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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

कण्डिका ३ ॥ अतिरात्र यज्ञ में पवमान आदि स्तोत्रों का विचार ॥

४१६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३ ॥
यः स्तुवते, तेन रात्रिः पञ्चदशस्तोत्रा, तेनोभे पञ्चदशस्तोत्रे भवतः, तेन ते समा-
वद्भाजी भवतः । परिमितं स्तुवन्त्यपरिमितमनुशंसन्ति, परिमितं भूतमपरिमितं
भव्यमपरिमितान्येवावरुन्द्ध्यादित्यतिशंसन्ति । स्तोममति वै प्रजास्यात्मानमति
पशवः । तद्यदेवास्यात्या१त्मानन्तदेवास्यैतेनाप्याययन्ति । अथो द्वयं वा इदं सर्वं स्नेह-
श्चैव तत्तेजश्च । अथ तदहोरात्राभ्यामाप्तं२ स्नेहतेजसोराप्त्यै । गायत्रीं स्तोत्रियानु-
रूपं शंसन्ति, तेजो वै गायत्री, तमः पाप्मा, रात्रिस्तेन तेजसा तमः पाप्मानन्तरन्ति
पुनरादाय३, शंसन्ति । एवं हि सामगाः स्तुवते, यथास्तुतमनुशस्तं भवति । न हि
तत् स्तुतं यन्नानुशस्तम् । तदाहुः, अथ कस्मादुत्तमात् प्रतीहारादाहूय साम्ना
शस्त्रमुपसन्तन्वन्तीति ॥ ३ ॥
कण्डिका ३ ॥ अतिरात्र यज्ञ में पवमान आदि स्तोत्रों का विचार ॥
( पवमानवत् अहः इति आहुः, रात्रिः पवमानवती न, कथम् उभे पव-
मानवती भवतः, केन ते समावद्भाजौ भवतः इति ) वे [ ब्रह्मवादी ] कहते हैं दिन
[ यज्ञ ] पवमान स्तोत्र वाला है, और रात्रि [ यज्ञ ] पवमान स्तोत्र वाली नहीं है, कैसे
दोनों [ दिन और रात ] पवमान स्तोत्र वाले होते हैं और किस कारण से वे दोनों एक से
भाग वाले होते हैं । [ इसका समाधान ] ( इन्द्राय मद्वने सुतम्. इदं वसो सुतमन्धः,
इदं हि अन्वोजसा सुतम् इति—यत् एव स्तुवन्ति च शंसन्ति च, तेन रात्रिः पव-
मानवती, तेन उभे पवमानवती भवतः, तेन ते समावद्भाजौ भवतः ) इन्द्राय
मद्वने सुतम्.......ऋ० ८ । ६२ । १६, [ सायणभाष्य ८१ ] । साम० उ० २ । ७ । ४ ।
इदं वसो सुतम् अन्धः.......ऋ० ८ । २ । १, सा० पू० २ । ३ । १०, इदं हि अनु ओजसा
सुतम्.......ऋ० ३ । ५१ । १०, सा० पू० २ । ८ । १, इन [ तीन मन्त्रों ] से वे [उद्गाता
लोग ] स्तोत्र पढ़ते हैं और [ होता लोग ] शस्त्र पढ़ते हैं, इससे रात्रि पवमान स्तोत्र
वाली है [ क्योंकि तीनों मन्त्रों में सुत—निचोड़ा गया सोम—शब्द पवमानवाची है ], इस
से दोनों पवमान स्तोत्र वाले हैं, इस कारण से वे दोनों एकसे भाग वाले हैं ॥
( पञ्चदश स्तोत्रम् अहः इति आहुः रात्रिः पञ्चदश स्तोत्रा न, कथम् उभे
पञ्चदश स्तोत्रे भवतः, केन ते समावद्भाजौ भवतः इति ) वे [ ब्रह्मवादी ] कहते
३— (पवमानवत्) पवमानस्तोत्रयुक्तम् ( उभे ) अहोरात्रे ( समावद्भाजौ )
समानभागयुक्ते ( मद्वने ) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (पा० ३ । २ । ७५) मदी हर्षे
—क्वनिप् । हर्षशीलाय ( सुतम् ) अभिषुतं सोमम् ( वसो ) हे वासयितः ( अन्धः )
अन्नम् ( ओजसा ) बलेन (स्तुवन्ति) उद्गातारः स्तोत्रं पठन्ति ( शंसन्ति ) होतारः
शस्त्रं पठन्ति ( पवमानवती ) पवमानस्तोत्रयुक्ता । तथा द्विवचनस्य ईकारादेशः
१. पू. सं. 'त्या' पाठः नास्ति ॥ २. पू. सं. 'आप्यं' इति पाठः ॥
३. पू. सं 'आदायं' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३ ।। ४५७
