गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ५ ॥ दस अथर्वा ऋषि, दस आथर्वण, वेद और ओम् ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । कं० ५ ॥ ९
॥ कण्डिका ५ ॥
तमथर्वाणमृषिमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्तस्माच्छ्रान्तात्तप्तात् सन्तप्तात्
दशतयानथर्वण ऋषीन्निरमिमतैकचाँन् द्व्यचाँस्तुचाँश्चतुर्ऋंचान् पञ्चर्चाम्
षडर्चांन् सप्तर्चानष्टर्चाम्नवचाँन्दशर्चानिति । तानथर्वण ऋषीनभ्यश्राम्यदभ्यतपत्
समतपत्, तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यो दशतयानाथर्वणानार्षेयान्निरमिम-
तैकादशान् द्वादशांस्त्रयोदशांश्चतुर्दशान् पञ्चदशान् षोडशान् सप्तदशानष्टा-
दशान्नवदशान् विंशानिति । तानथर्वण ऋषीनाथर्वणांश्चार्षेयानभ्यश्राम्यदभ्य-
तपत् समतपत् तेभ्यः श्रान्तेभ्यस्तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यो यान् मन्त्रानपश्यत् स आथ-
र्वणो वेदोऽभवत् तमाथर्वणं वेदमभ्यश्राम्यदभ्यतपत्समतपत्तस्माच्छ्रान्तात्
तप्तात् सन्तप्तादोमिति मन एवोर्ध्वमक्षरमुदक्रामत्, स य इच्छेत्सर्वैरेतैरथर्वनि-
श्चाथर्वणैश्च कुर्वीयेत्येतयैव तं महाव्याहृत्या कुर्वीत । सर्वैर्ह वा अस्यैतैरथर्व-
भिश्चाथर्वणैश्च कृतं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतया महाव्याहृत्या
कुरुते ॥ ५ ॥
कण्डिका ५ ॥ दस अथर्वा ऋषि, दस आथर्वण, वेद और ओम् ॥
(तम् अथर्वाणम् ऋषिम्) उस अथर्वा ऋषि [अर्थात् अपने] को (अभि
अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से
तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तस्मात् श्रान्तात् तप्तात् सन्तप्तात्) उस
दबाये हुए, तपाये हुए भली भांति तपाये हुए [अथर्वा] से (दशतयान् अथर्वणः ऋषीन्)
दस प्रकार वाले अथर्वा (निश्चल) ऋषियों [दर्शनीय वेदज्ञानों] को (निर् अमिमत्)
उसने बनाया, [अर्थात्] (एक-ऋचान्) एक [ओम् परमात्मा] की स्तुति योग्य विद्या
वाले [वेद ज्ञानों] को, (द्वि--ऋचान्) दो [स्थावर और जङ्गम संसार] की स्तुति
योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (तृचान्) तीन [भूत, भविष्यत्, वर्तमान]
की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (चतुर्--ऋचान्) चार [धर्म, अर्थ,
काम, मोक्ष,] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (पंच-ऋचान्) पांच
[पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, पांच तत्त्वों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों]
को, (षट्-ऋचान्) छह [वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, ऋतुओं] की
स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को, (सप्त-ऋचान्) सात [दो कान, दो नयने,
दो आँखें, एक मुख अथर्व १०।२।६] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को,
(अष्ट-ऋचान्) आठ [यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि,
५--अथर्वाणम् - गो० पू० १ । ४ निश्चलम् । ऋषिम्-गो० पू० १ । ४ ।
सन्मार्गदर्शकं स्वात्मानम् (दशतयान्) संख्याया अवयवे तयप् (पा० ५।२।४२)
दशन्-तयप् दशप्रकारान् (ऋषीन्) दर्शनीयान् वेदमन्त्रान् (निर् अमिमत)
माङ् माने-लङ् आर्षं बहुवचनम् । अमिमीत । निर्मितवान् (एकऋचान्) ऋच
स्तुतौ-क्विप् । ऋग्वाङ्नाम-निघ० १ । ११ । ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे (पा० ५।४।
७४) एक+ऋच्-अप्रत्ययः समासान्तः । एकस्य ओम् इत्यस्य परमात्मनः ऋक्
१० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ५ ॥
योग के आठ अंगों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को (नव-ऋचान्)
नव [आचारो विनयो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम् । निष्ठावृत्तिस्तपो दानं नवधा
कुललक्षणम्-ति शब्दकल्पद्रुमः-इन नो कुल लक्षणों] की स्तुति योग्य विद्या वाले
[ज्ञानों] को और (दश ऋचान्-इति) दस [दान, शील, क्षमा, वीरता,
ध्यान, बुद्धि, सेना, उपाय, दूत, ज्ञान, इन दस बलों] की स्तुति योग्य विद्या वाले
[वेद ज्ञानों] को [इस विषय के लिये देखो - अथर्व० १६ । २३ । २० १६.
