गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
ब्राह्मण [ न० लिङ्ग ] शब्द बना, जिसका अर्थ ब्रह्म परमेश्वर वा वेद का ज्ञान है ।
( १८ )
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः ।
गोजित् भूयास॒मश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित् ॥ ४ ॥
अथर्व० ७ । ५० । ८ ॥
[ हे सर्वपोषक परमेश्वर ! ] ( कृतम् ) कर्म [ वेदविहित व्यवहार ] ( मे )
मेरे ( दक्षिणे ) दाहिने ( हस्ते ) हाथ में और ( जयः ) जीत ( मे ) मेरे ( सव्ये )
बायें [ हाथ ] में ( आहितः ) ठहरी हो । मैं ( गोजित् ) भूमि जीतने वाला, ( अश्व-
जित् ) घोड़े जीतने वाला, ( धनंजयः ) धन जीतने वाला और ( हिरण्यजित् ) तेज
जीतने वाला ( भूयासम् ) रहूं ॥ ४ ॥
हे परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें जिससे हम सदा वेदविहित कर्म में पुरु-
षार्थ के साथ आगे बढ़ते हुये संसार में सुखी रहें, और सुपात्र वीर होकर आपसे
आपकी कृपा का दान लेवें ॥ ४ ॥
यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्व१ः स्वायाः ।
अश्लोणा अङ्गैरहुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान् ॥ ५ ॥
अथर्व० ६ । १२० । ३ ॥
( यत्र ) जहाँ पर ( सुहार्दः ) सुन्दर हृदय वाले, ( सुकृतः ) सुकर्मी लोग
( स्वायाः ) अपने ( तन्वः ) शरीर का ( रोगम् ) रोग ( विहाय ) छोड़ कर ( मदन्ति )
आनन्द भोगते हैं । ( तत्र ) वहाँ पर ( स्वर्गे ) स्वर्ग [ सुख ] में ( अश्लोणाः ) बिना
लंगड़े हुये और ( अङ्गैः ) अङ्गों से ( अहुताः ) बिना टेढ़े हुये हम ( पितरौ ) माता
पिता ( च ) और ( पुत्रान् ) पुत्रों [ सन्तानों ] को ( पश्येम ) देखें ॥ ५ ॥
हे जगत्पिता परमेश्वर ! हम सब ब्रह्मचर्य आदि सेवन से वेदानुगामी सुकर्मी
और निरोग रहें और उस स्वर्ग में रहकर हम सब मिलकर प्रयत्नपूर्वक स्थिर
सुख पावें ॥ ५ ॥
२—गोपथब्राह्मण क्या है ॥
चार वेदों के चार ब्राह्मण हैं, ऋग्वेद का ऐतरेय, यजुर्वेद का शतपथ, साम-
वेद का साम, और अथर्ववेद का गोपथ । विदित नहीं है कि गोपथब्राह्मण के कौन
कर्ता थे । यह पद तो तीन शब्दों से बना है, गो+पथ+ब्राह्मण, जिनकी सिद्धि इस
प्रकार है—गमेर्डोः ( उ० २ । ६७ ) गमॢ गतौ–जाना, जानना और पाना—
डो प्रत्यय । पाने योग्य पदार्थ गो शब्द वाणी, भूमि, स्वर्ग, इन्द्रिय आदि का वाचक है ।
पथ गतौ--अच् प्रत्यय । पथ नाम मार्ग का है । वृंहेर्नोऽच्च ( उ० ४ । १४६ ) वृहि
वृद्धौ—मनिन्, नकार का अकार और रत्व होकर ब्रह्मन् शब्द [ ब्रह्म और ब्रह्मा ]
सिद्ध होता है फिर तस्येदम् ( पा० ४ । ३ । १२० ) ब्रह्मन्—अण् । इस प्रकार
ब्राह्मण [ न० लिङ्ग ] शब्द बना, जिसका अर्थ ब्रह्म परमेश्वर वा वेद का ज्ञान है ।
इससे गोपथब्राह्मणम् का यह अर्थ है—गो, वाणी अर्थात् वेदवाणी, भूमि अर्थात् पृथिवी
( १६ )
का राज्य और स्वर्ग अर्थात् सुख पाने के मार्ग का ईश्वरीय वा वैदिक ज्ञान । अर्थात्
इस ग्रन्थ के पढ़ने और विचारने से वेदों के पढ़ने, राज्य प्रबन्ध करने और परम
आनन्द पाने के लिये मनुष्य का पुरुषार्थ बढ़ता है ॥
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की वेदों की पठन पाठन
विधि, ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका प्रथमवार पृष्ठ ३२० में इस प्रकार लिखते हैं—
