मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीसरा अध्याय । १०५
तीसरा अध्याय । १०५
देवे । श्राद्ध में दौहित्र, कुतप और तिल ये तीन पवित्र होते हैं।
पवित्रता, क्रोध न करना और धीरज इन तीन बातों की प्रशंसा
है। सब अन्न को खूब गरम रक्खे और उसको ब्राह्मण मौन
होकर भोजन करें। यदि देनेवाला भोजन के गुण पूछे तो भी
ब्राह्मणों को न कहना चाहिए। अर्थात् भोजन के समय व्यर्थ
बकवाद न करना चाहिए ॥ २३४-२३६ ॥
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः ।
पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ २३७ ॥
यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ २३८॥
चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च।
रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षरन्नश्नतो द्विजान् ॥ २३६ ॥
होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते ।
दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम् ॥ २४० ॥
घ्राणेन शूकरो हन्ति पक्षवातेन कुक्कुटः ।
श्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः ॥ २४१ ॥
जबतक अन्न गरम रहता है और जबतक मौन होकर ब्राह्मण
भोजन करते हैं और भोजन के गुण नहीं बयान किए जाते तबतक
ही पितर अन्नका ग्रहण करते हैं। जो शिर में वस्त्र बांधकर द-
क्षिणमुख होकर और जूता पहनकर खाता है, ऐसे भोजन का
फल राक्षसों को पहुँचता है। चाण्डाल, शूकर, मुरगा, कुत्ता,
रजस्वला स्त्री, और नपुंसक ये लोग भोजन करते हुए ब्राह्मणों को
न देखने पावें। हवन में, दान में, ब्राह्मणभोजन में, देवकर्म में वा
पितृकर्म में यदि चाण्डाल आदि की नज़र पड़े तो वह कर्म निष्फल
होजाता है। शूकर सूंघने से, मुरगा पंख की हवा से, कुत्ता देखने से
और शूद्र स्पर्श से श्राद्ध के अन्न को दूषित करदेता है ॥ २३७-२४१॥
१४
१०६ मनुस्मृति ।
खञ्जो वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत् ।
हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेत् पुनः ॥ २४२ ॥
ब्राह्मणं भिक्षुकं वापि भोजनार्थमुपस्थितम् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः शक्तितः प्रतिपूजयेत् ॥ २४३ ॥
श्राद्धकर्ता का सेवक भी यदि लूला, काना, या कम ज्यादा
अङ्गवाला हो तो उसे भी ब्राह्मणभोजन के समय हटा देना चा-
हिए। उस समय यदि कोई ब्राह्मण वा भिक्षुक भोजन के लिए
आजाय तो ब्राह्मणों की आज्ञा से उसका भी भरशक आदर
करना चाहिए ॥ २४२-२४३ ॥
सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संनीयाप्लाव्य वारिणा ।
समुत्सृजेद्भुक्तवतामग्रतो विकिरेद्भुवि ॥ २४४ ॥
असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम् ।
उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरश्च यः ॥ २४५ ॥
उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्याशठस्य च ।
दासवर्गस्य तत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षते ॥ २४६ ॥
भोजन से बचा हुआ सब प्रकार का अन्न इकट्ठा करके जल से
गीला करे और ब्राह्मणों के आगे रक्खे और थोड़ासा कुशों पर
छींट देवे । यह कुशों पर बिखेरा और जूॅठा बचा अन्न बिना सं-
स्कार मृत बालक, त्यागी और कुलस्त्रियों का माना जाता है।
श्राद्ध में भूमि पर पड़ा जूॅठा अन्न सीधे सरल स्वभाव दासों का
भाग है ॥ २४४-२४६ ॥
आसपिण्डक्रियाकर्म द्विजातेः संस्थितस्य तु ।
अद्दैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥ २४७ ॥
स ह पिण्डक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः ।
अनयैवावृता कार्यं पिण्डनिर्वपणं सुतैः ॥ २४८ ॥
⸱तीसरा अध्याय । १०७
⸱तीसरा अध्याय । १०७
श्राद्धं भुक्त्वा य उच्छिष्टं वृषलाय प्रयच्छति ।
स मूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक्शिराः ॥ २४६ ॥
श्राद्धभुग्वृषलीतल्पं तदहर्योऽधिगच्छति ।
तस्याः पुरीषे तन्मासं पितरस्तस्य शेरते ॥ २५० ॥
द्विजातियों का जबतक सपिण्डीकरण न हो, तबतक उसका
श्राद्ध वैश्वदेवरहित करे और उसमें एक ब्राह्मण को भोजन और
एक पिण्ड देना चाहिए । मृत पुरुष का सपिण्डीकरण होजाने पर
अमावास्या की श्राद्धविधि के अनुसार ही पुत्रों को पिण्डदान
करना चाहिए । भोजन के बाद बचा जूॅठा अन्न जो शूद्र को देता
है, वह मूर्ख नीचे शिर होकर कालसूत्र नरक को जाता है । जो
श्राद्ध में भोजन करके उस दिन रात में स्त्रीसंग करता है, उसके
पितर एक मासतक उसी स्त्री की विष्ठा में सोते हैं ॥ २४७-२५० ॥
पृष्ट्वा स्वदितमित्येवं तृप्तानाचामयेत्ततः ।
आचान्तांश्चानुजानीयादभितो रम्यतामिति ॥ २५१ ॥
स्वधास्त्वित्येव तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम् ।
स्वधाकारः परा ह्याशीः सर्वेषु पितृकर्मसु ॥ २५२ ॥
ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत् ।
यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्ततो द्विजैः ॥ २५३ ॥
तृप्त हुए ब्राह्मणों से 'स्वदितम्' आपने खूब भोजन किया ?
