मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
८० मनुस्मृति ।
विश्वेदेव के निमित्त गृहाग्निमें द्विजोंको नित्य होमकरना चाहिए
वह आहुति पहले अग्नि और सोम को फिर दोनों को एक वार में,
फिर विश्वेदेवको उसके बाद धन्वन्तरिको देनी चाहिए*॥८४-८५॥
कुह्वै चैवानुमत्यै च प्रजापतय एव च ।
सहद्यावापृथिव्योश्च तथा स्विष्टकृतेऽन्ततः ॥ ८६ ॥
एवं सम्यग्घविर्हुत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ।
इन्द्रान्तकाप्यतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥८७॥
मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि ।
वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ॥ ८८ ॥
उच्छीर्षके श्रियै कुर्याद्भद्रकाल्यै च पादतः ।
ब्रह्मवास्तोष्पतिभ्यां तु वास्तुमध्ये बलिं हरेत् ॥ ८६ ॥
कुहू-अमावास्या, अनुमति-पूर्णिमा और प्रजापति को आहुति
दे । द्यावा और पृथिवी को साथ में दे और अन्त में स्विष्टकृत को
आहुति देना चाहिये । इस प्रकार, अच्छी विधि से होम करके सब
दिशाओं में प्रदक्षिणा करे । इन्द्र, यम, वरुण, चन्द्र और इनके
अनुचरों को बलि देय । घर के द्वार में मरुत को बलि देय, जल,
मूसल-ओखली और वनस्पति को बलि देय । वास्तु पुरुष के शिर
पर अर्थात् घर के ईशान कोण में-श्रियै नमः कह कर बलि देय ।
वास्तु के चरण में-भद्रकाल्यै नमः, मध्य में-घर के बीच में-ब्रह्म-
वास्तोष्पतीभ्यां नमः कहकर बलि देय ॥ ८६-८६ ॥
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो बलिमाकाश उत्क्षिपेत् ।
दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नक्तं चारिभ्य एव च ॥ ६० ॥
पृष्ठवास्तुनि कुर्वीत बलिं सर्वात्मभूतये ।
- इस प्रकार आहुति करने में यों बोलना-अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, अग्नी-
सोमाभ्यां स्वाहा, विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा ।
तीसरा अध्याय। ८१
तीसरा अध्याय। ८१
पितृभ्यो बलिशेषं तु सर्व दक्षिणतो हरेत् ॥ ९१ ॥
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् ।
वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥ ९२ ॥
विश्वेदेव के निमित्त आकाश में बलि देवे। दिन देवता और रात्रि
देवता को बलि देवे। घर के सब से ऊंचे भाग में 'सर्वात्मभूतये
नमः' कहकर बलि देवे और बलिशेष को 'पितृभ्यो नमः' कहकर
दक्षिण दिशा में पितरों को बलि देना चाहिए। कुत्ता, पतित,
चाण्डाल, कोढ़ी, पापी, रोगी, कौआ, कीड़ों को धीरे से ज़मीन में
ही बलि देना चाहिए ॥ ९०-९२ ॥
एवं यः सर्वभूतानि ब्राह्मणो नित्यमर्चति ।
स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्त्तिः पथर्जुना ॥ ९३ ॥
कृत्वैतद्बलिकर्मैवमतिथिं पूर्वमाशयेत् ।
भिक्षां च भिक्षवे दद्याद्विधिवद्ब्रह्मचारिणे ॥ ९४ ॥
यत्पुण्यफलमाप्नोति गां दत्त्वा विधिवद्गुरोः ।
तत्पुण्यफलमाप्नोति भिक्षां दत्त्वा द्विजो गृही ॥ ९५ ॥
भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ।
वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥ ९६ ॥
नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् ।
भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद्दत्तानि दातृभिः ॥ ९७ ॥
विद्यातपः समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु ।
निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैव किल्विषात् ॥ ९८ ॥
इस प्रकार जो गृहस्थ ब्राह्मण बलि देकर प्राणियों का सत्कार
करता है, वह तेजस्वी परमधाम को प्राप्त होता है। बलिकर्म के
बाद अतिथिसत्कार करे फिर संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा
दान करना चाहिए। गुरु को गोदान करने से जो पुण्य फल
११
८२ मनुस्मृति ।
मिलता है, वही संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा देने से मिलता
है। वेदविशारद ब्राह्मण का आदर करके भिक्षा वा एक जलपात्र
देवे। वेदपाठरहित, मूर्ख ब्राह्मण को अज्ञान से जो भोजन दान
दियाजाता है वह सब निष्फल होजाता है । विद्या और तपसे युक्त
ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में जो हवन-भोजन कराता है, वह महा-
दुःख और पापों से उबारता है ॥ ६३-६८ ॥
संप्राप्ताय त्वतिथये प्रदद्यादासनोदके ।
अन्नं चैव यथाशक्ति सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ६६ ॥
अतिथि-सत्कार ।
गृहस्थ को आये हुए अतिथि का आसन, जल और अन्नसे यथा-
शक्ति सत्कार करना चाहिए ॥ ६६ ॥
