मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सातवां अध्याय । २३७
सातवां अध्याय । २३७
सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथास्याभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥१७७॥
आयतिं सर्वकार्याणां तदात्वं न विचारयेत् ।
आयतीनां च सर्वेषां गुणदोषौ च तत्त्वतः ॥ १७८॥
आयत्यां गुणदोषज्ञस्तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः ।
अतीते कार्यशेषज्ञः शत्रुभिर्नाभिभूयते ॥ १७६ ॥
और जब कि शत्रु के आधीन अपने को होता देखे तब झट-
पट धार्मिक और बलवान् राजा की शरण लेवे । जो दुष्ट मन्त्रि-
मण्डल आदि और शत्रुसेना को दबा सकता हो उस राजा की,
गुरु के समान, नित्य सेवा करे । और यदि उस आश्रयवाले राजा
से धोखा जाने तो निडर होकर युद्ध ही करे । नीतिवेत्ता राजा
को सब भांति से ऐसा बर्त्ताव करना चाहिए जिससे उसके मित्र,
उदासीन और शत्रु राजा बलवान् न हो जावें । सम्पूर्ण कार्यों
की वर्तमान, भूत और भविष्य स्थिति और उनके गुण-दोषों का
विचार किया करे । जो राजा कार्यों के भविष्य शुभाशुभ परिणाम
को जानता है, वर्तमान कार्य का शीघ्र निश्चय कर लेता है और बाक़ी
कामों को जानता है, उसका शत्रु कुछ नहीं कर सकते ॥१७४-१७६॥
यथैनं नाभिसंदध्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ।
तथा सर्वं संविदध्यादेष सामासिको नयः ॥ १८० ॥
यदा तु यानमातिष्ठेदरिराष्ट्रं प्रति प्रभुः ।
तदानेन विधानेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८१ ॥
जिस प्रकार मित्र, उदासीन और बैरी राजा अपने को पीड़ा
न दे सकें वैसे उपायों को करता रहे, यह नीति है। और जब
किसी बैरी के देश पर चढ़ाई करनी हो तो नीचे लिखी विधि
से धीरे धीरे यात्रा करे ॥ १८०-१८१ ॥
२३८ : मनुस्मृति।
मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः ।
फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति यथाबलम् ॥१८२॥
अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद्ध्रुवं जयम् ।
तदा यायाद्विगृह्यैव व्यसने चोत्थिते रिपोः ॥ १८३ ॥
कृत्वा विधानं मूले तु यात्रिकं च यथाविधि ।
उपगृह्यास्पदं चैव चारान् सम्यग् विधाय च ॥१८४॥
संशोध्यं विविधं मार्गं षड्विधं च बलं स्वकम् ।
सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८५ ॥
शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्ततरो भवेत् ।
गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ॥ १८६ ॥
राजा अपनी सेना के वलावल का विचार करके, शुभ अगहन
या फागुन के महीने में या चैत में, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करे।
इसके सिवा दूसरे समय में भी अगर अपनी जीत देखे तब, अथवा
जब शत्रु किसी विपत्ति में फँसा हो तब चढ़ाई करे। अपने नगर
की रक्षा का प्रबन्ध करके, गुप्तदूतों को भेजकर, ऊंचा, नीचा
और सम मार्ग को साफ़ कराकर छः प्रकार की सेना * को
ठीक करके सम्पूर्ण युद्ध-सामग्री को साथ लेकर, धीरे से शत्रु
के नगर को जावे। जो मित्र छिप कर शत्रु से मिला हो, जो पहले
छुड़ाया नौकर फिर आया हो, इनसे सावधान रहे, क्योंकि ये
दोनों दुःखदायक वैरी हैं ॥ १८२-१८६ ॥
दण्डव्यूहेन तन्मार्गं यायात्तु शकटेन वा ।
- छः प्रकार के बलः- हाथीसवार, घोड़ासवार, रथसवार, पैदल, खज़ाना
और नौकर चाकर।
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वराहमकराभ्यां वा सूच्या वा गरुडेन वा ॥ १८७ ॥
यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद्बलम् ।
पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम् ॥ १८८ ॥
सेनापतिबलाध्यक्षौ सर्वदिक्षु निवेशयेत् ।
यतश्च भयमाशङ्केत्प्राचीं तां कल्पयेद्दिशम् ॥१८६॥
राजा, दण्डव्यूह † से मार्ग में चले अथवा शकट, वराह,
मकर, सूई, गरुड़ के तुल्य आकार वाले व्यूहों में, जहां जैसा देखे
वैसी यात्रा करे। जिस तरफ़ डर जाने, उधर सेना बढ़ावे और
खुद पद्माकार व्यूह में सदा रहे । सेनापति और सेनानायकों
को सब दिशाओं में नियुक्त करे और जिस दिशा में भय समझे
उसे पूर्वदिशा मान लेवे ॥ १८७-१८६ ॥
गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः ।