ऐसा पूंछे, फिर आचमन कराकर 'अभितो रम्यताम्' इच्छानु-
सार पधारिए, यों कहकर विदा करे । उसके बाद ब्राह्मण
'स्वधास्तु' ऐसा कहें, क्योंकि सब पितृकर्मों में यह कहना परम
आशीर्वाद मानाजाता है। भोजन किए ब्राह्मणों से जो अन्न बचा
हो उसको निवेदन करे और उन लोगों की आज्ञानुसार उसकी
व्यवस्था करे ॥ २५१-२५३ ॥
अपराह्णं तथा दर्भा वास्तुसंपादनं तिलाः ।
१०८ मनुस्मृति ।
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाच्यं गोष्ठे तु सुश्रुतम् ।
संपन्नमित्यभ्युदये दैवे रुचितमित्यपि ॥ २५४ ॥
अपराह्णं तथा दर्भा वास्तुसंपादनं तिलाः ।
सृष्टिर्मृष्टिर्द्विजाश्चाग्र्याः श्राद्धकर्मसु संपदः ॥ २५५ ॥
दर्भाः पवित्रं पूर्वाह्णे हविष्याणि च सर्वशः ।
पवित्रं यच्च पूर्वोक्तं विज्ञेया हव्यसंपदः ॥ २५६ ॥
मुन्यन्नानि पयः सोमो मांसं यच्चानुपस्कृतम् ।
अक्षारलवणं चैव प्रकृत्या हविरुच्यते ॥ २५७ ॥
माता पिताके एकोद्दिष्ट और पार्वणश्राद्ध में ' 'स्वदितम्'
'गोष्ठीश्राद्ध में 'सुश्रुतम्' वृद्धिश्राद्ध में 'सम्पन्नम्' और देवकर्म
में 'रुचितम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणों से उनकी तृप्ति को पूंछ लेवे ।
अपराह्न काल, कुश, गोबर से लिपी भूमि, तिल, निःसंकोच
भोजन देना, भोजन का स्वाद और पंक्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध
कर्म में उत्तम गिना जाता है। कुश, वेदमंत्र, पूर्वाह्न काल, हवि का
अन्न और पूर्वोक्त भूमि आदि की पवित्रता, ये सब देवकर्म की
सम्पत्ति हैं। मुनियों का अन्न-नीवार आदि, दूध, सोमलता का
रस, कच्चा मांस, सैंधानमक, ये सब पदार्थ स्वभाव से ही हवि
कहलाते हैं ॥ २५४-२५७ ॥
विसृज्य ब्राह्मणांस्तांस्तु नियतो वाग्यतः शुचिः ।
दक्षिणांदिशमाकाङ्क्षन्याचेतेमान्वरान्पितॄन्॥ २५८॥
दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां वेदाः संततिरेव च ।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद्बहु देयं च नोऽस्त्विति॥२५६॥
एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डांस्तांस्तदनन्तरम् ।
गां विप्रमजमग्निं वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत्॥ २६० ॥
तीसरा अध्याय । १०६
तीसरा अध्याय । १०६
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों को विदा करके, सावधानी से स्नान
करे और दक्षिण दिशा को खड़ा होकर, पितरों से इन वरों को
मांगेः-हमारे कुल में दाता हों, वेदाभ्यास और सन्तान की वृद्धि
हो, वैदिक कर्म से श्रद्धा दूर न हो और सुपात्रों को देने के लिए
हमें बहुतसा धन मिले-इस प्रकार, श्राद्ध कर्म पूरा होने पर वह
पिण्ड गौ, ब्राह्मण या बकरा को खिलादे, अथवा अग्नि या जल में
डाल देवे ॥ २५८-२६० ॥
पिण्डनिर्वपणं केचित्पुरस्तादेव कुर्वते ।
वयोभिः खादयन्त्यन्ये प्रक्षिपन्त्यनलेऽप्सु वा ॥ २६१ ॥
पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा ।
मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात्सम्यक् सुतार्थिनी ॥ २६२ ॥
आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् ।
धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ॥ २६३ ॥
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातिप्रायं प्रकल्पयेत् ।
ज्ञातिभ्यः सत्कृतं दत्त्वा बान्धवानपि भोजयेत् ॥ २६४ ॥
कोई आचार्य ब्राह्मण भोजन के पहलेही पिण्डनिर्वपण कराते
हैं, कोई पिण्ड पक्षियों को खिलाते हैं, कोई जल वा अग्नि में छोड़
देते हैं। पतिव्रता स्त्री पुत्र की इच्छा से उन पिण्डों में से पितामह
के मध्यम पिण्ड को खा लेय । वह स्त्री आयुष्मान्, यशस्वी, बुद्धि-
मान्, धनवान्, सन्तानवान्, सत्यगुणी और धार्मिक पुत्र को पैदा
करती है। फिर दोनों हाथ धोकर, बचा हुआ अन्न अपने जाति
वालों को और दूसरे सम्बन्धियों को भी खिलावे ॥ २६१-२६४ ॥
उच्छेषणं तु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्रा विसर्जिताः ।
ततो गृहबलिं कुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ २६५ ॥
हविर्यच्चिररात्राय यच्चानन्त्याय कल्प्यते ।
पितृभ्यो विधिवद्दत्तं तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २६६ ॥
