गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० २ ॥ ४१५
अ॒न॒राशं॑साः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते
हैं—नरों की स्तुति बिना [ यज्ञ यजमान को ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप
बढ़ते हैं । देखो क० १ ] ॥ २ ॥
भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ २ ॥
विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—तं वो॑ दस्ममृ॑तीषहं॒ वसोर्मन्दानमन्ध॑सः । अ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒
इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्न॑वामहे—अथर्व० २० । ६ । १, ऋग्० ८ । ८८ । [ सायण भाष्य ७७ ] ।
१, साम० उ० १ । १ । १ । ३ ॥ [ हे मनुष्यों ! ] ( वः ) तुम्हारे लिये ( तम् ) उस
( दस्मम् ) दर्शनीय, ( ऋतीषहम् ) शत्रुओं के हराने वाले, ( वसोः ) धन से और
( अन्धसः ) अन्न से ( मन्दानम् ) आनन्द देने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले
परमात्मा ] को ( गीर्भिः ) वाणियों से ( अभि ) सब प्रकार ( नवामहे ) हम सराहते
हैं, ( न ) जैसे ( धेनवः ) गौयें ( स्वसरेषु ) घरों में [ वर्तमान ] ( वत्सम् ) बछड़े
को [ हिङ्कारती हैं ] ॥
२—तत् त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये । येना यतिभ्यो भृगवे
धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ—अथर्व० २० । ६ । ३, ऋग् ० ८ । ३ । ६ ।। [ हे
परमात्मन् ! ] ( त्वा ) तुझसे ( तत् ) वह ( सुवीर्यम् ) बड़ा वीरत्व और
( तत् ) वह ( ब्रह्म ) बढ़ता हुआ अन्न ( पूर्वचित्तये ) पहिले ज्ञान के लिए ( यामि )
मैं माँगता हूँ । ( येन ) जिस [ वीरत्व और अन्न ] से ( धने हिते ) धन के स्थापित होने
पर ( यतिभ्यः ) यतियों [ यत्नशीलों ] के लिए ( भृगवे = भृगुम् ) परिपक्व ज्ञानी को
और ( येन ) जिससे ( प्रस्कण्वम् ) बड़े बुद्धिमान् पुरुष को ( आविथ ) तूने बचाया है ।
३—उदुत्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते । सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो
वाजयन्तो रथा इव—अथर्व० २० । १० । १, ऋ० ८ । ३ । १५, साम उ० ६ । १ ।
६ ॥ ( त्ये ) वे ( मधुमत्तमा ) अति मधुर ( स्तोमासः ) स्तोत्र ( उ ) और ( गिरः )
वाणियाँ ( उत् ईरते ) ऊँची जाती हैं। ( इव ) जैसे ( सत्राजितः सत्य से जीतने वाले,
( धनसा ) धन देने वाले, ( अक्षितोतयः ) अक्षय रक्षा वाले, ( वाजयन्तः ) बल प्रकट
करते हुए ( रथाः ) रथ [ आगे बढ़ते हैं ] ॥
४—इन्द्रः पूर्भिदातिरद् दासमर्केर्विदद्वसुर्दय मानो वि शत्रून् । ब्रह्मजूतस्तन्वा
वावृधानो भूरिदात्र आपृणद् रोदसी उभे—अथर्व० २० । ११ । १ । ऋ० ३ । ३४ । १ ।।
( विदद्वसुः ) ज्ञानी श्रेष्ठ पुरुषों से युक्त, ( पूर्भित् ) [ शत्रुओं के ] गढ़ों को तोड़ने वाले
( शत्रून् ) बैरियों को ( वि ) विविध प्रकार । ( दयमानः ) मारते हुए ( इन्द्रः ) इन्द्र
[ बड़े ऐश्वर्य वाले राजा ] ने ( अर्कैः ) पूजनीय विचारों से ( दासम् ) दास [ सेवक ]
को ( आ अतिरत् ) बढ़ाया है । ( ब्रह्मजूतः ) ब्रह्माओं [ महाविद्वानों ] से प्रेरणा किये
गये ( तन्वा ) उपकार शक्ति से ( वावृधानः ) बढ़ते हुये; ( भूरिदात्रः ) बहुत से अस्त्र
शस्त्र वाले [ शूर ] ने ( उभे ) दोनों ( रोदसी ) आकाश और भूमि को ( आ ) भले
प्रकार ( अपृणत् ) तृप्त किया है ॥
कण्डिका ३ ॥
४१६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३
५-उदु ब्रह्माण्याैरत श्रवस्येन्द्रं समर्य्ये महया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि
शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि-अथर्व० २० । १२ । १, ऋग्वेद ७ । २३ ।
१ ॥ ( श्रवस्या ) यश के लिए हितकारी ( ब्रह्माणि ) वेदज्ञानों को ( उ ) ही ( उद्
ऐरत ) उन [ विद्वानों ] ने उच्चारण किया है, ( वसिष्ठ ) हे अति श्रेष्ठ ! ( इन्द्रम् )
इन्द्र [ महाप्रतापी सेनापति ] को ( समर्ये ) युद्ध में ( महय ) पूज । ( यः ) जिस
(उप श्रोता) आदर से सुनने वाले [शूर] ने ( ईवतः ) उद्योगी ( मे ) मेरे ( विश्वानि )
सब ( वचांसि ) वचनों को ( शवसा ) बल के साथ ( आ ) अच्छे प्रकार ( ततान )
फैलाया है ॥
६-एवेदिन्द्रं वृषण वज्रवाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः । स न स्तुतो वीरवद्
धातु गोमद् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः-अथर्व० २० । १२ । ६, ऋग्० ७ । २३ । ६ ।
यजु० २० । ५४ ॥ ( एव इत् ) इस प्रकार से ही ( वसिष्ठासः ) अत्यन्त वसु [ श्रेष्ठ
विद्वान् लोग ] ( वृषणम् ) बलवान्, ( वज्रबाहुम् ) वज्र [ शस्त्र अस्त्रों ] को भुजा पर
रखने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ महाप्रतापी सेनापति ] को ( अर्कैः ) पूजनीय विचारों और अन्नों
से ( अभि अर्चन्ति ) यथावत् पूजते हैं । ( स्तुतः ) स्तुति किया गया ( सः ) वह ( नः )
हमारे लिये ( वीरवत् ) वीरों से युक्त ( गोमत् ) उत्तम गौओं वाले [ राज्य ] को
( धातु ) धारण करे, [ हे वीरों ! ] ( यूयम् ) तुम सब ( स्वस्तिभिः ) सुखों से ( सदा )
सदा ( नः ) हमें ( पात ) रक्षित रक्खो ॥
७-ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोम पावा । युक्त्वा
हरिभ्यामुपयासद॒र्वाङ् माध्यन्दिने सवने मत्सदिन्द्रः-अथर्व० २० । १२ । ७ । ऋ० ५ ।
४० । ४ ॥ ( ऋजीषी ) महाधनी, ( वज्री ) वज्रधारी [ शस्त्र अस्त्रों वाला ], ( वृषभः )
बलवान् ( तुराषाट् ) हिंसक शत्रुओं का हराने वाला, ( शुष्मी ) बलवान् सेना वाला,
( राजा ) राजा, ( वृत्रहा ) वैग्रियों का मारने वाला, ( सोमपावा ) सोम [ महौषधियों
के रस ] का पीने वाला ( इन्द्रः ) इन्द्र [ महाप्रतापी सेनापति ] ( हरिभ्याम् ) दो घोड़ों
से [ रथ को ] ( युक्त्वा ) जोत कर ( अर्वाङ् ) सामने ( उपयासत् ) आवे और
( माध्यन्दिने ) मध्याह्न में ( सवने ) यज्ञ के बीच ( मत्सत् ) आनन्द पावे ॥
कण्डिका ३ ॥
तरोभिर्वोविदद्वसुन्तरणिरित्सिषासतीति, अच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ ।
उदिन्वस्य रिच्यत इति, बार्हतः प्रगाथः । तस्योक्तं ब्राह्मणम् । भूय इद्वावृधे वीर्यायिति
उक्थमुखम् । इमामूषु प्रभृतिं सातये धा इति, पयसिः । तस्य दशमीमुद्धरति ।
घोरस्य वा आङ्गिरसस्यैतदार्षं नेद्यज्ञं निर्दहेत् शस्यमानं पिवा वर्धस्व तव घा सुतास
इति यजति । एतामेव तद्देवतां यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्यानुवषट् करोति । प्रत्ये-
वाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति, न ह्यनाराशंᳪसाः सीदन्ति ॥ ३ ॥
कण्डिका ३ ।। एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में
अच्छावाक के मन्त्र प्रयोग ।।
( तरोभिर्वो विदद्वसुम्, तरणिरित् सिषासति, इति अच्छावाकस्य स्तोत्रियानु-
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३ ।। ४१७
रूपौ ) तरोभिर्वो विदद्वसुम्... और, तरणिरित् सिषासति..., १, २ यह दो मन्त्र अच्छावाक
ऋत्विज् के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। ( उदिन्वस्य रिच्यते...इति बार्हतः प्रगाथः )
उदिन्वस्य रिच्यते...३ यह मन्त्र बृहती छन्द वाला प्रगाथ [ अच्छे प्रकार गाने योग्य स्तोत्र ]
है। ( तस्य उक्तं ब्राह्मणम् ) उसका ही कहा गया ब्राह्मण है। ( भूय इद् वावृधे वीर्याय
इति उक्थमुखम् ) भूय इद् वावृधे वीर्याय ४ यह मन्त्र उक्थ [ स्तोत्र ] का आरम्भ है।
( इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः-इति पर्यासः ) इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः,...५ यह
मन्त्र [ उक्थ का ] पर्यास [ विराम ] है। ( तस्य दशमीम् उद्धरति ) उस [ सूक्त ] की
दसवीं ऋचा [ अस्मे प्र यन्धि-६ ] को उठाकर पढ़ता है। ( घोरस्य आङ्गिरसस्य वै
एतत् आर्षं शस्यमानं नेत् यज्ञं निर्दहेत् ) घोर आङ्गिरस का [ ऋषि विशेष का व्याख्या
किया हुआ ] यह वेद मन्त्र [ दसवीं ऋचा ] बोलना चाहिये, नहीं तो वह यज्ञ को भस्म कर
देवे। ( पिबा वर्धस्व तव घा सुतासः, इति यजति ) पिबा वर्धस्व तव घा सुतासः ७,