स्थानयुद्धे च कुशलानभीरूनविकारिणः ॥ १६०॥
संहतान्योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद्बहून् ।
सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य योधयेत् ॥१६१॥
स्यन्दनाश्वैः समे युद्ध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा ।
वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ १६२ ॥
कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च पञ्चालान् शूरसेनजान् ।
दीर्घाल्लघूंश्चैव नरानग्रानीकेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥
† दण्डा के समान फौज रखना, दण्डव्यूह ऐसे ही शकटव्यूह वगैरह । ऐसी
व्यूहरचना में आगे सेनापति, बीच में राजा, पीछे, सेनापति, दोनों बगल हाथी,
उनके पास घोड़े और उनके आसपास में पैदल, इस तरह लम्बा जमाव दण्डव्यूह
कहा जाता है।
२४० मनुस्मृति ।
प्रहर्षयेद्वलं व्यूह्य तांश्च सम्यक् परीक्षयेत् ।
चेष्टाश्चैव विजानीयादरीन् योधयतामपि ॥ १६४ ॥
उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् ।
दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् ॥ १६५ ॥
भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा ।
समवस्कन्दयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ॥ १६६ ॥
उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम् ।
युक्ते च दैवे युध्येत जयप्रेप्सुरपेतभीः ॥ १६७ ॥
कुछ सेना का हिस्सा, चतुर पुरुष की अध्यक्षता में चारों
तरफ़ से नियत करे और उनमें बाजा वगैरह का संकेत कर ले
जिसमें समय समय पर हालात मिला करें। योद्धा कमती हों तो
इकट्ठे करके युद्ध करावे, अधिक हों तो मनमानी, चारों तरफ़
फैलाकर, सूई के आकार के व्यूह से लड़ावे । समभूमि में रथ
घोड़ों से, जल में नावों से, हाथियों से, वृक्ष आदि की झाड़ियों
में बाणों से और स्थल में, ढाल तलवार वगैरह से युद्ध करे ।
कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पञ्चाल, शूरसेन आदि देशों के ऊंचे और ठिंगने
मनुष्यों को सेना के आगे रक्खे । सेना को किसी रचना से खड़ी
करके उत्साह दिलावे और क्या क्या करने से खुशी या नाखुश
होंगे इन बातों की परीक्षा करे और शत्रुओं के मुक़ाबले दिल
से लड़ते हैं या नहीं यह चेष्टाओं से जान लेवे । शत्रु लड़े वा
न लड़े पर उसके देश को नष्ट कर के वहाँ का, अन्न, जल,
चारा, ईंधन आदि उजाड़ देवे । तालाब, क़िला, खाइयों को
तोड़ दे, शत्रु पर हमला करे और रात में अनेक आवाज़ों से
उसको डरा देवे । उसके मन्त्री आदि जो फूट सकें उनको
लालच देकर मिलाले, उनसे शत्रु की कुल हालतें जाने । और
समय अनुकूल आवे, तो निडर होकर, युद्ध करे ॥ १६०-१६७ ॥
सातवां अध्याय। २४१
सातवां अध्याय। २४१
साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक् ।
विजेतुं प्रयतेतारीन् न युद्धेन कदाचन ॥ १९८ ॥
अनित्यो विजये यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः ।
पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत् ॥ १९९ ॥
त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे ।
तथा युद्ध्येत संपन्नो विजयेत रिपून् यथा ॥ २०० ॥
जित्वा संपूजयेद्देवान् ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान् ।
प्रदद्यात्परिहारांश्च ख्यापयेदभयानि च ॥ २०१ ॥
सर्वेषां तु विदित्वैषां समासेन चिकीर्षितम् ।
स्थापयेत्तत्र तद्वंश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम् ॥ २०२ ॥
प्रमाणानि च कुर्वीत तेषां धर्मान् यथोदितान् ।
रत्नैश्च पूजयेदेनं प्रधानपुरुषैः सह ॥ २०३ ॥
आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् ।
अभीप्सितानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते ॥ २०४ ॥
सर्वं कर्मेदमादत्तं विधाने दैवमानुषे ।
तयोर्दैवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ॥ २०५ ॥
राजा साम, दान और भेद इन तीनों से या एकही किसी से
शत्रु के जीतने का उपाय करे। पर जहांतक होसके युद्ध का उद्योग
न करे। युद्ध में लड़नेवालों की हार वा जीत कोई निश्चित नहीं
देखने में आती, कभी कोई कभी कोई, इसलिए युद्ध न करे। जब
