गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ४ ॥ मनुष्य शरीर के दृष्टान्त से संवत्सर यज्ञ का वृत्तान्त ॥
२१८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ४ ॥
कण्डिका ४ ॥ मनुष्य शरीर के दृष्टान्त से संवत्सर यज्ञ का वृत्तान्त ॥
(पुरुषः वाव संवत्सरः) मनुष्य ही संवत्सर यज्ञ है। (तस्य प्राणः एव प्राय-
णीयः अतिरात्रः, प्राणेन हि प्रयन्ति) उस [मनुष्य] का प्राण ही प्रायणीय अतिरात्र
यज्ञ है, प्राण से ही आगे बढ़ते हैं। (वाक् आरम्भणीयम् अहः, यद् यत् आरभते
वाक् आरभते, वाचा एव तत् आरभते) वाणी आरम्भ करने योग्य दिन
[यज्ञ] है, जो जो आरम्भ किया जाता है वाणी आरम्भ करती है, वाणी से ही वह
आरम्भ किया जाता है। (तस्य दक्षिणः पाणिः अयम् एव अभिप्लवः) उस
[मनुष्य] का दाहिना हाथ यही अभिप्लव है। (तस्य इदं प्रातःसवनम् इदम्
माध्यन्दिनं सवनं इदं तृतीयं सवनं गायत्र्याः आयतने, तस्माद् इयम्
अस्यै ह्रसिष्ठा १) उस [मनुष्य] का यह प्रातःसवन [प्रातःकाल का यज्ञ अर्थात्
बालकपन] यह माध्यन्दिन सवन [दोपहर का यज्ञ अर्थात् यौवन], और
यह तीसरा सवन [तीसरे पहर का यज्ञ अर्थात् बुढ़ापा], गायत्री [आठ अक्षर के तीन
पाद वाले गायत्री छन्द] के स्थान में है, इसलिये यह [गायत्री] इस [वाणी] में
अति छोटी है। १। (तस्य इदं प्रातःसवनम् इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीय-
सवनं त्रिष्टुभः आयतने, तस्मात् इयम् अस्यै वरिष्ठा २) उस [मनुष्य] का यह
प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन, यह तीसरा सवन [संख्या १ देखो] त्रिष्टुप् [ग्यारह
अक्षर के चार पाद वाले त्रिष्टुप् छन्द] के स्थान में है, इसलिये यह [त्रिष्टुप्] इस
[गायत्री] से अधिक बड़ा है। २। (तस्य इदं प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम्
इदं तृतीयं सवनं जगत्याः आयतने, तस्मात् इयम् अनयोः वरिष्ठा ३) उस
[मनुष्य] का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन, और यह तीसरा सवन [सं० १]
जगती [बारह अक्षर के चार पाद वाले जगती छन्द] के स्थान में है, इसलिये यह
[जगती] इन दोनों [गायत्री और त्रिष्टुप्] से अधिक बड़ा है। ३। (तस्य इदं
प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीयं सवनं पङ्क्त्याः आयतने पृथुः इव
वै पङ्क्तिः, तस्मात् इयम् आसां प्रतिष्ठा ४) उस [मनुष्य] का यह प्रातःसवन,
यह माध्यन्दिन सवन और यह तीसरा सवन [सं० १] पङ्क्ति [पांच वा आठ अक्षर के
पांच पाद वाले पंक्ति छन्द] के स्थान में है, चौड़े पदार्थ के समान ही पङ्क्ति है, इसलिये
यह [पङ्क्ति] इन [गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती] की भूमि है। ४। (तस्य इदं
प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम्, इदं तृतीयसवनं विराजः आयतने, अन्नं वै
श्रीः विराट्, अन्नाद्यस्य श्रियः अवरुद्ध्यै, तस्मात् इयम् आसां वरिष्ठा ५) उस
४-(आरभते) आरभ्यते (प्रातःसवनम्) बाल्यमिति यावत् (माध्य-
न्दिनं सवनम्) यौवनम् (तृतीयसवनम्) वृद्धत्वम् (आयतने) स्थाने (ह्रसिष्ठा)
ह्रस्व-इष्ठन्, टाप्। ह्रस्वतमा (वरिष्ठा) उरु वर वा-इष्ठन् टाप्।
उरुतमा। विस्तीर्णतमा। वरतमा। श्रेष्ठतमा (पृथुः) विस्तीर्णः (प्रतिष्ठा)
भूमिः। अथवा पृथु-इष्ठन्, थस्य तः। प्रथिष्ठा। अधिकविस्तीर्णा (विराट्)
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ४ २१९
