गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ३ ॥
४१६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३
५-उदु ब्रह्माण्याैरत श्रवस्येन्द्रं समर्य्ये महया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि
शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि-अथर्व० २० । १२ । १, ऋग्वेद ७ । २३ ।
१ ॥ ( श्रवस्या ) यश के लिए हितकारी ( ब्रह्माणि ) वेदज्ञानों को ( उ ) ही ( उद्
ऐरत ) उन [ विद्वानों ] ने उच्चारण किया है, ( वसिष्ठ ) हे अति श्रेष्ठ ! ( इन्द्रम् )
इन्द्र [ महाप्रतापी सेनापति ] को ( समर्ये ) युद्ध में ( महय ) पूज । ( यः ) जिस
(उप श्रोता) आदर से सुनने वाले [शूर] ने ( ईवतः ) उद्योगी ( मे ) मेरे ( विश्वानि )
सब ( वचांसि ) वचनों को ( शवसा ) बल के साथ ( आ ) अच्छे प्रकार ( ततान )
फैलाया है ॥
६-एवेदिन्द्रं वृषण वज्रवाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः । स न स्तुतो वीरवद्
धातु गोमद् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः-अथर्व० २० । १२ । ६, ऋग्० ७ । २३ । ६ ।
यजु० २० । ५४ ॥ ( एव इत् ) इस प्रकार से ही ( वसिष्ठासः ) अत्यन्त वसु [ श्रेष्ठ
विद्वान् लोग ] ( वृषणम् ) बलवान्, ( वज्रबाहुम् ) वज्र [ शस्त्र अस्त्रों ] को भुजा पर
रखने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ महाप्रतापी सेनापति ] को ( अर्कैः ) पूजनीय विचारों और अन्नों
से ( अभि अर्चन्ति ) यथावत् पूजते हैं । ( स्तुतः ) स्तुति किया गया ( सः ) वह ( नः )
हमारे लिये ( वीरवत् ) वीरों से युक्त ( गोमत् ) उत्तम गौओं वाले [ राज्य ] को
( धातु ) धारण करे, [ हे वीरों ! ] ( यूयम् ) तुम सब ( स्वस्तिभिः ) सुखों से ( सदा )
सदा ( नः ) हमें ( पात ) रक्षित रक्खो ॥
७-ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोम पावा । युक्त्वा
हरिभ्यामुपयासद॒र्वाङ् माध्यन्दिने सवने मत्सदिन्द्रः-अथर्व० २० । १२ । ७ । ऋ० ५ ।
४० । ४ ॥ ( ऋजीषी ) महाधनी, ( वज्री ) वज्रधारी [ शस्त्र अस्त्रों वाला ], ( वृषभः )
बलवान् ( तुराषाट् ) हिंसक शत्रुओं का हराने वाला, ( शुष्मी ) बलवान् सेना वाला,
( राजा ) राजा, ( वृत्रहा ) वैग्रियों का मारने वाला, ( सोमपावा ) सोम [ महौषधियों
के रस ] का पीने वाला ( इन्द्रः ) इन्द्र [ महाप्रतापी सेनापति ] ( हरिभ्याम् ) दो घोड़ों
से [ रथ को ] ( युक्त्वा ) जोत कर ( अर्वाङ् ) सामने ( उपयासत् ) आवे और
( माध्यन्दिने ) मध्याह्न में ( सवने ) यज्ञ के बीच ( मत्सत् ) आनन्द पावे ॥
कण्डिका ३ ॥
तरोभिर्वोविदद्वसुन्तरणिरित्सिषासतीति, अच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ ।
उदिन्वस्य रिच्यत इति, बार्हतः प्रगाथः । तस्योक्तं ब्राह्मणम् । भूय इद्वावृधे वीर्यायिति
उक्थमुखम् । इमामूषु प्रभृतिं सातये धा इति, पयसिः । तस्य दशमीमुद्धरति ।
घोरस्य वा आङ्गिरसस्यैतदार्षं नेद्यज्ञं निर्दहेत् शस्यमानं पिवा वर्धस्व तव घा सुतास
इति यजति । एतामेव तद्देवतां यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्यानुवषट् करोति । प्रत्ये-
वाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति, न ह्यनाराशंᳪसाः सीदन्ति ॥ ३ ॥
कण्डिका ३ ।। एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में
अच्छावाक के मन्त्र प्रयोग ।।