हैं—दिन पन्द्रह स्तोत्र वाला है, और रात्रि पन्द्रह स्तोत्र वाली नहीं है, कैसे दोनों [ दिन
और रात्रि ] पन्द्रह स्तोत्र वाले हैं और किस कारण से वे दोनों एक से भाग वाले होते हैं।
[ इस का समाधान ] ( द्वादश स्तोत्राणि अपिशर्वराणि तिसृभिः देवताभिः, रायन्त-
रेण सन्धिना अश्विना यः स्तुवते, तेन रात्रिः पञ्चदशस्तोत्रा, तेन उभे पञ्चदश-
स्तोत्रे भवतः तेन ते समावद्भाजो भवतः ) तीन देवताओं सहित बारह स्तोत्र वाले
अपिशर्वरस्तोत्र हैं [ आगे विशेषः ४ देखो, उन स्तोत्रों में ] रथन्तर साम की ध्वनि वाले
सन्धि [ प्रातःकालीन स्तोत्र ] से दोनों अश्विनों [ दिन रात के मेल ] को जो [ ऋत्विज् ]
स्तुति करता है, उस से रात पन्द्रह स्तोत्र वाली है, उससे वे दोनों पन्द्रह स्तोत्र वाले होते
हैं, और उसी कारण से वे दोनों एक से भाग वाले होते हैं। ( परिमितं स्तुवन्ति, अप-
रिमितम् अनुशँसन्ति ) परिमित [ गिने हुये मन्त्र युक्त ] स्तोत्र पढ़ते हैं और अपरिमित
[ बेगिनती मन्त्र वाला ] अनुशास्त्र [ स्तोत्र के पीछे पढ़ा गया स्तोत्र ] वे पढ़ते हैं। ( परि-
मितं भूतम्, अपरिमितं भव्यम् ) परिमित [ सीमाबद्ध ] भूतकाल है और अपरिमित
[ सीमा बिना ] भविष्यकाल है। (अपरिमितानि एव अवरुन्ध्यात् इति अति-
शंसन्ति ) अपरिमितों [ सीमा बिना फलों ] को वह प्राप्त करे, इसलिये वे अति शस्त्र
[ स्तोत्रों से अधिक शस्त्र ] पढ़ते हैं। ( स्तोमम् अति, अस्य आत्मानम् अति वै प्रजा
पशवः ) स्तोत्र से अधिक [ जैसे अनुशस्त्र हैं, वैसे ] इस के आत्मा से अधिक प्रजा [ पुत्र
पौत्र आदि ] और पशु [ गो, घोड़ा हाथी आदि ] होते हैं। ( तत् यत् एव अस्य आत्मा-
नम् अति, अस्य तत् एव एतेन आप्याययन्ति ) जो वे [ प्रजा और पशु ] इस के
आत्मा से अधिक होते हैं, उसके उनको इस व्यवहार से वे बढ़ाते हैं॥
( अथो द्वयं वै इदं सर्वं स्नेहः च एव तत् तेजः च ) फिर यह सब दो हैं स्नेह
और वह तेज ही [ रात्रि का रस और दिन का प्रकाश ]। ( अथ तत् अहोरात्राभ्याम्
आप्तम्, स्नेहतेजसोः आप्त्यै ) फिर जो कुछ दिन और रात्रि से पाने योग्य है, वह
(वा० पा० ७ । १ । ३६) पवमानवत्यौ१ (सन्धिना) प्रातःसन्धिना (रायन्तरेण) रथ-
न्तरसामध्वनियुक्तेन(अश्विना)अशूङ् व्याप्तौ–क्वन्,इनिः। अश्विनौ यद् व्यश्नुवाते
सर्वं रसेनान्यो ज्योतिषान्यः अहोरात्रावित्येके—निरु० १२ । १ । व्याप्तिमन्तौ ।
अहोरात्रौ । सूर्याचन्द्रमसौ (परिमितम्) परिमितमन्त्रोपेतम् (अनुशंसन्ति)
स्तोत्रपश्चात् शस्त्रं पठन्ति (परिमितम्) सीमाबद्धम् (अपरिमितम्) सीमार-
हितम् (अवरुन्ध्यात्) प्राप्नुयात् (अतिशंसन्ति) स्तोत्रगतामृक्संख्यामतिलङ्घ्य
होतारः शस्त्रं पठन्ति (स्तोमम्) स्तोत्रम् (अति) अतीत्य । उल्लङ्घ्य (प्रजा)
पुत्रपौत्रादिरूपा (अस्य) यजमानस्य (स्नेहः) रसः। आर्द्रम् (आप्तम्) प्राप्त-
१—यह सिद्धि ठीक नहीं है। यह 'पवमानवती' शब्द को नपुंसकलिङ्ग का द्वि-
वचन मान कर की गई है, पर वस्तुतः यह शब्द स्त्रीलिङ्ग द्विवचन का है। जैसा कि इसके
विशेषण 'उभे' शब्द से प्रकट है। यद्यपि ऐसी स्थिति में पवमानवत्यौ बनना चाहिये। पुन-