इस मन्त्र से वह यज्ञ करता है [ याज्या आहुति देता है ] । ( एताम् एव देवतां तत्
यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्य अनुवषट्करोति ) इस ही [ इन्द्र ] देवता को उससे अपने
अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम
आहुति दान ] करता है। ( प्रति एव अभिभृंशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि
सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों की स्तुति के बिना [ यज्ञ यजमान
को ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं। देखो क० १, २ ] ॥ ३ ॥
भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ ३ ॥
विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रं सबाध ऊतये । बृहद् गायन्तः सुतसोमे अध्वरे
हुवे भरं न कारिणम्-ऋ० ८ । ६६ । १ [ सायण भाष्य ५५ ] ॥ [ हे मनुष्यो ! ]
( भरम् ) पोषण करने वाले ( कारिणं न ) कर्म कुशल के समान ( वः ) तुम्हारे लिये
( तरोभिः ) शीघ्रता से ( विदद्वसुम् ) धन पाने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले
वीर ] को ( बृहत् ) वृद्धिकारक स्तोत्र ( गायन्तः ) गाते हुये, ( सबाधः ) बाधा में पड़े
हुये हम ( ऊतये ) रक्षा के लिये ( सुतसोमे ) सिद्ध किये हुये सोम [ तत्त्व रस ] रखने
वाले ( अध्वरे ) हिंसा रहित यज्ञ में ( हुवे = आह्वयामः ) बुलाते हैं ॥
३—( तरोभिः ) वेगैः । बलैः—निघ० २ । ६ ( वः ) युष्मदर्थम् (विदद्वसुम्)
वेदयद्वसुम् । धनप्रापकम् ( तरणिः ) तारकः ( इत् ) एव (सिषासति) संभक्तुमिच्छति
( उत् ) आधिक्ये ( नु ) क्षिप्रम् ( अस्य ) राज्ञः ( रिच्यते ) अधिको भवति ( भूयः )
बहु—ईयसुन् । बहुतरम् । पुनः ( वावृधे ) वर्धते ( वीर्याय ) पराक्रमाय ( उ )
वितर्के ( सु ) शोभने ( प्रभृतिम् ) प्रकृष्टां धारणाम् ( सातये ) संविभागाय ( धाः )
दध्याः ( उद्धरति ) उद्धृत्य पठति ( आर्षम् ) ऋषिणा परमेश्वरेण प्रोक्तः । वेदमन्त्रः
( नेत् ) नैव ( शस्यमानम् ) कथ्यमानम् ( वर्धस्व ) वृद्धिं कुरु ( घ ) एव ( सुतासः )
निष्पन्नाः ॥
४१८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३
२—तरणिरित् सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा। आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा
नेमिं तष्टेव सुद्रुवम्—ऋ० ७ । ३२ । २० ॥ (तरणिः इत्) तारने वाला पुरुष ही
(युजा) योग्य, (पुरन्ध्या) बहुत अर्थों को धारण करने वाली बुद्धि से (वाजम्)
विज्ञान वा धन को (सिषासति) बांटना चाहता है। (वः) तुम्हारे लिये (पुरुहूतम्)
बहुतों से बुलाये गये (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले राजा] को (गिरा) वाणी से
(आ नमे) अच्छे प्रकार झुकता हूं, (तष्टा इव) जैसे बढ़ई (सुद्रुवम्) दृढ़ काठ वाले
(नेमिम्) पहिये को झुकाता है॥
३—उदिन्वस्य रिच्यतेंऽशो धनं न जिग्युषः। य इन्द्रो हरिवान् न दभन्ति तं
रिपो दक्षं दधाति सोमिनि—अथर्व० २० । ५६ । ३, ऋ० ७ । ३२ । १२ ॥ (अस्य)
उस [राजा] का (इत्) ही (अंशः) भाग (जिग्युषः) विजयी वीर के (धनं न)
धन के समान (नु) शीघ्र (उद् रिच्यते) बढ़ाता जाता है, (यः) जो (हरिवान्)
श्रेष्ठ मनुष्यों वाला (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाला राजा] (सोमिनि) तत्त्वरस वाले
व्यवहार में (दक्षम्) बल को (दधाति) लगाता है, और (तम्) उस [राजा] को
(रिपः) बैरी लोग (न दभन्ति) नहीं सताते हैं॥
४—भूय इद् वावृधे वीर्यायै एको अजुर्यो दयते वसूनि। प्ररिरिचे दिव इन्द्रः
पृथिव्या अर्धमिदस्य प्रति रोदसी उभे--ऋ० ६ । ३० । १ ॥ (एकः) अकेला
(अजुर्यः) न बूढ़ा होने वाला [महाबली राजा] (भूयः इत्) बहुत अधिक ही
(वीर्याय) पराक्रम के लिये (वावृधे) बढ़ता है और (वसूनि दयते) अनेक धनों का
दान करता है, [जैसे] (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाला परमात्मा] (दिवः) प्रकाश
लोक से और (पृथिव्याः) पृथिवी से (प्ररिरिचे) बहुत बड़ा है, (अस्य) उस
[परमात्मा] का (अर्धम् इत्) आधा भाग ही (उभे रोदसी प्रति) दोनों अन्तरिक्ष
और पृथिवी में है॥
५—इमाम् षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतिभिर्यादमानः। सुतेसुते वावृधे
वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत्—ऋ० ३ । ३६ । १ ॥ [हे इन्द्र! बड़े ऐश्वर्य
वाले राजन्] (शश्वच्छश्वत्) नित्य नित्य (ऊतिभिः) रक्षण क्रियाओं से (यादमानः)
प्रयत्न करता हुआ तू (इमाम् उ प्रभृतिम्) इस ही पालन शक्ति को (सातये) बांटने
के लिये (सु धाः) अच्छे प्रकार धारण कर। (यः) जो मनुष्य (सुतेसुते) प्रत्येक
निचोड़े हुये [तत्त्वरस] में (वर्धनेभिः) बढ़ती करने वाले साधनों से (वावृधे) बढ़ा है,
वह (महद्भिः कर्मभिः) महान् कर्मों से (सुश्रुतः) बड़ा विख्यात (भूत्) हुआ है॥
६—अस्मे प्र यन्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र रायो विश्ववारस्य भूरेः। अस्मे शतं
शरदो जीवसे धा अस्मे वीराञ्छश्वत इन्द्र शिप्रिन्—ऋ० ३ । ३६ । १० ॥ (मघवन्)
हे पूजनीय (ऋजीषिन्) महाधनी (इन्द्र) इन्द्र! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजन्] (अस्मे)
हम को (विश्ववारस्य) सबसे स्वीकार करने योग्य (भूरेः) बहुत (रायः) धन का
(प्र यन्धि) दान कर। (शिप्रिन्) हे सुन्दर नासिका और ठोढ़ी वाले (इन्द्र) इन्द्र!
(अस्मे) हमारे (शतं शरदः जीवसे) सौ वर्ष जीने को (अस्मे) हमारे लिये (शश्वतः)
कण्डिका ४ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ४ ॥ ४१६
सदा वर्तमान (वीरान्) वीरों को (धाः) धारण कर। [इस दसवें मन्त्र के घोर
आङ्गिरस ऋषि और शेष सूक्त के विश्वामित्र ऋषि हैं ] ॥
७--पिबा वर्धस्व तव घा सुतास इन्द्र सोमासः प्रथमा उतेमे । यथापिबः पूर्व्याँ
इन्द्र सोमाँ एवा पाहि पन्यो अद्या नवीयान्—ऋ० ३ । ३६ । ३ ॥ (इन्द्र) हे इन्द्र !
[बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष ] (पिब वर्धस्व) पी और बढ़, (प्रथमाः) पहिले (उत इमे)
और यह [अब ] (सुतासः) निचोड़े हुये (सोमासः) सोमरस [ऐश्वर्य करने वाले
सोमलता आदि तत्त्व रस ] (तव घ) तेरे ही हैं। (इन्द्र) हे इन्द्र ! (यथा) जैसे
(पूर्व्यान्) पूर्व जनों के सिद्ध किये हुये (सोमान्) सोमों [तत्त्वरसों] को (अपिबः)
तूने पिया है, (एव) वैसे ही (पन्यः) प्रशंसनीय और (नवीयान्) नवीनतर [अधिक
बल वाला] तू (अद्य) आज (पाहि) [उनकी ] रक्षा कर ॥
कण्डिका ४ ॥
अथाध्वर्यो शंꣳसावोमिति, स्तोत्रियानुरूपाय प्रगाथायोक्थमुखाय परि-
धानीयाया इति पञ्चकृत्व आह्वयन्ते । पञ्चपदा पङ्क्तिः पाङ्क्तो यज्ञः। सर्वे ऐन्द्राणि
त्रैष्टुभानि शंसन्ति । ऐन्द्रं हि त्रैष्टुभं माध्यन्दिनꣳ सवनम्। सर्वे समवतीभिः
परिदधति, तद्यत् समवतीभिः परिदधति । अन्तो वै पर्यासोऽन्त उदर्कः, अन्तेनैवान्तं
परिदधति । सर्वे मद्वतीभिर्यजन्ति, तद्यत् मद्वतीभिर्यजन्ति । सर्वे सुतवतीभिः
पीतवतीभिरभिरूपाभिर्यजन्ति । यद्यज्ञेऽभिरूपं, तत् समृद्धम् । सर्वे ऽनुवषट् कुर्वन्ति,
स्विष्टकृत्त्वा अनुवषट्कारो नेत् स्विष्टकृतमन्तरयामेति । अन्तरिक्षलोको माध्यन्दिनं
सवनम् । तस्य पञ्च दिशः, पञ्चोक्थानि माध्यन्दिनस्य सवनस्य । स एतैः
पञ्चभिरुक्थैरेताः पञ्च दिश आप्नोत्येताः पञ्च दिश आप्नोति ॥ ४ ॥
कण्डिका ४ ॥ एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में (शंसावोम् )
मन्त्र को पांच बार बोलें ॥
(अथ अध्वर्यो शंसावोम् इति, स्तोत्रियाय, अनुरूपाय, प्रगाथाय, उक्थ-
मुखाय, परिधानीयायै इति, पंचकृत्वः आह्वयन्ते) फिर (अध्वर्यो शंसाव ओम्) हे
अध्वर्यो ! हम दोनों स्तुति करें, हां—इस मन्त्र से स्तोत्रिय [ स्तुति योग्य व्यवहार] के
लिये, अनुरूप [ विषय की अनुकूलता ] के लिये, प्रगाथ [ उत्तम गान ] के लिये, उक्थमुख
[यज्ञ की मुख्यता ] के लिये और परिधानीया [ समाप्ति क्रिया ] के लिये--इस प्रकार
पांच बार वे बोलते हैं। (पञ्चपदा पङ्क्तिः पाङ्क्तः यज्ञः ) पांच पाद वाला [ अथवा
