ते प्रवरासु च योनिषु ॥ २७॥
तथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।
आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ॥२८॥
ब्राह्मणादि वर्णों में आपस के व्यभिचार से, अपने सगोत्रा के
साथ विवाह न करने से और अपने वर्णाश्रम धर्मों को छोड़ने से
वर्णसङ्कर उत्पन्न होते हैं। जो सङ्कीर्णयोनि, प्रतिलोम और अनु-
लोम के परस्पर सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं उनको विशेषरीति से
कहते हैं:-सूत, वैदेह, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता और आयोगव ये छः
पुरुष अपनी माता की जाति में और अपने से ऊंची जाति में जो

३८० मनुस्मृति ।
सन्तान पैदा करें वे अपनी जाति की होती हैं। और जैसे ब्राह्मण
का तीनों वर्गों में से क्षत्रिय और वैश्यकन्या में और अपनी जाति
की कन्या में पैदा पुत्र द्विज कहाजाता है, वैसे क्षत्रिय से ब्राह्मणी,
वैश्य से क्षत्रिया और ब्राह्मणीकन्या में उत्पन्न पुत्र उत्तम गिने
जाते हैं ॥ २४-२८ ॥
ते चापि बाह्यान्सुबहूंस्ततोऽप्यधिकदूषितान् ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥ २९ ॥
यथैव शूद्रो ब्राह्मण्यां बाह्यं जन्तुं प्रसूयते ।
तथा बाह्यतरं बाह्यश्चातुर्वर्ण्ये प्रसूयते ॥ ३० ॥
प्रतिकूलं वर्तमाना बाह्याद्वाह्यतरान् पुनः ।
हीना हीनान् प्रसूयन्ते वर्णान् पञ्चदशैव तु ॥ ३१ ॥
आयोगव आदि छः प्रतिलोम पुत्र परस्पर में अपने से अधम
जाति के पुत्रों को पैदा करते हैं । जैसे शूद्र ब्राह्मण की कन्या में
वर्णसंकर चाण्डाल पुत्र पैदा करता है वैसे चाण्डाल चारोंवर्ण
की कन्याओं में अपने से भी नीच-जाति के पुत्रों को उत्पन्न करता
है। चाण्डाल वगैरह अपनी दूसरी पाँच प्रतिलोम जातियों में
अति अधम पुत्रों को उत्पन्न करते हैं और प्रतिलोम जाति के वर्ण-
संकर अपने से उत्तम जाति की कन्या में हीन जाति के पन्द्रह
पुत्रों को उत्पन्न करता है । अर्थात् चारोंवर्ण की स्त्रियों में तीन
अधमों के तीन तीन पुत्र बारह हुए और उनके पिता तीन अधम
मिलकर १५ हुए ॥ २९-३१ ॥
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।
सैरन्ध्रं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ॥ ३२ ॥
मैत्रेयकं तु वैदेहो माधूकं संप्रसूयते ।
नृन्प्रशंसत्यजस्रं यो घण्टाताडोऽरुणोदये ॥ ३३ ॥

दशवां अध्याय। ३८१

दशवां अध्याय। ३८१
निषादो मार्गवं सूते दासं नौकर्मजीविनम् ।
कैवर्त्तमिति यं प्राहुरार्यावर्त्तनिवासिनः ॥ ३४ ॥
मृतवस्त्रभृत्सु नारीषु गर्हितान्नाशनासु च ।
भवन्त्यायोगवीष्वेते जातिहीनाः पृथक् त्रयः ॥ ३५ ॥
कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते ।
वैदेहिकान्ध्रमेदौ बहिर्ग्रामप्रतिश्रयौ ॥ ३६ ॥
चण्डालात्पाण्डुसोपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।
आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥ ३७ ॥
चण्डालेन तु सोपाको मूलव्यसनवृत्तिमान् ।
पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥ ३८ ॥
निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् ।
श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ ३९ ॥
दस्यु से आयोगवी में 'सैरन्ध्र' जाति का पुत्र होता है । वह
दास न होकर भी केश सँभालना·हाथ-पैर दाबना वगैरह काम
करे और जाल से मृग आदि को पकड़े । वैदेह से आयोगवी स्त्री
में 'मैत्रेयक' जाति का पुत्र होता है । वह मधुरभाषी, सूर्योदय-स-
मय में घंटा आदि का शब्द करके राजा आदि भद्र पुरुषों की प्र-
शंसा का काम करे । निषाद, आयोगवी में मार्गव जाति का पुत्र
पैदा करता है वह दास भी कहाता है, नौका से जीविका करता
है और आर्यावर्त्तदेशनिवासी उसको 'कैवर्त्त' कहते हैं । इसी
प्रकार मृत मनुष्य वस्त्र पहननेवाली, क्ररस्वभाव, जूठने खाने
वाली आयोगवी में अपने पिता के भेद से अधम जातीय सैरन्ध्र,
मैत्रेय और मार्गवजाति के तीन पुत्र पैदा होते हैं । निषाद से
वैदेहीकन्या में कारावर जाति का पुत्र होता है, वह मोची का
काम करे । वैदेहिक से वैदेही में आंध्र और मेदजाति के पुत्र होते

