मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० मनुस्मृति ।
धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्गः समाहितः ।
प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमारभेत् ॥ २३ ॥
अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा धर्माधर्मौ च केवलौ ।
वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २४ ॥
बाह्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् ।
स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥ २५ ॥
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ २६ ॥
राजा न्यायासन पर वस्त्र वगैरह पहन कर बैठे और आठ
लोकपालों को प्रणाम करके सावधानी से विचारकार्य का आरम्भ
करे। प्रजा की लाभ और हानि को, धर्म और अधर्म को सोचकर
वादियों के दावों को ब्राह्मणादि वर्ण के क्रम से देखना शुरू
करे। मनुष्यों के बाहरी लक्षण, स्वर (आवाज़) शरीर का वर्ण,
नीचे ऊपर देखना, आकार रोमांच होना आदि, आँख, हाथ, पैर
की चेष्टा वगैरह से भीतरी हाल पहचानना। आकार, नीचे ऊपर
देखना, गति, चेष्टा, बोली, आँख, मुँह के विकार से मन का भाव
जाना जाता है ॥ २३-२६ ॥
बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् ।
यावत्स स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ॥ २७ ॥
वशाऽपुत्रासु चैव स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च ।
पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ २८ ॥
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः ।
ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