चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंबलं शिरः कपालानां विशेषेणाभिवर्धते ॥ ८० ॥
दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च ।
इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुत्वग्भवति चामला ॥ ८१ ॥
निद्रालाभः सुखं च स्यान्मूर्ध्नि तैल-निषेवणात् ।
नित्य प्रति शिर पर तेल की मालिश करने से शिरःशूल (शिर का दुखना)
नहीं होता, न बाल उड़ते हैं न गंजापन आता, न पालित्य अर्थात् बाल जल्दी
श्वेत नहीं होते और बाल नहीं गिरते । शेर की अस्थियों का बल विशेष रूप
से बढ़ता है और बालों की जड़ें मजबूत होती हैं, बाल लम्बे और काले हो
जाते हैं । आँख कान आदि इन्द्रियाँ स्वच्छ, प्रसन्न हो जाती हैं, त्वचा स्वच्छ,
निर्मल हो जाती है और सुख पूर्वक नींद आता है । शिर पर तैल लगाने से
ये लाभ हैं ॥ ७९-८१ ॥
कान में तैल डालने से लाभ—
न कर्णरोगा वातोत्था न मन्या-हनु-संग्रहः ॥ ८२ ॥
नोच्चैः श्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णतर्पणात् ।
नित्य प्रति कान में तैल डालने से वात जन्य कान के रोग, एवं 'मन्याग्रह'
( ग्रीवा का जकड़ना ) और 'हनुग्रह' ( जबड़ों का भिचना ), उच्चैः श्रुति
( ऊँचा सुनना ), बाधिर्य ( बधिरता, बहरापन ) नहीं होता ॥ ८२ ॥
शरीर पर तैल लगाने की विधि—
स्नेहाभ्यङ्गाद्यथा कुम्भश्चर्म स्नेह-विमर्दनात् ॥ ८३ ॥
भवत्युपाङ्गादक्षश्च दृढः क्लेशसहो यथा ।
तथा शरीरमभ्यङ्गाद् दृढं सुत्वक्प्रजायते ॥ ८४ ॥
प्रशान्त-मारुताबाधं क्लेश-व्यायाम-संसहम् ।
स्पर्शने चाधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम् ॥ ८५ ॥
त्वच्यश्च परमोऽभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः ।
न चाभिघाताभिहतं गात्रमभ्यङ्गसेविनः ॥ ८६ ॥
विकारं भजतेऽत्यर्थं बलकर्मणि वा क्वचित् ।
सुस्पर्शोपचिताङ्गश्च बलवान् प्रियदर्शनः ॥ ८७ ॥
भवत्यभ्यङ्ग-नित्यत्वान्नरोऽल्पजर एव च ।
जिस प्रकार स्नेह, चिकनाई की मालिश से घड़ा और जिस प्रकार स्नेह के
मर्दन से चमड़ा, और जिस प्रकार स्नेह के चुपड़ने से गाड़ी का धुरा, दृढ़
( मजबूत ) और क्लेशसह अर्थात् ( दुःख कष्ट सहने योग्य हो जाता है ) उसी
प्रकार शरीर पर तेल मलने से शरीर भी दृढ़, मजबूत हो जाता है, त्वक