मनुष्य लोग वेदार्थ जा,ने के लिये अर्थयोजना सहित व्याकरण, अष्टा-
ध्यायी धातुपाठ उणादिगण गणपाठ और महाभाष्य शिक्षा, कल्प, निघण्टु
निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छः वेदों के अङ्ग । मीमांसा, वैशेषिक,
न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त, ये छः शास्त्र जो वेदों के उपाङ्ग, अर्थात्
जिनसे वेदार्थ ठीक ठीक जाना जाता है । तथा ऐतरेय, शतपथ, साम और
गोपथ, ये चार ब्राह्मण। इन सब ग्रन्थों को क्रम से पढ़के अथवा जिन्होंने उन
सम्पूर्ण ग्रन्थों को पढ़के जो सत्य सत्य वेद व्याख्यान किये हों उनको देखके
वेद का अर्थ यथावत् जान लेवें—इस लेख से प्रकट है कि वेदार्थ जिज्ञासुओं के
लिये चारों ब्राह्मण महान् उपयोगी हैं जिनमें से यह एक गोपथब्राह्मण है ॥
३—गोपथ के भाष्य करने में कठिनाई ॥
मेरे पास गोपथब्राह्मण की दो पुस्तकें हैं, एक पं० राजेन्द्रलाल मित्र सम्पादित,
छापा एशियाटिक सोसैटी कलकत्ता सन् १८७२ ईस्वी, दूसरा पं० जीवानन्द विद्या-
सागर सम्पादित छापा कलकत्ता सन् १८६१ ईस्वी । पं० राजेन्द्रलाल मित्र ने प्रयत्न
करके हस्तलिखित पुस्तकों को मिलाकर अपना पुस्तक पहिले ही पहिले छपवाया,
उसके पीछे पण्डित जीवानन्द का छपा । दोनों पुस्तकों में कुछ तो लेख प्रमाद और
कुछ छापे की अशुद्धियां हैं। इसके अतिरिक्त ग्रन्थ के प्रयोगों में प्रायः आर्ष शैली है—
जैसे ( इषे त्वा ) के स्थान पर ( इखे त्वा—पू० १ । २६ ), ( सरंसतायै ) के स्थान
पर (सरस्वतायै--उ० ४ । १८), ( पारुच्छेपी ) के स्थान पर (पारुक्षेपी-उ० ६ । १),
( कवीँरिच्छामि ) के स्थान पर ( कवीं ऋच्छामि-उ० ६ । २) इत्यादि इत्यादि ।
ऐसी अशुद्धियों और शैलियों के यथार्थ रूप वेद मन्त्रों और ऐतरेय ब्राह्मण से यथा-
सम्भव मैंने शुद्ध कर दिये हैं ॥
एक और कठिनाई है कि अब तक इस ब्राह्मण का न तो कोई भाष्य और
न कोई अनुवाद उपस्थित है राजेन्द्रलाल मित्र ने इसके भाष्य के लिए बहुत प्रयत्न
किया परन्तु न मिलने से इन्होंने मूल मात्र ही यथासम्भव शोधकर छपा दिया । पं०
राजेन्द्रलाल ने अपने गोपथब्राह्मण की भूमिका में और मौरिसब्लूम्सफील्ड साहिब ने
अपने पुस्तक ( The Atharva Veda and the Gopatha Brahmana by
Maurice Bloomsfield ) में अंगरेजी भाषा में कुछ टिप्पणियां दी हैं । वे किसी अंश
में उपयोगी हैं। उन महाशयों को धन्यवाद है जिन्होंने अपने अन्वेषण का फल प्रका-
शित कर दिया है। मैंने भी पुराने भाष्य और अनुवाद के लिये बहुत खोज किया,
परन्तु कोई न मिला।
जब मेरा अथर्ववेद भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित पूरा होकर संवत् १६७८
विक्रमीय (सन् १६२१ ईस्वी) में छपकर प्रकाशित हो गया, बहुत से विद्वान् महा-
शयों ने अनेक पुस्तकों के भाष्य करने की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया, उनमें
गोपथ के लिये बहु सम्मति थी, और मैंने विचार कर कि यह प्राचीन वैदिक ग्रन्थ
भी महान् उपयोगी है, इसीके लिये प्रयत्न किया। अपनी वृद्धावस्था के कारण मुझे
ग्रन्थ के पूरे हो जाने की आशा न थी, परन्तु सर्वशक्तिमान् परमात्मा की महती कृपा
