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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 639 में से

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८४ चरकसंहिता [अ० ५
प्रभावों से भली प्रकार रक्षा करता है । छाता धारण करने से धूप, वायु, धूल
बरसात से बचता है ।॥ ९६ ॥
दण्ड धारण के गुण—
स्खलतः संप्रतिष्ठानं शत्रूणां च निषूदनम् ॥ १०० ॥
अवष्टम्भनमायुष्यं भयघ्नं दण्डधारणम् ।
दण्ड गिरते हुए को भली प्रकार से रोकता है, शत्रुओं का नाश करता है,
बल में सहायता देता है, दीर्घायुष्य कारक और सांप आदि के भय को
मिटाता है ॥ १०० ॥
संक्षेप से स्वस्थवृत्त—
नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी सदा ॥ १०१ ॥
स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत् ।
जिस प्रकार नगराधिपति राजा नगर की और रथी अपने रथ की रक्षा
करता है उसी प्रकार मेधावी, ( बुद्धिमान् मनुष्य ) अपने शरीर के कर्त्तव्यों में
सावधान रहे ॥ १०१ ॥
भवति चात्र— वृत्त्युपायान्निषेवेत ये स्युर्धर्माविरोधिनः ।
शममध्ययनं चैव सुखमेव समश्नुते ॥ १०२ ॥
जो धर्म के अविरोधी कार्य हों उन उपायों का ( जीविका के साधनों का )
पालन करना चाहिये । शम (शान्त वृत्ति) और अध्ययन (वेदादि सद्ग्रन्थों का
पठन ), करने से मनुष्य को सुख मिलता है ॥ १०२ ॥
तत्र श्लोकाः—मात्रा द्रव्याणि मात्रां च संश्रित्य गुरुलाघवम् ।
द्रव्याणां गर्हितोऽभ्यासो येषां येषां च शस्यते ॥ १०३ ॥
इस अध्याय में मात्रा को लक्ष्य करके द्रव्य, मात्रा, गुरु लघु का ज्ञान,
निन्दित द्रव्य पदार्थ, और जिन जिन पदार्थों का अभ्यास करना चाहिये
वे कह दिये हैं ॥ १०३ ॥
अञ्जनं धूम-वर्तिश्च त्रिविधा वर्ति-कल्पना ।
धूमपान-गुणाः कालाः पानमानं च यस्य यत् ॥ १०४ ॥
व्यापत्ति-चिह्नं भेषज्यं धूमो येषां विगर्हितः ।
पेयो यथा यन्मयं च नेत्रं यस्य च यद्द्विधम् ॥ १०५ ॥
नस्य-कर्म-गुणा नस्तः कार्यं यच्च यथा यदा ।
भक्षयेद्दन्त-पवनं यथा यद्यद्गुणं च यत् ॥ १०६ ॥
यदर्थं यानि चाऽऽस्येन धार्याणि कवलग्रहे ।