पांच दिशाओं में व्यापक ] पङ्क्ति [ छन्द विशेष, अथवा विस्तार शक्ति प्रकृति ] है, पङ्क्ति
[ विस्तार ] वाला यज्ञ है। (सर्वे ऐन्द्राणि त्रैष्टुभानि शंसन्ति ) सब ऋत्विज् इन्द्र देवता
४–(पञ्चकृत्वः) पञ्चवारम् (पङ्क्तिः) पचि विस्तारे व्यक्तीकरणे च-
क्तिन् । विस्तारः ! गौरवम् । छन्दविशेषः (पाङ्क्तः) गो० उ० ३ । २० । विस्तार-
युक्तः । अन्यद्गतम्—गो० उ० ३ । १६ ॥
कण्डिका ५ ॥
४२० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ क० ५ ॥
वाले और त्रिष्टुप् छन्द वाले स्तोत्रों को बोलते हैं । ( ऐन्द्रं हि त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनम् )
क्योंकि इन्द्र देवता वाला और त्रिष्टुप् छन्द वाला माध्यन्दिन सवन है । ( सर्वे समवतीभिः
परिदधति, यत् तत् समवतीभिः परिदधति ) वे सब समवती ऋचाओं से [ सम शब्द
वाली ऋचाओं से जैसे- समं ज्योतिः सूर्येण .....अथर्व० ८ । १८ । १, इत्यादि मन्त्रों से ]
समाप्त करते हैं क्योंकि वहां समवती ऋचाओं से वे समाप्त करते हैं । ( अन्तः वै पर्यासः
अन्तः उदर्कः, अन्तेन एव अन्तं परिदधति ) अन्त ही पर्यास [ विराम ] है, अन्त ही
उदर्क [ अवसान वा विच्छेद अर्थात् रोक ] है, अन्त के साथ ही अन्त को वे समाप्त
करते हैं [ एक एक विषय पर रुक कर दूसरे को आरम्भ करके पूरा करते हैं ] ।
( सर्वे मद्वतीभिः यजन्ति, यत् तत् ॰द्वतीभिः यजन्ति ) वे सब मद्वती [ मद
शब्द वाली ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं [ याज्या बोलते हैं ], क्योंकि वहाँ मद्वती ऋचाओं
से वे यज्ञ करते हैं । ( सर्वे सुतवतीभिः पीतवतीभिः अभिरूपाभिः यजन्ति ) वे सब
सुतवती [ सुत शब्द वाली ] ऋचाओं से, पीतवती [ पीत शब्द वाली ] ऋचाओं से और
अभिरूप [ विषय के अनुकूल ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं । [ मद्वती, सुतवती और पीतवती
ऋचाओं के लिये देखो ऋ० १ । १६ । ८ । और बहुवचन होने से ब्राह्मण में समस्त इन नौ
ऋचा वाले सूक्त का ग्रहण अभीष्ट है । अभिरूप शब्द से यह प्रयोजन है कि अभीष्ट देवता
की स्तुति में उस देवता के सूचक पद आजावें ] । ( यत् यज्ञे अभिरूपं, तत् समृद्धम् )
जो यज्ञ में विषय के अनुकूल कर्म है, वह समृद्ध [ सफल ] है । ( सर्वे स्विष्टकृत्वा अनु-
वषट् कुर्वन्ति ) सब स्विष्टकृत् मन्त्र [ यदस्य कर्मणोत्यरीरिचम् ़ ़ ़गो० उ० ३ । १ ]
पढ़कर अनुवषट् [ समाप्ति सूचक पद ] पढ़ते हैं । ( अनुवषट्कारः स्विष्टकृतम् नेत्
अन्तरयाम इति ) अनुवषट्कार स्विष्टकृत् मन्त्र को कभी भी बीच [ व्यवधान ] से नहीं
करता । ( अन्तरिक्षलोकः माध्यन्दिनं सवनम् ) अन्तरिक्षलोक ही माध्यन्दिन सवन
है । ( तस्य पञ्च दिशः, माध्यन्दिनस्य सवनस्य पञ्च उक्थानि ) उस [ लोक ]
की पांच दिशायें [ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और एक ऊपर नीचे की दिशा ] हैं माध्य-
न्दिन सवन के पांच उक्थ [ समवती, मद्वती, सुतवती, पीतवती और अभिरूपा ऋचाओं
वाले स्तोत्र ] हैं । ( स एतैः पंचभिः उक्थैः एताः पंच दिशः आप्नोति, एताः पंच
दिशः आप्नोति ) वह [ यजमान ] इन पांच प्रकार वाले स्तोत्रों से इन पांच दिशाओं
को पाता है इन पांच दिशाओं को पाता है [ अर्थात् अवश्य पाता है ] ॥ ४ ॥
भावार्थ :-विद्वान् मनुष्य अपनी कर्मकुशलता से सब दिशाओं में सिद्धि
पाता है ॥ ४ ॥
विशेष :-इस कण्डिका को मिलाओ गो० उ० ३ । १६ । तथा गो० उ० ४ । १८
और ऐतरेय ब्राह्मण ३ । १२ । और प्रतीक वाले मन्त्रों को गो० उ० ३ । १६ टिप्पणी
२ में देखो ॥
कण्डिका ५ ॥
अथ यदौपासनं तृतीयसवन उपास्यन्ते पितॄनेव तेन प्रीणाति । उपांशु
पात्नीवतस्याग्नीध्रो यजति, रेतो वै पात्नीवतः, उपांश्विव वै रेतः सिच्यते, तन्ना-
कण्डिका ५ ॥ एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में पात्नीवत
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ५ ४२१
'नुवषट्करोति, नेद्रेतः सिक्तं संस्थापयामीति, असंस्थितमिव वै रेतः सिक्तं
समृद्धम् । संस्था वा एषा, यदनुवषट्कारः । तस्मान्नानुवषट् करोति । नेष्टुरु-
पस्थे धिष्ण्यान्ते वासीनो भक्षयति, १ पत्नीभाजनं वै नेष्टा, अग्नीत् पत्नीषु रेतो
धत्ते, रेतसः सिक्ताः प्रजाः प्रजायन्ते प्रजानां प्रजननाय । प्रजावान् प्रजनयिष्णु-
र्भवति प्रजात्यै । प्रजायते प्रजया पशुभिः, य एवं वेद ॥ ५ ॥
कण्डिका ५ ॥ एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में पात्नीवत
स्तोत्र को आग्नीध्र का चुपके चुपके जपने का कारण ॥
( अथ यत् औपासनं तृतीयसवने उपास्यन्ते, पितॄन् एव तेन प्रीणाति ) फिर
जो उपासना वाले स्तोत्र को तीसरे सवन में वे [ ऋत्विज् लोग ] सेवन करते हैं, पितरों
[ पालन करने वाले विद्वानों ] को ही उस से वह [ यजमान ] तृप्त करता है । ( पात्नी-
वतस्य उपांशु आग्नीध्रः यजति ) पात्नीवत [ पत्नी शब्द वाले स्तोत्र ] के उपांशु
[ शब्द बिना किये जप से ] आग्नीध्र [ अग्नि प्रकाशक ऋत्विज् ] यज्ञ करता है । ( रेतः
वै पात्नीवतः, उपांशु इव वै रेतः सिच्यते, तत् न अनुवषट् करोति ) वीर्य [ के
सामान ] ही पात्नीवत [ पत्नी शब्द वाला स्तोत्र ] है, बिना शब्द किये [ बिना घबराहट ]
ही वीर्य सींचा जाता है, इस लिये वह अनुवषट् नहीं करता । ( सिक्तं रेतः नेत् संस्था-
पयामि इति, असंस्थितम् इव वै सिक्तं रेतः समृद्धम् ) सींचते हुये वीर्य को मैं नहीं
रोकता हूँ [ ऐसा वह विचारता है ], बिना रुका हुआ ही सींचा हुआ वीर्य सफल होता है।
( संस्था वै एषा, यत् अनुवषट्कारः ) यह रुकावट है जो अनुवषट्कार है । ( तस्मात्
न अनुवषट् करोति ) इस लिये वह अनुवषट् नहीं करता है । ( नेष्टुः उपस्थे
धिष्ण्यान्ते वा आसीनः भक्षयति ) नेष्टा [ ऋत्विज् ] के समीप अथवा धिष्ण्य [ नाम
वाली अग्नि ] के समीप बैठा हुआ वह [ आग्नीध्र ] भोजन करता है । ( पत्नीभाजनं
वै नेष्टा, अग्नीत् पत्नीषु रेतः धत्ते ) पत्नियों का स्थान ही नेष्टा है, अग्नीत् [ अग्नि
प्रज्वालन मन्त्र वा विचार ] पत्नियों में वीर्य स्थापित करता है । ( रेतसः सिक्ताः प्रजाः
प्रजानां प्रजननाय प्रजायन्ते ) वीर्य से सींचें हुये प्रजायें प्रजाओं की उत्पत्ति के लिये
उत्पन्न होती हैं । ( प्रजनयिष्णुः प्रजावान् प्रजात्यै भवति ) सन्तान उत्पन्न करने वाला
पुरुष सन्तानोत्पत्ति के लिये सन्तान वाला होता है । ( प्रजया पशुभिः प्रजायते यः एवं
वेद ) सन्तान से और पशुओं से वह बढ़ता जो ऐसा जानता है ॥ ५ ॥
५--( औपासनम् ) उपासना-अण् । उपासनायुक्तं स्तोत्रम् ( उपा-
स्यन्ते ) आर्षं दिवादित्वम् । उपासते । सेवन्ते ( उपांशु ) निर्जने । निजश्रवण-
योग्येन जपेन ( पात्नीवतः ) पत्नीवत्--अण् । पत्नीशब्देन युक्तं स्तोत्रम् ( रेतः)
वीर्यम् ( नेत् ) नैव ( संस्थापयामि ) संस्थितं करोमि । निरुणध्मि ( असंस्थि-
तम् ) अनुपरतम् ( समृद्धम् ) सफलम् ( संस्था ) स्थितिः । निवृत्तिः ( उपस्थे )
समीपे ( पत्नीभाजनम् ) पत्नीनां स्थानवान् ( अग्नीत् ) अग्निप्रज्वालनस्य मन्त्रो
१. पूं. सं. "भक्षयन्ति" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ६ ॥
४२२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ६ ॥
भावार्थः—मनुष्य विचार पूर्वक उत्तम सन्तान उत्पन्न करके वयोवृद्ध और विद्यावृद्ध
पितरों को सेवा से तृप्त करे ॥ ५ ॥
विशेष :—इस कण्डिका को मिलाओ, ऐ० ब्रा० ६ । ३ अन्तिम भाग ॥
कण्डिका ६ ॥
अथ शाकलां जुह्वति । तद्यथाहिर्जीर्णायास्त्वचो निर्मुच्येत इषीका वा
मुञ्जात्, एवं हैवँते सर्वस्मात्पाप्मनः सम्प्रमुच्यन्ते, ये शाकलां जुह्वति । द्रोणक-
लशे धाना भवन्ति, तासां हस्तैरादधति । पशवो वै धानाः, ता आहवनीयस्य
भस्मान्ते निर्वपन्ति । योनिर्वै पशूनामाहवनीयः, स्व एवैनां१स्तद्गोष्ठे निरपक्रमे
निदधति । अथ स व्यावृतोऽप्सु सोमानाप्याययन्ति, तान् ह अन्तर्वेद्यां साद-
यन्ति, तद्धि सोमस्यायतनम् । चात्वालादपरेणऽध्वर्य्युश्चमसानद्भिः पूरयित्वो-
दीचः प्रणिधाय हरितानि तृणानि व्यवदधाति । यदा वा आपश्चौषधयश्च सङ्ग-