शिलानप्युञ्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः ।
सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ॥ १०० ॥
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १०१ ॥
एकरात्रं तु निवसंन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः ।
अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ १०२ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रं साङ्गतिकं तथा ।
उपस्थितं गृहे विद्याद्भार्या यत्राग्नयोऽपि वा ॥ १०३ ॥
जो उञ्छवृत्ति 'खेतों से अन्न बीनकर निर्वाह' करता हो और
पञ्चाग्नि में हवन करता हो वह भी यदि अतिथि का सत्कार न
करे तो अतिथि उसके सब पुण्य को ले लेता है । अन्न न हो तोभी
तृणासन, भूमि, जल और मीठी बात ये सत्पुरुषों के यहां सदा
रहते हैं। जो ब्राह्मण एक रात्रि गृहस्थ के यहां निवास करता है
उसको अतिथि कहते हैं । वह नित्य नहीं रहता इसी लिए अतिथि
कहाजाता है। एक गांव में रहनेवाला, हँसी, मज़ाक करके साथ
तीसरा अध्याय। ८३
तीसरा अध्याय। ८३
रखनेवाला स्त्री और अग्निहोत्री ब्राह्मण को अतिथि न मानना
चाहिए ॥ १००-१०३ ॥
उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः ।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम् ॥ १०४ ॥
अप्रणोद्योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिना ।
काले प्राप्तस्त्याकाले वा नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥१०५॥
न वै स्वयं तदश्नीयादतिथिं यन्न भोजयेत् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं वातिथिपूजनम् ॥ १०६॥
जो मूर्ख दूसरे के यहां खाने के लोभ से अतिथि बनता है,
वह मरकर अन्न देनेवाले का पशु होता है। जो गृहस्थ के घर
सूर्यास्त के बाद अतिथि आवे समय में या असमय में, तोभी
उसको भूखा न रक्खे। जो अतिथि को न खिलाया हो वह पदार्थ
खुद भी न खावे। अतिथि का सत्कार यश, आयु और स्वर्ग
देनेवाला है ॥ १०४-१०६ ॥
आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम् ।
उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीने हीनं समे समम् ॥ १०७॥
वैश्वदेवे तु निर्वृत्ते यद्यन्योऽतिथिराव्रजेत् ।
तस्याप्यन्नं यथाशक्ति प्रदद्यान्न बलिं हरेत् ॥ १०८ ॥
न भोजनार्थं स्वे विप्रः कुलगोत्रे निवेदयेत् ।
भोजनार्थं हि ते शंसन्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः ॥१०९॥
न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते ।
वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥ ११० ॥
यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत् ।
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ १११ ॥
८४ मनुस्मृति ।
शासन, स्थान, शय्या, सेना और अरदली में जाना, इन सबका
उत्तम अतिथि उत्तम, मध्यम को मध्यम और साधारण से उसके
लायक बर्ताव करना चाहिए । वैश्वदेव के बाद जो कोई अतिथि
आपड़े तो उसको भी भोजन बनाकर खिलावे, पाक में से बलि न
देवे । विप्र को भोजनार्थ अपना कुल, गोत्र न बतलाना चाहिए ।
यदि बतलावे तो वह, वान्ताशी 'उगलन खानेवाला' कहा जाता
है । ब्राह्मण के घर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अपना मित्र, जातीय पुरुष
और गुरु ये सब अतिथि नहीं माने जाते । अगर क्षत्रिय अतिथि
बनकर आवे तो ब्राह्मणभोजन के बाद उसको भी खूब खिला
देवे ॥ १०७-१११ ॥
वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ ।
भोजयेत्सह भृत्यैस्तावानृशंस्यं प्रयोजयन् ॥ ११२ ॥
इतरानपि सख्यादीन् संप्रीत्या गृहमागतान् ।
संस्कृत्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ ११३ ॥
सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीस्तथा ।
अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ ११४ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण के घर वैश्य, शूद्र भी अतिथि रूप से आजाय
तो उनको भी नौकरों के साथ खिला देना चाहिए । और भी
मित्र-सम्बन्धी आदि प्रेम से अपने घर आवें तो स्त्री के साथ
उनको भी अच्छा भोजन देना चाहिए । नवीन विवाहवाली,
कन्या, रोगी और गर्भवती इनको अतिथि के पहिले ही बिना विचार
किये भोजन करा देना चाहिए ॥ ११२-११४ ॥
अदत्त्वा तु य एतेभ्यः पूर्वं भुङ्क्ते विचक्षणः ।
स भुञ्जानो न जानाति श्वगृध्रैर्जग्धिमात्मनः॥११५॥
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि ।
भुञ्जीयातां ततः पश्चादवशिष्टं तु दम्पती ॥ ११६ ॥
तीसरा अध्याय। ८५
तीसरा अध्याय। ८५