( तरोभिर्वो विदद्वसुम्, तरणिरित् सिषासति, इति अच्छावाकस्य स्तोत्रियानु-
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३ ।। ४१७
रूपौ ) तरोभिर्वो विदद्वसुम्... और, तरणिरित् सिषासति..., १, २ यह दो मन्त्र अच्छावाक
ऋत्विज् के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। ( उदिन्वस्य रिच्यते...इति बार्हतः प्रगाथः )
उदिन्वस्य रिच्यते...३ यह मन्त्र बृहती छन्द वाला प्रगाथ [ अच्छे प्रकार गाने योग्य स्तोत्र ]
है। ( तस्य उक्तं ब्राह्मणम् ) उसका ही कहा गया ब्राह्मण है। ( भूय इद् वावृधे वीर्याय
इति उक्थमुखम् ) भूय इद् वावृधे वीर्याय ४ यह मन्त्र उक्थ [ स्तोत्र ] का आरम्भ है।
( इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः-इति पर्यासः ) इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः,...५ यह
मन्त्र [ उक्थ का ] पर्यास [ विराम ] है। ( तस्य दशमीम् उद्धरति ) उस [ सूक्त ] की
दसवीं ऋचा [ अस्मे प्र यन्धि-६ ] को उठाकर पढ़ता है। ( घोरस्य आङ्गिरसस्य वै
एतत् आर्षं शस्यमानं नेत् यज्ञं निर्दहेत् ) घोर आङ्गिरस का [ ऋषि विशेष का व्याख्या
किया हुआ ] यह वेद मन्त्र [ दसवीं ऋचा ] बोलना चाहिये, नहीं तो वह यज्ञ को भस्म कर
देवे। ( पिबा वर्धस्व तव घा सुतासः, इति यजति ) पिबा वर्धस्व तव घा सुतासः ७,
इस मन्त्र से वह यज्ञ करता है [ याज्या आहुति देता है ] । ( एताम् एव देवतां तत्
यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्य अनुवषट्करोति ) इस ही [ इन्द्र ] देवता को उससे अपने
अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम
आहुति दान ] करता है। ( प्रति एव अभिभृंशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि
सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों की स्तुति के बिना [ यज्ञ यजमान
को ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं। देखो क० १, २ ] ॥ ३ ॥
भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ ३ ॥
विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रं सबाध ऊतये । बृहद् गायन्तः सुतसोमे अध्वरे
हुवे भरं न कारिणम्-ऋ० ८ । ६६ । १ [ सायण भाष्य ५५ ] ॥ [ हे मनुष्यो ! ]
( भरम् ) पोषण करने वाले ( कारिणं न ) कर्म कुशल के समान ( वः ) तुम्हारे लिये
( तरोभिः ) शीघ्रता से ( विदद्वसुम् ) धन पाने वाले ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले
वीर ] को ( बृहत् ) वृद्धिकारक स्तोत्र ( गायन्तः ) गाते हुये, ( सबाधः ) बाधा में पड़े
हुये हम ( ऊतये ) रक्षा के लिये ( सुतसोमे ) सिद्ध किये हुये सोम [ तत्त्व रस ] रखने
वाले ( अध्वरे ) हिंसा रहित यज्ञ में ( हुवे = आह्वयामः ) बुलाते हैं ॥
३—( तरोभिः ) वेगैः । बलैः—निघ० २ । ६ ( वः ) युष्मदर्थम् (विदद्वसुम्)
वेदयद्वसुम् । धनप्रापकम् ( तरणिः ) तारकः ( इत् ) एव (सिषासति) संभक्तुमिच्छति
( उत् ) आधिक्ये ( नु ) क्षिप्रम् ( अस्य ) राज्ञः ( रिच्यते ) अधिको भवति ( भूयः )
बहु—ईयसुन् । बहुतरम् । पुनः ( वावृधे ) वर्धते ( वीर्याय ) पराक्रमाय ( उ )
वितर्के ( सु ) शोभने ( प्रभृतिम् ) प्रकृष्टां धारणाम् ( सातये ) संविभागाय ( धाः )
दध्याः ( उद्धरति ) उद्धृत्य पठति ( आर्षम् ) ऋषिणा परमेश्वरेण प्रोक्तः । वेदमन्त्रः
( नेत् ) नैव ( शस्यमानम् ) कथ्यमानम् ( वर्धस्व ) वृद्धिं कुरु ( घ ) एव ( सुतासः )