च्छन्ते, अथ कृतस्नः सोमः सम्पद्यते । ता वैष्णव्यर्चा निनयन्ति । यज्ञो वै विष्णुः,
यज्ञमेवैनमन्ततः प्रतिष्ठापयति । अथ यद्वृक्षः प्रतिनिधिं कुर्वन्ति, मानुषेणैवैर्न
तद्वृक्षेण दैवं भक्षमन्तर्दधति ॥ ६ ॥
कण्डिका ६ ॥ तृतीय सवन में शाकला इष्टि ॥
( अथ शाकलां जुह्वति ) फिर शाकला [ शक्ति वाली इष्टि ] को वे [ याजक ]
करते हैं । ( तत् यथा अहिः जीर्णायाः त्वचः वा इषीका मुञ्जात् निर्मुच्येत, एवं
ह एव एते सर्वस्मात् पाप्मनः सम्प्रमुच्यन्ते, ये शाकलां जुह्वति ) सो जैसे सांप
पुरानी केंचूरी से अथवा सरकण्डा मुंज [ के छिलका ] से छूट जाता है, ऐसे ही वे लोग
सब पाप से सर्वथा छूट जाते हैं, जो शाकला [ शक्ति वाली इष्टि ] को करते हैं । ( द्रोण-
कलशे धानाः भवन्ति, तासां हस्तैः आदधति ) द्रोण कलश [ काठ के घड़े ] में भुंजे जौ
होते हैं, उनको हाथों से लेकर वे धरते हैं । ( पशवः वै धानाः, ताः आहवनीयस्य
भस्मान्ते निर्वपन्ति ) पशुओं [ के समान ] ही भुंजे जौ हैं, उनको आहवनीय [ अग्नि ] के
भस्म निकलने पर वे छोड़ते हैं । ( पशूनां योनिः वै आहवनीयः, स्वे निरपक्रमे गोष्ठे
विचारो वा ( प्रजनयिष्णुः ) णेश्छन्दसि ( पा० ३ । २ । १३७ ) प्रजनयतेः-
इष्णुच् प्रजनयिता । जनकः ( प्रजायै ) सन्तानोत्पत्तये ॥
६-( शाकलाम् ) शकिशम्योर्नित् ( उ० १ । ११२ ) शकॢ शक्तौ--कल-
प्रत्ययो नित्, शकल--अण्, टाप् । शकलेन सामर्थ्येन युक्ताम् इष्टिम् ( अहिः )
सर्पः ( इषीका ) ईषेः किद्वह्रस्वश्च ( उ० ४ । २१ ) ईष गतौ-ईकन्, टाप्,
ह्रस्वश्च । मुञ्जशलाका ( पाप्मनः ) पापात् ( द्रोणकलशे ) द्रोणं द्रुममयम्-
निरु० ५ । २६ । काष्ठमये कलशे ( धानाः ) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः ( उ० ३ । ६ )
१. पू. सं० 'एनन्' इति पाठः '॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ७ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ७ ॥ ४२३
एव एनान् तत् निदधति ) पशुओं के घर [ के समान ] ही आहवनीय अग्नि
है, भागने के मार्ग रहित अपनी गोशाला में इन [ पशुओं ] को तब वे बाँधते हैं। ( अथ
सः [ ते ] व्यावृतः अप्सु सोमान् आप्याययन्ति, तान् ह अन्तर्वेद्यां सादयन्ति, तत् हि
सोमस्य आयतनम् ) फिर वे लोग निवृत्त होकर जल में सोमों [ ओषधियों ] को बढ़ाते
हैं, और उनको भीतर की वेदी पर रखते हैं, वह ही सोम का घर है । ( अध्वर्युः चात्वा-
लात् अपरेण चमसान् अद्भभः पूरयित्वा उदीचः प्रणिधाय हरितानि तृणानि व्यवद-
धति ) अध्वर्यु चात्वाल [ यज्ञकुण्ड ] से दूसरे [ ऋत्विज् ] के साथ पात्रों को जल से
भरवा कर उत्तर वाले स्थान में रख कर हरी घासों को बीच में रखता है। ( यदा वै आपः
च ओषधयः च सङ्गच्छन्ते, अथ कृत्स्नः सोमः सम्पद्यते ) जब ही जल और ओषधियाँ
मिल जाते हैं, तब सब सोम [ओषधियों का रस] प्राप्त होता है। ( ताः वैष्णव्या ऋचा
निनयन्ति ) उस [ जल ] को विष्णु देवता वाली ऋचा से नितार देते हैं । ( यज्ञः वै
विष्णुः, यज्ञम् एव एनम् अन्ततः प्रतिष्ठापयति ) यज्ञ ही विष्णु [व्यापक पदार्थ ] है,
यज्ञ को ही इस [ सोमरस ] में अन्त में वह स्थापित करता है। ( अथ यत् भक्षः प्रतिनिधिं
कुर्वन्ति, मानुषेण एव भक्षेण तत् एनं दैवं भक्षम् अन्तर्दधति ) फिर जब भोजन को
प्रतिनिधि [ सोम का स्थानी ] वे करते हैं, मनुष्यों के योग्य भोजन के साथ ही तब इस
दिव्य भोजन [ सोम ] को भीतर धरते हैं ॥ ६ ॥
भावार्थः—जो मनुष्य अपनी शक्ति को काम में लातें हैं, वे ही कष्टों को हटाकर
सोम रस [ अमृत रस वा तत्त्व रस ] पाते हैं ॥ ६ ॥
कण्डिका ७ ॥
पूर्तिर्वा एषोऽमुष्मिँल्लोकेऽध्वर्युश्च यजमानश्चाभिवहति, तद्यदेनं दध्नानभि-
हुत्यावभृथमुपहरेयुः। यथा कुणपं वाति, एवमेवैनं तत् करोति। अथ यदेनं
दध्नानभिहुत्यावभृथमुपहरन्ति, सर्वमेवैनं सयोनि सन्तनुते, समृद्धिं सम्भरन्ति ।
अभूद्देवः सविता वन्द्योनु¹ न इति जुहोति, सर्वमेवैनं सपर्वाणं सम्भरन्ति² । तिसृ-
भिस्त्रिवृद्भिर्यज्ञो द्रप्सवतीभिरभिजुहोति, सर्वमेवैनं सर्वाङ्गं सम्भरति । सौमी-
भिरभिजुहोति, सर्वमेवैनं सात्मानं संभरति। पञ्चभिरभिजुहोति, पाङ्क्तो यज्ञः।
यज्ञमेवावरुन्धे । पाङ्क्तः पुरुषः, पुरुषमेवाप्नोति । पांङ्क्ताः पशवः, पशुष्वेव प्रति-
तिष्ठति । प्रतितिष्ठति प्रजया पशुभिः य एवं वेद ॥ ७ ॥
दधातेः—तः, टाप् । भृष्टयवाः ( योनिः ) गृहम्—निघ० ३ । ४ । ( निरपक्रमे )
पलायनमार्गरहिते ( व्यावृतः ) निवृत्तः ( सादयन्ति ) स्थापयन्ति ( चात्वालात् )
यज्ञकुण्डात् ( चमसान् ) पात्राणि (व्यवदधति) दध धारणे—लट् । व्यवधानेन स्थाप-
यति ( वैष्णव्या ) विष्णुदेवताकया ( भक्षः ) भक्ष अदने—घञ् । भक्षणीयं पदार्थम्
( प्रतिनिधिम् ) प्रतिरूपं स्थानिनम् ( मानुषेण ) मनुष्ययोग्येन ॥
१. पू सं. “नू” इति पाठः ॥ २. 'सम्भरति' इति पाठोऽत्र समुचितः ॥सम्पा०॥
कण्डिका ७ ॥ अध्वर्यु और यजमान की शुद्धि और
४२४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ७
कण्डिका ७ ॥ अध्वर्यु और यजमान की शुद्धि और
अवभृथ स्नान ॥
(एषो पूतिः वै अमुष्मिन् लोके अध्वर्युं च यजमानं च अभिवहति, तत् यत्
एनं दध्ना अनभिहुत्य अवभृथम् उपहरेयुः) यह ही शुद्धि निश्चय करके उस [स्वर्ग]
लोक में अध्वर्युं और यजमान को सर्वथा ले जाती है, सो जब इस [यजमान] को, दधि
[नामवाली हवि] से हवन न करके, अवभृथ [यज्ञान्त स्नानशाला] में वे ले जावें।
(यथा कुणपं वाति, एवम् एव एनं तत् करोति) जैसे उपकारी पुरुष को मनुष्य प्राप्त
होता है, वैसे ही इस [यजमान] को वह [स्नान, उपकार] करता है। (अथ यत् एनं
दध्ना अनभिहुत्य अवभृथम् उपहरन्ति, सयोनिं सर्वम् एव एनं सन्तनुते, समृद्धिं सम्भ-
रन्ति) फिर जब इस [यजमान] को, दधि [नाम वाली हवि] से हवन न करके, अव-
भृथं [यज्ञान्त स्नानशाला] में वे ले जाते हैं, घर सहित सब ही इस [यजमान] को
वह [अध्वर्युं] यथावत् बढ़ाता है और समृद्धि [सम्पत्ति] को यथावत् पुष्ट करता है।
(अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु नः इति जुहोति, सपर्वाणं सर्वम् एव एनं सम्भ-
रति) अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु नः•••• इस वेद मन्त्र से वह हवन करता है, और
जोड़ों सहित सब ही इस [यजमान] को वह यथावत् पुष्ट करता है। (तिसृभिः
त्रिवृद्भिः द्रप्सवतीभिः अभि जुहोति, सर्वाङ्गं सर्वम् एव एनं सम्भरति) तीन तीन
बार वर्तमान द्रप्सवतियों से [द्रप्स शब्द वाली ऋचाओं से जैसे-द्रप्सश्चस्कन्द•••••
इत्यादि,-ऋ० १० । १७ । ११-१३] वह सर्वथा हवन करता है, अङ्गों सहित सब
ही इस [यजमान] को वह यथावत् पुष्ट करता है। (सौमीभिः अभिजुहोति,
सात्मानं सर्वम् एव एनं संभरति) सौमियों से [सोम देवता वाली ऋचाओं से, जैसे--
त्वं सोम प्रचिकितो••• इत्यादि ऋ० १ । ६१ । १-२३] सब प्रकार हवन करता है,
आत्मा [आत्मबल, पुरुषार्थ] सहित सब ही इस [यजमान] को वह पुष्ट करता है।
(पञ्चभिः अभिजुहोति, पाङ्क्तः यज्ञः, यज्ञम् एव अवरुन्धे) पाँच [उन १-२३ मन्त्रों
में से पाँच ऋचाओं] से वह सब प्रकार हवन करता है, पाङ्क्त [पङ्क्ति, विस्तार वाला] यज्ञ
है, यज्ञ को ही वह प्राप्त होता है। (पाङ्क्तः पुरुषः, पुरुषम् एव आप्नोति) पाङ्क्तः
[पङ्क्ति, विस्तार वाला] पुरुष है, पुरुष को ही वह पाता है। (पाङ्क्ताः पशवः, पशुपु
७-(पूतिः) पूञ् शोधने--क्तिन्। शुद्धिः। पवित्रव्यवहारः (एषो) एषा
उ। एषा एव (अभिवहति) सर्वतो नयति (दध्ना) दधिनामकेन हविषा (अव-
भृथम्) अवे भृञः (उ० २ । ३) अव + डुभृञ् धारणपोषणयोः-क्यन्। यज्ञा-
न्तस्नानम् (कुणपम्) क्वणेः सम्प्रसारणञ्च (उ० ३ । १४३) क्वण शब्दोपकरणयोः-
कपन्। उपकारिणम् (वाति) गच्छति। प्राप्नोति (सयोनिम्) सगृहम् (सम्भ-
रन्ति) सम्यक् पोषयन्ति (सविता) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (नु) क्षिप्रम् (सपर्वा-
णम्) शरीरग्रन्थिभिः सहितम् (द्रप्सवतीभिः) द्रप्सशब्दयुक्ताभिः (सौमीभिः)
सोमदेवताकाभिः (सात्मानम्) आत्मबलेन पुरुषार्थेन सहितम् (अवरुन्धे)
प्राप्नोति ॥
