सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७९

अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७९
दातुन के लिये उत्तम वृक्ष—
करञ्ज-करवीरार्क-मालती-ककुभासनाः ॥ ७३ ॥
शस्यन्ते दन्तपवने ये चाप्येवंविधा द्रुमाः ।
धार्याण्यास्येन वैशद्य-रुचि-सौगन्ध्यमिच्छता ॥ ७४ ॥
जाती-कटुक-पूगानां लवङ्गस्य फलानि च ।
कङ्कोलफलं पत्रं ताम्बूलस्य शुभं तथा ॥ ७५ ॥
तथा कर्पूर-निर्यासः सूक्ष्मैलायाः फलानि च ।
करञ्ज ( नाटा करञ्ज ), करवीर (कनेर), अर्क ( आक ), मालती (जुही),
ककुभ ( अर्जुन ), असन ( आसन ), ये वृक्ष अथवा इनके समान इस गुण
वाले वृक्ष दातुन के लिये उत्तम हैं ।
मुख की निर्मलता, भोजन में रुचि एवं मुख की सुगन्धि चाहने वाले
पुरुष को चाहिये कि जातिफल ( जायफल ), कटुकफल ( लता कस्तूरी ), पूग
( सुपारी ), लवङ्ग (लौङ्ग), कङ्कोल (शीतल चीनी), उत्तम पान, कपूर ( कपूर
वृक्ष का गोंद) और छोटी इलायची इन वस्तुओं को मुख में धारण करे ॥७५॥
स्नेह-गण्डूष के गुण—
हन्वोर्बलं स्वरबलं वदनोपचयः परः ॥ ७६ ॥
स्यात्परं च रसज्ञानमन्ने च रुचिरुत्तमा ।
न चाऽस्य-कण्ठ-शोषः स्यान्नौष्ठयोः स्फुटनाद्भयम् ॥ ७७ ॥
न च दन्ताः क्षयं यान्ति दृढमूला भवन्ति च ।
न शूल्यन्ते न चाम्लेन हृष्यन्ते भक्षयन्ति च ॥ ७८ ॥
परानपि खरान् भक्ष्यान् तैल-गण्डूष-सेवनात् ।
जबड़ों को बल मिलता है, वाणी, स्वर, आवाज को बल प्राप्त होता है,
मुख, गाल आदि की वृद्धि, उन्नति, रसों का ज्ञान भली प्रकार से होता है और
अन्न में भली प्रकार से भोजन के लिये रुचि होती है ।
स्नेह-गण्डूष अर्थात् तैल के गरारे करने वाले को गले में खुश्की, रूक्षता
नहीं होती और न ओठों के फटने की आशङ्का होती है । दाँत जल्दी गिरते भी
नहीं, अपितु और भी अधिक जड़ें मजबूत बन जाती हैं और न दाँतों में दर्द
होती है, और न खटाई से खट्टे होते हैं, कठोर खाने की वस्तु को भी खा
सकते हैं ॥ ७६-७८ ॥
शिर पर तैल लगाने से लाभ—
नित्यं स्नेहार्द्रशिरसः शिरःशूलं न जायते ॥ ७९ ॥
न खालित्यं न पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च ।

बलं शिरः कपालानां विशेषेणाभिवर्धते ॥ ८० ॥
दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च ।
इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुत्वग्भवति चामला ॥ ८१ ॥
निद्रालाभः सुखं च स्यान्मूर्ध्नि तैल-निषेवणात् ।
नित्य प्रति शिर पर तेल की मालिश करने से शिरःशूल (शिर का दुखना)
नहीं होता, न बाल उड़ते हैं न गंजापन आता, न पालित्य अर्थात् बाल जल्दी
श्वेत नहीं होते और बाल नहीं गिरते । शेर की अस्थियों का बल विशेष रूप
से बढ़ता है और बालों की जड़ें मजबूत होती हैं, बाल लम्बे और काले हो
जाते हैं । आँख कान आदि इन्द्रियाँ स्वच्छ, प्रसन्न हो जाती हैं, त्वचा स्वच्छ,
निर्मल हो जाती है और सुख पूर्वक नींद आता है । शिर पर तैल लगाने से
ये लाभ हैं ॥ ७९-८१ ॥
कान में तैल डालने से लाभ—
न कर्णरोगा वातोत्था न मन्या-हनु-संग्रहः ॥ ८२ ॥
नोच्चैः श्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णतर्पणात् ।
नित्य प्रति कान में तैल डालने से वात जन्य कान के रोग, एवं 'मन्याग्रह'
( ग्रीवा का जकड़ना ) और 'हनुग्रह' ( जबड़ों का भिचना ), उच्चैः श्रुति
( ऊँचा सुनना ), बाधिर्य ( बधिरता, बहरापन ) नहीं होता ॥ ८२ ॥
शरीर पर तैल लगाने की विधि—
स्नेहाभ्यङ्गाद्यथा कुम्भश्चर्म स्नेह-विमर्दनात् ॥ ८३ ॥
भवत्युपाङ्गादक्षश्च दृढः क्लेशसहो यथा ।
तथा शरीरमभ्यङ्गाद् दृढं सुत्वक्प्रजायते ॥ ८४ ॥
प्रशान्त-मारुताबाधं क्लेश-व्यायाम-संसहम् ।
स्पर्शने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम् ॥ ८५ ॥
त्वच्यश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः ।
न चाभिघाताभिहतं गात्रमभ्यङ्गसेविनः ॥ ८६ ॥
विकारं भजतेऽत्यर्थं बलकर्मणि वा क्वचित् ।
सुस्पर्शोपचिताङ्गश्च बलवान् प्रियदर्शनः ॥ ८७ ॥
भवत्यभ्यङ्ग-नित्यत्वान्नरोऽल्पजर एव च ।
जिस प्रकार स्नेह, चिकनाई की मालिश से घड़ा और जिस प्रकार स्नेह के
मर्दन से चमड़ा, और जिस प्रकार स्नेह के चुपड़ने से गाड़ी का धुरा, दृढ़
( मजबूत ) और क्लेशसह अर्थात् ( दुःख कष्ट सहने योग्य हो जाता है ) उसी
प्रकार शरीर पर तेल मलने से शरीर भी दृढ़, मजबूत हो जाता है, त्वक

