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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 238

( ११० )

अनुरागसागर

आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥
लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥
आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥
सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥
करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥
बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥
जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥

कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर

आना पुरुष वचन

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥
जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥
दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥
लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥
सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥
सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥
तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥
वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥
ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥

कबीर वचन

चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥
धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥
तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥
पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥
यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥
पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥
धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