[ मनुष्य ] का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन और यह तीसरा सवन [सं० १] विराट्
[ दस अक्षर के चार पाद वाले विराट् छन्द ] के स्थान में है, अन्न और श्री [ लक्ष्मी वा
शोभा ] ही विराट् है, खाने योग्य अन्न और श्री की प्राप्ति के लिये यह है, इसलिये यह
[ विराट् ] इन [ गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती और पङ्क्ति ] में अति श्रेष्ठ है । ५ । ( तस्य
इदं प्रातःसवनम् इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीयसवनम् अतिछन्दसाम् आयतने,
अतिछन्दः वै छन्दसाम् आयतनम्, तस्मात् इदं प्रतिष्ठं फलकम् ६ ) उस [ मनुष्य ]
का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन, यह तीसरा सवन [ सं० १ ] अतिछन्दों
[ अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति अतिछन्दों ] के
स्थान में है, अतिछन्द ही छन्दों का स्थान है, इसलिये यह प्रतिष्ठा वाला प्रतिफल है । ६ ।
( तस्य इदं प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम्, इदं तृतीयं सवनं सैतः, सैतः
अभिप्लवः, सैतः आत्मा पृष्ठ्यः, प्लवति इव अभिप्लवः, तिष्ठति इव पृष्ठ्यः,
प्लवते इव हि एवम् अङ्गैः, तिष्ठति इव आत्मना ७ ) उस [ मनुष्य ] का यह
प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन और यह तीसरा सवन [ सं० १ ] खेती से सिद्ध हुआ
यज्ञ है, खेती से सिद्ध हुआ यज्ञ अभिप्लव है, खेती से सिद्ध हुआ यज्ञ आत्मा रूप पृष्ठ्य है,
चलता है जैसे यह अभिप्लव यज्ञ है, ठहरता है जैसे यह पृष्ठ्य है, क्योंकि वह [ यज्ञ ]
चलता है जैसे इस प्रकार अङ्गों से, और ठहरता है जैसे आत्मा से । ७ । ( तस्य दक्षिणः
कर्णः अयम् एव अभिजित् ) उस [ मनुष्य ] का दाहिना कान यही अभिजित् यज्ञ है ।
( तस्य अक्ष्णः यत् दक्षिणं शुक्लं सः प्रथमस्वरसामा यत् कृष्णं सः द्वितीयः, यत्
मण्डलं सः तृतीयः ) उस [ मनुष्य ] के आंख का जो दाहिना श्वेतपन है वह पहिला
स्वरसाम यज्ञ है, जो कालापन है वह दूसरा, और जो मण्डल [ आंख का घेरा ] है वह
तीसरा [ स्वरसाम ] है । ( नासिके विषुवान् ) दोनों नथने विषुवान् यज्ञ हैं । ( मण्डलम्
एव प्रथमः अर्वाक् स्वरसामा यत् कृष्णं सः द्वितीयः, यत् शुक्लं सः तृतीयः )
मण्डल [ वाएं आंख का घेरा ] ही पहिला अर्वाक् स्वरसाम यज्ञ है, जो कालापन है वह
दूसरा है और जो श्वेतपन है वह तीसरा है । ( तस्य सव्यः कर्णः अयं विश्वजित् ) उस
[ मनुष्य ] का बांयां कान यह विश्वजित् है । ( उक्तौ पृष्ठ्याभिप्लवौ ) दोनों पृष्ठ्य
और अभिप्लव कह दिये हैं । ( यौ अर्वाञ्चौ प्राणौ ते गवायुषी ) जो नीचे वाले दो
प्राण [ पायु और उपस्थ ] हैं वे दो गवायुषी यज्ञ हैं । ( अङ्गानि दशरात्रः मुखं
महाव्रतम् ) शेष अङ्ग दशरात्र और मुख महाव्रत है । ( तस्य उदानः एव उदयनीयः
अतिरात्रः ) उस [ मनुष्य ] का उदान [ ऊपर चढ़ने वाला वायु ] ही उदयनीय
अतिरात्र यज्ञ है । ( उदानेन हि उद्यन्ति यः एवं वेद ) क्योंकि वह उदान वायु से
वि + राजृ दीप्तौ ऐश्वर्य्ये च-क्विप् । विविधदीप्यमाना । विविधैश्वर्ययुक्ता ।
छन्दोविशेषः ( अतिछन्दसाम् ) अतिजगत्याद्यतिछन्दसाम् ( प्रतिष्ठम् ) प्रति-
ष्ठायुक्तम् ( फलकम् ) स्वार्थे कन् । फलम् । प्रतिफलम् ( सैतः ) तेन निर्वृत्तम्
( पा० ४ । २ । ६८ ) सीता-अण् । सीतया कृषिकर्मणा निष्पादितो यज्ञः ( अक्ष्णः )
नेत्रस्य ( मण्डलम् ) मडि भूषणे-कलच् । चक्राकारेण वेष्टनम् ॥