उक्त तीनों उपायों से शत्रु को जीतने का भरोसा न हो तभी युद्ध
का उपाय पूरी तौर से करना उचित है जिसमें वह अधीन होजाय।
युद्ध में विजय पाने पर देवता, ब्राह्मणों की पूजा करे। जीती
३१
२४२ मनुस्मृति ।
प्रजाओं का भूमि कर कम करे और यह ढिंढोरा पिटावे कि
जिन्होंने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है उन्हें भी अभय दिया
गया। जीते राजा और मंत्री का अभिप्राय जानकर, उसी के
वंशवाले को गद्दी देकर अपनी शर्तें पक्की कर लेवे। और उनके
धर्मों को-रिवाजों को माने, रत्नों से मंत्री आदि के साथ उसका
सत्कार करे अर्थात्-खिलत देवे। यद्यपि किसी की प्रिय वस्तु
ले लेना अप्रिय और देना प्रिय होता है तौभी समयानुसार लेना
और देना दोनों अच्छा माना जाता है। ये सब कर्म दैव और
मनुष्य के पुरुषार्थ के अधीन हैं। इन में दैव का निर्णय अशक्य
है परन्तु पुरुषार्थ से कार्य किया जाता है। अर्थात् मनुष्य-साध्य-
कार्य में पुरुषार्थ प्रधान माना जाता है ॥ १६८-२०५॥
सह वापि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
मित्रं हिरण्यं भूमिं वा संपश्यंस्त्रिविधं फलम् ॥२०६॥
पाष्णिग्राहं च संप्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले ।
मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ॥ २०७ ॥
हिरण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते ।
यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम् ॥ २०८॥
अथवा राजा मित्रता या कुछ द्रव्य या भूमि शत्रु से पाकर
सुलह करके लौट आवे अर्थात् इन पदार्थों को देना शत्रु मंजूर करे
तो लेकर सुलह कर ले। जो विजय करते हुए राजा के पीछे दूसरा
राजा दबाकर चढ़ आवे उसको 'पाष्णिग्राह' कहते हैं और जो
उसको इस काम से रोके उसे 'क्रन्द' कहते हैं। इन दोनों को
देखकर, मित्र या अमित्र से यात्रा का फल ग्रहण करे । (ऐसा न
करे जिसमें ये दोनों बिगड़ जावें) राजा सुवर्ण और भूमि को
पाकर वैसा नहीं बढ़ता, जैसा दुर्बल भी स्थिर मित्र को पाकर
बढ़ता है ॥२०६-२०८ ॥
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।
अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते ॥ २०६ ॥
सातवां अध्याय । २४३
सातवां अध्याय । २४३
प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च ।
कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः ॥ २१० ॥
आर्यता पुरुषज्ञानं शौर्यं करुणवेदिता ।
स्थौललक्ष्यं च सततमुदासीनगुणोदयः ॥ २११ ॥
क्षेम्यां सस्यप्रदां नित्यं पशुवृद्धिकरीमपि ।
परित्यजेन्नृपो भूमिमात्मार्थमविचारयन् ॥ २१२ ॥
आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ २१३ ॥
धर्मज्ञ, कृतज्ञ, प्रसन्नचित्त, प्रीति करनेवाला, स्थिर कार्य का
आरम्भ करनेवाला, छोटा मित्र अच्छा होता है । बुद्धिमान्,
कुलीन, शूर, चतुर, दाता, कृतज्ञ और धैर्यवान् शत्रु को लोग
कठिन कहते हैं । सभ्यता, पुरुषों की पहिचान, शूरता, दयालुता
और उदारता ये सब उदासीन राजा के गुण हैं । कल्याण
करनेवाली, संपूर्ण धान्यों को देनेवाली और पशुवृद्धि करनेवाली
भूमि को भी राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए विना
विचार किये छोड़ देवे । आपत्ति दूर करने के लिए धन की
करे, धन से स्त्रियों की रक्षा करे और धन, स्त्री से भी
अपने शरीर की रक्षा करे ॥ २०६–२१३ ॥ । ॥ २२६ ॥
सह सर्वाः समुत्पन्नाः प्रसमीक्ष्यापदो ऽयां संहितायां
संयुक्तांश्च वियुक्तांश्च सर्वोपायान्स्तृ ॥
उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स्र अपना नित्यकर्म यथावत
एतन्त्रयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्ध संपूर्ण राजकार्यों का स्वयं
होजाय तो अपने अधिका-
एवं सर्वमिदं राजा सह संमन्त्र्य २५–२२६ ॥
व्यायाम्याप्लुत्यमध्याह्नेभोक्तुमन्तः पूरा हुआ।
२४४ , मनुस्मृति ।
तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः ।
सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रैर्विषापहैः ॥ २१७ ॥
विषघ्नैरुदकैश्चास्य सर्वद्रव्याणि योजयेत् ।
विषघ्नानि च रत्नानि नियतो धारयेत्सदा ॥ २१८ ॥