कण्डिका ८ ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ८ ४२५
एव प्रतितिष्ठति ) पाङ्क्त [ पङ्क्ति, विस्तार वाले ] पशु हैं, पशुओं में ही वह प्रतिष्ठा
पाता है । ( प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति, यः एवं वेद ) प्रजा से और पशुओं से वह
प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा जानता है ॥ ७ ॥
भावार्थः-मनुष्य आत्मशुद्धि अर्थात् निष्कपट आचरण से कुटुम्बियों और सेना
आदि प्रजाओं और गो घोड़े आदि पशुओं को बढ़ाकर संसार में प्रतिष्ठा पावे । [ पाङ्क्त
शब्द का अर्थ पङ्क्ति, पाँच वा विस्तार वाला है ] ॥ ७ ॥
विशेषः-प्रतीक वाला मन्त्र अर्थ सहित लिखा जाता है। अन्य सङ्केतित मन्त्र वेद
में देखो ॥
१-अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह्न उपवाच्यो नृभिः ।
वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत्-ऋ० ४।५४।१ ॥
( देवः ) दिव्य गुण वाला ( सविता ) सविता [सर्वप्रेरक परमात्मा] ( नु ) शीघ्र (अह्नः)
दिन के ( इदानीम् ) इस समय ( नः ) हमारा ( वन्द्यः ) वन्दना योग्य और ( नृभिः )
नेता मनुष्यों से ( उपवाच्यः ) सादर कहने योग्य ( अभूत् ) है, ( यः ) जो [ सविता
परमात्मा ] ( मानवेभ्यः ) मननशीलों के लिए ( रत्ना ) रत्नों [ रमणीय धनों ] को
( यथा ) जैसे ( वि भजति ) बाँटता है, [ वैसे ही ] वह [ परमात्मा ] ( नः ) हमको
( अत्र ) यहाँ ( श्रेष्ठं द्रविणम् ) श्रेष्ठ धन वा यश ( दधत् ) देवे ॥
कण्डिका ८ ॥
अग्निर्वाव यम इयं यमी। कुसीदं वा एतद्यमस्य यजमान आदत्ते, यदो-
षधीभिर्वेदिं स्तृणाति। तां यदनुपोष्य प्रयायात्, यातयेरन्नेनममुष्मिंल्लोके यमे
यत् कुसीदमयमित्यमप्रतीतमिति वेदिमुपोषन्तीहैव सन्यमङ्कुसीदं निरवदाय
अनृणो भूत्वा स्वर्गं लोकमेति । विश्वलोप विश्वदावस्य त्वा सं जुहोमीत्याह, होताद्वा
यजमानस्यापराभवाय यद्दु मिश्रामिव चरन्त्यञ्जलिना सक्तून् प्रदाव्ये जुहुयात्। एष
ह वा अग्निवैश्वानरो यत् प्रदा१व्यः, स्वस्यामेवैनं तद्योन्यां सादयति ॥ ८ ॥
कण्डिका ८ ॥ वेदी पर ओषधी स्थापन और सक्तुओं से होम ॥
( अग्निः वाव यमः इयं यमी ) अग्नि निश्चय करके यम [जोड़िया भाई के समान]
और यह [ वेदी ] यमी [ जोड़िया बहिन के समान ] है। ( यजमानः यमस्य एतत् वै
कुसीदम् आदत्ते, यत् ओषधीभिः वेदिं स्तृणाति ) यजमान यम [ अग्नि ] का यह व्याज
वाला ऋण ही लेता है, जो ओषधियों [ हव्य पदार्थों ] से वेदी को ढकता है। ( यत् ताम्
अनुपोष्या प्रयायात्, एनम् अमुष्मिन् यमे लोके यातयेरन्, यत् कुसीदमयम् इति
अप्रतीतम् इति वेदिम् उपोषन्ति, इह एव सन्यमन् कुसीदं निरवदाय अनृणः भूत्वा
८-( यमः ) यम परिवेषणे--अच् । एकगर्भजायमानो यमजो भ्राता
( इयम् ) वेदिः ( यमी ) यम-ङीष् । एकगर्भजायमाना यमजा भगिनी ( कुसी-
दम् ) कुसेरुम्भोमेदेताः ( उ० ४ । १०६ ) कुस संश्लेपणे--ईदप्रत्ययः। वृद्धिजीविक-
१. पू. सं. "प्रदातव्यः" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
कण्डिका ९ ॥
४२६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ९ ॥
स्वर्गं लोकम् एति ) जो उस [ वेदी ] को उष्ण न करके वह [ यजमान ] चला जावे, उस
[ यजमान ] को ही उस यमलोक में ताड़ना करें, जो ब्याज वाला ऋण है वह रोग के ज्ञान
से युक्त है—ऐसा विचार कर वेदी को उष्ण करते हैं, यहाँ ही संयम [ इन्द्रियनिग्रह ] करता
हुआ ब्याज वाले ऋण को चुकाकर बिना ऋण होकर वह [ यजमान ] स्वर्गं लोक पाता है।
( विश्वलोप विश्वदावस्य त्वा सं जुहोमि--इति आह ) हे विश्व के नाश करने वाले
[ अग्नि ! ] तुझ विश्वतापक को मैं अच्छे प्रकार होम करता हूं—यह [ ब्राह्मण वचन ] वह
बोलता है। ( होता अद्धा यजमानस्य अपराभवाय, यत् उ मिश्रम् इव चरन्ति,
अञ्जलिना सक्तून् प्रदाव्ये जुहुयात् ) होता साक्षात् यजमान के जिताने के लिये है, जो
मिश्र [ मिले हुए अन्न ] को वे चरु [ हव्य पदार्थ ] बनावें, अञ्जलि से [ दोनों हाथ मिलाये
हुए ] सक्तु [ भुंजे हुए जौ आदि चूर्ण ] को तपाने में कुशल [ अग्नि ] में हवन करे ।
( एषः ह वै वैश्वानरः अग्निः यत् प्रदाव्यः, तत् स्वस्याम् एव योन्याम् एनं सादयति )
यह ही वैश्वानर [ सब नरों का हितकारी ] अग्नि है, जो तपाने में कुशल है, तब वह
[ अग्नि ] अपने ही घर में इस [ यजमान ] को स्थापित करता है ॥ ८ ॥
भावार्थः—जैसे यज्ञ में आहुति देने से अग्नि तृप्त होकर यजमान को स्वर्गं लोक में
पहुँचाता है, वैसे ही अन्न के भोजन से जठराग्नि तृप्त होकर प्राणी को पुष्ट करता है ॥८॥
कण्डिका ९ ॥
अह्नां विधान्यामेकाष्टकायामपूपञ्चतुःशरावं पक्त्वा प्रातरेतेन कक्षमुपोषेत्।
यदि दहति पुण्यसमं भवति, यदि न दहति पापसमं भवति । एतेन ह स्म वा अङ्गि-
रसः पुरा विज्ञानेन दीर्घसत्रमुपयन्ति । यो ह वा उपद्रष्टारमुपश्रोतारमनुख्यातारमेव
विद्वान् यजते, समममुष्मिल्लोक इष्टापूर्तेन गच्छते । अग्निर्व्वा उपद्रष्टा, वायुर्वा उप-
श्रोता, आदित्यो वा अनुख्याता, तान्य एवं विद्वान्यजते, समममुष्मिल्लोक इष्टापूर्तेन
गच्छते अयन्त्रो नभसस्पतिरित्याह, अग्निर्वै नभसस्पतिरग्निमेव तदाह । एतन्नो गोपा-
कासहितम् ऋणम् ( आदत्ते ) गृह्णाति ( अनुपोष्या ) अनु+उप+उष दाहे--ल्यप् ।
अदग्ध्वा ( प्रयायात् ) प्रगच्छेत् ( यातयेरन् ) यत ताडने--वि० लि०। हन्युः।
ताडनां पीडां कुर्युः ( कुसीदमयम् ) ऋणमयं कर्म ( अप्रतीतम् ) अम रोगे--
घञ्+प्रति+इण् गतौ--क्तः। रोगप्रतीतियुक्तम् ( उपोषन्ति ) उपेत्य दहन्ति
( संयमन् ) सम्+यम नियमे--शतृः । संयममिन्द्रियनिग्रहं कुर्वन् ( निर-
वदाय ) निर्+अव+दो अवखण्डने--ल्यप् । शोधयित्वा ( विश्वलोप ) विश्वस्य
संसारस्य लोपो नाशो यस्मात् तत् सम्बुद्धौ ( विश्वदावस्य ) दुञ्योरनुपसर्गे ( पा०
३।१।१४२ ) दुञ् उपतापे--णः । सर्वोपतापकम् ( अद्धा ) साक्षात् । अवधारणेन
( अपराभवाय ) अपराजयाय ( मिश्रम् ) मिश्रितमन्नम् ( चरन्ति ) चरुं हव्यान्नं
कुर्वन्ति ( सक्तून् ) सितनिगममिसिसच्चवि० ( उ० १।६६ ) षच सेचने--तुन् ।
भृष्टयवादिचूर्णम् ( प्रदाव्ये ) तत्र साधुः ( पा० ४।४।६८ ) प्रदाव--यत् ।
प्रकर्षेण दाहकुशले अग्नौ ( वैश्वानरः ) सर्वनरहितः ( प्रदाव्यः ) प्रदाहकुशलः
( सादयति ) स्थापयति ॥
कण्डिका ९ ॥ एकाष्टका इष्टि और दो अरणियों से अग्निसमारोपण
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ६ ॥ ४३७
येति स त्वं नो नभसस्पतिरित्याह, वायुर्वै नभसस्पतिर्वायुमेव तदाह । एतन्नो गोपायेति
देव संस्फानित्याह, आदित्यो वै देवःसंस्फानः, आदित्यमेव तदाह । एतन्नो गोपायेत्ययं ते
योनिरिति, अरण्योरग्निं समारोपयेत् । तदाहुः, यदरण्योः समारूढो नश्येदुदस्याग्निः
सीदेत् पुनराधेयः स्यादिति । या ते अग्नेयँज्ञिया तनूस्तया मे ह्यारोह तया मे
ह्याविशायन्ते योनिरित्यात्मन्नग्नीन् समारोपयेत् । एष ह वा अग्नियोंनिः, स्वस्यामेवैनं
तद्योन्यां सादयति ॥ ६ ॥
कण्डिका ९ ॥ एकाष्टका इष्टि और दो अरणियों से अग्निसमारोपण
( अह्नां विधान्याम् एकाष्टकायां चतुःशरावम् अपूपं पक्त्वा प्रातः कक्षम् उ
पोषेत् ) दिनों [ यज्ञदिनों ] के विधान करने वाली एकाष्टका में [ सप्तमी आदि तीन
तिथियों में से किसी तिथि की इष्टि विशेष में ] चार शरावों में रखे हुए अपूप [ पक्वान्न ]
को पकाकर प्रातःकाल उससे पेट [ वेदी ] को ही पुष्ट करे । ( यदि दहति पुण्यसमं भवति,
यदि न दहति पापसमं भवति ) जो वह [ अग्नि ] जलता है, पुण्य सहित कर्म होता है,,
जो वह नहीं जलता, पाप सहित कर्म होता है । ( एतेन ह वै विज्ञानेन अङ्गिरसः पुरा
दीर्घसत्रम् उपयन्ति स्म ) इस ही विज्ञान [ सूक्ष्म विचार ] से अङ्गिराओं
[ महाविद्वानों ] ने पहिले समय में दीर्घसत्र [ बहुत समय वाले यज्ञ ] को प्राप्त किया
था । ( यः ह वै उपद्रष्टारम् उपश्रोतारम् अनुख्यातारम् एव विद्वान् यजते,
अमुष्मिन् लोके इष्टापूर्तेन समं गच्छते ) जो ही मनुष्य निश्चय करके समीप से
देखने वाले, समीप से सुनने वाले और लगातार जताने वाले को ही जानता हुआ यज्ञ करता
