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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 649 में से

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पृष्ठ 263

चौथा अध्याय । १२३
चाहिए। दिन में उत्तर दिशा और रात में दक्षिण दिशा को मुख
करके मल-मूत्र करना चाहिए। दिन हो या रात हो, छांया में,
अंधेरा में या जहां प्राण का भय हो, तब जिस दिशा में इच्छा हो
उसी तरफ़ मुख कर सकता है ॥ ४८-५१ ॥
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यं वा प्रतिसोमोदकद्विजान् ।
प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ॥ ५२ ॥
नाग्निं मुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत च स्त्रियम् ।
नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत् ॥ ५३ ॥
अधस्तान्नोपद्ध्याच्च न चैनमभिलङ्घयेत् ।
न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणाबाधमाचरेत् ॥ ५४ ॥
जो गृहस्थ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, ब्राह्मण, गौ और वायु
के संमुख होकर मल-मूत्र करता है, उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है।
अग्नि को मुख से फूँकना और नंगी स्त्री को देखना अनुचित है।
अग्नि में कोई अपवित्र चीज़ डालना और पैर के तलवा को उसमें
सेंकना न चाहिए। खाट के नीचे आग रखना, उसको उलांघ
कर जाना और पैर के नीचे दबाना न चाहिए। जिसमें प्राणबाधा
का भय हो ऐसा परिश्रम न करना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥
नाश्नीयात्सन्धिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत् ।
न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोपहरेत् स्रजम् ॥ ५५ ॥
नाप्सु मूत्रं पुरीषं वा ष्ठीवनं वा समुत्सृजेत् ।
अमेध्यलिप्तमन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा ॥ ५६ ॥
नैकः स्वपेच्छून्यगेहे शयानं न प्रबोधयेत् ।
नोदक्ययाभिभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः ॥ ५७ ॥
सायंकाल और प्रातःकाल भोजन, एक गाँव से दूसरे गाँव को
जाना और सोना न चाहिए। ज़मीन नख से लिखना और गले