सब आपत्तियों को एक साथ आतीं देख पड़ें तो बुद्धिमान्
राजा साम दान आदि उपायों को एक साथ वा अलग
अलग काम में लावे । उपाय करनेवाले, उपाय के साधन योग्य
और उपाय इन तीनों को ठीक ठीक आश्रय करके अर्थसिद्धि के
लिए उपाय करे । उक्त प्रकार से संपूर्ण राजकार्यों का मन्त्रियों के
साथ विचार करे । स्नान और व्यायाम (कसरत) करके
दोपहर में भोजनार्थ अन्तःपुर में प्रवेश करे । वहां नम्र, भोजन-
काल को जाननेवाला, शत्रु के बहकाने में न आनेवाला, रसोइयां
के तैयार किये, परीक्षित और विषनिवारक मन्त्रों से शुद्ध भोजन
को करे । राजा के सब खानेवाले पदार्थों में विषनाशक दवा डाले
और विषनाशक रत्नों को राजा सदा धारण करे ॥ २१४–२१८॥
परीक्षिताभिः स्त्रीभिश्चैनं व्यजनोदकधूपनैः ।
तो लेषाभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ॥ २१९ ॥
राजा दबा
उसको इस एवं कुर्वीत यानशय्यासनाशने ।
देखकर, मित्र या ने चैव सर्वालङ्कारकेषु च ॥ २२० ॥
करे जिसमें ये दोनों वेष-भूषणों से सजी धजी स्त्रियां, एकाग्रमन
पाकर वैसा नहीं चढ़ धूप-गन्ध से राजा की सेवा करें । इसी भांति
बढ़ता है ॥ २०६-२०८ या, आसन, भोजन, स्नान, उबटन और सब
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च क्षा आदि कर्म होना चाहिए ॥ २१९-२२० ॥
अनुरक्तं स्थिरारम्भं स्त्रीभिरन्तःपुरे सह ।
। पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ॥ २२१ ॥
सातवां अध्याय। २४५
सातवां अध्याय। २४५
अलङ्कृतश्च संपश्येदायुधीयं पुनर्जनम् ।
वाहनानि च सर्वाणि शस्त्राण्याभरणानि च ॥२२२॥
सन्ध्यां चोपास्य शृणुयादन्तर्वेश्मनि शस्त्रभृत् ।
रहस्याख्यायिनां चैव प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥२२३॥
गत्वा कक्षान्तरं त्वन्यत्समनुज्ञाप्य तं जनम् ।
प्रविशेद्भोजनार्थं च स्त्रीवृतोऽन्तःपुरं पुनः ॥ २२४ ॥
भोजन करने के बाद, उसी अन्तःपुर में स्त्रियों के साथ कुछ
देर टहले, फिर यथासमय अपने राजकाज का विचार करे।
फिर शस्त्र, भूषणों से सजकर सवार, सिपाही, घोड़ा वगैरह
अस्त्र और राजकीय आभूषणों की देखभाल करे। उसके अनन्तर
सायंसंध्या करके, एकान्त में दूत और प्रतिनिधियों के समा-
चार और कामों को सुने। उन लोगों को विदा करके दूसरे कमरे
में जाकर स्त्रियों के साथ भोजनार्थ अन्तःपुर को गमन करे। वहां
यथावत् भोजन करके थोड़ा गाना, बाजा से चित्त को प्रसन्न
करके और समय पर निद्रा करे ॥ २२१—२२४ ॥
तत्र भुक्त्वा पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः ।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः ॥ २२५ ॥
एतद्विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः ।
अस्वस्थः सर्वमेतत्तु भृत्येषु विनियोजयेत् ॥ २२६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
सप्तमोऽध्यायः ॥
प्रातःकाल कुछ सबेरे उठकर फिर अपना नित्यकर्म यथावत
करे। इस प्रकार से नीरोग राजा संपूर्ण राज्यकार्यों का स्वयं
संपादन करे। यदि शरीर में कोई क्लेश होजाय तो अपने अधिका-
रियों से सब कामों को करावे ॥ २२५—२२६ ॥
सातवाँ अध्याय पूरा हुआ।
२४६ मनुस्मृति ।
अथ अष्टमोऽध्यायः ।
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व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ १ ॥
तत्रासीनः स्थितो वापि पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् ।
विनीतवेषाभरणः पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २ ॥
प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः ।
अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृथक् पृथक् ॥ ३ ॥
तेषामाद्यमृणादानं निक्षेपोऽस्वामि विक्रयः ।
संभूय च समुत्थानं दत्तस्यानपकर्म च ॥ ४ ॥
वेतनस्यैव चादानं संविदश्च व्यतिक्रमः ।
क्रयविक्रयानुशयो विवादः स्वामिपालयोः ॥ ५ ॥
सीमाविवादधर्मश्च पारुष्ये दण्डवाचिके ।
स्तेयं च साहसं चैव स्त्रीसंग्रहणमेव च ॥ ६ ॥
स्त्रीपुंधर्मो विभागश्च द्यूतमाह्वय एव च ।
पदान्यष्टादशैतानि व्यवहारस्थिताविह ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय ।
व्यवहार-निर्णय—मुक़द्दमा आदि ।