निष्पन्नाः ॥
४१८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३
२—तरणिरित् सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा। आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा
नेमिं तष्टेव सुद्रुवम्—ऋ० ७ । ३२ । २० ॥ (तरणिः इत्) तारने वाला पुरुष ही
(युजा) योग्य, (पुरन्ध्या) बहुत अर्थों को धारण करने वाली बुद्धि से (वाजम्)
विज्ञान वा धन को (सिषासति) बांटना चाहता है। (वः) तुम्हारे लिये (पुरुहूतम्)
बहुतों से बुलाये गये (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले राजा] को (गिरा) वाणी से
(आ नमे) अच्छे प्रकार झुकता हूं, (तष्टा इव) जैसे बढ़ई (सुद्रुवम्) दृढ़ काठ वाले
(नेमिम्) पहिये को झुकाता है॥
३—उदिन्वस्य रिच्यतेंऽशो धनं न जिग्युषः। य इन्द्रो हरिवान् न दभन्ति तं
रिपो दक्षं दधाति सोमिनि—अथर्व० २० । ५६ । ३, ऋ० ७ । ३२ । १२ ॥ (अस्य)
उस [राजा] का (इत्) ही (अंशः) भाग (जिग्युषः) विजयी वीर के (धनं न)
धन के समान (नु) शीघ्र (उद् रिच्यते) बढ़ाता जाता है, (यः) जो (हरिवान्)
श्रेष्ठ मनुष्यों वाला (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाला राजा] (सोमिनि) तत्त्वरस वाले
व्यवहार में (दक्षम्) बल को (दधाति) लगाता है, और (तम्) उस [राजा] को
(रिपः) बैरी लोग (न दभन्ति) नहीं सताते हैं॥
४—भूय इद् वावृधे वीर्यायै एको अजुर्यो दयते वसूनि। प्ररिरिचे दिव इन्द्रः
पृथिव्या अर्धमिदस्य प्रति रोदसी उभे--ऋ० ६ । ३० । १ ॥ (एकः) अकेला
(अजुर्यः) न बूढ़ा होने वाला [महाबली राजा] (भूयः इत्) बहुत अधिक ही
(वीर्याय) पराक्रम के लिये (वावृधे) बढ़ता है और (वसूनि दयते) अनेक धनों का
दान करता है, [जैसे] (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाला परमात्मा] (दिवः) प्रकाश
लोक से और (पृथिव्याः) पृथिवी से (प्ररिरिचे) बहुत बड़ा है, (अस्य) उस
[परमात्मा] का (अर्धम् इत्) आधा भाग ही (उभे रोदसी प्रति) दोनों अन्तरिक्ष
और पृथिवी में है॥
५—इमाम् षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतिभिर्यादमानः। सुतेसुते वावृधे
वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत्—ऋ० ३ । ३६ । १ ॥ [हे इन्द्र! बड़े ऐश्वर्य
वाले राजन्] (शश्वच्छश्वत्) नित्य नित्य (ऊतिभिः) रक्षण क्रियाओं से (यादमानः)
प्रयत्न करता हुआ तू (इमाम् उ प्रभृतिम्) इस ही पालन शक्ति को (सातये) बांटने
के लिये (सु धाः) अच्छे प्रकार धारण कर। (यः) जो मनुष्य (सुतेसुते) प्रत्येक
निचोड़े हुये [तत्त्वरस] में (वर्धनेभिः) बढ़ती करने वाले साधनों से (वावृधे) बढ़ा है,
वह (महद्भिः कर्मभिः) महान् कर्मों से (सुश्रुतः) बड़ा विख्यात (भूत्) हुआ है॥
६—अस्मे प्र यन्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र रायो विश्ववारस्य भूरेः। अस्मे शतं
शरदो जीवसे धा अस्मे वीराञ्छश्वत इन्द्र शिप्रिन्—ऋ० ३ । ३६ । १० ॥ (मघवन्)
हे पूजनीय (ऋजीषिन्) महाधनी (इन्द्र) इन्द्र! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजन्] (अस्मे)
हम को (विश्ववारस्य) सबसे स्वीकार करने योग्य (भूरेः) बहुत (रायः) धन का
(प्र यन्धि) दान कर। (शिप्रिन्) हे सुन्दर नासिका और ठोढ़ी वाले (इन्द्र) इन्द्र!
(अस्मे) हमारे (शतं शरदः जीवसे) सौ वर्ष जीने को (अस्मे) हमारे लिये (शश्वतः)