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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 239

अनुरागसागर

( १११ )

धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥
धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे
युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥
बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥
निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥
बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥

धर्मराज वचन

बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥
धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥
अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥
निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥

कबीर वचन

धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥
चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥
मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥
आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥
पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥
तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥
चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥
हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥
मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥
तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥

छन्द

आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥
करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