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितॄन्गृह्याश्च देवताः ।
पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ॥११७॥
अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् ।
यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते ॥ ११८ ॥
इस प्रकार सबको भोजन दिये बिना जो पहले आपही खा
लेता है। मरने पर उसके मांस को कुत्ते और गीध खाते हैं ।
ब्राह्मण, अतिथि, सम्बन्धी आदि को खिलाकर पीछे बचा अन्न
आप और स्त्री खावे । देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर और घर के
पूज्य देवताओं का पूजन करके शेष अन्न गृहस्थ को खाना चा-
हिए । जो अपनेही लिए भोजन तैयार करता है वह केवल पाप
को ही खाता है, क्योंकि उत्तम पुरुषों को पञ्च महायज्ञ से बचे
अन्न काही भोजन फलदायक होता है ॥ ११५-११८ ॥
राजर्त्विक्स्नातकगुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् ।
अर्हयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरात्पुनः ॥ ११९ ॥
राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ ।
मधुपर्केण संपूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ १२० ॥
सायं त्वन्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत् ।
वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातर्विधीयते ॥ १२१ ॥
राजा, ऋत्विक्, स्नातक, गुरु, मित्र, जामाता, प्रिय पुरुष और
श्वशुर, मामा, एक साल के बीतने पर घर आवें तो मधुपर्क से
पूजन करना चाहिए। राजा और वेदज्ञ ब्राह्मण साल के भीतर भी
यदि यज्ञ के मौक़े पर आजांयें तो मधुपर्क से पूजन करना चाहिए।
अगर यज्ञमें न आवें तो न पूजन करे। स्त्री को शाम को पकाये अन्न
में से बिना मन्त्र पढ़े ही बलि देना चाहिए । इस बलि को
वैश्वदेव कहते हैं । यह सायंकाल और प्रातःकाल करना
चाहिए ॥ ११९-१२१ ॥
८६ मनुस्मृति ।
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चेन्दुक्षयेऽग्निमान् ।
पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम्॥१२२॥
पितॄणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः ।
तच्चामिषेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः ॥ १२३ ॥
तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ।
यावन्तश्चैव यैश्चान्नैस्तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥१२४॥
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनैकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ १२५ ॥
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः ।
पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ १२६ ॥
श्राद्ध-प्रकरण ।
अग्निहोत्री द्विज अमावास्या को पितृयज्ञ पूरी करके प्रतिमास
पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध को करे । पितरों का हर मास में जो श्राद्ध
होता है उसको अन्वाहार्यक श्राद्ध कहते हैं । वह उत्तम मांस से
करना चाहिए । उसमें जो ब्राह्मण ग्राह्य हैं और जो त्याज्य हैं
जितने भोजन कराने चाहिएं और जो अन्न चाहिए उसका विस्तार
इस प्रकार है—
देवकर्म में दो ब्राह्मण और पितृकर्म में तीन ब्राह्मण या दोनों में
एक एक ही भोजन कराना चाहिए । धनी पुरुष भी अधिक
ब्राह्मणों के भोजन में न लगे । विस्तार करने से ब्राह्मणों का
सत्कार, देश, काल, पवित्रता और श्रेष्ठ ब्राह्मण इन पाँचों को नष्ट
करता है। इसलिए ज्यादा फैलाव कभी न करना चाहिए।१२२-१२६॥
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये ।
तस्मिन्युक्तस्यैति नित्यं प्रेतकृत्यैव लौकिकी ॥ १२७ ॥
श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः ।
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम् ॥ १२८ ॥
तीसरा अध्याय। ८७
तीसरा अध्याय। ८७
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्ये च भोजयेत् ।
पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान्बहूनपि ॥ १२६ ॥
अमावास्या के प्रेतकर्म को पितृकर्म कहते हैं। उसको जो करता
है वह नित्य लौकिक फल को पाता है। वेदपाठी, सदाचारी,
ब्राह्मण को ही देव और पितृकर्म का अन्न आदि देना चाहिए, ऐसा
दान महाफल को देता है। देवकर्म और पितृकर्म में एक एक भी
विद्वान् ब्राह्मण को भोजन देने से बड़ा फल मिलता है। पर बहुत
से मूर्खों को भी खिलाने से वह फल नहीं मिलता ॥ १२७-१२६ ॥
दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
