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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 600 में से

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पृष्ठ 456

४१८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ३
२—तरणिरित् सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा। आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा
नेमिं तष्टेव सुद्रुवम्—ऋ० ७ । ३२ । २० ॥ (तरणिः इत्) तारने वाला पुरुष ही
(युजा) योग्य, (पुरन्ध्या) बहुत अर्थों को धारण करने वाली बुद्धि से (वाजम्)
विज्ञान वा धन को (सिषासति) बांटना चाहता है। (वः) तुम्हारे लिये (पुरुहूतम्)
बहुतों से बुलाये गये (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाले राजा] को (गिरा) वाणी से
(आ नमे) अच्छे प्रकार झुकता हूं, (तष्टा इव) जैसे बढ़ई (सुद्रुवम्) दृढ़ काठ वाले
(नेमिम्) पहिये को झुकाता है॥
३—उदिन्वस्य रिच्यतेंऽशो धनं न जिग्युषः। य इन्द्रो हरिवान् न दभन्ति तं
रिपो दक्षं दधाति सोमिनि—अथर्व० २० । ५६ । ३, ऋ० ७ । ३२ । १२ ॥ (अस्य)
उस [राजा] का (इत्) ही (अंशः) भाग (जिग्युषः) विजयी वीर के (धनं न)
धन के समान (नु) शीघ्र (उद् रिच्यते) बढ़ाता जाता है, (यः) जो (हरिवान्)
श्रेष्ठ मनुष्यों वाला (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाला राजा] (सोमिनि) तत्त्वरस वाले
व्यवहार में (दक्षम्) बल को (दधाति) लगाता है, और (तम्) उस [राजा] को
(रिपः) बैरी लोग (न दभन्ति) नहीं सताते हैं॥
४—भूय इद् वावृधे वीर्यायै एको अजुर्यो दयते वसूनि। प्ररिरिचे दिव इन्द्रः
पृथिव्या अर्धमिदस्य प्रति रोदसी उभे--ऋ० ६ । ३० । १ ॥ (एकः) अकेला
(अजुर्यः) न बूढ़ा होने वाला [महाबली राजा] (भूयः इत्) बहुत अधिक ही
(वीर्याय) पराक्रम के लिये (वावृधे) बढ़ता है और (वसूनि दयते) अनेक धनों का
दान करता है, [जैसे] (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्य वाला परमात्मा] (दिवः) प्रकाश
लोक से और (पृथिव्याः) पृथिवी से (प्ररिरिचे) बहुत बड़ा है, (अस्य) उस
[परमात्मा] का (अर्धम् इत्) आधा भाग ही (उभे रोदसी प्रति) दोनों अन्तरिक्ष
और पृथिवी में है॥
५—इमाम् षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतिभिर्यादमानः। सुतेसुते वावृधे
वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत्—ऋ० ३ । ३६ । १ ॥ [हे इन्द्र! बड़े ऐश्वर्य
वाले राजन्] (शश्वच्छश्वत्) नित्य नित्य (ऊतिभिः) रक्षण क्रियाओं से (यादमानः)
प्रयत्न करता हुआ तू (इमाम् उ प्रभृतिम्) इस ही पालन शक्ति को (सातये) बांटने
के लिये (सु धाः) अच्छे प्रकार धारण कर। (यः) जो मनुष्य (सुतेसुते) प्रत्येक
निचोड़े हुये [तत्त्वरस] में (वर्धनेभिः) बढ़ती करने वाले साधनों से (वावृधे) बढ़ा है,
वह (महद्भिः कर्मभिः) महान् कर्मों से (सुश्रुतः) बड़ा विख्यात (भूत्) हुआ है॥
६—अस्मे प्र यन्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र रायो विश्ववारस्य भूरेः। अस्मे शतं
शरदो जीवसे धा अस्मे वीराञ्छश्वत इन्द्र शिप्रिन्—ऋ० ३ । ३६ । १० ॥ (मघवन्)
हे पूजनीय (ऋजीषिन्) महाधनी (इन्द्र) इन्द्र! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजन्] (अस्मे)
हम को (विश्ववारस्य) सबसे स्वीकार करने योग्य (भूरेः) बहुत (रायः) धन का
(प्र यन्धि) दान कर। (शिप्रिन्) हे सुन्दर नासिका और ठोढ़ी वाले (इन्द्र) इन्द्र!
(अस्मे) हमारे (शतं शरदः जीवसे) सौ वर्ष जीने को (अस्मे) हमारे लिये (शश्वतः)