अ० ५ ] ६ सूत्रस्थानम् ८१

अ० ५ ] ६ सूत्रस्थानम् ८१
( त्वचा, चमड़ी ) अच्छी कोमल हो जाती है । वायु के रोग शान्त हो जाते हैं,
और शरीर क्लेश कष्ट दुःख आदि, व्यायाम-परिश्रम सहन करने योग्य बन जाता है ।
अन्य श्रोत्रादि इन्द्रियों की अपेक्षा त्वचा में वायु का आधिक्य रहता है
और स्पर्श ज्ञान भी त्वचा में ही आश्रित है, इसलिये अभ्यंग ( तैल का मलना )
त्वचा के लिये अति उपकारी है । इस लिये मनुष्य को चाहिए कि उसे करता रहे।
तैल मर्दन करने वाले व्यक्ति के शरीर पर अभिघात ( चोट ) लगने पर भी
विशेष कोई हानि नहीं आती; क्योंकि वायु शान्त हुई होती है, आघात जो कि
वायु को कुपित करने वाला है वह भी वायु को कुपित नहीं कर सकता । इसी
प्रकार कभी अचानक श्रम या मेहनत का काम करने से भी शरीर में विकार
उत्पन्न नहीं होता ।
नित्य प्रति अभ्यंग ( शरीर पर तैल मर्दन करने से ) मनुष्य की त्वचा
कोमल, उत्तम स्पर्शज्ञान वाली, तथा पुष्ट भरे हुए सुघटित अंगों वाला
बलवान् एवं सुन्दर शरीर वाला हो जाता है । ऐसे मनुष्य को बुढ़ापा भी
जल्दी नहीं आता ॥ ८३-८७ ॥
पाँव में तैलमर्दन के गुण—
खरत्वं शुष्कता रौक्ष्यं श्रमः सुप्तिश्च पादयोः ॥ ८८ ॥
सद्य एवापशाम्यन्ति पादाभ्यङ्ग-निषेवणात् ।
जायते सौकुमार्यं च बलं स्थैर्यं च पादयोः ॥ ८९ ॥
दृष्टिः प्रसादं लभते मारुतश्चापशाम्यति ।
न च स्युर्गृध्रसी-वाताः पादयोः स्फुटनं न च ॥ ९० ॥
न शिरा-स्नायु-संकोचः पादाभ्यङ्गेन पादयोः ।
पाँव में ( खासकर पाँव के तन्तुओं पर तैल लगाने से खरत्व ( खुखुरा
पन ), शुष्कता ( सूखापन, फटना ), रौक्ष्य ( रूक्षता, रूखाई ), श्रम ( थकान )
और पांव की सुप्ति ( सो जाना, स्तब्ध, जड़ सा हो जाना ), शीघ्र ही अच्छे
हो जाते हैं । पाँव में तेल मर्दन करने से पांव में कोमलता, सुकुमारता आ
जाती है, पांव बलवान् , स्थिर ( न कांपने वाले ) हो जाते हैं । इसके सिवाय
आंख स्वच्छ, निर्मल हो जाती है, और वायु भी पांव की शान्त हो जाती है ।
पांव में तैल मालिश करने वाले व्यक्ति को न तो गृध्रसी रोग न पांव का फटना
( पाददारी, बिवाई आदि रोग ), और न शिरा या स्नायुओं का संकुचित
होना ( पाँव के ज्ञान तन्तुओं या मांस पेशियों का संकुचित होना ) होते हैं ।

८० चरकसंहिता [ अ० ५
उबटन लगाना—
दौर्गन्ध्यं गौरवं तन्द्रां कण्डूं मलमरोचकम् ॥ ६१ ॥
स्वेदं बीभत्सतां हन्ति शरीर-परिमार्जनम् ।
शरीर पर उबटन ( बेसन आदि ) मलने से शरीर की दुर्गन्ध, भारीपन,
तन्द्रा ( काम में आलस्य ), खाज, मल, अरुचि ( भोजन में अनिच्छा ), स्वेद,
बीभत्सता ( पसीने की बदबू ) नष्ट हो जाते हैं ॥ ६१ ॥
स्नान का फल—
पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रम-स्वेद-मलापहम् ॥ ६२ ॥
शरीर-बल-संधानं स्नानमोजस्करं परम् ।
नित्य प्रति स्नान करने से मनुष्य को पवित्रता, वृष्यता (पुरुषत्व), दीर्घायु
मिलती है । स्नान से थकावट, पसीना और मल की दुर्गन्ध दूर हो जाती है ।
स्नान करने से शरीर का बल और ओज ( तेज, कान्ति, दीप्ति ) विशेष रूप
में बढ़ता है ॥ ६२ ॥
('ओज' आठवीं धातु है । 'मज्जा' के सूक्ष्म भाग का शुक्राग्नि से पाक होने
पर जो सूक्ष्मतम भाग बनता है, वही 'ओज' है । द्रव्यों का अन्तःस्राव
( Internal secretion ) का नाम 'ओज' है, जिसके कम होने से मनुष्य
का तेज कम हो जाता है और जिसके नाश होने पर मनुष्य भी मर जाता है ।)
स्वच्छ वस्त्र पहिनने के गुण—
[L20: काम्यं यशस्यमायुष्यमलक्ष्मीघ्नं प्रहर्षणम् ॥ ६३ ॥
श्रीमत्पारिषदं शस्तं निर्मलाम्बर-धारणम् ।
निर्मल, स्वच्छ साफ वस्त्र पहिनने से मनुष्य को कमनीयता, सुन्दरता, यश,
कीर्त्ति, दीर्घायु मिलती है । स्वच्छ वस्त्र अलक्ष्मीघ्न अर्थात् दरिद्रता को दूर
करता है और प्रहर्षण अर्थात् ( चित्त को खुश करता है ) । स्वच्छ वस्त्र
राजाओं की सभा में भी प्रशंसित होता है ॥ ६३ ॥
गन्धमाला आदि के धारण करने के गुण—
वृष्यं सौगन्ध्यमायुष्यं काम्यं पुष्टिबलप्रदम् ॥ ६४ ॥
सौमनस्यमलक्ष्मीघ्नं गन्ध-माल्य-निषेवणम् ।
सुगन्धित पदार्थ, इत्र आदि और पुष्प माला आदि को धारण करने से
मनुष्य को पुरुषत्व, सुगन्धि, दीर्घायु मिलती है । इनके धारण करने से शरीर
में कमनीयता, पुष्टि और बल आता है । माला के धारण करने से मन प्रसन्न
रहता है और दरिद्रता का नाश होता है ॥ ६४ ॥

अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ८३

अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ८३
रत्न आभूषण आदि धारण करने से लाभ—
धन्यं मङ्गलमायुष्यं श्रीमद्द्व्यसन-सूदनम् ॥ ६५ ॥
हर्षणं काम्यमोजस्यं रत्नाऽऽभरण-धारणम् ।
रत्न हीरे आदि, आभरण इनसे या स्वर्ण आदि से बने आभूषण धारण
करना धन्य अर्थात् भाग्यवान्, धनी होने का चिह्न है । इनका धारण करना
मङ्गलकारी, दीर्घायु देने वाला एवं शोभा बढ़ाता है । इनके धारण करने से
सब व्यसन, सर्प कांटादि की विपत्ति नष्ट हो जाती है । आभूषण इत्यादि को
धारण करने से मन प्रसन्न होता है, सुन्दरता आती है और ओज, तेज, कांति
बढ़ती है ॥ ६५ ॥
दीर्घायु के लिये आवश्यक शौच कर्म—
मेध्यं पवित्रमायुष्यमलक्ष्मीक-विनाशनम् ॥ ६६ ॥
पाद्योर्मलमार्गाणां शौचाधानमभीक्ष्णशः ।
बार-बार मल त्याग आदि के पीछे शुद्धि करने से अर्थात् पवित्र रहने से
मेधा बुद्धि बढ़ती है, पवित्रता, दीर्घायु मिलती है और दरिद्रता एवं कलि
(पाप या दुःख) का नाश होता है। इसलिए पांव और मल मार्ग गुद और
उपस्थ, और शिर के सात छिद्र—दो नाक, दो कान, दो आंख और
एक मुख इन सातों छेदों को बार-बार साफ करना चाहिये ॥ ६६ ॥
पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचि रूप-विराजनम् ॥ ६७ ॥
केश-श्मश्रु-नखादीनां कल्पनं संप्रसाधनम् ।
केश (शिर के बाल), श्मश्रु (दाढ़ी मूंछ) और नख आदि का काटना
और इनका प्रसाद, श्रृंगार करने से पुष्टि, पुरुषत्व, दीर्घायु मिलती है एवं रूप
भी सुन्दर, पवित्र बन जाता है ॥ ६७ ॥
जूता पहिनने का गुण—
चक्षुष्यं स्पर्शनहितं पादयोर्व्यसनापहम् ॥ ६८ ॥
बल्यं पराक्रमसुखं वृष्यं पादत्रधारणम् ।
जूता पहिनना आँखों के लिये हितकारी, त्वचा के लिये लाभकारी, एवं
कीड़े आदि से बचाता है और बल पराक्रम, सुख और पुरुषत्व को देता है ॥६८॥
छत्र धारण का गुण—
ईतेः प्रशमनं बल्यं गुप्त्यावरणसंकरम् ॥ ६९ ॥
घर्मानिलरजोऽम्बुघ्नं छत्रधारणमुच्यते ।
छत्र धारण करना भावी दुःख को शान्त करने वाला, बलकारक, बुरे

