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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

जगुजी

अनुरागसागर

( १०६ )

चतुरभुज

तहाँते चलि आये धर्मदासा । राय चतुरभुजपति जहँ वासा ॥
ताकर देश आहि दरभङ्गा । परखिसि मोहि सतपर संगा ॥
देखि अधीन ताहि समझावा । ज्ञान भक्ति विधि ताहि हद्दावा ॥
हद्दाता देखि ताहि पुनि थापा । मिला मोहि छाडि भ्रम आपा ॥
मायामोह न तनिको कीन्हा । अमर नाम तब ताही दीन्हा ॥
ताहूँ कहँ कडिहारी दीन्हा । चतुरभुजशब्द हेत करि लीन्हा ॥

छन्द

हँस निरमल ज्ञान रहनी, गहनी नाम उजागरा ॥
कुल कानि सबै बिसारि विषया, जौहरी गुण नागरा ॥
चतुरभुज बंकेज औ सहतेज, तुम चौथ सही ॥
चारिहँ कडिहार जिवके, गिरानिश्चल हम कही ७१ ॥
सो०-जम्बुदीपके जीव, तुम्हरी बाँह मोकहँ मिला ॥
गहे वचन दृढ पीव, ताहि काल पावे नहीं ॥ ७५ ॥

धर्मदास वचन

धन सत गुरु तुम मोहिं चेतावा । काल फंदसे मोहिं मुक्तावा ॥
मैं क्रिकर तुम दासके दासा । लीन्हों मोरि काटि जमफांसा ॥
मोते चित अतिहरष समाना । तव गुण मोहिं न जाय बखाना ॥
भागी जीव शब्द तुव माना । पूरण भाग जो तुव व्रत ठाना ॥
मैं अघकर्मि कुटिल कठोरा । रहेउँ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥
कहा जानि तुम मोहिं जगाये । कौने तप हम दशन पाये ॥
सो समुझाय कहो जियमूला । रबि तब गिरा कमल मनफूला ॥

धर्मदासके पिछले जन्मोंकी कथा कबीर वचन

इच्छा कर जो पूछा मोही । अब मैं गोइ न राखौं तोही ॥
धर्मनि सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहों विख्याता ॥

धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा

( १०६ )

अनुरागसागर

सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥
तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥

सुपच वचन

कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥
बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥
मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥
बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥
भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥
अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥
आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥
ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥
हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥
और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥
सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥
सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥

सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा

सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा ।
दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥
कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥
बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥
अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥
तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥
बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥

चन्दन साहूकी कथा

अनुरागसागर

( १०७ )

कहै नारि कृपा प्रभु कीन्हा । सूर्य व्रत करफल यह दीन्हा॥
बहुत दिवसलग तहाँ रहाये । नारि पुरुष मिल सेवा लाये॥
रहे दरिद्रते दुखी अपारा । हम मनमहँ असकीन विचारा॥
प्रथमहि दरिद्रता इनकर टारों। पुनिभक्तिमुक्तिकरवचनउचारों॥
जब हम पलना झटक झकोरा । मिलत सुवर्ण ताहि इकतोरा॥
नितप्रति सोन मिलै इक तोला । ताते भये वह सुखी अमोला॥
पुनि हम सत्य शब्द गोहराई । बहुप्रकारसे उनहि समुझाई॥
ता हृदये नहिं शब्द समायी । बालक ज्ञान प्रतीत न आई॥
ताहि देह चीन्हेसि नहिं मोहीं । भयोगुप्त तहँ तन तजि वोहीं॥

सुपच सुदर्शनके पिता माताके दूसरे जन्ममें चन्दसाहु
और ऊदाकी कथा

नारि द्विज दोई तन त्यागा । दरश प्रभाव मनुजतनु जागा॥
पुनि दोनों भये अंशु मिलाऊ । रहहि नगर चन्द वारे नाऊ॥
ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ॥
परसोतमते हम चलि आये । तब चन्दवारा जाइ पगटाये॥
बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीन्हेउताल माहि विश्रामा॥
कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई॥
पीछे ऊदा अस्नानहि आयी । सुन्दर बालक देखि लुभाई॥
दरश दियोदेहि शिशुतनधारी । लेगई बालक निज घर नारी॥
ले बालक गृह अपने आई । चन्दन साहु अस कहा सुनाई॥