[Header: ३८२ मनुस्मृति ।]

हैं वे गांव से बाहर रहें । चाण्डाल से वैदेही में पाण्डुसोपाक पैदा
होता है, वह वृक्षों की छाल से पंखा, सूप, आदि से जीविका
करे । निषाद से वैदेही में आहिण्डक, चाण्डाल से पुक्कसी में, सो-
पाक और चांडाल से निषादस्त्री में अन्त्यावसायी जाति के पुत्र
होते हैं । ये जल्लादी का काम करें, मरघटमें रहें । ये सब महादूषित
होते हैं ॥ ३२-३६ ॥

संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः ।
प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः॥४०॥
सजातिजानन्तरजाः षट् सुता द्विजधर्मिणः ।
शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाःस्मृताः ४१ ॥
तपो बीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे ।
उत्कर्षं चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥ ४२ ॥
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ ४३ ॥
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः ।
पारदापह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ४४ ॥
मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः ।
म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ४५ ॥
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः ।
ते निन्दितैर्वर्त्तेयुर्द्विजानामेव कर्मभिः ॥ ४६ ॥
सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्ठानां चिकित्सनम् ।
वैदेहकानां स्त्रीकार्यं मागधानां वणिक्पथः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार वर्णसंकरों की जातियां उनके माता-पिता के साथ

दसवां अध्याय। ३८३

दसवां अध्याय। ३८३
कही गई हैं। इन में छिपी या प्रकट जातियों को उनके कर्मों से
जानना चाहिए। अपनी जाति और पिछली जाति की स्त्री में द्विज
के पैदाकिए छः पुत्र उपनयन संस्कार के योग्य होते हैं। और प्रति-
लोम से उत्पन्न हुए सब शूद्र के समान माने जाते हैं। तप के प्रभाव
से (विश्वामित्र) और बीज के प्रभाव से (ऋष्यशृङ्ग) सब युगों
में मनुष्यजन्म की उंचाई और निचाई को प्राप्त होते हैं। पुंड्र, उड्र,
द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, अपह्व, चीन, किरात, दरद
और खसदेश के क्षत्रियगण धीरे धीरे धर्मक्रियाओं को छोड़ देने
से और धर्मोपदेशक ब्राह्मणों का संग न करने से वृषल-म्लेच्छ-
पने को प्राप्त होगये। इस जगत् में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-
जाति के पुरुष जो क्रिया के लोप से पतित जाति के होगए हों, वे
आर्यभाषा बोलें या म्लेच्छभाषा, पर उन को ‘दस्यु’ चोर सम-
झना चाहिए *। द्विजों में जिनको अपसद् वा वर्णसंकर कहा
है वे द्विजों के ही दूषित कामों से जीविका करें। सूतों का काम,
घोड़े का सारथि होना, अम्बष्ठों का चिकित्सा, वैदेहों का अन्तःपुर
का काम और मागधों का व्यापार कर्म है॥ ४०-४७॥
मत्स्यघातो निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च।
मेदान्ध्रचुञ्चुमद्गूनामारण्यपशुहिंसनम् ॥ ४८ ॥
क्षत्तूग्रपुक्कसानां तु बिलौको वधबन्धनम् ।
धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ॥ ४९ ॥
चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च ।