११० मनुस्मृति ।
तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा ।
दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत् पितरो नृणाम् ॥ २६७॥
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै ॥ २६८ ॥
षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै ।
अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ २६६ ॥
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।
शशकूर्म्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ २७० ॥
संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च ।
वार्घ्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ २७१ ॥
ब्राह्मणों को विदा करके उस स्थान से जूठ उठाकर, फिर
वैश्वदेव और भूतबलि आदि करे-यह धर्मव्यवस्था है। पितरों को
विधि से हवि देने से जो चिरकालतक अक्षय तृप्ति होती है वह इस
प्रकार है-तिल, धान्य, यव, उड़द, जल, मूल और फल विधिपूर्वक
पितरों को देने से, एक मास तक तृप्ति होती है। मछली और मांस
से दो मास, हरिण के मांस से तीन मास, मेंढा के मांस से चार
और भक्ष्य पक्षियों के मांस से पांच मास तक तृप्ति होती है।
बकरा के मांस से छः मास, चित्रमृग के मांस से सात मास, मृग
से आठ मास और रुरु मृग से नव मास तक तृप्ति होती है।
शूकर और महिष के मांस से दश मास, खरगोश और कछुआ
से ग्यारह मास तक तृप्ति होती है। गौके दूध वा उसकी खीर
से साल भर और लम्बे कान और नाकवाले बूढ़े बकरे के मांस
से बारह वर्ष तक तृप्ति होती है ॥ २६५-२७१ ॥
कालशाकं महाशल्काः खड्गलोहामिषं मधु ।
आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥२७२॥
तीसरा अध्याय। १११
तीसरा अध्याय। १११
यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात्तु त्रयोदशीम् ।
तदप्यक्षयमेव स्याद्वर्षासु च मघासु च॥ २७३ ॥
अपि नः स कुले जायाद्यो नो दद्यात् त्रयोदशीम् ।
पायसं मधुसर्पिभ्यां प्राक्छाये कुञ्जरस्य च॥ २७४ ॥
यद्यद्ददाति विधिवत् सम्यक्श्रद्धासमन्वितः ।
तत्तत्पितॄणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ॥ २७५ ॥
कालाशाक, महाशल्क-मछली का भेद, गेंडा, लाल बकरा, शहद
और सब प्रकार के मुनिअन्नों से, अनन्त वर्षों तक पितर तृप्त
रहते हैं। वर्षार्ऋतु, मघानक्षत्र और त्रयोदशी तिथिको कोई भी
पदार्थ मधु मिलाकर पितरों के निमित्त देने से, उनको अक्षय तृप्ति
होती है। पितर आशा करते हैं-हमारे कुल में कोई ऐसा हो जो
त्रयोदशी को या हाथी की छाया पूर्व दिशा में पड़े ऐसे समय,
घी, मधु से मिले हुए पायस-खीर से, हमको तृप्त करें। भक्ति
और श्रद्धा से विधिपूर्वक जो कुछ पितरों को दिया जाता है,
उसका अनन्त फल उनको परलोक में पहुँचता है ॥ २७२-२७५ ॥
कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् ।
श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैमा न तथेतराः ॥ २७६ ॥
युक्षु कुर्वन् दिनर्क्षेषु सर्वान् कामान् समश्नुते ।
अयुक्षु तु पितृन्सर्वान् प्रजां प्राप्नोति पुष्कलाम् ॥२७७॥
यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते ।
तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ २७८ ॥
चतुर्दशी को छोड़कर, कृष्णपक्ष की दशमी से अमावास्या तक
की तिथि पितृकार्य के लिए जैसी पवित्र है वैसी दूसरी नहीं है।
समतिथि और समनक्षत्रों में (जैसा द्वितीया, चतुर्थी, भरणी,
११२ मनुस्मृति ।
रोहिणी ) श्राद्ध करने से, सब कामना पूरी होती हैं। और विषम
तिथि, नक्षत्रों में (प्रतिपदा, तृतीया, अश्विनी, कृत्तिका आदि)
श्राद्ध करने से, बहुत सन्तान होती है। जैसे, शुक्लपक्ष से कृष्णपक्ष
श्राद्ध में श्रेष्ठ माना जाता है, वैसेही पूर्वाह्न से अपराह्न-दोपहर बाद,
काल उत्तम गिना जाता है ॥ २७६-२७८ ॥
प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा ।
पित्र्यमानिधनात्कार्यं विधिवद्दर्भपाणिना ॥ २७९ ॥
रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा ।
सन्ध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते ॥ २८० ॥
अनेन विधिना श्राद्धं त्रिरब्दस्येह निर्वपेत् ।
हेमन्तग्रीष्मवर्षासु पाञ्चयज्ञिकमन्वहम् ॥ २८१ ॥