८४ चरकसंहिता [अ० ५
प्रभावों से भली प्रकार रक्षा करता है । छाता धारण करने से धूप, वायु, धूल
बरसात से बचता है ।॥ ९६ ॥
दण्ड धारण के गुण—
स्खलतः संप्रतिष्ठानं शत्रूणां च निषूदनम् ॥ १०० ॥
अवष्टम्भनमायुष्यं भयघ्नं दण्डधारणम् ।
दण्ड गिरते हुए को भली प्रकार से रोकता है, शत्रुओं का नाश करता है,
बल में सहायता देता है, दीर्घायुष्य कारक और सांप आदि के भय को
मिटाता है ॥ १०० ॥
संक्षेप से स्वस्थवृत्त—
नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी सदा ॥ १०१ ॥
स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत् ।
जिस प्रकार नगराधिपति राजा नगर की और रथी अपने रथ की रक्षा
करता है उसी प्रकार मेधावी, ( बुद्धिमान् मनुष्य ) अपने शरीर के कर्त्तव्यों में
सावधान रहे ॥ १०१ ॥
भवति चात्र— वृत्त्युपायान्निषेवेत ये स्युर्धर्माविरोधिनः ।
शममध्ययनं चैव सुखमेव समश्नुते ॥ १०२ ॥
जो धर्म के अविरोधी कार्य हों उन उपायों का ( जीविका के साधनों का )
पालन करना चाहिये । शम (शान्त वृत्ति) और अध्ययन (वेदादि सद्ग्रन्थों का
पठन ), करने से मनुष्य को सुख मिलता है ॥ १०२ ॥
तत्र श्लोकाः—मात्रा द्रव्याणि मात्रां च संश्रित्य गुरुलाघवम् ।
द्रव्याणां गर्हितोऽभ्यासो येषां येषां च शस्यते ॥ १०३ ॥
इस अध्याय में मात्रा को लक्ष्य करके द्रव्य, मात्रा, गुरु लघु का ज्ञान,
निन्दित द्रव्य पदार्थ, और जिन जिन पदार्थों का अभ्यास करना चाहिये
वे कह दिये हैं ॥ १०३ ॥
अञ्जनं धूम-वर्तिश्च त्रिविधा वर्ति-कल्पना ।
धूमपान-गुणाः कालाः पानमानं च यस्य यत् ॥ १०४ ॥
व्यापत्ति-चिह्नं भेषज्यं धूमो येषां विगर्हितः ।
पेयो यथा यन्मयं च नेत्रं यस्य च यद्द्विधम् ॥ १०५ ॥
नस्य-कर्म-गुणा नस्तः कार्यं यच्च यथा यदा ।
भक्षयेद्दन्त-पवनं यथा यद्यद्गुणं च यत् ॥ १०६ ॥
यदर्थं यानि चाऽऽस्येन धार्याणि कवलग्रहे ।

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८५

[Header]
अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८५

तैलस्य ये गुणा दृष्टाः शिरस्तैलगुणाश्च ये ॥ १०७ ॥
कर्णतैले तथाऽभ्यङ्गे पादाभ्यङ्गे च मार्जने ।
स्नाने वाससि शुद्धे च सौगन्ध्ये रत्नधारणे ॥ १०८ ॥
शौचे संहरणे लोम्नां पादत्र-च्छत्र-धारणे ।
गुणा मात्राशितीयेऽस्मिन् तथोक्ता दण्डधारणे ॥ १०९ ॥
अञ्जन, धूम वर्त्ति के तीन प्रकार, प्रायोगिक, वैरेचिक और स्नैहिक धूम
की कल्पना, धूमपान के गुण, धूमपान के समय, धूमपान का परिणाम, धूप
पान से होनेवाली हानियों और इन हानियों की 'भैषज्य' ( औषध ), जिन
पुरुषों के लिये धूम निन्दित है, वह जिस प्रकार से पीना चाहिये, नलिका जिस
वस्तु और जिस प्रकार की बनी होनी चाहिये वह भी कह दिया है । नस्य
कर्म्म के लाभ, उसके बनाने की विधि, नस्य लेने का समय एवं विधि, दन्त
धावन के गुण, मुख में धारण करने योग्य वस्तुएँ, तैल-गण्डूष के गुण, शिर
पर तेल लगाने के लाभ, कान में तेल डालने के गुण, पाँव में और शरीर में
तेल लगाने के लाभ, उबटन, स्नान करने के लाभ, शुद्ध वस्त्र माला आदि
सुगन्धि द्रव्य, रत्न धारण करने के गुण, शुचि कर्म के, बालों को काटने, जूता
छाता और दण्ड को धारण करने के गुण, लाभ यह सब इस 'मात्राशितीय'
अध्याय में कह दिये हैं ॥ १०४-१०९ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्ते
मात्राशितीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

षष्ठोऽध्यायः ।
अथातस्तस्याशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'तस्याशितीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, ऐसा
भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ १-२ ॥
तस्याशिताद्यादाहाराद् बलं वर्णश्च वर्धते ।
तस्र्त्तृसात्म्यं विदितं चेष्टाऽऽहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥
परिमित मात्रा में भोजन करने वाले पुरुष के मात्रा में खाने-पीने से बल,
वर्ण, कान्ति, सुख और आयुष्य बढ़ता है । मात्राशी पुरुष का सात्म्य ऋतु के
गुण के विपरीत चेष्टा, व्यायाम, अभ्यङ्ग आदि, आहार खाना-पीना, चाटना
के आश्रय पर ही ऋतुओं का सात्म्य भी जाना जाता है ॥ ३ ॥