  • इसीलिए जिन देशों में ब्राह्मणादि आर्यजन निवास नहीं करते वे देश ‘कीकट’
    आदि निंद्य शब्दों से वेद में लिखे हैं। जैसा—‘किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः’।
    यास्क मुनि ने निरुक्त में व्याख्या की है—‘कीकटो नाम देशोऽनार्यनिवासः...’।
    शक, यवन आदि म्लेच्छों के भाषा शब्द हमारी आर्यभाषा से बहुत मिलते हैं।
    इससे अनुमान होता है सबका मूल कुटुम्ब एक ही था। देश और कर्म त्याग से
    अनार्य होगये हैं।

३८४ मनुस्मृति ।
वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥ ५० ॥
चण्डालश्वपचानां तु बहिर्ग्रामात्प्रतिश्रयः ।
अपपात्राश्च कर्त्तव्या धनमेषां श्वगर्दभम् ॥ ५१ ॥
वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम् ।
कार्ष्णाय समलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥ ५२ ॥
न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् ।
व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ॥ ५३ ॥
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने ।
रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥ ५४ ॥
दिवाचरेयुः कार्यार्थ चिह्निता राजशासनैः ।
अबान्धवं चैव शवं निर्हरेयुरिति स्थितिः ॥ ५५ ॥
निषादों का काम मछली मारना, आयोगव का लकड़ी काटना,
मेद, आंध्र, चंचु और मद्गुका वनपशुओंको मारना, क्षत्ता, उग्र और
पुक्कस का बिलों में रहनेवाले साँप, नौला को मारना वा पकड़ना ।
धिग्वसों का मोची का काम और वेणों का बाजा बनाने का काम
है । क्षत्ता आदि जातिवाले गाँव के पास प्रसिद्ध वृक्ष के नीचे,
श्मशान में, पर्वत पर, बगीचे में रहकर अपनी अपनी जीविका को
करें । चाण्डाल और श्वपच गाँव के बाहर रहें, इनके पात्रों को
काम में न लाना । कुत्ता, गधा आदि इनके धन हैं । ये मुरदा के
कफ़न धारण करें, फूटे पात्रों में भोजन करें, लोह के गहने पहनें
और रोज़ गांवों में घूमा करें । पुरुष को धर्माचरण के समय इन
चाण्डालों का दर्शन भी न करना चाहिए, इनका व्यवहार और
विवाह समान-जातिवालों में होना चाहिए । इनका भोजन परा-
धीन होवे, फूटे पात्रों में खाने को अन्न देवे और ये लोग रात में
गाँव या नगर में न फिरें । राजा की आज्ञा से चपड़ास पाए हुए

दसवां अध्याय । ३८५

दसवां अध्याय । ३८५
काम के लिए दिन में घूमैं और वे वारिश मुरदों को ले जावैं ।
यह मर्यादा है ॥ ४८-५५ ॥
वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया ।
वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥ ५६ ॥
वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम् ।
आर्यरूपमिवानार्यं कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥ ५७ ॥
अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता ।
पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥ ५८ ॥
पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।
न कथंचन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥ ५६ ॥
कुले मुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसंकरः ।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥ ६० ॥
यत्र त्वेते परिध्वंसाज्जायन्ते वर्णदूषकाः ।
राष्ट्रिकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ६१ ॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽनुपस्कृतः ।
स्त्रीबालाभ्युपपत्तौ च बाह्यानां सिद्धिकारणम् ॥ ६२ ॥
जिनको राजाज्ञा से फाँसी का दण्ड हुआ हो उनको शास्त्रानु-
सार मारे और उनके वस्त्र, शय्या, आभूषणों को लेवे । जातिभ्रष्ट,
वर्णसङ्कर, अपरिचित और आर्य मालूम होनेवाला ऐसे अनार्यों को
उनके कर्मों से पहचाने । असभ्यता, कठोरपन, क्रूरता और अना-
चार से लोक में पुरुष की वर्णसङ्करता प्रकट होती है । वर्णसङ्कर
अपने पिता का या माता का अथवा दोनों का स्वभाव पाता है ।
वह अपने स्वभाव-शील को किसी भांति छिपा नहीं सकता । वर्ण-
सङ्कर उत्तम कुल में पैदा होने पर भी अपने उत्पादक के स्वभाव
४६