तीर्थं तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथिःस्मृतः ॥१३०॥
सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते ।
एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ॥ १३१ ॥
ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च ।
न हि हस्तावरुग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुद्ध्यतः ॥ १३२ ॥
यावतो ग्रसते ग्रासान्हव्यकव्येष्वमन्त्रवित् ।
तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूलर्ष्ट्ययोगुडान् ॥ १३३ ॥
वंशपरम्परा से ही वेदज्ञ ब्राह्मण को जान रक्खे क्योंकि वह
ब्राह्मण हव्य, कव्य देने का पात्र है। उसको देने से अतिथि के
समान फल होता है। जिस श्राद्ध में वेद न जाननेवाले दस लाख
ब्राह्मण भोजन करते हों, उसका फल एकही वेदविशारद ब्राह्मण
को भोजन कराने से होता है। हव्य और कव्य ज्ञानवृद्ध ब्राह्मण
को देना चाहिए, मूर्ख को नहीं। क्योंकि रुधिर से सनेहुए हाथ
रुधिर से ही शुद्ध नहीं होते। वेदहीन ब्राह्मण देव और पितृकर्म
में जितने हव्य-कव्य के ग्रास खाता है, उतने ही जलते हुए शूल,
ऋष्टि और लोहगोला यजमान को निगलने पड़ते हैं ॥ १३०-१३३ ॥
ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथापरे ।
८८ मनुस्मृति ।
तपःस्वाध्यायनिष्ठाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ॥ १३४ ॥
ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः ।
हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्ष्वपि ॥ १३५ ॥
अश्रोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारगः ।
अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात्पिता स्याद्वेदपारगः ॥१३६॥
ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्य स्याच्छ्रोत्रियः पिता ।
मन्त्रसंपूजनार्थं तु सत्कारमितरोऽर्हति ॥ १३७ ॥
कोई ब्राह्मण आत्मज्ञानी, कोई तप में तत्पर, कोई तप और
स्वाध्याय में तत्पर और कोई कर्मनिष्ठ ही होते हैं । इनमें ज्ञानी
को श्राद्ध में ग्रहण करे, और देवकर्म में इन चारों को ग्रहण करना
चाहिए । जिसका पिता वेदज्ञ न हो, पर पुत्र वेदपारंगत हो
अथवा पुत्र वेदवेत्ता न हो, पिता वेदपारंगत हो इन दोनों में
जिसका पिता वेदपारगामी हो वह श्रेष्ठ है और दूसरा भी मान्य
होता है ॥ १३४-१३७ ॥
न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः ।
नारिं न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद् द्विजम् ॥ १३८ ॥
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ।
तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च ॥ १३६ ॥
यः संगतानि कुरुते मोहाच्छ्राद्धेन मानवः ।
स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रो द्विजाधमः ॥ १४०॥
श्राद्ध में मित्र को भोजन न करावे, मित्रों का संग्रह धन से
करना चाहिए । जो अपना शत्रु वा मित्र न हो उसी ब्राह्मण को
भोजन देना चाहिए । जो श्राद्ध और यज्ञ कर्म में केवल मित्रों को
ही भोजन देता है, उसका फल परलोक में नहीं मिलता । जो
अज्ञानी पुरुष श्राद्ध के द्वारा मैत्री बांधता है उसको स्वर्ग नहीं
होता ॥ १३८-१४० ॥
तीसरा अध्याय । ८६
तीसरा अध्याय । ८६
संभोजिनी साभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः।
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि ॥ १४१ ॥
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम् ।
तथाऽनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम् ॥ १४२ ॥
दातॄन्प्रतिग्रहीतॄंश्च कुरुते फलभागिनः।
विदुषे दक्षिणां दत्त्वा विधिवत्प्रेत्य चेह च ॥ १४३ ॥
जो श्राद्धकर्म में मित्रमण्डली को खिलाता है, वह 'पैशाची द-
क्षिणा' कहलाती है । यह दक्षिणा—जैसे भोजन आदि अंधी गौ
एक ही घर में रहती है, उसी भांति इसी लोक में ही रहती है ।
परलोक में उपकार नहीं करती । जिस प्रकार ऊपर में बीज बो-
कर, बोनेवाला फल नहीं पाता, वैसे ही-मूर्ख-वेदहीन ब्राह्मण
को हवि देने से फल नहीं मिलता । विद्वान् ब्राह्मण को विधि से
भोजन कराकर दक्षिणा देने से देने और लेनेवाले दोनों लोक में
फलभागी होते हैं ॥ १४१-१४३ ॥
कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम् ।
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम् ॥ १४४ ॥
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम् ।
शाखान्तगमथाध्वर्युं छन्दोगं तु समाप्तिकम् ॥ १४५ ॥
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः ।
