मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२० मनुस्मृति ।
चाहिए, अपने हाथ से भोजन न बनानेवाले ब्रह्मचारी-संन्यासी
को पक्वान्न आदि देवे और जहां तक होसके जड़-चेतन सब
प्राणियों को अन्न, जल से आदर करे । स्नातक गृहस्थ यदि
भोजन के लिए दुःखी हो तो वह क्षत्रिय राजा, यजमान और
शिष्य से धन लेने की इच्छा करे, परन्तु पतित-अधर्मियों से कभी
न लेय, यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है ॥ ३२-३३ ॥
न सीदेत् स्नातको विप्रः क्षुधाशक्तः कथंचन ।
न जीर्णमलवासा भवेच्च विभवे सति ॥ ३४ ॥
कॢप्तकेशनखश्मश्रुर्दान्तः शुक्लाम्बरः शुचिः ।
स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यमात्महिते रतः ॥ ३५ ॥
वैणवीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् ।
यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले ॥ ३६ ॥
स्नातक ब्राह्मण को किसी प्रकार भी क्षुधा से पीड़ित न रहना
चाहिए । यदि धन न हो तो पुराने और मैले कपड़ों को भी न
पहने । केश, नख और दाढ़ी को कटवाया करे, सफेद वस्त्र पहने
और पवित्र होकर रहा करे । अपने स्वाध्याय में लगा रहे और
अपनी शरीररक्षा के लिए उपाय किया करे । बांस की लकड़ी,
जलपूर्ण कमण्डलु, यज्ञोपवीत, वेदपुस्तक और सोने के सुन्दर
कुण्डल को धारण करे ॥ ३४-३६ ॥
नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन ।
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ॥ ३७ ॥
न लङ्घयेद्वत्सन्त्रीं न प्रधावेच्च वर्षति ।
न चोदके निरीक्षेत स्वं रूपमिति धारणा ॥ ३८ ॥
मृदं गां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम् ।
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन् ॥ ३६ ॥