है, उस [ स्वर्ग ] लोक में इष्टापूर्त्त से [ अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, देवमन्दिर आदि कर्म
द्वारा ] सर्वथा जाता है । ( अग्निः वै उपद्रष्टा, वायुः वै उपश्रोता, आदित्यः वै अनु-
ख्याता, यः तान् एवं विद्वान् यजते, अमुष्मिन् लोके इष्टापूर्तेन समं गच्छते ) अग्नि
ही समीप से देखने वाला, वायु ही समीप से सुनने वाला और सूर्य ही लगातार जताने
वाला है, जो पुरुष उन को ऐसा जानता हुआ यज्ञ करता है, उस [ स्वर्ग ] लोक में इष्टा-
पूर्त से [ अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, देवमन्दिर आदि कर्म द्वारा ] सर्वथा जाता है । ( यन्नो
नभसस्पतिः इति आह, अग्निः वै नभसः पतिः अग्निम् एव तत् आह ) यन्नो नभ-
सस्पतिः--१, यह मन्त्र वह बोलता है, अग्नि ही आकाश का पालने वाला है, अग्नि को
ही तब वह यह कहता है । ( एतन्नो गोपाय इति, स त्वं नो नभसस्पतिः इति आह,
वायुः वै नभसः पतिः वायुम् एव तत् आह ) एतन्नो गोपाय—२, और, स त्वं नो
नभसस्पतिः--३, इन दो मन्त्रों को वह बोलता है, वायु ही आकाश का पालने वाला है,
वायु को ही वह यह कहता है । ( एतन्नो गोपाय इति, देव संस्फान—इति आह,
६--( अह्नाम् ) यज्ञदिनानाम् ( विधान्याम् ) विधानकारिकायाम् ( एका-
ष्टकायाम् ) इष्यशिभ्यां तकन् ( उ० ३ । १४८ ) अश भोजने अशू व्याप्तौ वा --
तकन्, टाप् । सप्तम्यादिदिनत्रयमध्य एकस्यां तिथौ । इष्टिविशेषे (अपूपम् )
अ+पूयी दुर्गन्धे भेदने विशरणे च---पप्रत्ययः । गोधूमदिचूर्णपिष्टकम् ( कक्षम् )
वेदिकक्षम् ( उ ) एव ( पोषेत् ) पोषयेत् ( पुण्यसमम् ) पुण्येन सहितं कर्म
ब्राह्मण में कुछ भेद से है ] ॥
आदित्यः वै देवः संस्फानः, आदित्यम् एव तत् आह ) एतन्नो गोपाय--४ और, देव
संस्फान--५, यह दो मन्त्र वह बोलता है, सूर्य ही प्रकाशमान और यथावत् बढ़ता हुआ है,
सूर्य को ही वह यह कहता है । ( एतन्नो गोपाय इति, अयन्ते योनिः इति अरण्योः
अग्निम् समारोपयेत् ) एतन्नो गोपाय--६ और, अयं ते योनिः--७ इन दो मन्त्रों से दो
अरणियों [ अग्नि मथने की लकड़ियों ] की अग्नि को समारोपित [ स्थापित ] करे । ( तत्
आहुः, यत् अरण्योः अस्य समारूढः अग्निः नश्येत् उत्सीदेत्, पुनः आधेयः स्यात् इति )
यह कहते हैं—जो दो अरणियों की निकली हुई इस [ यजमान ] की अग्नि बुझ जावे
[ अथवा वायु आदि से ] उड़कर बिखर जावे, फिर वह अग्न्याधान योग्य होवे । [ इसका
उत्तर ] ( या ते अग्नेर्यज्ञिया तनूस्तया मे ह्यारोह तया मे हि आविश, अयं ते योनिः
इति आत्मन् अग्नीन् समारोपयेत् ) या ते अग्नेर्यज्ञिया तनूः .....८ और, अयन्ते .
योनिः--६, इन दो मन्त्रों से आत्मा में अग्नियों को समारोपित करे [ अर्थात् भौतिक यज्ञ
न करे किन्तु मन्त्रों से आत्मिक यज्ञ करे ] । ( एषः ह वै अग्निः योनिः, तत् स्वस्याम्
एव योन्याम् एनं सादयति ) यह ही अग्नि [ आत्मिक अग्नि, इस यजमान का ] घर है,
तब वह [ अग्नि ] अपने ही घर में इस [ यजमान ] को स्थापित करता है ॥ ६ ॥
भावार्थः—यज्ञ, प्रज्वलित अग्नि में ही हवन करने से सफल होता है। यदि अग्नि
बुझ जावे, तो मन्त्रों से आत्मिक यज्ञ करना चाहिये ॥ ६ ॥
विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—अयं नो नभसस्पतिः संस्फानो अभि रक्षतु । अस्मातिं गृहेषु नः—अथर्व०
६ । ७६ । २ ॥ ( अयम ) यह ( नभसः ) सूर्य [ वा आकाश ] का ( पतिः ) स्वामी
परमेश्वर ( संस्फानः ) यथावत् बढ़ता हुआ ( नः ) हमारे लिये ( नः ) हमारे ( गृहेषु )
घरों में ( असमातिम् ) असामान्य [ विशेष ] लक्ष्मी वा वृद्धि को अभि ) सब ओर से
( रक्षतु ) रक्खे [ यह मन्त्र इस ब्राह्मण में कुछ भेद से है ] ॥
२—एतन्नो गोपाय--यह ब्राह्मण वचन है ॥
३—त्वं नो नभसस्पत ऊर्जं गृहेषु धारय । आ पुष्टमेत्वा वसु—अथर्व०
६ । ७६ । १ ॥ ( नभसः पते ) हे सूर्य [ वा आकाश ] के स्वामी ! ( त्वम् ) तू ' नः )
हमारे ( गृहेषु ) घरों में ( ऊर्जम् ) बल बढ़ाने वाला अन्न ( धारय ) धारण कर ।
( पुष्टम् ) पुष्टि ( आ ) और ( वसु ) धन ( आ एतु ) चला आवे [ यह मन्त्र इस
ब्राह्मण में कुछ भेद से है ] ॥
४—एतन्नो गोपाय—संख्या २ ऊपर देखो ॥
( अङ्गिरसः ) विद्वांसः ( दीर्घसत्रम् ) दीर्घकालिकयज्ञम् ( उपयन्ति स्म ) प्राप्त-
वन्तः ( उपद्रष्टारम् ) समीपेन अवलोकयितारम् ( उपश्रोतारम् ) उपश्रवण-
शीलम् ( अनुख्यातारम् ) निरन्तरज्ञापकम् ( इष्टापूर्तेन ) इष्टेन च पूर्तेन च ।
अग्निहोत्रवेदाध्ययनदेवमन्दिरादिकर्मणा ( समम् ) सर्वथा ( नभसः ) णह बन्धने
—असुन्, हस्य भः । नभ आदित्यो भवति—निरु० २ । १४ । सूर्यस्य । आका-
शस्य ( पतिः ) पालयिता ( गोपाय ) रक्ष ( देव ) हे प्रकाशमान ( संस्फान )
कण्डिका १० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १० ४२१
५--देव संस्फान सहस्रापोषस्येशिषे । तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि तस्य
भक्तिवांमः स्याम-अथ० ६ । ७६ । ३ ।। (संस्फान) हे सब प्रकार वृद्धि वाले (देव)
प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (सहस्रपोषस्य) सहस्र प्रकार के पोषण का (ईशिषे)
तू स्वामी है । (तस्य) उस [पोषण] का (नः) हमें (रास्व) दान कर, (तस्य)
उसका (नः) हमारे लिए (घेहि) धारण कर, (तस्य ते) उस तेरी (भक्तिभांसः)
भक्ति वाले (स्याम) हम होवें ॥
६-एतन्नो गोपाय-संख्या २ ऊपर देखो ॥
७-अयं ते योनिऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः । तं जानन्नग्र आ रोहाथा
नो वर्धया रयिम्--अथर्व० ३ । २० । १, ऋग्० ३ । २६ । १० और यजु० ३ ।
१४ ।। (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (अयम्) यह [सर्वव्यापी परमेश्वर ] (ते) तेरा
[ऋत्वियः] सब ऋतुओं में मिलने वाला (योनिः) कारण है, (यतः) जिससे (जातः)
प्रकट होकर (अरोचथाः) तू प्रकाशमान हुआ है, (तम्) उस [कारण] को (जानन्)
पहिचान कर (आरोह) ऊँचा चढ़, (अथ) और (नः) हमारे लिए (रयिम्) धन
(वर्धय) बढ़ा ॥
८-या ते अग्नेर्यज्ञिया तनूस्तया मे ह्यारोह तया मे ह्याविश-ब्राह्मण वचन
है । (अग्नेः) हे अग्नि [प्रकाश स्वरूप परमेश्वर ] (या ते) जो तेरा (यज्ञिया तनूः)
पूजनीय विस्तार है, (तया) उससे (मे) मेरे लिए (हि) अवश्य (आरोह) ऊँचा हो ।
और (तया) उससे (मे) मेरे लिए ही अवश्य (आविश) प्रवेश कर ॥
६--(अयं ते योनिः......) संख्या ७ ऊपर देखो ॥
कण्डिका १० ॥
यो ह वा अग्निष्टोमं साह्नं वेद, अग्निष्टोमस्य साह्नस्य सायुज्यं सलोक-
तामश्नुते य एवं वेद, यो ह वा एष ऽपत्येषोऽग्निष्टोम एष साह्नः, तं ह्यैवाह्ना
संस्थापयेयुः, साह्नो वै नामैषः, तेनासन्त्वरमाणाश्चरेयुः यद्व वा इदं पूर्वयोः सव-
नयोरसन्त्वरमाणाश्चरन्ति, तस्माद् धेदं तं प्राच्यो ग्रामता बहुलाविष्टा । अथ
यद्धेदं तृतीयसवने सन्त्वरमाणाश्चरन्ति, तस्माद्धेदं प्रत्यञ्चेदीर्घारण्यानि भवन्ति ।
यथैव प्रातःसवन एवं माध्यन्दिनसवन एवं तृतीयसवने, एवमु ह यजमानो
ऽप्रमायुको भवति । तेनासन्त्वरमाणाश्चरेयुः । यदा वा एष प्रातरुदेत्यथ मन्द्रतमं
तपति, तस्मान्मन्द्रतमया वाचा प्रातःसवने शंसेत् । अथ यदाम्येत्यथ वलीयस्त-
पति, तस्माद् बलीयस्या वाचा माध्यन्दिने सवने शंसेत् । अथो यदामितरामेत्यथ
सम्+ स्फायी वृद्धौ-क्तः । छान्दसं रूपम् । हे सम्यक् स्फीत । प्रवृद्ध (अरण्योः)
अर्तिसृधू० (उ० २।१०२) ऋ गतो-अनिः । अग्निमन्थनकाष्ठद्वयोः (समा-
रोपयेत्) स्थापयेत् (उत्सीदेत्) वायुना उद्गत्य विशीर्णो भवेत् (आधेयः)
अग्न्याधानेन स्थापनीयः (अग्नेः) हे अग्ने (यज्ञिया) यज्ञयोग्या (तनूः) f मूर्तिः ।
शरीरम् ॥
कण्डिका १० ॥ अग्निष्टोम सूर्य समान है, तीनों सवनों में
४१० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १०
बलिष्ठतमं तपति, तस्माद् बलिष्ठतमया वाचा तृतीयसवने शंसेत् । एवं शंसेत्,
यदि वाच ईशीत१, वाग् हि शस्त्रं, यायान् वाचोत्तरण्योत्तरया उत्सहेत, आसमापनाय-
तना प्रतिपद्येत । एतत् सुशस्ततरमिव भवति, स वा एष न कदाचनास्तमयति, नोद-
यति । तद्यदेनं पश्चादस्तमयतीति मन्यन्ते, अह्न एव तदन्तं गत्वात्मानं विपर्य्यस्यतेऽ-