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वती साप्तपौरुषी ॥ १४६ ॥
एष वै प्रथमः कल्प्यः प्रदाने हव्यकव्ययोः ।
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भििरनुष्ठितः ॥ १४७ ॥
मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम् ।
१२
६० मनुस्मृति ।
दौहित्रं विट् पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्॥१४८॥
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् ।
पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ १४६ ॥
ये स्तेनपतितक्कीबा ये च नास्तिकवृत्तयः ।
तान् हव्यकव्ययोर्विप्राननर्हान् मनुरब्रवीत् ॥ १५०॥
यदि योग्य, ब्राह्मण न मिलें तो श्राद्ध में मित्र कोही खिलादे ।
पर शत्रु विद्वान् को भी न भोजन करावे—वह निष्फल होता है।
वेदपारगामी ऋग्वेदी ब्राह्मण को, यजुर्वेदी को, समाप्ति तक
सामवेद जाननेवाले को, श्राद्ध में अच्छीभांति भोजन कराना
चाहिए । इन में से कोई भी ब्राह्मण जिसके श्राद्ध में आदर से
भोजन पाता है, उसके सात पीढ़ी तक के पितर तृप्त होते हैं ।
यह हव्य और कव्य की प्रथम विधि है और सत्पुरुषों से आच-
रित गौण विधि इस प्रकार है-यदि ऊपर कहे ब्राह्मण न मिलें तो
नाना, मामा, भानजा, ससुर, गुरु, जामाता, मौसेरा भाई,
ऋत्विज और यज्ञ करानेवालों को भोजन देना । देवकर्म में
ब्राह्मण की परीक्षा न करे ओर पितृकर्म में यत्न से परीक्षा करनी
चाहिए । जो चोर पतित वा नपुंसक हों, नास्तिकभाव से
जीविका करता हो उन ब्राह्मणों को मनुजी ने देवकर्म और
पितृकर्म में अयोग्य कहा है॥ १४४-१५० ॥
जटिलं चानधीयानं दुर्बलं कितवं तथा ।
याजयन्ति च ये पूगांस्तांश्च श्राद्धे न भोजयेत्॥ १५१॥
चिकित्सकान् देवलकान् मांसविक्रयिणस्तथा ।
विपणेन च जीवन्तो वर्ज्याः स्युर्हव्यकव्ययोः ॥ १५२॥
प्रेष्यो ग्रामस्य राज्ञश्च कुनखी श्यावदन्तकः ।
प्रतिरोद्धा गुरोश्चैव त्यक्ताग्निर्वार्धुषिस्तथा ॥ १५३ ॥
तीसरा अध्याय। ६१
तीसरा अध्याय। ६१
यक्ष्मी च पशुपालश्च परिवेत्ता निराकृतिः ।
ब्रह्मद्विट् परिवित्तिश्च गणाभ्यन्तर एव च ॥ १५४ ॥
कुशीलवोऽवकीर्णी च वृषलीपतिरेव च ।
पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ १५५ ॥
भृतकाध्यापको यश्च भृतकाध्यापितस्तथा ।
शूद्रशिष्यो गुरुश्चैव वाग्दुष्टः कुण्डगोलकौ ॥ १५६ ॥
अकारणपरित्यक्ता मातापित्रोर्गुरोस्तथा ।
ब्राह्मैर्योनैश्च सम्बन्धैः संयोगं पतितैर्गतः ॥ १५७ ॥
अपढ़, जटाधारी, दुर्बल, जुआरी, बहुत यजमानों को एक साथ
बैठाकर यज्ञ करानेवाला, द्रव्य लेकर पूजा करानेवाला, इन को
श्राद्ध में न खिलाये । वैद्य, पुजारी, मांस बेचनेवाला और वाणिज्य
से जीविका करनेवाला इनको हव्य-कव्य में न भोजन देवे । ग्राम
और राजा का हलकारा, खराब नखवाला, काले दाँतवाला, गुरु-
विरोधी, अग्निहोत्रत्यागी, व्याजखोर, क्षयरोगी, चरवाह, बड़े
भाई के विवाह बिना पूर्व ही विवाहित, पञ्चमहायज्ञ न करनेवाला,
ब्राह्मणद्वेषी, छोटे भाई के विवाह होने पर अविवाहित बड़ा भाई,
धर्मार्थ इकट्ठा किये धन से जीवन करनेवाला, नाच, गान से जी-
विका करनेवाला, ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट, शूद्रा से विवाहित, पुनर्विवाह
का लड़का, काना, जिस के घर स्त्री का उपपति-जार रहता हो,
'वेतन लेकर पढ़ानेवाला, वेतन देकर पढ़ा हुआ । शूद्र का गुरु,
कटुभाषी, कुण्ड-पति के जीते जार से पैदा, गोलक-पति के मरने
पर जार से पैदा, बिना कारण माता, पिता और गुरु को त्यागने
वाला, पतितों को पढ़ानेवाला, पढ़नेवाला और पतितों से कन्या-
सम्बन्ध करनेवाला इन सब को श्राद्ध में कभी भोजन न कराना
चाहिए ॥ १५१-१५७ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।
६२ मनुस्मृति ।
समुद्रयायी वन्दी च तैलिकः कूटकारकः ॥ १५८ ॥
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा ।
पापरोग्यभिशस्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी ॥ १५६ ॥
धनुःशराणां कर्ता च यश्चाग्रे दिधिषूपतिः ।
मित्रध्रुक् द्यूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च ॥ १६० ॥
भ्रामरी गण्डमाली च श्वित्र्यथो पिशुनस्तथा ।
उन्मत्तोऽन्धश्च वर्ज्याः स्युर्वेदनिन्दक एव च ॥ १६१ ॥
घर में आग लगानेवाला, ज़हर देनेवाला, जार से पैदा हुए
का अन्न खानेवाला, सोमलता बेचनेवाला, समुद्र पार जानेवाला,
राजा की स्तुति करनेवाला, तेल का व्यापारी, झूठी गवाही देने
वाला, पिता से लड़नेवाला, धूर्त, शराबखोर, कोढ़ी आदि पाप-
रोगी, निन्दित, पाखण्डी, दूध, दही बेचनेवाला, धनुष् और बाण