हाथ में कुश लेकर, शास्त्रविधि से मृत्यु तक श्राद्ध किया
करे। रात्रि में श्राद्ध न करे, क्योंकि वह राक्षसी समय है। और
सूर्योदय, सूर्यास्त समय और सूर्योदय के कुछ काल बाद भी श्राद्ध
न करना चाहिए। इस विधि के अनुसार, गृहस्थ यदि प्रतिमास
श्राद्ध न करसके तो वर्ष में, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षार्ऋतु में श्राद्ध
और नित्य पञ्चमहायज्ञ करे ॥ २७९-२८१ ॥
न पैतृयज्ञियो होमो लौकिकेऽग्नौ विधीयते ।
न दर्शेन विना श्राद्धमाहिताग्नेर्द्विजन्मनः ॥ २८२ ॥
यदेव तर्पयत्यद्भिः पितॄन् स्नात्वा द्विजोत्तमः ।
तेनैव कृत्स्नमाप्नोति पितृयज्ञक्रियाफलम् ॥ २८३ ॥
वसून् वदन्ति तु पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान् ।
प्रपितामहांस्तथादित्याञ्छुतिरेषा सनातनी ॥ २८४ ॥
विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं वामृतभोजनः ।
विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ २८५ ॥
तीसरा अध्याय। ११३
तीसरा अध्याय। ११३
एतद्वोऽभिहितं सर्वं विधानं पाञ्चयज्ञिकम् ।
द्विजातिमुख्यवृत्तीनां विधानं श्रूयतामिति ॥ २८६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
तृतीयोऽध्यायः ॥
पितृकर्म लौकिक अग्नि में न करना चाहिए। अग्निहोत्री अमा-
वास्या के सिवाय दूसरी तिथियों में श्राद्ध न करे तोभी कोई हानि
नहीं है। द्विज से न कुछ बन पड़े तो जल से पितृतर्पण करा
करे तोभी पितृयज्ञ का फल मिलता है। वेद में पिता को वसु,
पितामह को रुद्र और प्रपितामह को आदित्य कहते हैं। समर्थ
पुरुष, नित्य विघस या अमृत का भोजन किया करे। श्राद्ध में
ब्राह्मणभोजन से बचा अन्न विघस और वैश्वदेव आदि यज्ञशेष
अमृत कहलाता है। यह पञ्चमहायज्ञ की सब विधि तुमसे कही
है, अब द्विजों में मुख्य ब्राह्मण की वृत्ति का विषय सुनो ॥ २८२-२८६॥
तीसरा अध्याय समाप्त ।
अथ चतुर्थोऽध्यायः ।
चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाद्यं गुरौ द्विजः ।
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ १ ॥
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ॥ २ ॥
यात्रामानप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः ।
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय ।
गृहस्थाश्रम-धर्म ।
द्विज अपने जीवन का चतुर्थांश गुरुकुल में, विद्याभ्यास में
बितावे और दूसरे चतुर्थांश में विवाह करके गृहस्थाश्रम में रहे।
आपत्तिकाल में किसीको कुछ दुःख देकर भी और समय में किसी
को कष्ट न देकर जो निर्वाह के लिए जीविका बनपड़े उसको करना
चाहिए। अपने और परिवार के पालन के लिए कोई खराब काम
न करना चाहिए। शरीर को दुःख न देकर धन उपार्जन करना
चाहिए ॥ १-३ ॥
ऋतानृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा ।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥ ४ ॥
ऋतमुञ्छशिलं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम् ।
मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ ५ ॥
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते ।
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
चौथा अध्याय । ११५
चौथा अध्याय । ११५
ब्राह्मण को ऋत से, अमृत से, मृत से और प्रमृत से या सत्य और
अनृत से जीविका करनी चाहिए। लेकिन श्ववृत्ति-नौकरी-गुलामी
से निर्वाह न करना चाहिए। उञ्छ और शिल को ऋत, बिना मांगे
मिलाहुआ अमृत, मांगी हुई भिक्षा मृत और खेती को प्रमृत कहते
हैं। सत्यानृत-सच-झूठ वाणिज्य-व्यापार को कहते हैं, उससे भी
जीविका चलाना श्रेष्ठ है। श्ववृत्ति-अर्थात् कुत्ता की वृत्ति-सेवा
को कहते हैं, इसलिए उसको छोड़ देना चाहिए ॥ ४-६ ॥
कुशूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा ।
त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥ ७ ॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् ।
ज्यायान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥ ८ ॥
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते ।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ॥ ६ ॥