रपि 'वाच्छन्दसि' के नियम से पूर्वसवर्ण दीर्घ होकर 'पवमानवती' शब्द साधु सिद्ध होता
है ॥ सम्पा० ॥

४५८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३
[ यजमान के ] स्नेह और तेज [ रस और प्रताप ] की प्राप्ति के लिये है । ( गायत्रीं
स्तोत्रियानुरूपं शंसन्ति ) गायत्री ' छन्द वा मन्त्र ] में स्तोत्रिय अनुरूप को वे बोलते
हैं । ( तेजः वै गायत्री, तमः पाप्मा ) तेज ही गायत्री है, अन्धकार पाप है । ( तेन
तेजसां रात्रिः तमः पाप्मानं तरन्ति, पुनः [ तेजः ] आदाय शंसन्ति ) उस
[ गायत्री रूप ] तेज से रात्रि के अन्धकार [ समान ] पाप को वे पार करते हैं, और फिर
[ तेज ] ग्रहण करके वे बोलते हैं [ शस्त्र पढ़ते हैं ] । ( एवं हि सामगाः स्तुवते यथा
स्तुतम् अनुशस्तं भवति ) ऐसे ही सामगायक [ उद्गाता लोग ] स्तोत्र बोलते हैं कि स्तुति
के योग्य अनुशस्त्र होवे । (तत् स्तुतं न हि, यत् अनुशस्तं न ) वह स्तोत्र नहीं है जिस
में अनुशस्त्र न हो । ( तत् आहुः, अथ कस्मात् उत्तमात् प्रतीहारात् आहूय साम्ना
शस्त्रम् उपसन्तन्वन्ति इति ) वे कहते हैं—फिर किसलिये सबसे पिछले प्रतीहार
[ प्रतिहर्ता के गाने योग्य स्तोत्र ] से बोलकर सामगान के साथ शस्त्र को समीप में वे
बढ़ाते हैं [ इसका उत्तर ऊपर आ चुका है ] ॥ ३ ॥
भावार्थः अवसर को विचार कर स्तुति करनी योग्य है ॥ ३ ॥
विशेषः १—इस कण्डिका को मिलाओ—ऐ० ब्रा० ४ । ६ ॥
विशेषः २—( उभ ) के स्थान में ( उभे ) ऐ० ब्रा० से शुद्ध किया गया है ॥
विशेषः ३—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१--इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः अर्कमर्चन्तु कारवः—ऋग्०
८ । ६२ । १९, [ सायण भाष्य ८१ ] । साम० २ । ७ । ४ ॥ ( नः गिरः ) हमारी
वाणियां ( मद्वने ) हर्षशील ( इन्द्राय ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले वीर पुरुष ] के लिये
( सुतम् ) सुत [ निचोड़े हुये तत्त्व रस ] को ( परि स्तोभन्तु ) सब ओर से सराहें,
और ( कारवः ) स्तुति करने वाले लोग ( अर्कम् ) पूजनीय [ वीर ] को (अर्चन्तु ) पूजें ॥
२--इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते—ऋग्०
८ । २ । १, साम० पू० ३ । २ । १० ॥ ( वसो ) हे वसु ! [ वसाने वाले इन्द्र राजन् ]
( इदम् ) इस ( सुतम् ) सुत [ निचोड़े हुये ] ( अन्धः ) अन्न [ तत्त्वरस ] को ( सुपूर्णम्
उदरम् ) भले प्रकार भर पेट ( पिब ) पी, ( अनाभयिन् ) हे निर्भय ! ( ते ) तुझे
( ररिम ) [ वह ] हम देते हैं ॥
३—इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधांनां पते । पिबा त्व१स्य गिर्वणः—ऋ०
३ । ५१ । १०, साम० पू० २ । ८ । १ ॥ ( राधांनां पते ) हे धनों के स्वामी ! [ इन्द्र
राजन् ] ( इदं हि ) यह ही ( ओजसा ) बल के साथ ( अनु ) निरन्तर ( सुतम् ) सुत
[ निचोड़ा गया तत्त्व रस ] है, ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ! ( अस्य ) इस
[ तत्त्वरस ] का ( तु ) ( पिब ) पान कर ॥
व्यम् ( आदाय ) गृहीत्वा ( सामगाः ) उद्गातारः ( प्रतीहारात् ) प्रति + हृञ्
हरणे-घञ् वा दीर्घः । प्रतिहर्त्रा गातव्यात् स्तोमात् ॥