बनानेवाला, जो बड़ी बहिन के क्वारी रहते छोटी का पति बन
गया हो, मित्रद्रोही, जुवा से जीविका करनेवाला, अपने पुत्र से
विद्या पढ़नेवाला, मृगीरोगी, गण्डमालारोगी, श्वेतकुष्ठ, चुगल-
खोर, पागल, अन्धा, वेदनिन्दक इतने प्रकार के ब्राह्मण श्राद्ध में
वर्जित हैं ॥ १५८-१६१ ॥
हस्तिगोश्वोष्ट्रदमको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
पक्षिणां पोषको यश्च युद्धाचार्यस्तथैव च ॥ १६२ ॥
स्रोतसां भेदको यश्च तेषां चावरणे रतः ।
गृहसंवेशको दूतो वृक्षारोपक एव च ॥ १६३ ॥
श्वक्रीडी श्येनजीवी च कन्यादूषक एव च ।
हिंस्रो वृषलवृत्तिश्च गणानां चैव याजकः ॥ १६४ ॥
हाथी, बैल, घोड़ा और ऊँटों का सिखानेवाला, नक्षत्र से
तीसरा अध्याय । ६३
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जीविका करनेवाला जोशी, पक्षी पालनेवाला, युद्धशिक्षा देने
वाला, नहर आदि तोड़नेवाला, उसको बंद करनेवाला, घर
बनानेवाला, दूत, मज़दूरी लेकर वृक्ष लगानेवाला, खेल के लिए
कुत्ता पालनेवाला, बाज पक्षी से जीविका करनेवाला, कन्या को
दूषित करनेवाला, हिंसक, शूद्र आचरण करनेवाला, और भूत,
पिशाच पुजानेवाला ये सब कर्म करनेवाले ब्राह्मण श्राद्ध में
भोजन न पावें ॥ १६२-१६४ ॥
आचारहीनः क्लीबश्च नित्यं याचनकस्तथा ।
कृषिजीवी श्लीपदी च सद्भिर्निन्दित एव च ॥ १६५ ॥
औरभ्रिको माहिषिकः परपूर्वापतिस्तथा ।
प्रेतनिर्यातकश्चैव वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ १६६ ॥
एतान् विगर्हिताचारानपांक्तेयान् द्विजाधमान् ।
द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत् ॥ १६७ ॥
आचाररहित, नपुंसक, रोज़ भीख मांगनेवाला, खेती से जीने
वाला, पीलपांव रोगवाला, सत्पुरुषों से निन्दित, मेंड़ा और भैंस
से जीनेवाला, जो दूसरे की होचुकी हो उसके साथ विवाह
करनेवाला और प्रेत का धन लेनेवाला इनको श्राद्ध में वर्जित
करना चाहिए । इन सब दूषित आचारवाले और पंक्तिबाह्य
अधम ब्राह्मणों को देव और पितृकार्य में विद्वान् पुरुष त्याग
देवे ॥ १६५-१६७ ॥
ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ १६८ ॥
अपांक्तदाने यो दातुर्भवत्यूर्ध्वं फलोदयः ।
दैवे हविषि पित्र्ये वा तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १६६ ॥
अव्रतैैर्यद्द्विजैर्भुक्तं परिवेत्रादिभिस्तथा ।
६४ मनुस्मृति ।
अपांक्तेयैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ १७० ॥
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते ।
परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ॥ १७१ ॥
वेद न पढ़नेवाला ब्राह्मण फूस के आग की तरह निर्जीव हो
जाता है। ऐसे को हव्य और कव्य न देना चाहिए। क्योंकि, राख,
में होम नहीं किया जाता है। पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को हव्य, कव्य देने
से, जो दाता को फल होता है, वह सब कहता हूं। वेदव्रतरहित
ब्राह्मण और परिवेत्ता आदि और पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को जो देव,
पितृकार्य में भोजन कराया जाता है वह राक्षसभोजन है। जो
छोटा भाई बड़े भाई के रहते, उसके पहले विवाह और अग्निहोत्र
करता है उसको परिवेत्ता कहते हैं। और बड़े भाई को परिवित्ति
कहते हैं ॥ १६८-१७१ ॥
परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते ।
सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥ १७२ ॥
भ्रातुर्मृतस्य भार्यायां योऽनुरज्येत कामतः ।
धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ॥ १७३ ॥
परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलकौ ।
पत्यौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः ॥ १७४ ॥
तौ तु जातौ परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च ।
दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयेते प्रदायिनाम् ॥ १७५॥
परिवित्ति, परिवेत्ता और ये जिस कन्या से विवाह करते हैं वह
पांचवां कन्या देनेवाला और विवाह करनेवाला सब नरक को
जाते हैं। भाई की मृत्यु होनेपर उसकी स्त्री से कामवश जो नियोग
करता है उसको 'दिधिषूपति' कहते हैं। दूसरे की स्त्री से उत्पन्न
दो पुत्रों की कुण्ड और गोलक संज्ञा है। पति के जीते, जार सें
तीसरा अध्याय। ६५
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पैदा हुआ कुण्ड और मरने पर पैदा हुआ गोलक कहलाता है।
ये दोनों परस्त्री से पैदा होकर, लोक और परलोक में हव्य, कव्य
देनेवाले का नाश करते हैं ॥ १७२-१७५ ॥