१७] (तान्) उन (अथर्वणः) अथर्वा [निश्चल] (ऋषीन्) ऋषियों
[दर्शनीय वेद ज्ञानों] को (अभि अश्राम्यत्) सब ओर से दबाया, (अभि
अतपत्,) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया।
(तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः) उन दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति
तपाये हुये [निश्चल वेदज्ञानों] से (दशतयान्) दस प्रकार वाले (आथर्वणान्)
आथर्वण [निश्चल ब्रह्म से आये हुये] (आर्षेयान्) आर्षेयों [ऋषियो'. वेदज्ञानों
में विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों] को (निर् अभिममत) उस [ब्रह्म] ने बनाया-
[अर्थात्] (एकादशान्) ग्यारहवें [प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग,
कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय, दस प्राणों' के सहित ग्यारहवें जीवात्मा] से सम्बन्ध
वाले, (द्वादशान्) बारहवें [चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन,
कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ, ग्यारह, महीनों के सहित फाल्गुन महीने] से सम्बन्ध
वाले, (त्रयोदशान्) तेरहवें [उछालना, गिराना, सिकोड़ना, फैलाना, और चलना
पांच कर्म-तथा छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता' बड़ाई, ईश्वरपन और जिते-
न्द्रियता, इन बारह के सहित तेरहवें सत्य संकल्प] से सम्बन्ध वाले (चतुर्दशान्)
चौदहवें [कान, आंख नासिका जिह्वा, त्वचा-पांच ज्ञानेन्द्रिय और वाक् हाथ,
पांव, पायु, उपस्थ पांच कर्मेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त के सहित चौदहवें अहङ्कार]
से सम्बन्ध वाले, (पञ्चदशान्) पन्द्रहवें [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, और
चित्र-सात रूप, तथा मधुर, अम्ल, लवण, 'कटु, कषाय और तिक्त-छह रस और
चौदहवें सुरभि गन्ध के सहित पन्द्रहवें असुरभि गन्ध] से सम्बन्ध वाले, (षोडशान्)
सोलहवें [प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, प्रकाश, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य,
तप, मन्त्र, कर्म, लोक इन पन्द्रह कलाओं के सहित सोलहवीं कला के नाम] से सम्बन्ध
स्तुत्या विद्या येषु तान् वेदान् (द्वि-ऋचान्) सिद्धिः पूर्ववत्। द्वयोः
स्थावरजङ्गमयोः स्तुत्यविद्यायुक्तान् वेदान्। तृचान्-त्रि+ऋचान्। न संप्रसारणे
संप्रसारणम् (पा० ६ । १ । ३७) अत्र वार्तिकम्-ऋषि त्रैरुत्तरपदादिलोपश्छन्दसि।
ऋचि परतः त्रिशब्दस्य सम्प्रसारणम्, ऋलोपश्च। ऋक्पूरबू० (पा० ५ ।
४। ७४) तृच्-समासान्तः अप्रत्ययः। त्रयाणां भूतभविष्यद्वर्तमानानां स्तुत्य-
विद्यायुक्तान् वेदान्। एवम् (चतुरृचान्, पञ्चर्चाम्) इत्यादि पदेषु सिद्धि-
रर्थश्च योजनीयः (आथर्वणान्) तत आगतः (पा० ४ । १ । ७४) अथर्वन्-
अण्। अन् (६ । ४ । १६७) इति अणि प्रकृतिभावः। अथर्वणो निश्चलात् परमे-
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ५ ॥ ११
वाले, (सप्तदशान्) सत्रहवें [चार दिशा, चार विदिशा, एक उपर की एक नीचे की,
दस दिशायें—सत्त्व, रज, और तम तथा ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन सोलह के सहित