हरेवाधस्तात् कृणुते रात्रीं परस्तान् । स वा एष न कदाचनास्तमयति नोदयति ।
तद्यदेनं पुरस्तादुदयतीति मन्यन्ते, रात्रेरेव तदन्तं गत्वाथात्मानं विपर्य्यस्यते रात्रि-
मेवाधस्तात् कृणुतेऽहः परस्तात् । स वा एष न कदाचनास्तमयति नोदयति न ह वै
कदाचन निम्लोचति । एतस्य ह सायुज्यं सलोकतामश्नुते, य एवं वेद ॥ १० ॥
कण्डिका १० ॥ अग्निष्टोम सूर्य समान है, तीनों सवनों में
मन्त्र बोलने का विधान, सूर्य न कभी उदय और न
अस्त होता है, इसका विचार ॥
( यः ह वै साह्नम् अग्निष्टोमं वेद साह्नस्य अग्निष्टोमस्य सायुज्यं सलोक-
ताम् अश्नुते, यः एवं वेद ) जो ही मनुष्य दिन सहित [ दिन में पूर्ण होने वाले ] अग्नि-
ष्टोम को जानता है, वह दिन सहित अग्निष्टोम का सहवास और समान लोक पाता है,
जो ऐसा जानता है। ( यः ह वै एषः तपति, एषः एषः साह्नः अग्निष्टोमः, तम्
अह्ना सह संस्थापयेयुः ) जो ही यह [दीखता हुआ सूर्य] तपता है, सो ही यह दिन सहित
[ दिन में पूरा होने वाला ] अग्निष्टोम है, [ इसलिये ] उस [ अग्निष्टोम ] को दिन ही
दिन में पूरा करें । ( साह्नः वै नाम एषः, तेन असन्त्वरमाणाः चरेयुः ) साह्न
[ दिन में रहने वाला ] ही नाम यह [अग्निष्टोम] है, इसलिए [उसको] बिना शीघ्रता किये
हुए [भले प्रकार देख भाल कर] करें । ( यत् ह वै इदं पूर्वयोः सवनयोः असन्त्वरमाणाः
चरन्ति, तस्मात् ह इदं तं प्राच्यः ग्रामता बहुलाविष्टा) जो ही इस कर्म को पहिले दो
सवनों में बिना शीघ्रता किये हुये वे करते हैं, इसलिये ही इससे उस [यजमान] के लिए पूर्व
देश में रहने वाला ग्राम समूह बहुत जनों से परिपूर्ण होता है । ( अथ यत् ह इदं तृतीय-
सवने सन्त्वरमाणाः चरन्ति, तस्मात् ह इदं प्रत्यञ्चेत्, दीर्घारण्यानि भवन्ति )
फिर जब इस कर्म को तीसरे सवन में शीघ्रता करते हुये वे करें, उससे ही यह कर्म पश्चिम
देश में जावे और [ वहां ] बड़े बड़े वन [ निर्जन देश ] हो जावें । ( यया एव
१०-( साह्नम् ) अह्ना सह वर्त्तमानम् । एकेन दिनेन सह समापनी-
यम् ( सायुज्यम् ) सहवासम् ( सलोकताम् ) समानलोकत्वम् ( एषः ) दृश्य-
मानः सूर्य्यः ( संस्थापयेयुः ) समापयेयुः ( असन्त्वरमाणाः ) त्वरामकुर्वन्तः,
सम्यक् पर्यालोचयन्तः ( चरेयुः ) अनुतिष्ठेयुः ( प्राच्यः ) प्राची । पूर्वदिग्वर्तिनी
( ग्रामता ) ग्रामसमूहः ( बहुलाविष्टाः ) बहुभिर्जनैः सम्पूर्णाः ( सन्त्वरमाणाः )
अतित्वरया सह वर्त्तमानाः ( प्रत्यञ्चेत् ) पश्चिमदिशि प्राप्नुयात् ( दीर्घारण्यानि )
१. पू. सं. "ईशत" इति पाठः ॥ २. पू. सं. "एतत् सह" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १० ४३१
प्रातःसवने, एवं माध्यन्दिने सवने, एवं तृतीयसवने, एवम् उ ह यजमानः
अप्रमायुकः भवति ) जैसा ही प्रातःसवन में होवे, वैसा ही माध्यन्दिन सवन में और वैसा
ही तृतीयसवन में [ बिना शीघ्रता किये ] होवे, इस प्रकार से ही यजमान बिना अचानक
मृत्यु वाला होता है । ( तेन असन्त्वरमाणाः चरेयुः ) इसलिये बिना शीघ्रता किये हुये
वे [ ऋत्विज् लोग अग्निष्टोम को ] करें । ( यदा वै एषः प्रातः उदेति, अथ मन्द्रतमं
तपति, तस्मात् मन्द्रतमया वाचा प्रातःसवने शंसेत् ) जब ही यह [ सूर्य ] प्रातःकाल
निकलता है तब वह मन्द मन्द तपता है, इसलिये अति मन्द वाणी से प्रातःसवन में वह
[ स्तोत्र ] बोले । ( अथ यदा अभ्येति अथ बलीयः तपति, तस्मात् बलीयस्या वाचा
माध्यन्दिने सवने शंसेत् ) फिर जब वह [ सूर्य ] ऊंचा चढ़ता है तब वह [ दोपहर को ]
अधिक प्रबल तपता है, इसलिये अधिक प्रबल वाणी से माध्यन्दिन सवन में वह [ स्तोत्र ]
बोले । ( अथो यद्वा अभितराम् एति, अथ बलिष्ठतमं तपति, तस्मात् बलिष्ठतमया
वाचा तृतीय सवने शंसेत् ) फिर जब वह [ सूर्य दोपहर पीछे ] अत्यन्त ऊंचा चलता है,
तब वह अत्यन्त प्रबल तपता है, इसलिये अत्यन्त प्रबल वाणी से तृतीय सवन में वह
[ स्तोत्र ] बोले । ( एवं शंसेत्, यदि वाचः ईशीत, वाक् हि * स्त्रं. यया उत्तरण्या
उत्तरया वाचा तु उत्सहेत, आसमापनायतना प्रतिपद्येत ) इस प्रकार से वह बोले
कि वह वाणी पर समर्थ हो, क्योंकि वाणी शस्त्र [ स्तोत्र ] है, जिस बहुत बढ़ती हुई और
अधिक ऊँची वाणी से वह उत्साही तो होवे, और समाप्ति पर्य्यन्त वह [ वाणी ] प्राप्त
होवे । ( एतत् सुशस्ततरम् इव भवति ) यह ही कर्म बहुत ही प्रशंसित होता है ।
( सः वै एषः न कदाचन अस्तम् अयति न उदयति ) वह ही यह [ सूर्य ]
न कभी अस्त होता है और न कभी उदय होता है । ( तत् यत् एनं मन्यन्ते पश्चात्
अस्तम् अयति इति ) फिर जो इस [ सूर्य ] को लोग मानते हैं कि वह पश्चिम में अस्त
होता है [ सो यह बात ठीक नहीं है ] । ( तत् अह्नः एव अन्तं गत्वा अथ आत्मानं
विपर्य्यस्यते, अह्नः एव अधस्तात् कृणुते रात्रीं परस्तात् ) [ क्योंकि ] तब वह [ सूर्य ]
दिन के अन्त पर पहुँचकर फिर अपने को विरुद्ध प्रकार से करता है, [ अर्थात् ] वह [ सूर्य ]
दिन को नीचे [अपने नीचे वा सामने ] की ओर बनाता है और रात्रि को [ पृथिवी की ]
दूसरी ओर [ बनाता है ] ।
(सः वै एषः न कदाचन अस्तम् अयति न उदयति) वह ही यह [ सूर्य ] न कभी
विस्तृतवनानि । जनशून्यस्थानानि ( अप्रमायुकः ) अपमृत्युरहितः ( मन्द्रतमम् )
मन्दतमं यथा भवति तथा ( अभ्येति ) आभिमुख्येनोर्ध्वं गच्छति ( बलीयः )
प्रबलं यथा भवति तथा ( अभितराम् ) किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे ( पा०
५।४।११) अभितर-आम् । पश्चिमाभिमुखानां पुरुषाणामत्यन्ताभिमुख्येन
( बलिष्ठतमम् ) अत्यन्तप्रबलम् ( वाचः ) वाण्याः ( ईशीत ) ईश्वरो भवेत् ( उत्त-
रण्या ) उत्+तॄ तरणे-ल्युट्, ङीप् । उत्कर्षेण वर्धमानया (उत्तरया) उच्चतरया (उत्स-
हेत) उत्साहवान् भवेत् (आसमापनायतना) आसंमापनात् आयतनं यस्याः सा । समाप्ति-
पर्य्यन्तम् आश्रयवती वाक् (प्रतिपद्येत) प्राप्नुयात् (सुशस्ततरम्) अतिशयेन प्रशस्तम्
(अस्तम्) अस्यन्ते सूर्यकिरणाः अत्र । हसिमृगृण्वामि० (उ० ३।८६) असु क्षेपणे-तन् ।
कण्डिका ११॥
४३२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ११
अस्त होता है न उदय होता है। (तत् यत् एनं मन्यन्ते पुरस्तात् उदयति इति) फिर
जो उस [सूर्य] को लोग मानते हैं कि वह पूर्व में उदय होता है [सो यह ठीक नहीं है]।
(तत् रात्रेः एव अन्तं गत्वा अथ आत्मानं विपर्यस्यते, रात्रिम् एव अधस्तात् कृणुते
अहः परस्तात्) [क्योंकि] तब वह [सूर्य] रात्रि के अन्त पर पहुँचकर फिर अपने को
विरुद्ध प्रकार से करता है, [अर्थात्] वह [सूर्य] रात्रि को [पृथिवी के] नीचे की ओर
बनाता है और दिन को दूसरी ओर [अपने सामने की ओर, बनाता है। अर्थात् सूर्य
एक सर्वतः प्रकाशमय घूमता हुआ गोला भूगोल से बहुत बड़ा है। भूगोल के घूमने से प्रत्येक
समय पृथिवी का जो भाग सूर्य के सामने आता जाता है, वह दिन होता चला जाता है
और जो भाग पीछे रहता जाता है वहाँ रात्रि होती जाती है, और सूर्य का गोला सर्वतः
प्रकाशमय होने से प्रत्येक समय चमकता रहता है]।
(सः वै एषः न कदाचन अस्तम् अयति न उदयति) वह ही यह [सूर्य]
न कभी अस्त होता है, न कभी उदय होता है। (न ह वै कदाचन निम्लोचति एतस्य ह
सायुज्यं सलोकताम् अश्नुते, यः एवं वेद) [इसलिए] वह [यजमान] कभी भी नहीं
नीचे जाता है [नहीं अधोगति पाता है] और वह इस [सूर्य] के साथ सहवास और समान
लोक [अवस्था] पाता है जो ऐसा जानता है॥ १०॥
भावार्थः—मनुष्य सूर्य के समान प्रतापी होकर दिन रात उन्नति का प्रयत्न करे॥१०॥
विशेषः १—इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ३।४४ से मिलाओ॥
विशेषः २—(यदि वा तः) के स्थान पर ऐ०ब्रा०से (यदि वाचः) शोधा गया है।
कण्डिका ११॥
अथात एकाहास्यैव तृतीयसवनं, देवासुरा वा एषु लोकेषु समयतन्त। ते देवा
असुरानभ्यजयन्। ते जिता अहोरात्रयोः सन्धिं समभ्यवागुः। स हेन्द्र उवाच, इमे
वा असुरा अहोरात्रयोः सन्धिं समभ्यवागुः। कश्चाहञ्चेमानसुरानभ्युत्थास्यामहा
इति। अहञ्चेत्यग्निरब्रवीन्, अहञ्चेति वरुणः, अहंचेति बृहस्पतिः, अहं चेति विष्णुः।
