गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४२४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ७
कण्डिका ७ ॥ अध्वर्यु और यजमान की शुद्धि और
अवभृथ स्नान ॥
(एषो पूतिः वै अमुष्मिन् लोके अध्वर्युं च यजमानं च अभिवहति, तत् यत्
एनं दध्ना अनभिहुत्य अवभृथम् उपहरेयुः) यह ही शुद्धि निश्चय करके उस [स्वर्ग]
लोक में अध्वर्युं और यजमान को सर्वथा ले जाती है, सो जब इस [यजमान] को, दधि
[नामवाली हवि] से हवन न करके, अवभृथ [यज्ञान्त स्नानशाला] में वे ले जावें।
(यथा कुणपं वाति, एवम् एव एनं तत् करोति) जैसे उपकारी पुरुष को मनुष्य प्राप्त
होता है, वैसे ही इस [यजमान] को वह [स्नान, उपकार] करता है। (अथ यत् एनं
दध्ना अनभिहुत्य अवभृथम् उपहरन्ति, सयोनिं सर्वम् एव एनं सन्तनुते, समृद्धिं सम्भ-
रन्ति) फिर जब इस [यजमान] को, दधि [नाम वाली हवि] से हवन न करके, अव-
भृथं [यज्ञान्त स्नानशाला] में वे ले जाते हैं, घर सहित सब ही इस [यजमान] को
वह [अध्वर्युं] यथावत् बढ़ाता है और समृद्धि [सम्पत्ति] को यथावत् पुष्ट करता है।
(अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु नः इति जुहोति, सपर्वाणं सर्वम् एव एनं सम्भ-
रति) अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु नः•••• इस वेद मन्त्र से वह हवन करता है, और
जोड़ों सहित सब ही इस [यजमान] को वह यथावत् पुष्ट करता है। (तिसृभिः
त्रिवृद्भिः द्रप्सवतीभिः अभि जुहोति, सर्वाङ्गं सर्वम् एव एनं सम्भरति) तीन तीन
बार वर्तमान द्रप्सवतियों से [द्रप्स शब्द वाली ऋचाओं से जैसे-द्रप्सश्चस्कन्द•••••
इत्यादि,-ऋ० १० । १७ । ११-१३] वह सर्वथा हवन करता है, अङ्गों सहित सब
ही इस [यजमान] को वह यथावत् पुष्ट करता है। (सौमीभिः अभिजुहोति,
सात्मानं सर्वम् एव एनं संभरति) सौमियों से [सोम देवता वाली ऋचाओं से, जैसे--
त्वं सोम प्रचिकितो••• इत्यादि ऋ० १ । ६१ । १-२३] सब प्रकार हवन करता है,
आत्मा [आत्मबल, पुरुषार्थ] सहित सब ही इस [यजमान] को वह पुष्ट करता है।
(पञ्चभिः अभिजुहोति, पाङ्क्तः यज्ञः, यज्ञम् एव अवरुन्धे) पाँच [उन १-२३ मन्त्रों
में से पाँच ऋचाओं] से वह सब प्रकार हवन करता है, पाङ्क्त [पङ्क्ति, विस्तार वाला] यज्ञ
है, यज्ञ को ही वह प्राप्त होता है। (पाङ्क्तः पुरुषः, पुरुषम् एव आप्नोति) पाङ्क्तः
[पङ्क्ति, विस्तार वाला] पुरुष है, पुरुष को ही वह पाता है। (पाङ्क्ताः पशवः, पशुपु
७-(पूतिः) पूञ् शोधने--क्तिन्। शुद्धिः। पवित्रव्यवहारः (एषो) एषा
उ। एषा एव (अभिवहति) सर्वतो नयति (दध्ना) दधिनामकेन हविषा (अव-
भृथम्) अवे भृञः (उ० २ । ३) अव + डुभृञ् धारणपोषणयोः-क्यन्। यज्ञा-
न्तस्नानम् (कुणपम्) क्वणेः सम्प्रसारणञ्च (उ० ३ । १४३) क्वण शब्दोपकरणयोः-
कपन्। उपकारिणम् (वाति) गच्छति। प्राप्नोति (सयोनिम्) सगृहम् (सम्भ-
रन्ति) सम्यक् पोषयन्ति (सविता) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (नु) क्षिप्रम् (सपर्वा-
णम्) शरीरग्रन्थिभिः सहितम् (द्रप्सवतीभिः) द्रप्सशब्दयुक्ताभिः (सौमीभिः)
सोमदेवताकाभिः (सात्मानम्) आत्मबलेन पुरुषार्थेन सहितम् (अवरुन्धे)
प्राप्नोति ॥