गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ६ ॥ ४३७
येति स त्वं नो नभसस्पतिरित्याह, वायुर्वै नभसस्पतिर्वायुमेव तदाह । एतन्नो गोपायेति
देव संस्फानित्याह, आदित्यो वै देवःसंस्फानः, आदित्यमेव तदाह । एतन्नो गोपायेत्ययं ते
योनिरिति, अरण्योरग्निं समारोपयेत् । तदाहुः, यदरण्योः समारूढो नश्येदुदस्याग्निः
सीदेत् पुनराधेयः स्यादिति । या ते अग्नेयँज्ञिया तनूस्तया मे ह्यारोह तया मे
ह्याविशायन्ते योनिरित्यात्मन्नग्नीन् समारोपयेत् । एष ह वा अग्नियोंनिः, स्वस्यामेवैनं
तद्योन्यां सादयति ॥ ६ ॥
कण्डिका ९ ॥ एकाष्टका इष्टि और दो अरणियों से अग्निसमारोपण
( अह्नां विधान्याम् एकाष्टकायां चतुःशरावम् अपूपं पक्त्वा प्रातः कक्षम् उ
पोषेत् ) दिनों [ यज्ञदिनों ] के विधान करने वाली एकाष्टका में [ सप्तमी आदि तीन
तिथियों में से किसी तिथि की इष्टि विशेष में ] चार शरावों में रखे हुए अपूप [ पक्वान्न ]
को पकाकर प्रातःकाल उससे पेट [ वेदी ] को ही पुष्ट करे । ( यदि दहति पुण्यसमं भवति,
यदि न दहति पापसमं भवति ) जो वह [ अग्नि ] जलता है, पुण्य सहित कर्म होता है,,
जो वह नहीं जलता, पाप सहित कर्म होता है । ( एतेन ह वै विज्ञानेन अङ्गिरसः पुरा
दीर्घसत्रम् उपयन्ति स्म ) इस ही विज्ञान [ सूक्ष्म विचार ] से अङ्गिराओं
[ महाविद्वानों ] ने पहिले समय में दीर्घसत्र [ बहुत समय वाले यज्ञ ] को प्राप्त किया
था । ( यः ह वै उपद्रष्टारम् उपश्रोतारम् अनुख्यातारम् एव विद्वान् यजते,
अमुष्मिन् लोके इष्टापूर्तेन समं गच्छते ) जो ही मनुष्य निश्चय करके समीप से
देखने वाले, समीप से सुनने वाले और लगातार जताने वाले को ही जानता हुआ यज्ञ करता
है, उस [ स्वर्ग ] लोक में इष्टापूर्त्त से [ अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, देवमन्दिर आदि कर्म
द्वारा ] सर्वथा जाता है । ( अग्निः वै उपद्रष्टा, वायुः वै उपश्रोता, आदित्यः वै अनु-
ख्याता, यः तान् एवं विद्वान् यजते, अमुष्मिन् लोके इष्टापूर्तेन समं गच्छते ) अग्नि
ही समीप से देखने वाला, वायु ही समीप से सुनने वाला और सूर्य ही लगातार जताने
वाला है, जो पुरुष उन को ऐसा जानता हुआ यज्ञ करता है, उस [ स्वर्ग ] लोक में इष्टा-
पूर्त से [ अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, देवमन्दिर आदि कर्म द्वारा ] सर्वथा जाता है । ( यन्नो
नभसस्पतिः इति आह, अग्निः वै नभसः पतिः अग्निम् एव तत् आह ) यन्नो नभ-
सस्पतिः--१, यह मन्त्र वह बोलता है, अग्नि ही आकाश का पालने वाला है, अग्नि को
ही तब वह यह कहता है । ( एतन्नो गोपाय इति, स त्वं नो नभसस्पतिः इति आह,
वायुः वै नभसः पतिः वायुम् एव तत् आह ) एतन्नो गोपाय—२, और, स त्वं नो
नभसस्पतिः--३, इन दो मन्त्रों को वह बोलता है, वायु ही आकाश का पालने वाला है,
वायु को ही वह यह कहता है । ( एतन्नो गोपाय इति, देव संस्फान—इति आह,
६--( अह्नाम् ) यज्ञदिनानाम् ( विधान्याम् ) विधानकारिकायाम् ( एका-
ष्टकायाम् ) इष्यशिभ्यां तकन् ( उ० ३ । १४८ ) अश भोजने अशू व्याप्तौ वा --
तकन्, टाप् । सप्तम्यादिदिनत्रयमध्य एकस्यां तिथौ । इष्टिविशेषे (अपूपम् )
अ+पूयी दुर्गन्धे भेदने विशरणे च---पप्रत्ययः । गोधूमदिचूर्णपिष्टकम् ( कक्षम् )
वेदिकक्षम् ( उ ) एव ( पोषेत् ) पोषयेत् ( पुण्यसमम् ) पुण्येन सहितं कर्म