से अब यह ग्रन्थ भाषानुवाद, टिप्पणियों, व्याकरण प्रक्रियाओं और विनियोगीय वेद
मन्त्रों आदि सहित सर्वसाधारण के सामने छपकर उपस्थित है। सब विचारशील स्त्री
पुरुष आत्मोन्नति करने और वेदार्थ जानने में उससे लाभ उठावें। संस्कृत कोषों में
वैदिक शब्द और ब्राह्मण शब्द बहुधा नहीं मिलते विद्वान् लोग इस ओर भी
ध्यान देवें॥
४—गोपथब्राह्मण का विषय॥
गोपथब्राह्मण अथर्ववेद का ब्राह्मण कहा जाता है, परन्तु उसमें यज्ञ करने के
लिये चारों वेदों के मन्त्रों का विनियोग है। इससे विदित है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद और अथर्ववेद चार वेद संहिताओं के अलग अलग नाम हैं और चारों नाम
एक दूसरे के भी बोधक हैं। और यह भी प्रकट है कि चारों वेदों का नाम अलग
अलग करके तथा मिलाकर त्रयी वा त्रयी विद्या [कर्म, उपासना और ज्ञान] है।
गोपथ पू० २।१८ में वर्णन है—(एष ह वै विद्वांत्सर्ववित् ब्रह्मा यद् भृग्वङ्गिरोवित्)
यही विद्वान् सब जानने वाला ब्रह्मा [प्रधान ऋत्विज्] है जो भृगु-अङ्गिराओं
[प्रकाशमान ज्ञानों, चारों वेदों] का जानने वाला पुरुष है। भगवान् यास्क मुनि
निरुक्त १।८ में लिखते हैं—(ब्रह्माणौ जाते जाते विद्यां वदति ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं
वेदितुमर्हति, ब्रह्मा परिवृढः श्रुतः) एक ब्रह्मा उत्पन्न हुये हुये कर्म में विद्या बताता
है, ब्रह्मा सब विद्याओं वाला, और सब जानने योग्य होता है, ब्रह्मा वेदविद्या के
कारण बढ़ा हुआ होता है। यह भी प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा चतुर्मुखी अर्थात् चतुर्वेदी
होता है। इन कथनों से स्पष्ट है कि भृग्वङ्गिरस्, अथर्ववेद, ब्रह्मवेद आदि शब्द वेद
की संहिता विशेष [अथर्ववेद] के और चारों संहिताओं के नाम हैं, प्रकरण के अनु-
सार अर्थ कर लेना चाहिये॥
गोपथ में यज्ञ विषय [अर्थात् आहवनीय आदि अग्नियों द्वारा वेद मन्त्रों से
अग्नि प्रज्वलन] दीख पड़ता है, परन्तु वस्तुतः आत्मिक यज्ञ अर्थात् आत्मा की
उन्नति से पुरुषार्थ बढ़ाकर अन्न, प्रजा, पशु और स्वर्ग [सुख] की प्राप्ति का विधान
वेद मन्त्रों द्वारा वर्णित है। (या वाक् सोऽग्निः, यः प्राणः स वरुणः, यन्मनः स इन्द्रः,
यच्चक्षुः स बृहस्पतिः, यच्छ्रोत्रं स विष्णुः—गो० उ० ४।११) जो वाणी है वह अग्नि
[तापक पदार्थ] है, जो प्राण [श्वास] है, वह वरुण [स्वीकार करने योग्य पदार्थ]
( २१ )
है, जो मन है वह इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला पदार्थ ] है, जो आंख है वह बृहस्पति
[ बड़े बड़ों का पालने वाला पदार्थ ] है, जो कान है वह विष्णु [ व्यापक पदार्थ ] है
[ यह यज्ञ के देवता हैं ] । (पुरुषो वै यज्ञः, तस्य शिर एव हविर्धानं, मुखमाहवनीयः,
उदरं सदः इत्यादि-गो० उ० ५ । ४ ) पुरुष ही यज्ञ है, उसका शिर ही हविर्धान [हवि
का स्थान ], मुख आहवनीय [ यज्ञाग्नि ] और उदर सद [ सभा शाला ] है,
इत्यादि । ( प्रतितिष्ठति प्रजया पशुभिः य एवं वेद—गो० उ० ६ । १२ ) वह पुरुष
प्रजा और पशुओं से प्रतिष्ठा पाता है, जो ऐसा जानता है। इसी प्रकार के अनेक
वाक्य आत्मिक यज्ञ के प्रतिपादक हैं । इसके अतिरिक्त विशेष करके सृष्टिविद्या,
ओम् शब्द व्याख्या, गायत्री मन्त्र व्याख्या, ब्रह्मचर्यसेवन, शरीरविद्या, सत्य-
