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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 600 में से

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पृष्ठ 459

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ५ ४२१
'नुवषट्करोति, नेद्रेतः सिक्तं संस्थापयामीति, असंस्थितमिव वै रेतः सिक्तं
समृद्धम् । संस्था वा एषा, यदनुवषट्कारः । तस्मान्नानुवषट् करोति । नेष्टुरु-
पस्थे धिष्ण्यान्ते वासीनो भक्षयति, १ पत्नीभाजनं वै नेष्टा, अग्नीत् पत्नीषु रेतो
धत्ते, रेतसः सिक्ताः प्रजाः प्रजायन्ते प्रजानां प्रजननाय । प्रजावान् प्रजनयिष्णु-
र्भवति प्रजात्यै । प्रजायते प्रजया पशुभिः, य एवं वेद ॥ ५ ॥
कण्डिका ५ ॥ एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में पात्नीवत
स्तोत्र को आग्नीध्र का चुपके चुपके जपने का कारण ॥
( अथ यत् औपासनं तृतीयसवने उपास्यन्ते, पितॄन् एव तेन प्रीणाति ) फिर
जो उपासना वाले स्तोत्र को तीसरे सवन में वे [ ऋत्विज् लोग ] सेवन करते हैं, पितरों
[ पालन करने वाले विद्वानों ] को ही उस से वह [ यजमान ] तृप्त करता है । ( पात्नी-
वतस्य उपांशु आग्नीध्रः यजति ) पात्नीवत [ पत्नी शब्द वाले स्तोत्र ] के उपांशु
[ शब्द बिना किये जप से ] आग्नीध्र [ अग्नि प्रकाशक ऋत्विज् ] यज्ञ करता है । ( रेतः
वै पात्नीवतः, उपांशु इव वै रेतः सिच्यते, तत् न अनुवषट् करोति ) वीर्य [ के
सामान ] ही पात्नीवत [ पत्नी शब्द वाला स्तोत्र ] है, बिना शब्द किये [ बिना घबराहट ]
ही वीर्य सींचा जाता है, इस लिये वह अनुवषट् नहीं करता । ( सिक्तं रेतः नेत् संस्था-
पयामि इति, असंस्थितम् इव वै सिक्तं रेतः समृद्धम् ) सींचते हुये वीर्य को मैं नहीं
रोकता हूँ [ ऐसा वह विचारता है ], बिना रुका हुआ ही सींचा हुआ वीर्य सफल होता है।
( संस्था वै एषा, यत् अनुवषट्कारः ) यह रुकावट है जो अनुवषट्कार है । ( तस्मात्
न अनुवषट् करोति ) इस लिये वह अनुवषट् नहीं करता है । ( नेष्टुः उपस्थे
धिष्ण्यान्ते वा आसीनः भक्षयति ) नेष्टा [ ऋत्विज् ] के समीप अथवा धिष्ण्य [ नाम
वाली अग्नि ] के समीप बैठा हुआ वह [ आग्नीध्र ] भोजन करता है । ( पत्नीभाजनं
वै नेष्टा, अग्नीत् पत्नीषु रेतः धत्ते ) पत्नियों का स्थान ही नेष्टा है, अग्नीत् [ अग्नि
प्रज्वालन मन्त्र वा विचार ] पत्नियों में वीर्य स्थापित करता है । ( रेतसः सिक्ताः प्रजाः
प्रजानां प्रजननाय प्रजायन्ते ) वीर्य से सींचें हुये प्रजायें प्रजाओं की उत्पत्ति के लिये
उत्पन्न होती हैं । ( प्रजनयिष्णुः प्रजावान् प्रजात्यै भवति ) सन्तान उत्पन्न करने वाला
पुरुष सन्तानोत्पत्ति के लिये सन्तान वाला होता है । ( प्रजया पशुभिः प्रजायते यः एवं
वेद ) सन्तान से और पशुओं से वह बढ़ता जो ऐसा जानता है ॥ ५ ॥
५--( औपासनम् ) उपासना-अण् । उपासनायुक्तं स्तोत्रम् ( उपा-
स्यन्ते ) आर्षं दिवादित्वम् । उपासते । सेवन्ते ( उपांशु ) निर्जने । निजश्रवण-
योग्येन जपेन ( पात्नीवतः ) पत्नीवत्--अण् । पत्नीशब्देन युक्तं स्तोत्रम् ( रेतः)
वीर्यम् ( नेत् ) नैव ( संस्थापयामि ) संस्थितं करोमि । निरुणध्मि ( असंस्थि-
तम् ) अनुपरतम् ( समृद्धम् ) सफलम् ( संस्था ) स्थितिः । निवृत्तिः ( उपस्थे )
समीपे ( पत्नीभाजनम् ) पत्नीनां स्थानवान् ( अग्नीत् ) अग्निप्रज्वालनस्य मन्त्रो
१. पूं. सं. "भक्षयन्ति" इति पाठः ॥ सम्पा० ॥