ब्राह्मण इतना अन्न संग्रह करे जिसमें कोठी भरजाय, या छोटी
कोठरी भरजाने भरका अन्न संग्रह करे, या तीन दिन के गुज़र
लायक अथवा एकही दिन के प्रयोजन भरको इकट्ठा रक्खे। इन
चारों प्रकार के संग्रह को करनेवालों में अगला अगला ब्राह्मण श्रेष्ठ
माना जाता है और वह धर्म से स्वर्गफल को जीतनेवाला होता
है। इन चार प्रकार के गृहस्थों में ऋत आदि छ प्रकार की वृत्ति
से निर्वाह करना बड़े गृहस्थ के लिए है। जो साधारण कुटुम्ब
रखते हैं, वे यज्ञ कराना, वेदपढ़ाना और दान लेना इन तीन प्रकार
की जीविकाओं से निर्वाह करें। प्रतिग्रह-दान लेना जो नहीं
चाहते, उनको याजन और अध्यापन इन दो वृत्तियों से और चौथा
केवल वेद पढ़ाकर एकही वृत्ति से निर्वाह करना चाहिए ॥ ७-६ ॥
वर्तयंश्च शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः ।
इष्टीः पार्व्वायनान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा ॥ १० ॥
११६ मनुस्मृति ।
न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन ।
अजिह्यामशठां शुद्धां जीवेद्ब्राह्मणजीविकाम् ॥ ११॥
सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् ।
सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥ १२ ॥
अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः ।
स्वर्ग्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत् ॥ १३ ॥
जो ब्राह्मण उञ्छवृत्ति से जीविका चलाता हो उसको सदा
अग्निहोत्र में तत्पर रहना चाहिए। और अमा, पूर्णा की इष्टि
आदि सहज यज्ञ करना चाहिए। जीविका के लिए दुनियादारी में
ज्यादा न फँसना चाहिए अर्थात् झूठी बड़ाई खुशामद वगैरह न करे,
किन्तु शुद्ध, निष्कपट बर्ताव रक्खे और बनियों की नौकरी न करके
पवित्र ब्राह्मण के सम्बन्ध में जीविका करनी चाहिए। सुख चाहने
वालों को चाहिए कि सन्तोषवृत्तिको रखकर जो मिले उसीमें
निर्वाह करे अधिक माया में न फँसे–सन्तोष सुखका मूल और
असन्तोष दुःखका मूल है। इसलिए ऊपर कही किसी एक जीविका
के सहारे सुख से काल बितावे और आगे कहे हुए व्रतों का
पालन किया करे ॥ १०–१३ ॥
वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।
तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १४ ॥
नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा ।
न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः ॥ १५ ॥
इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः ।
अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा संनिवर्तयेत् ॥ १६ ॥
ब्राह्मण को अपने वेदोक्त कर्मका आचरण नित्य निरालस होकर
करना चाहिए। उसको भरशक करने से परमगति को पुरुष प्राप्त
चौथा अध्याय । ११७
चौथा अध्याय । ११७
होता है। ब्राह्मण को गाना, बजाना और शास्त्र के खिलाफ़ कर्म
करके दुःख के समय में भी धन पाने का उद्यम न करना चाहिए।
इन्द्रियों के विषय शब्द-स्पर्श आदि में कामना से न लगना चाहिए
वरन् इन सब बातों से मनको रोकना चाहिए ॥ १४-१६ ॥
सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ।
यथा तथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १७ ॥
वयसःकर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च ।
वेषवाग्बुद्धिसारूप्यमाचरन् विचरेदिह ॥ १८ ॥
बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च ।
नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ॥ १९ ॥
जिन कामों को करने से अपने स्वाध्याय में बाधा पड़े उन सब
को छोड़ देना उचित है। किसी क़दर स्वाध्याय में लगा रहने से
ही ब्राह्मण की कृतार्थता है। गृहस्थ ब्राह्मण को अपनी आयु, कर्म,
धन-विद्या और कुल के अनुसार वेष-पहनाव, वाणी और बुद्धि से
काम लेता हुआ इस संसार में बर्ताव करना चाहिए। बुद्धि को
शीघ्र ही बढ़ानेवाले आगम और विविध भांतिके शास्त्रों का अध्य-
यन नित्य करना चाहिए। उनके देखने से हित अनहित बातों का
पूरा ज्ञान होता है ॥ १७-१९ ॥
यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति ।
तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥ २० ॥
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥ २१ ॥