राजा विद्वान् ब्राह्मण और राजनीति चतुर मन्त्रियों के साथ
वादी और प्रतिवादियों के विचारार्थ नम्रता से राजसभा में
प्रवेश करे । वहां जाकर, दाहना हाथ उठाकर, बैठकर या खड़ेही
आठवां अध्याय । २४७
आठवां अध्याय । २४७
(जैसा कार्य हो) करमवालों के कामों को देखे । और वंश, जाति
आदि देशव्यवहार और शास्त्रोक्त साक्षी, शपथ आदि के अनुसार
अठारह प्रकार के विवाद-झगड़ों का अलग अलग विचार-फैसला
करे। उन अठारह विवादों का नाम इस प्रकार है—
(१) ऋण लेकर न देना (२) धरोहर (३) दूसरे की
वस्तु को बेचना (४) साझे का व्यापार (५) दान दिया हुआ
लौटा लेना (६) नौकरी न देना (७) प्रतिज्ञा भंग करना
(८) खरीद-बेंच का झगड़ा (६) पशु स्वामी और चरवाहे
का झगड़ा (१०) सरहद की लड़ाई (११) बड़ी बात कहना
(१२) मार पीट (१३) चोरी (१४) ज़ोर-जुलम (१५) पर
स्त्री का ले लेना (१६) स्त्री और पुरुष के धर्म की व्यवस्था
(१७) जुआखोरी.(१८) जानवरों की लड़ाई में हार जीत का
दाँव करना। इस संसार में ये १८ दावा होने के कारण हैं॥१–७॥
एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम् ।
धर्मं शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ॥ ८ ॥
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् ।
तदा नियुञ्ज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ ६ ॥
सोऽस्य कार्याणि संपश्येत् सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः ।
सभामेव प्रविश्याग्र्यामासीनः स्थित एव वा ॥ १० ॥
यस्मिन् देशे निषीदन्ति विप्रावेदविदस्त्रयः ।
राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ॥ ११ ॥
धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते ।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ १२॥
सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ १३ ॥
२४८ मनुस्मृति ।
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १४ ॥
इन विषयों में झगड़ा करनेवालों का फ़ैसला राजा को सनातन-
धर्म के अनुसार करना चाहिए। जब आप कारणवश न काम देख
सके तो विद्वान् ब्राह्मण को सौंप देवे। वह ब्राह्मण तीन सभासदों
के साथ सभा में बैठकर या खड़े ही राजा के खास कामों को
देखे। जिस देश में वेदविशारद तीन ब्राह्मण राजसभा में निर्ण-
यार्थ बैठते हैं और राजा का अधिकार पाया हुआ एक विद्वान्
ब्राह्मण रहता है वह ब्रह्मा की सभा मानी जाती है। जिस सभा
में धर्म, अधर्म से चौंका जाता है और उस चुभे काँटे को सभा-
सद् धर्मशरीर से नहीं निकालते तो वे सभासद् पापभागी होते
हैं। या तो सभा में न जाना, जाना तो सत्यवचन कहना। और
जो जानकर भी कुछ न कहे या झूठ कहे तो वह पातकी होता
है। जिस सभा में अधर्म से धर्म की और असत्य से सत्य की
हत्या होती है उस सभा के सभासद् नष्ट होजाते हैं ॥ ८-१४ ॥
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १५ ॥
वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥ १६ ॥
एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १७ ॥
धर्म का लोप करदेने से वह उस पुरुष को नष्ट करदेता है और
धर्म की रक्षा करने से वह भी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का
नाश न करना चाहिए जिसमें नष्ट धर्म हमारा नाश न करे।
भगवान् धर्म को 'वृष' कहते हैं और जो उसका नाश करता
है उसको देवता 'वृषल' कहते हैं। इस कारण मनुष्य को धर्म
आठवां अध्याय। २४६
आठवां अध्याय। २४६
का लोप न करना चाहिए । मृत्युसमय में भी एकमात्र मित्र
धर्म ही पीछे चलता है और सब शरीर के साथ ही नाश को
प्राप्त होजाता है ॥ १५-१७ ॥
पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति ।
पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १८ ॥
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्यते ॥ १९ ॥
जातिमात्रोपजीवी वा कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः ।
धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ २० ॥
यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम् ।
तस्य सीदति तद्राष्ट्रं पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ २१ ॥
यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् ।
विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् ॥ २२॥
न्याय करते समय उसका एक चौथाई अधर्म अन्याय करने
वाले को, एक चौथाई झूठे गवाह को, एक चौथाई सभासद् और
एक चौथाई राजा को अधर्म लगता है। जिस सभा में अन्यायी
पुरुष की ठीक ठीक निन्दा कीजाती है, वहां राजा और सभा-
सद् दोष से छूट जाते हैं। और उस अधर्मी को ही पाप लगता
है। जिसकी जातिमात्र से जीविका है कुछ विद्या, योग्यता से
नहीं वही चाहे न्यायकर्ता नियुक्त किया जाय, पर शूद्र को कभी
अधिकार न देवे । जिस राजा का न्यायाधीश शूद्र होता है
उसका राज्य कीचड़ में गौ की भांति फँसकर पीड़ा पाता है।
जिस राज्य में शूद्र और नास्तिक, अधिक हों, द्विज न हों वह
सम्पूर्ण राज्य दुर्भिक्ष और व्याधि से पीड़ित होकर शीघ्रही नष्ट
होजाता है ॥ १८-२२ ॥
३२
२५० मनुस्मृति ।
धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्गः समाहितः ।
प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमारभेत् ॥ २३ ॥
अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा धर्माधर्मौ च केवलौ ।
वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २४ ॥
बाह्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् ।
स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥ २५ ॥
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ २६ ॥
राजा न्यायासन पर वस्त्र वगैरह पहन कर बैठे और आठ
लोकपालों को प्रणाम करके सावधानी से विचारकार्य का आरम्भ
करे। प्रजा की लाभ और हानि को, धर्म और अधर्म को सोचकर
वादियों के दावों को ब्राह्मणादि वर्ण के क्रम से देखना शुरू
करे। मनुष्यों के बाहरी लक्षण, स्वर (आवाज़) शरीर का वर्ण,
नीचे ऊपर देखना, आकार रोमांच होना आदि, आँख, हाथ, पैर
की चेष्टा वगैरह से भीतरी हाल पहचानना। आकार, नीचे ऊपर
देखना, गति, चेष्टा, बोली, आँख, मुँह के विकार से मन का भाव
जाना जाता है ॥ २३-२६ ॥
बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् ।
यावत्स स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ॥ २७ ॥
वशाऽपुत्रासु चैव स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च ।
पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ २८ ॥
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः ।
ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥
आठवां अध्याय । २५१
आठवां अध्याय । २५१
प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् ।
अर्वाक्त्र्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् ॥ ३० ॥
बालक के दायभाग का द्रव्य, तब तक राजा के अधीन (कोर्ट
आफ़ वार्डस) में रहे जब तक वह समावर्त्तनवाला अर्थात्
पढ़ लिखकर चतुर न हो और बालिग न होजाय । बन्ध्या स्त्री,
अपुत्रा, सपिण्डरहित, पतिव्रता, विधवा और बहुत दिन की
रोगी स्त्री का भी धन राजा की रक्षा में रहे । इन जीती हुई स्त्रियों
का धन भाई बन्धु हर लेना चाहें तो उनको चोरदण्ड के मुवाफ़िक़
दण्ड देवे । जिसका स्वामी बे पता हो उस लावारिस धन को
राजा तीन साल तक रखे, उसके भीतर आ जाय तो ले जाय,
नहीं तो वह राजा का ही होजाता है ॥ २७-३० ॥
ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽनुयोज्यो यथाविधि ।
संवाद्य रूपसंख्यादीन् स्वामी तद्द्रव्यमर्हति ॥ ३१ ॥
अवेदयमानो नष्टस्य देशं कालं च तत्त्वतः ।
वर्णं रूपं प्रमाणं च तत्समं दण्डमर्हति ॥ ३२ ॥
आददीतार्थषड्भागं प्रणष्टाधिगतान्नृपः ।
दशमं द्वादशं वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ३३ ॥
प्रणाष्टाधिगतं द्रव्यं तिष्ठेद्युक्तैरधिष्ठितम् ।
यांस्तत्र चौरान् गृह्णीयात्तान् राजेभेन घातयेत् ॥ ३४ ॥
ममायमिति यो ब्रूयान्निधिं सत्येन मानवः ।
तस्याददीत षड्भागं राजा द्वादशमेव वा ॥ ३५ ॥
अनृतं तु वदन् दण्ड्यः स्ववित्तस्यांशमष्टमम् ।
तस्यैव वा निधानस्य संख्यायाल्पीयसीं कलाम् ॥ ३६ ॥
२५२ मनुस्मृति ।
तीन वर्ष के भीतर उसका मालिक आकर कहै कि-यह मेरा
धन है, तब राजा उससे ठीक तौर से पूंछे कि धन कैसा है?