अपांक्त्यो यावतः पांक्त्यान् भुञ्जानाननुपश्यति ।
तावतां न फलं प्रेत्य दाता प्राप्नोति बालिशः ॥ १७६ ॥
वीक्ष्यान्धो नवतेः काणः षष्टेः श्वित्री शतस्य तु ।
पापरोगी सहस्रस्य दातुर्नाशयते फलम् ॥ १७७ ॥
यावतः संस्पृशेदङ्गैर्ब्राह्मणान्छूद्रयाजकः ।
तावतां न भवेद्दातुः फलं दानस्य पौर्तिकम् ॥ १७८ ॥
पंक्तिबाह्य पुरुष श्राद्ध में जितने योग्य ब्राह्मणों को भोजन करते
देखता है उनका फल परलोक में उस मूर्ख भोजन देनेवाले को नहीं
मिलता। अन्धा देखकर नव्वे श्रोत्रिय ब्राह्मणों के भोजन का फल
नष्ट करता है, काना साठ ब्राह्मणों का, सफेद कोढ़ का सौका,
पापरोगी एक हज़ार का फल नष्ट कर देता है । शूद्रों को यज्ञ
करानेवाला जितने ब्राह्मणों को अपने अङ्गों से छूता है अर्थात्
श्राद्ध में जितने ब्राह्मणों की पाँत में बैठता है, उतनों के पूर्तस-
म्बन्धी श्राद्ध का फल दाता को नहीं मिलता है ॥ १७६-१७८ ॥
वेदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् ।
विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥ १७६ ॥
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ।
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं तु वार्धुषौ ॥ १८० ॥
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत् ।
भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ॥ १८१ ॥
इतरेषु त्वपांक्तेयेषु यथोद्दिष्टेष्वसाधुषु ।
६६ मनुस्मृति।
मेदोऽसृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ १८२॥
वेदज्ञ भी जो शूद्र याजक का दान लोभ से लेता है, वह पानी में
कच्चे वरतन की भांति शीघ्र ही नष्ट होजाता है । सोमलता बेंचने
वाले को जो हव्य, कव्य देवे वह विष्ठा होती है । वैद्य को देने से
पीव-रक्त, देवलक-पुजारी को देने से नाश, व्याजखोर को देने से
निष्फल होजाता है । श्राद्ध में जो वाणिज्य करनेवाले को दिया
जाता है वह दोनों लोक में निष्फल होता है । पुनर्विवाह के लड़के
को देने से राख में होम की भांति व्यर्थ होता है और जो दूषित
मनुष्य हैं उनको देने से दाता के जन्मान्तर में भोजन के लिए-
मेद, रुधिर, मांस, मज्जा और हड्डी होजाता है ॥ १७६-१८२ ॥
अपांक्त्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधत कात्स्न्र्येनद्विजाग्र्यान्पंक्तिपावनान्॥ १८३॥
अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ।
श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १८४॥
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ।
ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च ॥ १८५ ॥
दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है वे इस प्रकार
के होने चाहिएं-जो चारों वेदों के जाननेवाले और उसके अङ्गों
के जाननेवाले, श्रोत्रिय और परम्परा से वेदाध्यायी हैं वेही पंक्ति
पावन होते हैं । त्रिणाचिकेतनामक यजुर्वेद के भाग को पढ़ने
वाला ब्राह्मण, पञ्चाग्निहोत्री, त्रिसुपर्ण नामक ऋग्वेद के भाग को
पढ़नेवाला, शिक्षा आदि छः अङ्गों का ज्ञाता, ब्राह्मविवाह से पैदा
पुत्र और साम गान करनेवाला ये छः पंक्तिपावन जानना
चाहिए ॥ १८३-१८५ ॥
वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः ।
शतायुश्चैव विज्ञेया ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः ॥ १८६ ॥
तीसरा अध्याय। ५७
तीसरा अध्याय। ५७
पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते।
निमन्त्रयेतऽयवरान्सम्यग्विप्रान्यथोदितान्॥१८७॥
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा।
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत्॥१८८॥
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथा सीनानुपासते ॥ १८६ ॥
वेदार्थ का ज्ञाता, उसका अध्यापक, ब्रह्मचारी, हज़ार गोदान
करनेवाला और सौ वर्षका ये पंक्तिपावन होते हैं । श्राद्ध के
पहले दिन वा उसी दिन उक्त गुणवाले ब्राह्मणों को आदर से
तीन वा कम को निमन्त्रण देवे । श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण
उस दिन नियम से रहे और वेदाध्ययन न करे । और यही
नियम श्राद्ध करानेवाले को भी पालन करना चाहिए । पितर
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों के पास आते हैं और वायु के समान पीछे
चलते और बैठते हैं ॥ १८६-१८६ ॥
केतितस्तु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः ।
कथंचिदप्यतिक्रामन् पापः शूकरतां व्रजेत् ॥ १६० ॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदते ।
