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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 639 में से

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पृष्ठ 107

अ० ६ सूत्रस्थानम् ८६
हेमन्त ऋतु में त्याज्य—लघु गुण वाले एवं वायुप्रकोपक आहार विहार
हेमन्त ऋतु में छोड़ देने चाहियें। एवं सामने की वायु, थोड़ा खाना और
पानी में घोलकर सत्तू खाना छोड़ देना चाहिये ॥ १५-१८ ॥
हेमन्तशिशिरे तुल्ये शिशिरेऽल्पं विशेषणम् ।
रौक्ष्यमादानजं शीतं मेघ-मारुत-वर्षजम् ॥ १९ ॥
तस्माद्धैमन्तिकः सर्वः शिशिरे विधिरिष्यते ।
निवातमुष्णमधिकं शिशिरे गृहमाश्रयेत् ॥ २० ॥
कटु-तिक्त-कषायाणि वातलानि लघूनि च ।
वर्जयेदन्न-पानानि शिशिरे शीतलानि च ॥ २१ ॥
हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ प्रायः शीत की दृष्टि से समान हैं। परन्तु
शिशिर काल मे हेमन्त से इतना भेद है कि शिशिर का आदान काल होने से
वायु रूक्ष होती है एवं बादल, वायु और बरसात शिशिर में अधिक होने से
इस ऋतु में शीत अधिक होता है। इसलिये शिशिर ऋतु में हेमन्त की संपूर्ण
विधि पालन करनी चाहिये । परन्तु शिशिर में हेमन्त से अधिक गरम और
वायु रहित घरों में (खुली वायु जहाँ न आये) रहे । शिशिर काल में कडुवे,
तिक्त, कसैले, वायुकारक और लघु तथा ठण्डे खान-पानको छोड़ दे ॥१९-२१॥
वसन्त की ऋतुचर्या—
हेमन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः ।
कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून् ॥ २२ ॥
तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत् ।
गुर्वम्ल-स्निग्ध-मधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ २३ ॥
व्यायामोद्वर्तनं धूमं कवल-ग्रह-मञ्जनम् ।
सुखाम्बुना शौचविधिं शीलयत्कुसुमागमे ॥ २४ ॥
चन्दनागुरु-दिग्धाङ्गो यव-गोधूम-भोजनः ।
शारभं शाशमैणेयं मांसं लावक-पिञ्जलम् ॥ २५ ॥
भक्षयेन्निर्गदं सीधुं पिबेन्माध्वीकमेव वा ।
वसन्तेऽनुभवेत्स्त्रीणां काननानां च यौवनम् ॥ २६ ॥
हेमन्त काल में सञ्चित हुआ कफ सूर्य की किरणों से (घी के समान)
पिघल कर—द्रव बनकर शरीर की अग्नि को (धातुओं की अग्नि को नहीं)
कम करके कफजन्य बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। इसलिये कफ को
निकालने के लिये वसन्त ऋतु में वमन, शिरोविरेचन कार्य करने चाहिये ।