कितना है? जो वह रूप, रंग, संख्या बतला दे तो उसको दे
देना चाहिए। अगर खोई वस्तु का पता ठीक न बता सके तो
उस पर उतना ही धन जुर्माना करे। कोई खोई वस्तु उसके मा-
लिक को देते समय उसकी रक्षा के कारण उस धन का छठ्ठां,
दशवां या बारहवां भाग राजा ले लेवे। किसीकी कोई चीज़
गुम गई हो और मिले तो राजा उसे पहरे में रक्खे और वहां से
चुरानेवाला पकड़ा जाय तो उसको हाथी से मरवा देवे। जो
पुरुष सच्चाई से कहे कि 'यह निधि मेरा है' उसके निधि* से
छठ्ठां वां बारहवां भाग राजा ग्रहण कर लेवे। यदि वह दूसरे का
अपना लेने की इच्छा करे तो उस निधि का आठवां भाग अथवा
निधि गिनकर उसका कुछ भाग दण्ड देवे ॥ ३१-३६ ॥
विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् ।
अशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ ३७ ॥
यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ ।
तस्माद् द्विजेभ्यो दत्त्वार्धमर्धं कोशे प्रवेशयेत् ॥ ३८ ॥
यदि विद्वान् ब्राह्मण पुराने ज़माने की निधि पाजाय तो वह
सब ले लेवै। क्योंकि ब्राह्मण सबका स्वामी हैं और जो भूमि में
पुरानी निधि राजा पावे तो उसका आधा द्विजों को बाँट दे
और आधा अपने खज़ाने में रखवा देवे ॥ ३७-३८ ॥
निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ ।
अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ ३९ ॥
दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राज्ञा चौरैर्हृतं धनम् ।
राजा तदुपयुञ्जानश्चौरस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ ४० ॥
- भूमि में गड़ा हुआ पुराना धन 'निधि' कहलाता है।
आठवां अध्याय । २५३
आठवां अध्याय । २५३
जातिजानपदान्धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ४१ ॥
स्वानि कर्माणि कुर्वाणा दूरे सन्तोऽपि मानवाः ।
प्रिया भवन्ति लोकस्य स्वे स्वे कर्मण्यवस्थिताः॥४२॥
नोत्पादयेत्स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः।
न च प्रापितमन्येन ग्रसेदर्थं कथञ्चन ॥ ४३ ॥
भूमि का स्वामी और रक्षक होने से राजा गड़ा धन और
धातु की खानों के आधे भाग का अधिकारी है। चोरों का
चुराया हुआ धन छीन कर जिस वर्ण का हो उन सब को दे देय।
यदि आप ग्रहण करे तो चोर के पाप का स्वयं भागी होता है।
जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म (व्यापार) और कुलधर्म के अनु-
सार अर्थात् रिवाज के अनुसार राजा राजधर्म को प्रचलित करे।
जाति, देश और कुलधर्म और अपने कर्मों को करते लागे दूर
रहते भी लोक में प्रिय होते हैं। राजा वा राजपुरुष जो नालिश
न करता हो उससे खुद नालिश न करवावें और कोई झगड़ा
पेश करे तो उसमें आनाकानी न करे ॥ ३६-४३ ॥
यथा नयत्यसृक्पातैर्मृगस्य मृगयुः पदम् ।
नयेत्तथानुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ॥ ४४ ॥
सत्यमर्थं च संपश्येदात्मानमथ साक्षिणः ।
देशं रूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ॥ ४५ ॥
सद्भिराचरितं यत्स्याद्धार्मिकैश्च द्विजातिभिः ।
तद्देशकुलजातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ॥ ४६ ॥
जैसे वधक ज़मीन पर गिरे रुधिर के बूंदों से मारे हुए मृग
का घर खोज लेता है। वैसे राजा अनुमान से मामला की अस-
२५४ मनुस्मृति ।
लियत को खोज लेवे। सत्य का निर्णय करे, अन्याय से खुद डरे
और गवाहों के झूठ, सत्य का एवं देश, काल और मामला का
विचार करे । सजन पुरुष और धार्मिक द्विज जैसा आचरण
करते हों और देश, कुल, जाति के आचार से जो ख़िलाफ़ न हो
वैसा फ़ैसला करे ॥ ४४-४६ ॥
अधमर्णार्थसिद्ध्यर्थमुत्तमर्णेन चोदितः ।
दापयेद्धनिकस्यार्थमधमर्णाद्विभावितम् ॥ ४७ ॥
यैर्यैरुपायैरर्थं स्वं प्राप्नुयादुत्तमर्णिकः ।
तैस्तैरुपायैः संगृह्य दापयेदधमर्णिकम् ॥ ४८ ॥
धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च ।
प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चमेन बलेन च ॥ ४६ ॥
यः स्वयं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णिकात् ।
