चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 639 में से
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अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८५
तैलस्य ये गुणा दृष्टाः शिरस्तैलगुणाश्च ये ॥ १०७ ॥
कर्णतैले तथाऽभ्यङ्गे पादाभ्यङ्गे च मार्जने ।
स्नाने वाससि शुद्धे च सौगन्ध्ये रत्नधारणे ॥ १०८ ॥
शौचे संहरणे लोम्नां पादत्र-च्छत्र-धारणे ।
गुणा मात्राशितीयेऽस्मिन् तथोक्ता दण्डधारणे ॥ १०९ ॥
अञ्जन, धूम वर्त्ति के तीन प्रकार, प्रायोगिक, वैरेचिक और स्नैहिक धूम
की कल्पना, धूमपान के गुण, धूमपान के समय, धूमपान का परिणाम, धूप
पान से होनेवाली हानियों और इन हानियों की 'भैषज्य' ( औषध ), जिन
पुरुषों के लिये धूम निन्दित है, वह जिस प्रकार से पीना चाहिये, नलिका जिस
वस्तु और जिस प्रकार की बनी होनी चाहिये वह भी कह दिया है । नस्य
कर्म्म के लाभ, उसके बनाने की विधि, नस्य लेने का समय एवं विधि, दन्त
धावन के गुण, मुख में धारण करने योग्य वस्तुएँ, तैल-गण्डूष के गुण, शिर
पर तेल लगाने के लाभ, कान में तेल डालने के गुण, पाँव में और शरीर में
तेल लगाने के लाभ, उबटन, स्नान करने के लाभ, शुद्ध वस्त्र माला आदि
सुगन्धि द्रव्य, रत्न धारण करने के गुण, शुचि कर्म के, बालों को काटने, जूता
छाता और दण्ड को धारण करने के गुण, लाभ यह सब इस 'मात्राशितीय'
अध्याय में कह दिये हैं ॥ १०४-१०९ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्ते
मात्राशितीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातस्तस्याशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'तस्याशितीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, ऐसा
भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ १-२ ॥
तस्याशिताद्यादाहाराद् बलं वर्णश्च वर्धते ।
तस्र्त्तृसात्म्यं विदितं चेष्टाऽऽहारव्यपाश्रयम् ॥ ३ ॥
परिमित मात्रा में भोजन करने वाले पुरुष के मात्रा में खाने-पीने से बल,
वर्ण, कान्ति, सुख और आयुष्य बढ़ता है । मात्राशी पुरुष का सात्म्य ऋतु के
गुण के विपरीत चेष्टा, व्यायाम, अभ्यङ्ग आदि, आहार खाना-पीना, चाटना
के आश्रय पर ही ऋतुओं का सात्म्य भी जाना जाता है ॥ ३ ॥