एतानेके महायज्ञान् यज्ञशास्त्रविदो जनाः ।
अनीहमानाः सततमिन्द्रियेष्वेव जुह्वति ॥ २२ ॥
११८ मनुस्मृति।
वाच्येके जुह्वति प्राणं प्राणे वाचं च सर्वदा।
वाचि प्राणे च पश्यन्तो यज्ञनिर्वृत्तिमक्षयाम् ॥ २३ ॥
ज्ञानेनैवापरे विप्रा यजन्त्येतैर्मखैः सदा।
ज्ञानमूलां क्रियामिषां पश्यन्तो ज्ञानचक्षुषा ॥ २४ ॥
पुरुष जैसे जैसे शास्त्रको देखता जाता है वैसे वैसे उसको ज्ञान
होता है और उसकी प्रीति बढ़ती है। स्नातक ब्राह्मण को, वेदाध्ययन,
होम, भूतबलि, अतिथिसत्कार और श्राद्ध जहांतक होसके छोड़ना
न चाहिए। बहुत से यज्ञविषय के ज्ञाता पुरुष इन पाँच महायज्ञों को
न करके इन्द्रियों को ही अग्निरूप मानकर उसीमें विषयों का
होम करते हैं अर्थात् इन्द्रियों के बाहरी विषयों को अपने वश में
करने का उपाय किया करते हैं । कितने ही ज्ञानी पुरुष वाणी
का प्राण में और प्राण में वाणी का लय करते हैं। दूसरे लोग
ज्ञानयज्ञ से ही सब यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं क्योंकि ज्ञानही
सब यज्ञों का मूल है ॥ २०--२४ ॥
अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते द्युनिशोःसदा।
दर्शेन चार्धमासान्ते पौर्णमासेन चैव हि ॥ २५ ॥
सस्यान्ते नवसस्येष्ट्या तथर्त्वन्ते द्विजोऽध्वरैः।
पशुना त्वयनस्यादौ समान्ते सौमिकैर्मखैः ॥ २६ ॥
प्रातःकाल और सायंकाल में अग्निहोत्र, अमावास्या को दर्श-
नामक यज्ञ और पूर्णिमा को पौर्णमासयज्ञ ज़रूर करना चाहिए।
पहला अन्न हो चुके और नया अन्न पैदा हो तब शरद् ऋतु में
नवीन अन्न से इष्टि करे और प्रत्येक ऋतु के अन्त में चातुर्मास
यज्ञ करे, उत्तरायण-दक्षिणायन के आरम्भ में पशुयाग और वर्ष
पूरा होने पर वसन्तऋतु में सोमयाग को करना चाहिए ॥२५-२६॥
तानिष्ट्वा नवसस्येष्ट्या पशुना चाग्निमान् द्विजः।
नवान्नमद्यान्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥ २७ ॥
चौथा अध्याय । ११६
चौथा अध्याय । ११६
नवेमानर्चिता ह्यस्य पशुहव्येन चाग्नयः ।
प्राणानेवात्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगार्द्धितः ॥ २८ ॥
आसनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा ।
नास्य कश्चिद्वसेद्गेहे शक्तितोऽनर्चितोऽतिथिः ॥२९॥
पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान् ।
हैतुकान् बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ ३० ॥
वेदविद्याव्रतस्नातान् श्रोत्रियान् गृहमेधिनः ।
पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत् ॥ ३१ ॥
नवीन अन्न से इष्टि करके नया अन्न और पशुयाग करके मांस
खाने से दीर्घायु होती है। यदि नवीन अन्न और मांस से यज्ञ
किये विना कोई नया अन्न और मांस खाता है उसकी प्रजा को ही
अग्निदेव खाने की इच्छा करते हैं। गृहस्थ के यहां आसन, भोजन,
शय्या, जल, फल और फूल से यथाशक्ति अतिथि का सत्कार
ज़रूर होना चाहिए इसके बिना वह न रहने पावे। वेद के ख़िलाफ़
आचरण करनेवाले पाखण्डी, आश्रम के विरुद्ध वृत्ति से जीविका
करनेवाले, दम्भ से वैडालव्रत-बिल्ली के भांति मौन साधनेवाले
शठ, कुतर्की और वगलाभक्त इन सब कपटियों का ज़बान से भी
सत्कार गृहस्थ को न करना चाहिए ॥ २७-३१ ॥
शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना ।
संविभागश्च भूतेभ्यः कर्त्तव्योऽनुपरोधतः ॥ ३२ ॥
राजतो धनमन्विच्छेत् संसीदन् स्नातकः क्षुधा ।
याज्यान्तेवासिनोर्वापि नत्वन्यत इति स्थितिः॥ ३३ ॥
विद्यास्नातक, व्रतस्नातक और विद्याव्रतस्नातक इन तीन
प्रकार के श्रोत्रिय गृहस्थों का देव-पितृकर्म में सत्कार करना
चाहिए। जो ऐसे न हों उनको पूछना न चाहिए। गृहस्थ को
१२० मनुस्मृति ।
चाहिए, अपने हाथ से भोजन न बनानेवाले ब्रह्मचारी-संन्यासी
को पक्वान्न आदि देवे और जहां तक होसके जड़-चेतन सब
प्राणियों को अन्न, जल से आदर करे । स्नातक गृहस्थ यदि
भोजन के लिए दुःखी हो तो वह क्षत्रिय राजा, यजमान और
शिष्य से धन लेने की इच्छा करे, परन्तु पतित-अधर्मियों से कभी
न लेय, यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है ॥ ३२-३३ ॥
न सीदेत् स्नातको विप्रः क्षुधाशक्तः कथंचन ।
न जीर्णमलवासा भवेच्च विभवे सति ॥ ३४ ॥