८६ चरकसंहिता [ अ० ६
इह खलु संवत्सरं षडङ्गमृतुविभागेन विद्यात् । तत्राऽऽदित्यस्यो-
दगयनमादानं च त्रीन्ऋतून शिशिरादीन् ग्रीष्मान्तान् व्यवस्येत्,
वर्षादीन् पुनर्हेमन्तान्तान् दक्षिणायनं विसर्गं च ॥ ४ ॥
इस संसार में संवत्सर (वर्ष) रूपी काल को छः ऋतुओं के विभाग से
जानना चाहिये। जब भगवान् सूर्य उत्तरायण होते हैं, तब 'आदान' (ग्रहण)
काल होता है। इससे शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म तीन ऋतुएँ बनती हैं और
जब सूर्य दक्षिणायन हों तब 'विसर्ग' काल होता है। इससे वर्षा, शरद् और
हेमन्त ये तीन ऋतुएँ बनती हैं ॥ ४ ॥
विसर्गे च पुनर्वायवो नातिरूक्षाः प्रवान्तीतरे पुनरादाने, सोम-
श्चाव्याहतबलः शिशिराभिर्भाभिरापूरयञ्जगदाप्याययति शश्वत्, अतो
विसर्गः सौम्यः। आदानं पुनराग्नेयं, तावेतावर्कवायू सोमश्च काल-
स्वभाव-मार्ग-परिगृहीताः । कालर्तु-रस-दोष-देह-बल-निर्वृत्ति-प्रत्यय-
भूताः समुपदिश्यन्ते ॥ ५ ॥
'विसर्ग' काल में वायु बहुत अधिक रूखी नहीं बहती और आदान काल
में वायु बहुत रूक्ष खुश्क बहता है। क्योंकि विसर्गकाल में चन्द्रमा का बल
परिपूर्ण होता है। इसलिये चन्द्रमा शीतल किरणों से जगत् का पोषण करता
है, जगत् को नित्य बलवान् करता है। इसलिये विसर्गकाल सौम्य है।
'आदान' काल आग्नेय (अग्नि तत्त्व प्रधान) है। इसलिये सूर्य,
वायु और चन्द्रमा के समय स्वाभाविक मार्ग से चलते हुए काल, ऋतु, रस,
दोष, और शारीरिक बल के बनाने में कारण होते हैं ॥ ५ ॥
तत्र रविर्भाभिराददानो जगतः स्नेहं वायवस्तीव्ररूक्षाश्चोपशोष-
यन्तः शिशिर-वसन्त-ग्रीष्मेष्वृतुषु यथाक्रमं रौक्ष्यमुत्पादयन्तो रूक्षान्
रसान् तिक्त-कषाय-कटुकांश्चाभिवर्धयन्तो नृणां दौर्बल्यमावहन्ति ॥६॥
आदान काल में सूर्य अपनी किरणों से संसार की स्निग्धता को ले लेता है,
इसलिये वायु तीव्र, तीक्ष्ण, रूखी, सुखाती हुई बहती है। इससे शिशिर, वसन्त
और ग्रीष्म में क्रमशः (शिशिर से अधिक वसन्त में, और वसन्त से अधिक
ग्रीष्म में) रूक्षता उत्पन्न हो जाती है। इस रूक्षता के उत्पन्न होने से रूक्ष रस,
यथा—तिक्त (तीखा), कषाय (कसैला) और कटु (कडुवा) रस बढ़ जाते
हैं। इन रसों की वृद्धि से मनुष्यों के शरीर में निर्बलता आ जाती है ॥६॥
वर्षा-शरद्धेमन्तेष्वृतुषु तु दक्षिणाभिमुखेऽर्के काल-मार्ग-मेघ-वात-
वर्षाभिहत-प्रतापे, शोषिनि चाव्याहतबले, माहेन्द्र-सलिल-प्रशान्त-

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८७

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८७
सन्तापे जगति, अरूक्षा रसाः प्रवर्धन्तेऽम्ल-लवण-मधुराः, यथाक्रमं तत्र
बलमुपचीयते नृणामिति ॥ ७ ॥
वर्षा शरद् और हेमन्त ऋतु में जब सूर्य दक्षिणायन हो जाता है, काल
के स्वाभाविक मार्ग के कारण, बादल, वायु, वर्षा के कारण सूर्य का तेज घट
जाने से और सोम का बल कम न होने से, वर्षा जल के कारण गरमी के शान्त
हो जाने से संसार में अरूक्ष, स्निग्ध रस बढ़ते हैं । इससे अम्ल, लवण और
मधुर क्रमशः वर्षा, शरद् और हेमन्त में बढ़ते हैं । इन रसों के बढ़ने से मनुष्यों
का बल भी बढ़ जाता है ॥ ७ ॥
भवन्ति चात्र - आदावन्ते च दौर्बल्यं विसर्गादानयोर्नृणाम् ।
मध्ये मध्यबलं त्वन्ते श्रेष्ठमग्रं च निर्दिशेत् ॥ ८ ॥
शीते शीतानिल-स्पर्श-संरुद्धो बलिनां बली ।
विसर्ग और आदान काल के आदि और अन्त में पुरुषों के शरीर में दुर्ब-
लता आती है । यथा-विसर्ग के आदि काल वर्षा में और आदान के अन्त
समय ग्रीष्म ऋतु में मनुष्यों में दुर्बलता रहता है । दोनों कालों के मध्य में
(अर्थात् शरद् और वसन्त में) मध्यम बल रहता है । विसर्ग के अन्त समय
(हेमन्त में) और आदान काल के पहिले (शिशिर में) काल में मनुष्यों का
बल श्रेष्ठ अर्थात् बढ़ा रहता है ॥ ८ ॥
पक्ता भवति हेमन्ते नृणां द्रव्या-गुरु-क्षमः ॥ ९ ॥
स यदा नेन्धनं युक्तं लभते देहजं तदा ।
रसं हिनस्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रकुप्यति ॥ १० ॥
तस्मात्तूषार-समये स्निग्धानम्ल-लवणान् रसान् ।
औदकानूप-मांसानां मेध्यानामुपयोजयेत् ॥ ११ ॥
बिलेशयानां मांसानि प्रसहानां भृतानि च ।
भक्षयेन्मदिरां सीधुं मधु चानुपिबेन्नरः ॥ १२ ॥
गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम् ।
हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चाऽऽयुर्न हीयते ॥ १३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनं मूर्ध्नि तैलं जेन्ताकमातपम् ।
भजेद् भूमिगृहं चोष्णमुष्णं गर्भगृहं तथा ॥ १४ ॥
शीतेषु संवृतं सेव्यं यानं शयनमासनम् ।
हेमन्त काल की परिचर्या—हेमन्त रूपी शीत काल में ठण्डी वायु के
स्पर्श से जठराग्नि, शरीर से बाहर न निकल कर अन्दर ही रुक कर (जिस