दातुर्यद्दुष्कृतं किंचित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ १६१ ॥
अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः ।
न्यस्तशस्त्रा महाभागाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ १६२ ॥
हव्य और कव्य में नेवता पाकर किसी कारण भोजन न करने
से उस ब्राह्मण को दूसरे जन्म में शूकर होना पड़ता है । निम-
न्त्रण पाकर कामुक स्त्री से जो भोग करता है, वह दाता के पाप
का भागी होता है । क्रोधरहित, पवित्र-रागद्वेषरहित, सदा
ब्रह्मचारी, युद्धत्यागी, महाभाग-दया, शील आदि युक्त, देवता
रूप पितर हैं। इसलिए भोजन करनेवालों को आचार, विचार से
६८ मनुस्मृति ।
यस्मादुत्पत्तिरेतेषां सर्वेषामप्यशेषतः ।
ये च यैरुपचर्याः स्युर्नियमैस्तान्निबोधत ॥ १९३ ॥
मनोर्हैरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः ।
तेषामृषीणां सर्वेषां पुत्राः पितृगणाः स्मृताः ॥१९४॥
विराट्सुताः सोमसदः साध्यानां पितरः स्मृताः ।
अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः॥ १९५॥
दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सुपर्णकिन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोऽद्विजाः ॥ १९६ ॥
इन सब पितरों की जिससे उत्पत्ति हुई है और जो पितर जिन
नियमों से जिसके पूज्य हैं वह सुनो । हिरण्यगर्भ के पुत्र मनु के
जो मरीचि आदि पुत्र हैं, उनके पुत्र सोमपा आदि पितृगण हैं।
विराट् के पुत्र सोमसद्नामक साध्यों के पितर हैं और मरीचि
के पुत्र अग्निष्वात्त देवताओं के पितर कहे जाते हैं । दैत्य,
दानव, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, पक्षी और किन्नरों के बर्हिषद्नामक
पितर हैं ॥ १९३–१९६ ॥
सोमपानाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः ।
वैश्यानामाज्यपानाम शूद्राणां तु सुकालिनः ॥१९७॥
सोमपास्तु कवेः पुत्रा हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः ।
पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः ॥ १९८॥
अग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्र्वाहिषदस्तथा ।
अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत्॥१९६॥
य एते तु गणा मुख्याः पितॄणां परिकीर्त्तिताः ।
तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ २०० ॥
सोमपा ब्राह्मणों के, हविर्भुज क्षत्रियों के, आज्यपा वैश्यों के
और सुकालिननामक शूद्रों के पितर हैं । सोमपा भृगु के पुत्र,
तीसरा अध्याय । ६६
तीसरा अध्याय । ६६
हविष्मन्त अङ्गिरा के पुत्र, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुका-
लिन् वशिष्ठ के पुत्र हैं। अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद्,
अग्निष्वात्त और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं। ये पितरों के मुख्य
गण कहे गये हैं, इनके अनन्त जो पुत्र-पौत्र हैं उनको भी पितर
जानना चाहिए ॥ १६७-२०० ॥
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः ।
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ २०१ ॥
राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितैः ।
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्प्यते ॥ २०२ ॥
देवकार्याद्द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते ।
दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ २०३ ॥
तेषामारक्षभूतं तु पूर्वं दैवं नियोजयेत् ।
रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ॥२०४॥
मरीचि आदि ऋषियों से पितर हुए हैं, पितरों से देवता और
मनुष्य हुए हैं। देवताओं से क्रम से स्थावर, जङ्गम रूप जगत्
उत्पन्न हुआ है। इन सब पितरों को चांदी के पात्र से वा चांदी
लगे पात्र से जलदान करने से अक्षय तृप्ति होती है। देवकार्य से
पितृकार्य द्विजों के लिए विशेष गिना जाता है। पितृश्राद्ध प्र-
धान कर्म है और देवकर्म उसका अङ्ग गिना जाता है। देवकर्म
पूर्व करने से पितृकर्म की पुष्टि होती है। पितृकर्म का रक्षक देव-
कर्म पूर्व करे, क्योंकि रक्षारहित श्राद्ध का राक्षस नाश कर
देते हैं ॥ २०१-२०४ ॥
दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्र्याद्यन्तं न तद्भवेत् ।
पित्र्याद्यन्तं त्वीहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ॥२०५॥
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ।
दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ॥ २०६ ॥