कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( १०६ )
चतुरभुज
तहाँते चलि आये धर्मदासा । राय चतुरभुजपति जहँ वासा ॥
ताकर देश आहि दरभङ्गा । परखिसि मोहि सतपर संगा ॥
देखि अधीन ताहि समझावा । ज्ञान भक्ति विधि ताहि हद्दावा ॥
हद्दाता देखि ताहि पुनि थापा । मिला मोहि छाडि भ्रम आपा ॥
मायामोह न तनिको कीन्हा । अमर नाम तब ताही दीन्हा ॥
ताहूँ कहँ कडिहारी दीन्हा । चतुरभुजशब्द हेत करि लीन्हा ॥
छन्द
हँस निरमल ज्ञान रहनी, गहनी नाम उजागरा ॥
कुल कानि सबै बिसारि विषया, जौहरी गुण नागरा ॥
चतुरभुज बंकेज औ सहतेज, तुम चौथ सही ॥
चारिहँ कडिहार जिवके, गिरानिश्चल हम कही ७१ ॥
सो०-जम्बुदीपके जीव, तुम्हरी बाँह मोकहँ मिला ॥
गहे वचन दृढ पीव, ताहि काल पावे नहीं ॥ ७५ ॥
धर्मदास वचन
धन सत गुरु तुम मोहिं चेतावा । काल फंदसे मोहिं मुक्तावा ॥
मैं क्रिकर तुम दासके दासा । लीन्हों मोरि काटि जमफांसा ॥
मोते चित अतिहरष समाना । तव गुण मोहिं न जाय बखाना ॥
भागी जीव शब्द तुव माना । पूरण भाग जो तुव व्रत ठाना ॥
मैं अघकर्मि कुटिल कठोरा । रहेउँ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥
कहा जानि तुम मोहिं जगाये । कौने तप हम दशन पाये ॥
सो समुझाय कहो जियमूला । रबि तब गिरा कमल मनफूला ॥
धर्मदासके पिछले जन्मोंकी कथा कबीर वचन
इच्छा कर जो पूछा मोही । अब मैं गोइ न राखौं तोही ॥
धर्मनि सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहों विख्याता ॥