८८ चरकसंहिता [अ० ६
प्रकार कि कुम्हार बर्तन पकाते समय या ईंटों के भट्ठे में आग को अन्दर ही
बन्द कर देते हैं, और वहाँ पर अग्नि तीव्र हो जाती है, उसी प्रकार) प्रबल हो
उठती है। इसलिये मनुष्यों की जठराग्नि काल स्वभाव से ही हेमन्त में प्रबल
और अधिक मात्रा में भोजन को पचाने में समर्थ होती है। इस समय यदि
जाठराग्नि को अग्नि बल के अनुसार अन्न रूपी आहार न मिले, तो शरीर के
सौम्य (द्रव्य) भाग को नष्ट करने लगती है। इसलिये शीत काल में शीत
गुण के बढ़ने से वायु भी बढ़ती है।
इस वायु की वृद्धि को रोकने के लिये स्निग्ध (मधुर), अम्ल और नम-
कीन पदार्थ खाने चाहिये। चर्बी वाले जलचर प्राणियों का मांस रस, बिल में
रहने वाले (नकुल आदि) पशुओं का मांस, प्रसह (कुक्कुट आदि) पक्षियों
का मांस खाना चाहिये, मांस खाकर ऊपर से मदिरा सीधु (गुड़ की शराब)
और मधु पीना चाहिये। दूध, दही, मावा आदि एवं गन्ने के रस से बनी
खीर, राब, शर्करा आदि से बनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल
खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने
वाले की आयु कम नहीं होती। तैलमर्दन, उबटन, शिर पर तैल लगाना,
जेन्ताक (स्वेद,) धूप का सेवन, भूमि के नीचे बने तहखानों में रहना, घर के
अन्दर घर बना उसे गरम करके रहना चाहिये, भली प्रकार घिरा हुआ घर
हो, आसन या सवारी आदि करते समय खूब लिपटकर बैठे जिससे शीत
न लगे ॥ ६-१४ ॥
प्रावाराजिन-कौशेय-प्रवेणी-कुथकास्तृतम् ॥ १५ ॥
गुरूष्णवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा ।
शयने प्रमदां पीनां विशालोपचितस्तनीम् ॥ १६॥
आलिङ्ग्याऽगुरुदिग्धाङ्गीं सुप्यात्ससदमन्मथः ।
प्रकामं च निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥ १७ ॥
वर्जयेदन्नपानानि लघूनि वातलानि च ।
प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमांगमे ॥ १८ ॥
भारी कम्बल, मृग छाल ( कौशेय ) रेशम, (प्रवेणी ) कम्बल, गद्दे इनको
फैलाकर भारी और गरम कपड़ों को पहिनकर मनुष्य अङ्गों पर अगर का
गाढ़ा लेप सदा करे। भरे शरीर वाली (दुबली-पतली नहीं), कामवती एवं
उन्नत स्तनों वाली, अङ्गों पर अगर का लेप की हुई स्त्री का आलिङ्गन करके
हर्ष और कामेच्छा के साथ सोये। शिशिर ऋतु में मैथुन यथेच्छ सेवन करे।

अ० ६ सूत्रस्थानम् ८६

अ० ६ सूत्रस्थानम् ८६
हेमन्त ऋतु में त्याज्य—लघु गुण वाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार
हेमन्त ऋतु में छोड़ देने चाहियें। एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और
पानी में घोलकर सत्तू खाना छोड़ देना चाहिये ॥ १५-१८ ॥
हेमन्तशिशिरे तुल्ये शिशिरेऽल्पं विशेषणम् ।
रौक्ष्यमादानजं शीतं मेघ-मारुत-वर्षजम् ॥ १९ ॥
तस्माद्धैमन्तिकः सर्वः शिशिरे विधिरिष्यते ।
निवातमुष्णमधिकं शिशिरे गृहमाश्रयेत् ॥ २० ॥
कटु-तिक्त-कषायाणि वातलानि लघूनि च ।
वर्जयेदन्न-पानानि शिशिरे शीतलानि च ॥ २१ ॥
हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ प्रायः शीत की दृष्टि से समान हैं। परन्तु
शिशिर काल मे हेमन्त से इतना भेद है कि शिशिर का आदान काल होने से
वायु रूक्ष होती है एवं बादल, वायु और बरसात शिशिर में अधिक होने से
इस ऋतु में शीत अधिक होता है। इसलिये शिशिर ऋतु में हेमन्त की संपूर्ण
विधि पालन करनी चाहिये । परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और
वायु रहित घरों में (खुली वायु जहाँ न आये) रहे । शिशिर काल में कडुवे,
तिक्त, कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खान-पानको छोड़ दे ॥१९-२१॥
वसन्त की ऋतुचर्या—
हेमन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः ।
कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून् ॥ २२ ॥
तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत् ।
गुर्वम्ल-स्निग्ध-मधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ २३ ॥
व्यायामोद्वर्तनं धूमं कवल-ग्रह-मञ्जनम् ।
सुखाम्बुना शौचविधिं शीलयत्कुसुमागमे ॥ २४ ॥
चन्दनागुरु-दिग्धाङ्गो यव-गोधूम-भोजनः ।
शारभं शाशमैणेयं मांसं लावक-पिञ्जलम् ॥ २५ ॥
भक्षयेन्निर्गदं सीधुं पिबेन्माध्वीकमेव वा ।
वसन्तेऽनुभवेत्स्त्रीणां काननानां च यौवनम् ॥ २६ ॥
हेमन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से (घी के समान)
पिघल कर—द्रव बनकर शरीर की अग्नि को (धातुओं की अग्नि को नहीं)
कम करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। इसलिये कफ को
निकालने के लिये वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन कार्य करने चाहिये ।

६० चरकसंहिता [ अ० ६
व्यायाम उबटन, धूमपान, कवल (गरारे करना) और अञ्जन लगाना चाहिये ।
स्नान एवं शौच कार्य में गरम पानी का व्यवहार करना चाहिये (पीनेमें नहीं)।
शरीर पर चन्दन और अगर का लेप करना चाहिये, जौ और गेहूँ, शरभ
बारहसींगे, खरगोश, हरिण, बटेर, कपिञ्जल (कट फोड़ा) इनका मांस खाना
चाहिये । कफ दोष नाशक सीधु या अंगूरों का बना शराब पीना चाहिये ।
वसन्त काल में युवती स्त्रियों और जङ्गलों में मनोरंजन करे ॥ २२-२६ ॥
ग्रीष्मचर्या-
मयूखैर्जगतः सारं ग्रीष्मे पेपीयते रविः ।
स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम् ॥ २७ ॥
शीतं सशर्करं १मन्थं जाङ्गलाम्मृगपक्षिणः ।
घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् ग्रीष्मे न सीदति ॥ २८ ॥
मद्यमल्पं न वा पेयमथवा सुबहुदकम् ।
लवणाम्ल-कटूष्णानि व्यायामं चात्र वर्जयेत् ॥ २९ ॥
दिवा शीतगृहे निद्रां निशि चन्द्रांशुशीतले ।
भजेच्चन्दन-दिग्धाङ्गः प्रवातं हर्म्यमस्तके ॥ ३० ॥
व्यजनैः पाणिसंस्पर्शैश्चन्दनाेदक-शीतलैः ।
सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणि-विभूषितः ॥ ३१ ॥
काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च ।
ग्रीष्मकाले निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः ॥ ३२ ॥
ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता
है । इसलिये इस समय मीठा, ठण्डा द्रव पदार्थ पीना, चिकने (घी आदि)
खान पान हितकारी हैं। ठण्ड और शर्करा मिश्रित सत्तू खाने से, जंगली पशु-
पक्षियों का मांस खाने से, घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु
में कष्ट नहीं होता । इस ऋतु में मद्य नहीं पीना चाहिये और यदि पीना ही हो
तो बहुत पानी मिलाकर पीना चाहिये । नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस
पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिये । दिन के समय ठण्डे
मकानों में सोना चाहिये और रात में चन्द्रमा की किरणों से ठण्डी की हुई
मकान की छत पर खुली वायु में शरीर पर चन्दन मलकर सोना चाहिये ।
चन्दन और पानी से ठण्डे किये हुए पङ्खों से या हाथ के स्पर्श से, मोती और
१ मन्थ—सक्तवः सर्पिषा युक्ताः शीत-वारि-परिप्लुताः ।
नात्यच्छा नातिसान्द्राश्च मन्थ इत्यभिधीयते ॥