चन्दनसाहु वचन

कहु नारी बालक कहँ पायी । कौने विधिते इहँवा लायी ॥
ऊदावचन

कह ऊदा जल बालक पावा । सुन्दर देखि मोर मन भावा॥
चन्दनसाहुवचन

कह चन्दनते मूरख नारी । वेगि जाहु दै बालक डारी ॥
जाति कुटुम्बहँसिहँ सब लोगा । हँसत लोग उपजे तन सोगा॥

नीमा नीरुका वृत्तांत

( १०८ )

अनुरागसागर

कबीरवचन धर्मदास प्रति

ऊदा त्रास पुरुष कर माना । चन्दन साहु जवै रिसियाना॥

चन्दनस हुवचन धर्मदास प्रति

बालक चेरी लेहु उठाई । लै बालक जल नेहु खसाई॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

चल चेरी बालक कहैं लीन्हा । जलमहँडारनताहिचितदीन्हा॥

चलिभइ मोहि पवारन जवहीं । अन्तरधान भयो मैं तवहीं ॥

भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करे दोनों बिलखाई ॥

बिकल होय मन दूदत डोलै । मुग्धज्ञान कछु मुखनहिं बोलै॥

सुपच सुदर्शनके माता पिता तीसरे जन्ममें नीमा हुए

यहिविधिबहुतदिवसचलिगयऊ।तजितनजन्मबहुरितिनपयऊ

मानुष तन जुलहा कुल दीन्हा । दोउ संयोग बहुरिविधि कीन्हा॥

काशी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलहा होई ॥

नारि गवन लावे मग सोई । जेठमास बरसाइत होई ॥

नारि लिवाय आय मगमाहीं । जलअचवन गहबनिताहीं ॥

ताल नाहिं पुरइन पनवारा । शिशु होय मैं तहैं पगुधारा ॥

तहाँ जस बालकै रहैं पौढाई । करौं कुतूहल बाल स्वभाई ॥

नीमा दृष्टि परी तिहि ठाऊ । देखत दर्श भयो अति चाऊ॥

जिमिरविदरशपडुमबिगसाना । धाय गयो धन रंक समाना॥

धाय गही कर लिया उठायी । बालक लै नीरूपहैं आयी ॥

जुलहा रोष कीन्ह तेहि वारी । बेगि देहु तुम बालक डारी॥

हर्ष गुनावन नारी लाई । तब हम तासो वचन सुनाई॥

१ बरसाइत बटसावित्रीका अपभ्रंश है । यह बटसावित्री व्रत ज्येष्ठ शुद्धपूर्णिमासीको होता है इसकी विस्तारपूर्वक कथा महाभारतमें है । उसी दिन कबीर साहब नीमा और नूरीको मिले थे इस कारणसे कबीर पंथियोंमें बरसाइत महात्म पंथकी कथा प्रचलित है । और उस दिन कबीरपंथी लोग बहुत उत्सव मनाते हैं

रतनाकी कथा

अनुरागसागर

( १०९ )

छन्द

सुनहु वचन हमारे नीमा, तोहि कहहु समझायके ॥
प्रीत पिछली कारणे तुहि, दरस दीन्हो आयके ॥
आपने गृह मोहि लै चलु, चीन्हिके जो गुरु करो ॥
देऊँ नाम दृढाय तो कहै, फन्द यमके नापरो ॥७२॥
सो०-सुनत वचन अस नारि, नीरूत्रास न राखेउ ॥
लै गइ गेह मैझार, काशि नगर तब पहुँचेउ ॥७६॥
नारी न मान त्रास तेहि केरा । रंक धनद सम लै चलि डेरा ॥
जोलहा देखि नारि लौलीना । लेइ चलो अस आयसु दीना ॥
दिवस अनेक रहे तेहि ठाई । कैसहु तेहि परतीत न आई ॥
बहुत दिवस तेहि भवन रहावा । बालक जान न शब्द समावा ॥