सत्रहवें संसार] से सम्बन्ध वाले, (अष्टादशान्) अट्ठारहवें [धैर्य, सहन, मन का
रोकना, चोरी न करना, शुद्धता जितेन्द्रियता, बुद्धि, विद्या, सत्य, क्रोध न करना—यह दश
धर्म—तथा ब्राह्मण, गो, अग्नि, सुवर्ण, घृत, सूर्य, जल—इन सात मंगलों के सहित
अठारहवें राजा], से सम्बन्ध वाले, (नवदशान्) उन्नीसवें [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,
शूद्र—चार वर्ण, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—चार आश्रम, सत्संग सुनना,
विचारना, ध्यान करना—चार कर्म, अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त की रक्षा, रक्षित की वृद्धि,
बढ़े हुये का सन्मार्ग में व्यय करना, चार पुरुषार्थ--मन बुद्धि इन अट्ठारह के सहित
उन्नीसवें अहङ्कार] से सम्बन्ध वाले (विंशान् इति) और बीसवें [पृथिवी आदि
पांच सूक्ष्मभूत, पृथिवी आदि पांच स्थूल भूत—कान, आंख, नासिका, जिह्वा, त्वचा पांच
ज्ञानेन्द्रिय और वाक्, हाथ, पांव, पायु, इन उन्नीस के सहित बीसवें उपस्थेन्द्रिय] से
सम्बन्ध वाले [सूक्ष्म विज्ञानों को उस ब्रह्म ने बनाया]-[इस विषय के लिये देखो
अथर्व काण्ड १९ सूक्त २३ मन्त्र ८-१७]। (तान्) उन (अथर्वणः) अथर्वा [निश्चल]
(ऋषीन्) ऋषियों [सन्मार्ग दर्शक वेदज्ञानों] (च) और (आथर्वणान्)
आथर्वण [निश्चल ब्रह्म से आये हुये] (आर्षेयान्) आर्षेयों [ऋषियों वेदज्ञानों में
विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों) को (श्रमि-अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया
(अभि अतपत्) सब ओर तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तेभ्यः
श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः) उन दबाये हुए, तपाये हुए, भली भांति तपाये हुये
[बीसों] से (यान्) जिन (मन्त्रान्) मन्त्रों [अति-सूक्ष्म विचारों] को (अपश्यत्)
उस [ब्रह्म] ने देखा, (सः) वह (आथर्वणः) आथर्वण [निश्चल ब्रह्म का]
(वेदः) वेद (अभवत्) हुआ [अर्थात् समस्त चारों वेदोक्त विज्ञान प्रकट हुये]
(तम्) उस (आथर्वणम् वेदम्) आथर्वण वेद [निश्चल ब्रह्म के विज्ञान] को (अभि
अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से
तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तस्मात् श्रान्तात् तप्तात्
सन्तप्तात्) उस दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [वेद] से (ओम्
इति मनः एव) ओम् [सर्वरक्षक अर्थात्] मन [मननशील ब्रह्म] ही (ऊर्ध्वम्)
श्वराद् आगतान् प्राप्तान् (आर्षेयान्) पथ्यतिथिवसतिस्वपतेढञ् (पा० ४।
४।१०४) ऋषि-ढञ्, बाहुलकात्। ऋषिषु विख्यात आर्षेयः-महीधर भाष्ये,
यजु० ७।४६। आर्षेयः ऋषिषु साधुस्तत्सम्बुद्धौ-दयानन्द भाष्ये यजु०
२१।६१। ऋषिषु वेदमन्त्रेषु विख्यातानि सूक्ष्मविज्ञानानि (एकादशान्) तस्य
पूरणे डट् (पा० ५।२।४८) एकादशन्-डट्। अंशंआदिभ्योऽच् (पा० ५।
२।१२७) एकादश-अच्। प्राणापानोदानव्यानसमानागकूर्म्मकृकलदेवदत्त
धनञ्जयाः-इति दशभिः प्राणैः सहितस्यैकादशस्य जीवात्मनः सम्बद्धानि
विज्ञानानि (द्वादशान्) आदीनि पदान्येवमेव साधनीयानि योजनीयानि च