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६१

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६१
मणियों से शोभित होकर पलंग पर सोये । जङ्गलों को, ठण्डे पानी ( झरने
आदि ) को और फूलों को ग्रीष्म काल में सेवन करे। ग्रीष्म ऋतु में मैथुन
से अलग रहे ॥ २७-३२ ॥
वर्षा काल की ऋतुचर्या—
आदान-दुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः ।
स वर्षास्वनिलादीनां दूषणैर्बाध्यते पुनः ॥ ३३ ॥
भू-बाष्पाम्भेघ-निष्यन्दात्पाकादम्लाज्जलस्य च ।
वर्षास्वग्निबले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः ॥ ३४ ॥
तस्मात्साधारणः सर्वो विधिर्वर्षामु शस्यते ।
उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ॥ ३५ ॥
व्यायाममातपं चैव व्यवायं चात्र वर्जयेत् ।
पान-भोजन-संस्कारान् प्रायः क्षौद्रान्वितान् भजेत् ॥ ३६ ॥
व्यक्ताम्ल-लवण-स्नेहं वात-वर्षाकुलेऽहनि ।
विशेपशीते भोक्तव्यं वर्षास्वनिल-शान्तये ॥ ३७॥
अग्निं संरक्षणवता यव-गोधूम-शालयः ।
पुराणा जाङ्गलेर्मासैर्भाज्या यूषैश्च संस्कृतैः ॥ ३८ ॥
पिवेत्क्षौद्रान्वितं चाल्पं मार्द्वीकारिष्टमम्बु वा ।
माहेन्द्रं तप्तशीतं वा कौपं सारसमेव वा ।
प्रघर्षोद्वर्तन-स्नान-गन्ध-माल्य-परो भवेत् ।
लघुशुद्धाम्बरः स्थानं भजेदक्लेदि वार्षिकम् ॥ ४० ॥
आदान काल में शरीर के निर्बल होने से अग्नि भी निर्बल हो जाती है ।
यह अग्नि वर्षा ऋतु में वायु, पित्त, कफ तीनों के दूषणों से दूषित हो जाती है ।
ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड सूर्य की गरमी से भूमि के तप जाने से, वर्षा में बरसात
पड़ने से, पानी के स्पर्श से, भूमि में से गरम भाप के निकलने से तीनों दोष
कुपित हो जाते हैं, इसी प्रकार बादलों के बरसने से वात, कफ कुपित होते हैं,
जल के अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है । वर्षा ऋतु में अग्नि-बल के
क्षीण होने से वात, पित्त कफ तीनों कुपित हो जाते हैं । इसलिये वर्षा में साधा-
रण विधि का पालन करना चाहिये । पानी में घुला सत्तू, दिन में सोना, ओस,
नदी का पानी, सम्भोग-मैथुन, धूप और व्यायाम इस ऋतु में नहीं सेवन करने

चाहियें। वर्षा काल में खान पान के अन्दर प्रायः करके शहद का उपयोग
करना चाहिये। बरसात के दिनों में जिस दिन वायु और बरसात जोर का पड़
रहा हो और सर्दी बहुत हो, उस दिन वायु को शान्त करने के लिये अम्ल,
लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दीखता हो, उसे विशेष करके खाना
चाहिये। अग्नि की रक्षा करने के लिये जौ, गेहूँ, चावल (पुराने), जंगली-
वन के पशुओं का मांस एवं घी आदि से संस्कृत यूष खाने चाहिये। पित्त को
शान्त करने के लिये थोड़ा शहद मिला माध्वीकारिष्ट (द्राक्षासव), अथवा
पानी में शहद (थोड़ा) मिलाकर पीना चाहिये। वर्षा ऋतु में या तो आकाश
से गिरा स्वच्छ पानी पीना चाहिये अथवा कुएं या तालाब के पानी को गरम
करके ठण्डा करके पीना चाहिये। तैल का मर्दन, उबटन लगाना, स्नान करना
सुगन्ध धारण करना, माला पहिनना, हल्का और साफ़ वस्त्र पहिनना, तथा
सूखे स्थान पर रहना चलना आदि कार्य वर्षा ऋतु में करना चाहिये ।।३३-४०।।

शरद् ऋतु की परिचर्या—
वर्षा-शीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः ।
तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति ॥ ४१ ॥
तत्रान्नपानं मधुरं लघु शीतं सतिक्तकम् ।
पित्त-प्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाङ्क्षितैः ॥ ४२ ॥
लावान् कपिञ्जलान् हरिणानुरभ्राञ्छरभाञ्छशान् ।
शालीन् सयवगोधूमान् सेव्यानाहुर्घनात्यये ॥ ४३ ॥
तिक्तस्य सर्पिषः पानं विरेको रक्तमोक्षणम् ।
धाराधरात्यये कार्यमातपस्य च वर्जनम् ॥ ४४ ॥
वसां तैलमवश्यायमौदकानूपमामिषम् ।
क्षारं दधि दिवास्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत् ॥ ४५ ॥

वर्षा ऋतु में काल स्वभाव से संचित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के
हट जाने से, सूर्य के किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। इसलिये इस
ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त, पित्तशामक खान पान परिमाण में खाना
चाहिये। बटेर, कटफोड़ा, हरिण, मेढ़ा, बारहसींगा और खरगोश इनका मांस,
चावल, जौ, गेहूँ इनको शरद् काल में खाना चाहिये। तिक्त औषधियों से
संस्कृत घृत (पंचतिक्त घृत), विरेचन, रक्तमोक्षण, शिरावेध, जोंक आदि से
रक्त का निकलवाना और धूप का सेवन न करना ये काम बादलों के चले जाने
पर शरद् ऋतु में करने चाहिये। इस ऋतु में चर्बी, तेल, ओस, जलचर प्राणि...

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३
का मांस, क्षार, दही दिन में सोना सामने मे आती हुई वा पुरवा वायु का
त्याग करना चाहिये । ४१-४५ ॥
हंसोदक का लक्षण—
दिवा सूर्यांश-सन्तप्तं निशि चन्द्रांशु-शीतलम् ।
कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥ ४६ ॥
हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचि ।
स्नानपानावगाहेषु हितमम्बु यथाऽमृतम् ॥ ४७ ॥
शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च ।
शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥ ४८ ॥
दिन में सूर्य की किरणों से गरम और रात्रि मे चन्द्रमा की शीतल किरणों
से ठण्डा होने वाला कालस्वभाव से पका हुआ अर्थात् वर्षा का जल जिसमें न
रहा हो; इससे दोष रहित; अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने के प्रभाव से निर्मल,
( विष रहित ) पानी को हंसोदक ( चन्द्रार्क ) कहते हैं । यह हंसोदक शरद्
ऋतु में निर्मल और पवित्र है । इसलिये स्नान कार्य मे, पीने मे, अवगाहन,
पानी में बैठने आदि कार्यों मे उत्तम और अमृत के समान है । शरत्काल में
रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत्
कालीन मालायें, और निर्मल वस्त्र प्रशस्त हैं ॥ ४६-४८ ॥
इत्युक्तमृतुसात्म्यं यच्चेष्टाऽऽहार-व्यपाश्रयम् ।
उपशेते यदौचित्यादोकःसात्म्यं तदुच्यते ॥ ४६ ॥
देशनामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः ।
सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चायमेव च ॥ ५० ॥
( चेष्टा ) क्रिया और आहार, खान विहार के आश्रित अर्थात् ऋतुओं के
अनुकूल जो कर्म हैं, वे कह दिये । पुरुष की प्रकृति के अनुसार जो उचित
अनुकूल पड़ता है, उसे 'ओकः-सात्म्य' कहते हैं ।
जो आहार या विहार देश ( जांगल आनूप और साधारण ) एवं रोग
इनके गुणों से विपरीत, गुण वाले होते हैं उस आहार विहार को 'सात्म्य' को
जानने वाले विद्वान् 'सात्म्य' कहते हैं ॥ ४६-५० ॥
तत्र श्लोकाः—
ऋतावृत्तौ नृभिः सेव्यमसेव्यं यच्च किञ्चन ।
तस्याशितीये निर्दिष्टं हेतुमत्सात्म्यमेव च ॥ ५१ ॥
प्रत्येक ऋतु में मनुष्यों को क्या २ सेवन करना चाहिये और क्या २ नहीं