सुपुत्र सुदर्शनके माता पिताका बोथे जन्ममें मथुरामें

प्रगट होकर सत्यलोक जाना

त्रिन परतीत काजा नहि होई । दृढ कै गहहु परतीत विलोई ॥
ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा ॥
तजि सो देह बहुरि जो भाई । देह धरी सो देहुँ चिन्हाई ॥
जुलहाकी तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनी ॥
हम तहैं जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमारा मानसों लीन्हा ॥
रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥
ता कहै दीन्हेउ लोक निवासा । अंकुरी पठये निज दासा ॥
पुरुष चरण भेटे उरलाई । शोभा देह हंसकर पाई ॥
देखत हंस पुरुष हरषाने । सुकृति अंश कही मन माने ॥
बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥
जीवनहुः स्वअतिशय भयो भाई । तबही पुरुष सुकृत हंकराई ॥

मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत

( ११० )

अनुरागसागर

आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥
लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥
आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥
सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥
करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥
बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥
जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥

कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर

आना पुरुष वचन

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥
जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥
दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥
लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥
सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥
सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥
तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥
वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥
ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥

कबीर वचन

चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥
धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥
तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥
पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥
यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥
पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥
धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥

मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

अनुरागसागर

( १११ )

धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥
धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे
युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥
बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥
निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥
बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥

धर्मराज वचन

बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥
धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥
अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥
निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥

कबीर वचन

धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥
चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥
मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥
आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥
पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥
तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥
चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥
हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥
मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥
तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥

छन्द

आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥
करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥

( ११२ )

अनुरागसागर

मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥
सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥
सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥
पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥

धर्मदास वचन

धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥
मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥
धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥
मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥
अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥
काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥
सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥
धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥
तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥
शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥
दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥
तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥
अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥
ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥
यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥

१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।

कबीरसाहबका चौका करके धर्मदासजीको परवाना देना आरती विधि

अनुरागसागर

( ११३ )

छन्द

चतुर्भुज बंकेज सहतेज, और चौथे तुम अहौ ॥
चार गुरुकडिहार जगके वचन यह निश्चय गहौ ॥
यही चार अंश संसारमें, जीव काज प्रगटाइया ॥
स्वसंवेदसोइनसंग दियो, जेहि सुनि काल भगाइया ॥७४॥

सोरठा-चरोंमें धर्मदास, जम्बुदीपके गुरु साहि ॥
व्यालिस वंश विलास तैं जीव तेहि शरणगहि ॥७८॥

आरतीविधिवर्णन

कबीर साहबका चौका करके धर्मदासको परवाना देना
धर्मदास वचन

धर्मदास पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन्ह सुभागा ॥
हे प्रभु ! नहि रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण वरनिन जाई ॥
महिमा अमित अहै तुम स्वामी । केहि विधि बरनों अंतरयामी ॥
मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहिं तुम लीन उबारी ॥
अब चौका भेद कहो मुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुखभामी ॥
जो तुम कहो करौ मैं सोई । तामहैं फेर न परि हैं कोई ॥

कबीर वचन चौकाका साज

धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भागि चले यमराजा ॥
सात हाथको बस्तर लाओ । श्वेत चँदोबा छत्र तनाओ ॥
घर आंगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ॥
तापर आँटा चौक पुराओ । सवासेर तंदुल ले आओ ॥
स्वेत सिंहासन तहाँ बिछाई । नाना सुगंध धरु तहाँ लगाई ॥
स्वेत मिठाई स्वेतै पाना । पुंगीफल स्वेतहि परमाना ॥
लौंग इलायची कपुर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥

कबीरसाहबका धर्मदासको उपदेश देना

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नारायणदासजीका कबीरसाहबकी अवज्ञा करना

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द्वादश पन्थका वर्णन

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अनमङ्ग वृत्तका पन्थ ४

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अखिलभङ्ग दूतका पंथ ८

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धर्मदास साहबको आत्म अंशका दर्शन होना

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