कॢप्तकेशनखश्मश्रुर्दान्तः शुक्लाम्बरः शुचिः ।
स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यमात्महिते रतः ॥ ३५ ॥
वैणवीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् ।
यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले ॥ ३६ ॥
स्नातक ब्राह्मण को किसी प्रकार भी क्षुधा से पीड़ित न रहना
चाहिए । यदि धन न हो तो पुराने और मैले कपड़ों को भी न
पहने । केश, नख और दाढ़ी को कटवाया करे, सफेद वस्त्र पहने
और पवित्र होकर रहा करे । अपने स्वाध्याय में लगा रहे और
अपनी शरीररक्षा के लिए उपाय किया करे । बांस की लकड़ी,
जलपूर्ण कमण्डलु, यज्ञोपवीत, वेदपुस्तक और सोने के सुन्दर
कुण्डल को धारण करे ॥ ३४-३६ ॥
नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन ।
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ॥ ३७ ॥
न लङ्घयेद्वत्सन्त्रीं न प्रधावेच्च वर्षति ।
न चोदके निरीक्षेत स्वं रूपमिति धारणा ॥ ३८ ॥
मृदं गां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम् ।
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन् ॥ ३६ ॥
चौथा अध्याय । १२१
चौथा अध्याय । १२१
नोपगच्छेत् प्रमत्तोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने ।
समानशयने चैव न शयीत तया सह ॥ ४० ॥
उदय और अस्त होतेहुए सूर्य को जानकर कभी न देखना
चाहिए । और ग्रहणसमय में, जल में और दोपहर में भी न
देखना चाहिए। बछड़ा बांधने की रस्सी को लांघना न चाहिए,
वर्षा होते समय रास्ते में दौड़ना और जल में अपना मुख देखना
न चाहिए। यह धर्मशास्त्र की आज्ञा है। मिट्टी का टीला, गौ,
देवमूर्ति, ब्राह्मण, घी, शहद, चौराहा और वट, पीपल वगैरह वृक्ष,
मार्ग में जातेहुए देख पड़ें तो उनको दाहिनी तरफ़ करके जाना
चाहिए। कामातुर पुरुष को भी रजस्वला स्त्री के साथ भोग न
करना चाहिए और न एक शय्या पर सोना ही चाहिए ॥ ३७-४०॥
रजसाभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छतः ।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते ॥ ४१ ॥
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम् ।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते ॥ ४२ ॥
नाश्नीयाद्भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम् ।
क्षुवतीं जृम्भमाणां वा न चासीनां यथासुखम् ॥४३॥
नाञ्जयन्तीं स्वके नेत्रे न चाभ्यक्तामनावृताम् ।
न पश्येत्प्रसवन्तीं च तेजस्कामो द्विजोत्तमः ॥ ४४ ॥
जो पुरुष रजस्वला स्त्री के साथ भोग करता है उसकी बुद्धि,
तेज, बल, नेत्र और आयु नष्ट होती है। जो उससे बचा रहता है
उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र और आयु बढ़ते हैं। स्त्री और पुरुष
साथ बैठकर भोजन न करें। स्त्री को भोजन करती, छींकती,
जंभाई लेती और मनमानी बैठी हुई कभी न देखना चाहिए।
अंजन लगाती, तैल मलती, नंगी और बालक पैदा होता हो तो
उस समय भी न देखे ॥ ४१-४४ ॥
१६
१२२ मनुस्मृति ।
नान्नमद्यादेकवासा न नग्नः स्नानमाचरेत् ।
न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोव्रजे ॥ ४५ ॥
न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते ।
न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन ॥ ४६ ॥
न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्नपि च स्थितः ।
न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ॥ ४७ ॥
गृहस्थ को एक वस्त्र से भोजन, नंगा होकर स्नान, मार्ग में,
राख के ढेर पर और गोशाला में पेशाब न करना चाहिए ।
हल से जोती जमीन में, जल में, चिता में, पर्वत में, पुराने देव-
मन्दिर में और बामी पर पेशाब कभी न करना चाहिए। जीवजन्तु
वाले गढों में, चलतेहुए, खड़ा होकर, नदी के किनारे पर और
पहाड़ की चोटी पर पेशाब न करना चाहिए ॥ ४५-४७ ॥
वाय्वग्निविप्रमादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः ।
न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ४८ ॥
तिरस्कृत्योच्चरेत्काष्ठलोष्ठपत्रतृणादिना ।
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठितः ॥ ४९ ॥
मूत्रोच्चारसमुत्सर्गं दिवा कुर्यादुदङ्मुखः ।