भाषण आदि विषय मनोरोचक, उन्नतिकारक और पुरुषार्थवर्धक हैं—विषय
सूची देखो ॥
५–गोपथब्राह्मण का विस्तार ॥
गोपथब्राह्मण ( ओं ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत् ) इन पदों से आरम्भ होकर
(यत्रैवंविदं शंसति यत्रैवंविदं शंसतीति ब्राह्मणम्) इन पदों पर समाप्त होता है । इसके
दो भाग हैं, पूर्वभाग और उत्तरभाग । दोनों भागों में ग्यारह (११) प्रपाठक और
दो सौ अट्ठावन (२५८) कण्डिकायें निम्न प्रकार से हैं ॥
गोपथब्राह्मण के प्रपाठक और कण्डिकायें ॥
| प्रपाठक | कण्डिका | प्रपाठक | कण्डिका |
|---|---|---|---|
| पूर्व भाग | उत्तर भाग | ||
| १ | ३६ | १ | २६ |
| २ | २४ | २ | २४ |
| ३ | २३ | ३ | २३ |
| ४ | २४ | ४ | १६ |
| ५ | २५ | ५ | १५ |
| ६ | १६ | ||
| योग | १३५ | योग | १२३ |
| विवरण | पूर्व भाग | उत्तर भाग | महायोग |
|---|---|---|---|
| प्रपाठक | ५ | ६ | ११ |
| कण्डिका | १३५ | १२३ | २५८ |
( १२ )
६-धन्यवाद ॥
उस सर्वशक्तिमान् परमपिता जगदीश्वर को अत्यन्त धन्यवाद है जिसकी
महती कृपा से अथर्व वेद भाष्य के पीछे यह गोपथब्राह्मण का भाष्य मेरे हाथ से पूरा
होकर सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत है । वृद्धावस्था के कारण शरीर तो कुछ ढीला
पड़ गया है, और मृत्युदेव कान में यह कहता रहता है ।
काल करे सो आज कर आज करे सो अब ।
पल में परलय होइगी फेर करेगा कब ॥
इस प्रेरणा से परमेश्वर पर भरोसा करके अन्य आवश्यकताओं से बचे समय
को लगातार लगाये रहने से धीरे-धीरे यह भाष्य पूरा हो गया ॥
मैं यहाँ पर बदायूं निवासी श्रीमान् स्वामी रामभिक्षु जी महाराज को हार्दिक
धन्यवाद देता हूं । उनकी प्रेरणा और विचारशीलता आदि सहायता से मेरे चित्त
में उत्साह बढ़ता रहा । उक्त स्वामी जी मेरे पास वेदों का स्वाध्याय करने आये
थे । जब तक वे रहे, इस भाष्य के और वेद मन्त्रों के देखने, विचारने, लिखने और
मुद्रणपत्र ( Proof sheet ) शोधने तथा सूचीपत्र और अनुक्रमणिका आदि बनाने में
प्रेम से मेरे सहायक हुये ॥
७-उपसंहार
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र
उतार्ये—अथ० १६ । ६२ । १ ॥ [ हे सर्वशक्तिमान् परमात्मन् ! ] ( मा ) मुझे
( देवेषु ) विद्वानों में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( मा ) मुझे ( राजसु ) राजाओं
में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( उत ) और ( अर्ये ) वैश्यों में ( उत ) और
( शूद्रे ) शूद्रों में, और ( सर्वस्य ) प्रत्येक ( पश्यतः ) दृष्टि वाले का ( प्रियम् ) प्रिय
[ बना ] ॥
हे परम पिता ! हमें पुरुषार्थ दीजिये जिससे हम वेदों के पठन-पाठन, विचार
और अभ्यास से सब संसार के उपकार करने में उद्यत रहें ॥
ओ३म् । शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥
हे जगदीश्वर ! हमें एक आत्मिक शान्ति, दूसरी शारीरिक शान्ति और
तीसरी सामाजिक शान्ति दीजिये ॥
क्षेमकरणदास त्रिवेदी ।
५२ लूकरगंज, प्रयाग, जन्म, कार्त्तिक शुक्ला ७ संवत् १६०५
[ इलाहाबाद ] विक्रमीय [ता० ३ नवम्बर १८४८ ईस्वी]
कार्त्तिकशुक्ला ७ संवत् १९८१ वि०, जन्मस्थान, ग्राम शाहपुर–मडराक,
ता० ३ नवम्बर १९२४ ई०। जिला अलीगढ़ ॥