न स राज्ञाभियोक्तव्यः स्वकं संसाधयन् धनम् ॥ ५० ॥
अर्थेऽपह्नवमानं तु करणेन विभावितम् ।
दापयेद्धनिकस्यार्थं दण्डलेशं च शक्तितः ॥ ५१ ॥
क़र्ज़ा का लेना-देना ।
अधमर्ण-क़र्ज़दार से अपना क़र्ज़ मिलने के लिए उत्तमर्ण-महा-
जन कहे तो उसका धन राजा सबूत लेकर दिला देय । जिन्ह
जिन उपायों से महाजन अपना रुपया पासके, उन उपायों से
दिलाने की कोशिश करे । महाजन धर्म से, दावा से, कपट से,
दबाव से और पाँचवें उचित बलात्कार से अपना धन वसूल
करे। यदि महाजन ऋणी से खुद अपना धन वसूल करले तो
उसपर राजा कोई अभियोग (मुक़द्दमा) न करे। धनी के धन
को क़र्ज़दार न क़बूल करे और महाजन साक्षी-गवाह और लेख
आठवां अध्याय । २५५
आठवां अध्याय । २५५
से साबित कर दे तो राजा उसको धन दिलावे और ऋणी के
ऊपर शक्ति के अनुसार दण्ड भी करे ॥ ४७-५१ ॥
अपह्नवेऽधमर्णस्य देहीत्युक्तस्य संसदि ।
अभियोक्ता दिशेद्देश्यं करणं वान्यदुद्दिशेत् ॥ ५२ ॥
अदेश्यं यश्च दिशति निर्दिश्यापह्नुते च यः ।
यश्चाधरोत्तरानर्थान् विगीतान्नावबुध्यते ॥ ५३ ॥
अपदिश्यापदेश्यं च पुनर्यस्त्वपधावति ।
सम्यक् प्रणिहितं चार्थं पृष्टः सन्नाभिनन्दति ॥ ५४ ॥
राजसभा में ऋणी से कहा जाय-महाजन का क़र्ज़ा अदा
कर दो, तो भी वह इन्कार करे तो राजा साक्षी, दस्तावेज़ वगैरह
पेश करने की आज्ञा दे । जो झूठे गवाह या काग़ज़ पत्र पेश करे,
जो पेश करके इन्कार करे और जो पूर्वापर की कही बातों का
ध्यान न रक्खे । या जो बात को उलटता है, क़बूल करके भी
पूँछने पर इन्कार करता है ॥ ५२-५४ ॥
असंभाष्ये साक्षिभिश्च देशे संभाषते मिथः ।
निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छेद्यश्चापि निष्पतेत् ॥ ५५ ॥
ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत् ।
न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात् स हीयते ॥ ५६ ॥
साक्षिणः सन्ति मेत्युक्त्वा दिशेत्युक्तो दिशेन्न यः ।
धर्मस्थः कारणैरेतैर्हीनं तमपि निर्दिशेत् ॥ ५७ ॥
अभियोक्ता न चेद्ब्रूयाद्वध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः ।
न चेत् त्रिपक्षात्प्रब्रूयाद्धर्मं प्रति पराजितः ॥ ५८ ॥
यो यावन्निह्नुवीतार्थं मिथ्या यावति वा वदेत् ।
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२५६ : मनुस्मृति ।
[Main Text]
तौ नृपेण ह्यधर्मज्ञौ दाप्यौ तद्द्विगुणं दमम् ॥ ५६ ॥
पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा ।
त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ ६० ॥
और जो एकान्त में गवाहों के साथ बातचीत करे, जाने हुए
प्रश्न का उत्तर न दें, पूंछने पर कुछ न कहें और जो कहें सो दृढ़ता
से न कहें जो पूर्वापर बातों को न जानें। ऐसे पुरुष अपने अर्थ-
धन से हार जाते हैं। मेरे साक्षी हाज़िर हैं, ऐसा कह कर जो
मांगने पर हाज़िर न कर सके, न्यायाधीश उसको भी हरा देय।
वादी अपने दावा को सिद्ध न कर सके तो वह धर्मानुसार शिक्षा
और दण्ड दोनों का पात्र होता है और जो प्रतिवादी-मुद्दआलेह
डेढ़ महीना के भीतर झूठे दावे से हुई हानि की नालिश न कर
सकें तो वह भी हारा समझा जाय। प्रतिवादी जितने धन के
लिए झूठ बोले और वादी जितने धन का झूठा दावा करे, राजा
उन दोनों अधर्मियों को उसका दूना दण्ड करे। अगर राजा
और ब्राह्मण के सामने पूंछने पर ऋणी इन्कार करजाय तो तीन
गवाह देकर ऋण सत्य करावें ॥ ५५-६० ॥
यादृशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः ।
तादृशान् संप्रवक्ष्यामि यथा वाच्यमृतं च तैः ॥ ६१ ॥
गृहिणः पुत्रिणो मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः ।
अर्थ्युक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ॥ ६२ ॥
अब धनियों को और दूसरों को भी कैसे गवाह देने चाहिएं
और वे कैसें सच्ची गवाही दें, यह सब कहा जाता है।
साक्षी-गवाह।
कुटुम्बी, पुत्रवान्, उसी देश का वासी, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये लोग
जब वादी बुलावें तो गवाही दे सकते हैं, सब कोई नहीं ॥ ६१-६२॥