९४ चरकसंहिता [ अ० ७
सेवन करना चाहिये; तथा कारण रूपसात्म्य को भी इस 'तस्याशितीय' अध्याय
में कह दिया ॥ ५१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के
तस्याशितीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः ।
अथातो न वेगान्धारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने का प्रतिषेध करने के लिये 'न
वेगान् धारणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं । जैसा भगवानात्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान्मूत्रपुरीषयोः ।
न रेतसो न वातस्य न वम्याः क्षवथोर्न च ॥ ३ ॥
नोद्गारस्य न जृम्भाया न वेगान् क्षुत्पिपासयोः ।
न बाष्पस्य न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च ॥ ४ ॥
एतान् धारयतो जातान् वेगान् रोगा भवन्ति ये ।
पृथक्पृथक् चिकित्सार्थं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ ॥
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि उपस्थित हुए मूत्र मल के वेगों को नहीं
रोके । इसी प्रकार शुक्र, अपान आदि वायु, वमन, छींक, डकार, जम्भाई, भूख
और प्यास, हर्ष या शोक के कारण उत्पन्न आंसू; नींद और श्रमजनित तीव्र
प्रश्वास के वेगों को भी नहीं रोकना चाहिये । इन उपस्थित वेगों को रोकने
से जो जो रोग होते हैं, उनकी चिकित्सा के लिये पृथक् पृथक् उपदेश करते हैं, सुनो।
बस्ति-मेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा ।
विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥ ६ ॥
मूत्र के उपस्थित वेगको रोकने से 'बस्ति' ( मूत्राशय ) और लिंग में दर्द
होती है, मूत्र त्याग में कष्ट होता है, शिर में दर्द, मूत्र वेग के कारण खींच
होने से शरीर झुक जाता है वंक्षण प्रदेश ( पेडू ) जकड़ा हुआ प्रतीत होता है,
अथवा उस प्रदेश में फुलाव प्रतीत होता है ये लक्षण मूत्र के उपस्थित वेग को
रोकने से होते हैं ॥ ६ ॥

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६५

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६५
इस की चिकित्सा—
स्वेदावगाहनाभ्यङ्गान् सर्पिषश्चावपीडकम् ।
मूत्रे प्रतिहते कुर्यात् त्रिविधं बस्तिकर्म च ॥ ७ ॥
( स्वेद ) पसीना देना, ( अवगाहन ) गरम पानी की नाद में बैठना,
( अभ्यंग ) तैल आदि मर्दन और घी का नस्य देना, तीन प्रकार का बस्ति
कर्म ( निरूहण, अनुवासन और उत्तर बस्ति ) मूत्र के उपस्थित वेग को रोकने
के प्रतीकार हैं ॥ ७ ॥
पक्वाशय-शिरःशूलं वात-वर्चो-निरोधनम् ।
पिण्डिकोद्वेष्टनाध्मानं पुरीषे स्याद्विधारिते ॥ ८ ॥
मल के उपस्थित वेग को रोकने से पक्वाशय अर्थात् नाभि के नीचे के भाग
में और शिर में वेदना होती है, अपान वायु और मल बन्द हो जाते हैं, पिण्ड-
लियों में ऐंठन होने लगती है, पेट में अफरा चढ़ जाता है ॥ ८ ॥
चिकित्सा—
स्वेदाभ्यङ्गाऽवगाहाश्च वर्तयः बस्तिकर्म च ।
हितं प्रतिहते वर्चस्यन्नपानं प्रमाथि च ॥ ९ ॥
स्वेद पसीना देना, अभ्यंग, अवगाहन ( नांद या टब आदि में स्नान ),
फलवर्ति, और बस्तिकर्म करे । विरेचन द्रव्यों का घी और तैल आदि द्वारा
चूर्ण, क्वाथ, कल्कादि के रूप में बनाकर देना और वात को अनुलोमन करने
वाली औषध मल के रोकने में हितकारी है ॥ ९ ॥
मेढे वृषणयोः शूलमङ्गमर्दो हृदि व्यथा ।
भवेत्प्रतिहते शुक्रे विबद्धं मूत्रमेव च ॥ १० ॥
वीर्य के उपस्थित वेग को रोकने से लिंग और अण्डकोषों में वेदना होती
है, अंग टूटते हुए प्रतीत होते हैं, चेतना के स्थान हृदय में वेदना अनुभूत
होती है और मूत्र भी बन्द हो जाता है ॥ १० ॥ चिकित्सा—
तत्राभ्यङ्गावगाहश्च मदिरा चरणायुधाः ।
शालिः पयो निरूहाश्च शस्तं मैथुनमेव च ॥ ११ ॥
तैलमर्दन, अवगाहन स्नान ( द्रोणीस्नान ), मद्य, कुक्कुट का मांस, हेम-
न्तिक धान्य, दूध, बस्तिकर्म और मैथुन कर्म ये शुक्र वेग के निरोध से उत्पन्न
रोगों की चिकित्सा है ॥ ११ ॥
वात-मूत्र-पुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा ।
जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥ १२ ॥
अपान वायु के रोकने से, अपान वायु, मूत्र और पुरीष रुक जाते हैं ।

वातजन्य रोग भी हो जाते हैं ॥ १२ ॥ चिकित्सा—

६६ चरकसंहिता [ अ० ७
अफरा हो जाता है थकान की अंगों में प्रतीति होना, पेट में पीड़ा और अन्य
वातजन्य रोग भी हो जाते हैं ॥ १२ ॥ चिकित्सा—
स्नेह-स्वेद-विधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च ।
पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम् ॥१३॥
स्नेह (तैल) एवं स्वेद देना चाहिये, फलवर्त्तियाँ, वातनाशक खान-पान
और वातनाशक बस्तिकर्म उत्तम हैं ॥ १३ ॥
कण्डू-कोठ-रुचि-व्यङ्ग-शोथ-पाण्ड्वामय-ज्वराः ।
कुष्ठ-हृल्लास-वीसर्पच्छर्दि-निग्रहजा गदाः ॥ १४ ॥
वमन के रोकने से खाज, कोठ, भोजन में अनिच्छा, झांई, मुखपर काले-
काले दाग आना, सूजन, पाण्डु रोग, ज्वर, कोढ़, हृल्लास (वमन की रुचि),
जी मिचलाना, वीसर्प ये रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ चिकित्सा—
भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धूमो लङ्घनं रक्तमोक्षणम् ।
रूक्षान्नपानं व्यायामो विरेकश्चात्र शस्यते ॥ १५ ॥
भोजन खिलाकर वमन कराना चाहिये, धूम्रपान, उपवास, शिराव्यधन
करके रक्त का निकालना, रूखे अन्न और पान, व्यायाम और विरेचन ये
उपाय उत्तम हैं ॥ १५ ॥
मन्यास्तम्भः शिरःशूलमर्दिताधार्धावभेदकौ ।
इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात् ॥ १६ ॥
छींक के रोकने से ग्रीवा का जकड़ जाना, शिरोवेदना, चेहरे का लकवा,
आधा सीसी, आँख आदि इन्द्रियों की निर्बलता हो जाती है ॥ १६ ॥
तत्रोर्ध्वजत्रुकेऽभ्यङ्गः स्वेदो धूमः सनावनः ।
हितं वातघ्नमान्नं च घृतं चोत्तरभक्तिकम् ॥ १७ ॥
चिकित्सा—ग्रीवा से ऊपर के भागों में मालिश, पसीना देना, धूम्रपान
नस्य, वातनाशक भोजन और खाना खानेके पीछे घृतपान करना हितकारी है ॥
हिक्का श्वासोऽरुचिः कम्पो विबन्धो हृदयोरसोः ।
उद्गार-निग्रहात्तत्र हिक्कायास्तुल्यमौषधम् ॥ १८ ॥
डकार को रोकने पर हिचकी का आना, श्वास, भोजन में अनिच्छा, सिर-
छाती का काँपना, छाती और हृदय का रुक जाना ये रोग हो जाते हैं।
चिकित्सा—डकार के रोकने से उत्पन्न विकार की शान्ति के लिये हिचकी के
समान औषध करनी चाहिये ॥ १८ ॥
विनामाक्षेपसङ्कोचाः सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम् ।
जृम्भाया निग्रहात्तत्र सर्वं वातघ्नमौषधम् ॥ १६ ॥

अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७

अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७
जम्भाई के रोकने से शरीर का झुकना, आक्षेप अर्थात् हाथ-पाँव का जोर
से कम्पन, पर्वसन्धियों का आकुञ्चन, अङ्गों का सो जाना, ( स्पर्श ज्ञान का
अभाव ), काँपना-हिलना आदि होता है। चिकित्सा के लिये वातनाशक उप-
चार करना चाहिये ॥ १६ ॥
कार्श्य-दौर्बल्य-वैवर्ण्यमङ्गमर्दोऽरुचिर्भ्रमः ।
क्षुद्वेग-निग्रहात्तत्र स्निग्धमुष्णं लघु भोजनम् ॥ २० ॥
भूख रोकने से कृशता, दुर्बलता, रंग का बदल जाना, अङ्ग-प्रत्यङ्गों में
वेदना, उनका टूटते हुए प्रतीत होना, भोजन में अनिच्छा, चक्कर आना ये
लक्षण होते हैं। चिकित्सा—स्निग्ध ( चिकना ), गरम और हल्का भोजन
देना चाहिये ॥ २० ॥
कण्ठास्य-शोषो बाधिर्यं श्रमः श्वासो हृदि व्यथा ।
पिपासा-निग्रहात्तत्र शीतं तर्पणमिष्यते ॥ २१ ॥
प्यास के रोकने से गले और मुख का खुश्क हो जाना, बहरापन, थकान,
श्वास, दम का चढ़ना, हृदय प्रदेश में दर्द ये लक्षण होते हैं। चिकित्सा—
शीतल, तृप्ति करनेवाले खान-पान देने चाहिये ॥ २१ ॥
प्रतिश्यायोऽक्षिरोगश्च हृद्रोगश्चारुचिर्भ्रमः ।
बाष्प-निग्रहात्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः ॥ २२ ॥
आँसुओं के रोकने से नाक से पानी झरना, कफ का स्राव होना, आँखों
के रोग, हृदय रोग, अनिच्छा और भ्रम, (सिरमें चक्कर) आदि होते हैं। चिकित्सा—
नींद, मदिरा का पान, आनन्ददायक प्रिय बातचीत करना चाहिये ॥ २२ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दस्तन्द्रा च शिरो-रोगाक्षि-गौरवम् ।
निद्रा-विधारणात्तत्र स्वप्नः संवाहनानि च ॥ २३ ॥
नींद रोकने से जम्भाई, अङ्गों का टूटना ( शरीर में भारीपन ), शिर की
वेदना और आँखें भारी हो जाती हैं। चिकित्सा—नींद लाना, अङ्गों का संवा-
हन अर्थात् हाथों से अङ्गों का दबाना कल्याणकारी है ॥ २३ ॥
गुल्म-हृद्रोग-संमोहाः श्रम-निश्वास-धारणात् ।
जायन्ते, तत्र विश्रामो वातघ्नाश्च क्रिया हिताः ॥ २४ ॥
थकान से उत्पन्न निःश्वास को रोकने से गुल्म रोग, हृद्-रोग,
( मूर्च्छा ) उत्पन्न होती है। इस के लिये विश्राम, ( आराम ) एवं
वातनाशक उपचार करने चाहियें ॥२४॥

९८ चरकसंहिता [ अ० ७
वेग-निग्रहजा रोगा य एते परिकीर्त्तिताः।
इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं वेगानेतान्न धारयेत् ॥ २५ ॥
उपस्थित वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले जो ये रोग कहे हैं,
रोगों की उत्पत्ति को न चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह इन वेगों
को न रोका करे ॥ २५ ॥
इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च ।
साहसानामशस्तानां मनो-वाक्काय-कर्मणाम् ॥ २६ ॥
लोभ-शोक-भय-क्रोध-मान-वेगान् विधारयेत् ।
नैर्लज्ज्येष्र्यातिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान् ॥ २७ ॥
परुषस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च ।
वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम् ॥ २८ ॥
देहप्रवृत्तिर्या काचिद्वर्तते परपीड़या ।
स्त्रीभोगस्तेय-हिंसाद्या तस्या वेगान्विधारयेत् ॥ २९ ॥
पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनो-वाक्काय-कर्मणाम् ।
धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च ॥ ३० ॥
इहलोक और परलोक की हित कामना करने वाले मनुष्य को चाहिये
कि इन आगे कहे वेगों को धारण करे, जैसे—अयोग्य अनुचित साहस और
मन वाणी और शरीर के निन्दित कर्मों के उपस्थित वेगों को रोके ।
मन के निन्दित कार्य जैसे—लोभ, अनुचित विषय में मन की प्रवृत्ति,
( शोक ) धन बान्धव आदि के कारण दुःख में मन की प्रवृत्ति, भय, क्रोध
जिसके कारण मनुष्य अपने को जलता हुआ प्रतीत करता है, ( द्वेष ) वैर,
दूसरे के अपकार करने में मन की प्रवृत्ति, ( मान ) महत्व, अभिमान में मन
की प्रवृत्ति, ( जुगुप्सित ) दूसरे की निन्दा, ( निर्लज्जा ) लज्जा का अभाव,
( ईर्ष्या ) कुढ़ना, ( अभिध्या ) दूसरे के द्रव्य को लेने की लालसा-बुद्धि, इन
मन के निन्दित कार्यों को रोकना चाहिये।
वाणी के निन्दित कर्म—कर्कश, कठोर विशेषतः दूसरे की निन्दा या
अनिष्ट करने की इच्छा से झूठी और अप्रासंगिक वाणी को रोकना चाहिये।
शरीर के निन्दित कर्म—दूसरे को दुःख देने की जो कोई शरीर की चेष्टा
हो, उसे स्त्री-भोग ( पर-स्त्रीसम्भोग ), स्तेय ( चोरी ), हिंसा ( दुःख कष्ट देना.,
मारना ) आदि शरीर कार्यों के उपस्थित वेगों को रोकना चाहिये।
अपनी आत्मा के प्रतिकूल जो कार्य हों वे कार्य दूसरे के लिये न