दक्षिणाभिमुखो रात्रौ सन्ध्ययोश्च यथा दिवा ॥ ५० ॥
छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः ।
यथा सुखमुखः कुर्यात्प्राणबाधाभयेषु च ॥ ५१ ॥
वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जल और गौ को सामने देखकर
कभी मल-मूत्र का त्याग न करना चाहिए। शरीर और शिर को
वस्त्र से ढँककर, मौन होकर, लकड़ी, ढेला, वृक्ष का गिरा पत्ता
या तिनका से भूमि को ढककर मल-मूत्र त्याग करने को बैठना
चौथा अध्याय । १२३
चौथा अध्याय । १२३
चाहिए। दिन में उत्तर दिशा और रात में दक्षिण दिशा को मुख
करके मल-मूत्र करना चाहिए। दिन हो या रात हो, छांया में,
अंधेरा में या जहां प्राण का भय हो, तब जिस दिशा में इच्छा हो
उसी तरफ़ मुख कर सकता है ॥ ४८-५१ ॥
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यं वा प्रतिसोमोदकद्विजान् ।
प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ॥ ५२ ॥
नाग्निं मुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत च स्त्रियम् ।
नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत् ॥ ५३ ॥
अधस्तान्नोपद्ध्याच्च न चैनमभिलङ्घयेत् ।
न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणाबाधमाचरेत् ॥ ५४ ॥
जो गृहस्थ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, ब्राह्मण, गौ और वायु
के संमुख होकर मल-मूत्र करता है, उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है।
अग्नि को मुख से फूँकना और नंगी स्त्री को देखना अनुचित है।
अग्नि में कोई अपवित्र चीज़ डालना और पैर के तलवा को उसमें
सेंकना न चाहिए। खाट के नीचे आग रखना, उसको उलांघ
कर जाना और पैर के नीचे दबाना न चाहिए। जिसमें प्राणबाधा
का भय हो ऐसा परिश्रम न करना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥
नाश्नीयात्सन्धिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत् ।
न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोपहरेत् स्रजम् ॥ ५५ ॥
नाप्सु मूत्रं पुरीषं वा ष्ठीवनं वा समुत्सृजेत् ।
अमेध्यलिप्तमन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा ॥ ५६ ॥
नैकः स्वपेच्छून्यगेहे शयानं न प्रबोधयेत् ।
नोदक्ययाभिभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः ॥ ५७ ॥
सायंकाल और प्रातःकाल भोजन, एक गाँव से दूसरे गाँव को
जाना और सोना न चाहिए। ज़मीन नख से लिखना और गले
१२४ मनुस्मृति।
में से खुदही अपनी माला निकालना न चाहिए। मूत्र, मल, थूक,
जिस वस्तु में अपवित्र कुछ लगा हो और ज़हर इन सब को जल
में न डालना चाहिए। सूने घर में अकेला सोना, अपने से बड़े
को उपदेश देना, रजस्वला स्त्री से बातचीत करना और बिना
निमन्त्रण यज्ञ में जाना यह सब अनुचित है॥ ५५-५७॥
अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च सन्निधौ ।
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥
नावारयेद् गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्।
न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद्बुधः ॥ ५६ ॥
नाधार्मिके वसेद्ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् ।
नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥ ६० ॥
न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते ।
न पाखण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥ ६१ ॥
अग्निस्थान, गोशाला, ब्राह्मण के पास, स्वाध्याय के समय और
भोजन के समय दाहना हाथ बाहर करलेना चाहिए। बच्चे को
दूध पिलाती गौ को देखकर उसको हटाना नहीं और न किसी
से कहना। और आकाश में इन्द्रधनुष् देखकर किसीको दिखाना
न चाहिए। जहां अधर्मी रहते हों ऐसे ग्राम में और जहां रोग फैला
हो, उसमें न रहना। अकेला दूरदेश की यात्रा न करे और पर्वत के
ऊपर बहुत दिनतक निवास न करना चाहिए शूद्रके राज्य में बसना
न चाहिए और अधर्मी, पाखण्डी तथा चाण्डाल सेवित ग्राम आदि
में न रहना चाहिए ॥ ५८-६१ ॥
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् ।
नातिप्रगे नातिसायं न सायं प्रातराशितः ॥ ६२ ॥
न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्यञ्जलिना पिवेत्।