तानभ्युत्थायाहोरात्रयोः सन्धेर्निर्जघ्नुः। यदभ्युत्थायाहोरात्रयोः सन्धेर्निर्जघ्नुः, तस्मा-
दुत्था अभ्युत्थाय ह वै द्विषन्तं भ्रातृव्यं निर्हन्ति, य एवं वेद। सोऽग्निरश्वो भूत्वा
प्रथमः प्रजिगाय। यदग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मादाग्नेयीभिरुक्थानि प्रण-
यन्ति।, यदग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मात्साकमश्वम्। यत्पञ्च देवता
अभ्युत्तस्थुः, तस्मात्पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते। या वाक् सोऽग्निः, यः प्राणः स वरुणः,
यन्मनः स इन्द्रः, यच्चक्षुः स बृहस्पतिः, यच्छ्रोत्रं, स विष्णुः। एते ह वा एतान्
पञ्चभिः प्राणैः समीर्योदस्थापयन्१। तस्मादु ह एवैताः पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते ॥११॥
अदर्शनम्। पश्चिमाचलम् (अयति) अय गतौ-लट्। गच्छति। प्राप्नोति (उदयति)
उदेति। ऊर्ध्वं गच्छति (पश्चात्) पश्चिमदिशि (अन्तम्) समाप्तिम् (गत्वा) प्राप्य
(अथ) अनन्तरम् (आत्मानम्) स्वात्मानम् (विपर्य्यस्यते) विपर्य्यस्तं विरुद्धं प्रतिकूलं
करोति (अधस्तात्) अधःस्थाने (परस्तात्) परस्मिन् देशे . (पुरस्तात्) पूर्वस्मिन्
देशे (निम्लोचति) नि+म्रुचु म्लुचु गतौ—लट्। नीचैर्गच्छति॥
१. पू० सं० “उत्थापयन्” इति पाठः॥ सम्पा०॥
कण्डिका ११ ॥ आख्यायिका-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में से
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ११ ४३३
कण्डिका ११ ॥ आख्यायिका-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में से
सायंकाल में घुसे हुये असुर लोग इन्द्र, अग्नि, वरुण,
बृहस्पति और विष्णु पांच देवताओं अथवा वाक्
आदि पांच इन्द्रियों करके निकाले गये ॥
( अथ अतः एकाहस्य एव तृतीयसवनम् ) अब यहां से एकाह यज्ञ का ही
तृतीयसवन [ कहा जाता है ] । ( देवाऽसुराः वै एषु लोकेषु समयतन्त ) देव और असुर
इन लोकों [ शरीर के अङ्गों ] में लड़ने लगे । ( ते देवाः असुरान् अभ्यजयन् ) उन
देवताओं ने असुरों को सामने होकर जीत लिया । ( ते जिताः अहोरात्रयोः सन्धि
समभ्यवागुः ) वे जीते गये [ असुर ] रात्रि दिन की सन्धि में घुस गये । ( सः ह इन्द्रः
उवाच, इमे वै असुराः अहोरात्रयोः सन्धि समभ्यवागुः, कः च अहं च इमान् असुरान्
अभि उत्थास्यामहै इति ) वह इन्द्र [ अर्थात् मन ] बोला—यह असुर दिन और रात्रि की
सन्धि में घुस गये, कौन और मैं [ हम ] इन असुरों के सम्मुख होकर खड़े होवें । ( अहं च
इति अग्निः अब्रवीत्, अहं च इति वरुणः, अहं च इति बृहस्पतिः, अहं च इति विष्णुः )
और मैं—यह अग्नि [ वाक् ] बोला, और मैं—यह वरुण [ प्राण ], और मैं—यह बृहस्पति
[ नेत्र ], और मैं—यह विष्णु [ कान बोला ] । ( तान् अभ्युत्थाय अहोरात्रयोः
सन्धेः निर्जघ्नुः ) उन [ असुरों ] को उन्होंने उठकर दिन और रात्रि की सन्धि से निकाल
दिया । ( यत् अभ्युत्थाय अहोरात्रयोः सन्धेः निर्जघ्नुः, तस्मात् उत्थाः अभ्युत्थाय ह वै
द्विषन्तं भ्रातृव्यं निर्हन्ति, यः एवं वेद ) जो उन्होंने उठकर दिन और रात्रि की सन्धि से
[ असुरों को ] निकाल दिया, इसलिये उठने वाला [ उत्साही पुरुष ] सामने उठकर द्वेषी
वैरी को मार निकालता है, जो ऐसा जानता है । ( सः अग्निः अश्वः भूत्वा प्रथमः
प्रजिगाय ) उस अग्नि ने घोड़ा [ के समान वेगवान् ] होकर पहिले जीत लिया । ( यत्
अग्निः अश्वः भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मात् आग्नेयीभिः उक्थानि प्रणयन्ति ) जो
अग्नि ने घोड़ा होकर पहिले जीत लिया, इसलिये अग्नि देवता वाली [ ऋचाओं ] से उक्थों
[ स्तोत्रों ] को वे बोलते हैं । ( यत् अग्निः अश्वः भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मात् साकम्
अश्वम् ) जो अग्नि ने अश्व [ घोड़ा ] होकर पहिले जीता, इसलिये वह साकम् अश्व
· [ साथ साथ चलने वाला घोड़ा वा स्तोत्र विशेष हुआ ] । ( यत् पञ्च देवताः अभ्युत्तस्थुः
तस्मात् पञ्च देवताः उक्थे शस्यन्ते ) जो पांच देवता सामने खड़े हुये, इसलिये पांच
देवता उक्थ [ स्तोत्र ] में स्तुति किये जाते हैं । ( या वाक् सः अग्निः, यः प्राणः सः
वरुणः, यत् मनः सः इन्द्रः, यत् चक्षुः सः बृहस्पतिः, यत् श्रोत्रं सः विष्णुः ) जो वाणी
११—( समयतन्त ) युद्धाय यत्नं कृतवन्तः ( सन्धिम् ) संयोगम् ( अभि )
अभिगत्य ( उत्थास्यामहै ) उत्थास्यामः ( निर्जघ्नुः ) निःसारितवन्तः ( उत्थाः )
गतिकारकोपपदयोः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वञ्च ( उ० ४ । २२७ ) उत्+ष्ठा गति-
निवृत्तौ--असिः । उत्थानशीलः । उत्साही ( साकम् ) सह+अक गतौ--अम्,
सहस्य सः । सहगन्ता । सह ( अश्वम् ) अश्वः ( शस्यन्ते ) स्तूयन्ते ( वरुणः )
वरणीयः स्वीकरणीयः पदार्थः ( इन्द्रः ) ऐश्वर्यवान् ( बृहस्पतिः ) बृहतां
५८
कण्डिका १२ ॥
४३४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १२
है वह अग्नि [ तापक पदार्थ ] है, जो प्राण [ श्वास ] है वह वरुण [ स्वीकार करने योग्य
पदार्थ ] है, जो मन है वह इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला पदार्थ ] है, जो नेत्र है वह बृहस्पति
[ बड़े बड़ों का पालने वाला पदार्थ ] है, जो कान है वह विष्णु [ व्यापक पदार्थ ] है।
( एते ह वै एतान् पञ्चभिः प्राणैः समीर्य उदस्थापयन् ) इन ही [ देवताओं ] ने इन
[ असुरों ] को पांच प्राणों से मिलकर उठा दिया [ निकाल दिया ]। ( तस्मात् उ ह एव
एताः पञ्च देवताः उक्थे शस्यन्ते ) इसलिये ही यह पांच देवता उक्थ [ स्तोत्र ] में स्तुति
किये जाते हैं ॥ ११ ॥
भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि मन, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र आदि को
स्वस्थ रख कर विघ्नों को हटावें ॥ ११ ॥
विशेषः-ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ४६ में ( साकमश्वम् ) को साम अर्थात् स्तोत्र
लिखा है और उसके सायण भाष्य में निम्नलिखित मन्त्रों की ओर साकमश्व साम के लिये
संकेत किया है।
१-एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्येतरा गिरः । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥ २-यत्र
क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम् । तत्रा सदः कृणवसे ॥ ३-नहि ते पूर्तमक्षि-
पद्मभुवन्नेमानां वसो । अथा दुवो वनवसे ॥ ऋग्० ६ । १६ । १६-१८, साम० उ०
१ । १ । तृच २२, मन्त्र १, यजु० २६ । १३ ॥ १-( अग्ने ) हे अग्ने ! [ तेजस्वी
विद्वान् ] ( उ ) अवश्य ( आ इहि ) तू आ, ( ते ) तेरे लिये ( इत्था ) सत्य सत्य
( इतराः ) दूसरी ( गिरः ) वाणियों को ( सु ) सुन्दर प्रकार से ( ब्रवाणि ) मैं कहूँ,
( एभिः ) इन ( इन्दुभिः ) ऐश्वर्य वाले पदार्थों से ( वर्धसि ) तू बढ़ ॥ २-[ हे विद्वन् ! ]
( यत्र क्व च ) जहां कहीं भी ( ते मनः ) तेरा मन हो, ( तत्र ) वहां तू ( सदः ) स्थान
( कृणवसे ) करता है, [ क्योंकि ] तू ( उत्तरं दक्षम् ) अति श्रेष्ठ बल ( दधसे ) रखता
है ॥ ३-( नेमानां वसो ) हे नीतियों में वास करने वाले पुरुष ! ( ते ) तेरा ( पूर्तम् )
पूर्ति करने वाला कर्म ( अक्षिपत् ) [ हमारी ] आंखों से गिरने वाला ( नहि भुवत् )
नहीं होवे, ( अथ ) इसलिये ( दुवः ) [ हमारी ] सेवा को ( वनवसे ) तू स्वीकार कर ॥
कण्डिका १२ ॥
प्रजापतिर्ह्येतेभ्यः पञ्चभ्यः प्राणेभ्यो देवान् ससृजे । यदु चेदं किंच पाङ्क्तं
तत् सृष्ट्वा व्यज्वलयत् । ते होचुर्देवाः, म्लानोऽयं पिता मयोभूः, पुनरिमं समी-
र्योत्थापया१म इति । स ह सत्त्वमाख्यायाभ्युपतिष्ठते, यदि ह वा अपि निर्णिंक्तस्यैव
कुलस्य सन्धुक्षणेण यजते, सत्त्वं हैवाख्यायाभ्युपतिष्ठते । यो वै प्रजापतिः स यज्ञः।
स एतैरेव पञ्चभिः प्राणैः समीर्योत्थापितः । ये ह वा एनं पञ्चभिः प्राणैः
समीर्योदस्थापयंस्तां उ एवैताः पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते ॥ १२ ॥
पालकः ( विष्णुः ) व्यापकः ( समीर्य ) संगत्य ( उदस्थापयन् ) उत्थापितवन्तः ।
निःसारितवन्तः ॥
१. पू. सं. "उत्थापयामीति" पाठः ॥ सम्पा० ॥