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५। क० ४ ४५९
विशेषः ४-बारह स्तोत्र वाले अपिशर्वरे छह मन्त्र प्रातः सन्धि में रथन्तर साम
की ध्वनि से गाये जाते हैं। छह मन्त्रों के अर्धर्च अर्धर्च करके पाठ करने से बारह हो जाते
है [ देखो—गो० उ० ६ । ८ ], तीन देवता इस प्रकार हैं—पहिले और दूसरे मन्त्र अग्नि,
तीसरे और चौथे उषा तथा पांचवें और छठे अश्विनौ देवता वाले हैं। सामवेद में यह छह
मन्त्र एक स्थान पर हैं ॥
१, २ अग्निदेवता ॥
१--एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिं स्वध्वरं
विश्वस्य दूतममृतम्--ऋग्० ७ । १६ । १ यजु० १५ ० ३२, साम० १ । २ । १३ ।।
( एना नमसा ) इस अन्न वा सत्कार से ( वः ) तुम्हारे लिये ( ऊर्जः नपातम् ) पराक्रम
के न गिराने वाले, ( प्रियम् ) प्रिय, ( चेतिष्ठम् ) अत्यन्त चेताने वाले, ( अरतिम् )
गति वाले [ पुरुषार्थी ], ( स्वध्वरम् ) अच्छे प्रकार हिंसा रहित व्यवहार वाले, ( विश्वस्य
दूतम् ) सबके कार्य साधने वाले, ( अमृतम् ) न मरने वाले ( अग्निम् ) अग्नि [ अग्नि के
समान तेजस्वी विद्वान् ] को ( आ हुवे ) मैं बुलाता हूं ॥
२- स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत् स्वाहुतः । सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी
वसूनां देवं राधो जनानाम्-ऋ० ७ । १६ । २, यजु० १५ । ३३, ३४ भेद से,
साम० उ० १ । २ । १३ ।। ( सः ) वह [ अग्नि समान तेजस्वी विद्वान् ] ( विश्व-
भोजसा ) संसार के रक्षा करने वाले ( अरुषा ) तेज से ( योजते ) युक्त होता है,
( स्वाहुतः ) अच्छे प्रकार बुलाया गया ( सः ) वह ( दुद्रवत् ) शीघ्र पहुँचता है, वह
( सुब्रह्मा ) सुन्दर अन्न वा धनों वाला वा अच्छे प्रकार चारों वेद जानने वाला, ( यज्ञः )
संगति योग्य ( सुशमी ) सुन्दर कर्मों वाला, ( जनानाम् ) मनुष्यों के लिये ( वसूनाम् )
धनों के बीच ( देवम् ) प्रकाशमान ( राधः ) धन [ के समान ] है ॥
३ ४ उषा देवता ॥
३-प्रत्यु अदर्श्यायत्यु१ च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो महि व्ययति चक्षसे तमो
ज्योतिष्कृणोति सूनरी- ऋ० ७ । ८१ । १, साम० उ० १ । २ । १४ भेद से ।।
( आयती ) आती हुई ( उच्छन्ती ) अन्धकार निकालती हुई ( दिवः ) सूर्य की
( दुहिता ) पुत्री [ उषा, प्रभात वेला ] ( उ ) निश्चय करके ( प्रति अदर्शि ) प्रत्यक्ष
देखी जाती है, वह ( महि तमः ) बड़े अन्धकार को ( अपो व्ययति ) हटा देती है,
( सूनरी ) सुन्दर नेत्री [ अच्छे प्रकार ले चलने वाली वह ] ( चक्षसे ) देखने के लिये
( ज्योतिः ) ज्योति [ उजाला ] ( कृणोति ) करती है ॥
४-उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचाँ उद्यन् नक्षत्रमर्चिवत् । तवेदुषो व्युषि
सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि-ऋग्० ७ । ८१ । २, साम० उ० १ । २ । १४ ।।
( अर्चिवत् ) किरणों वाला ( नक्षत्रम् ) नक्षत्र, [ अर्थात् ] ( उद्यन् ) उदय होता
हुआ ( सूर्यः ) सूर्य ( उस्रियाः ) किरणों को ( सचा ) एक साथ ही ( उद् सृजते )
ऊपर को छोड़ता है। ( उषः ) हे उषा ! [ प्रभात वेला ] ( तव ) तेरे ( च ) और