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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 639 में से

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पृष्ठ 113

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६५
इस की चिकित्सा—
स्वेदावगाहनाभ्यङ्गान् सर्पिषश्चावपीडकम् ।
मूत्रे प्रतिहते कुर्यात् त्रिविधं बस्तिकर्म च ॥ ७ ॥
( स्वेद ) पसीना देना, ( अवगाहन ) गरम पानी की नाद में बैठना,
( अभ्यंग ) तैल आदि मर्दन और घी का नस्य देना, तीन प्रकार का बस्ति
कर्म ( निरूहण, अनुवासन और उत्तर बस्ति ) मूत्र के उपस्थित वेग को रोकने
के प्रतीकार हैं ॥ ७ ॥
पक्वाशय-शिरःशूलं वात-वर्चो-निरोधनम् ।
पिण्डिकोद्वेष्टनाध्मानं पुरीषे स्याद्विधारिते ॥ ८ ॥
मल के उपस्थित वेग को रोकने से पक्वाशय अर्थात् नाभि के नीचे के भाग
में और शिर में वेदना होती है, अपान वायु और मल बन्द हो जाते हैं, पिण्ड-
लियों में ऐंठन होने लगती है, पेट में अफरा चढ़ जाता है ॥ ८ ॥
चिकित्सा—
स्वेदाभ्यङ्गाऽवगाहाश्च वर्तयः बस्तिकर्म च ।
हितं प्रतिहते वर्चस्यन्नपानं प्रमाथि च ॥ ९ ॥
स्वेद पसीना देना, अभ्यंग, अवगाहन ( नांद या टब आदि में स्नान ),
फलवर्ति, और बस्तिकर्म करे । विरेचन द्रव्यों का घी और तैल आदि द्वारा
चूर्ण, क्वाथ, कल्कादि के रूप में बनाकर देना और वात को अनुलोमन करने
वाली औषध मल के रोकने में हितकारी है ॥ ९ ॥
मेढे वृषणयोः शूलमङ्गमर्दो हृदि व्यथा ।
भवेत्प्रतिहते शुक्रे विबद्धं मूत्रमेव च ॥ १० ॥
वीर्य के उपस्थित वेग को रोकने से लिंग और अण्डकोषों में वेदना होती
है, अंग टूटते हुए प्रतीत होते हैं, चेतना के स्थान हृदय में वेदना अनुभूत
होती है और मूत्र भी बन्द हो जाता है ॥ १० ॥ चिकित्सा—
तत्राभ्यङ्गावगाहश्च मदिरा चरणायुधाः ।
शालिः पयो निरूहाश्च शस्तं मैथुनमेव च ॥ ११ ॥
तैलमर्दन, अवगाहन स्नान ( द्रोणीस्नान ), मद्य, कुक्कुट का मांस, हेम-
न्तिक धान्य, दूध, बस्तिकर्म और मैथुन कर्म ये शुक्र वेग के निरोध से उत्पन्न
रोगों की चिकित्सा है ॥ ११ ॥
वात-मूत्र-पुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा ।
जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥ १२ ॥
अपान वायु के रोकने से, अपान वायु, मूत्र और पुरीष रुक जाते हैं ।