ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७
सूत्र ९—१२ ] अध्याय ३ ३०७
व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो 'यदेव विद्यया करोति' (छा० उ० १ । १ । १०)
इत्यादि श्रुतिका प्रमाण दिया है, वह एकदेशीय है। उस प्रकरणमे आयी हुई
उद्गीथ-विद्यासे ही उसका सम्बन्ध है, अतः उसको ही वह कर्मका अङ्ग बताती
हैं; अन्य सब प्रकरणोंमें वर्णित समस्त विद्याओसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है।
अतः उस एकदेशीय श्रुतिमे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि विद्यामात्र कर्मका
अङ्ग है।
सम्बन्ध—पांचवें सूत्रमे पूर्वपक्षीने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके
विषयमे उत्तर देते हैं—
विभागः शतवत् ॥ ३ । ४ । ११ ॥
शतवत्=एक सौ मुद्राके विभागकी भाँति; विभागः=उस श्रुतिमें कहे
हुए विद्या-कर्मका विभाग अधिकारिभेदसे समझना चाहिये।
व्याख्या—जिस प्रकार किसीको आज्ञा दी जाय कि 'एक सौ मुद्रा उपस्थित
लोगोंको दे दो।' तो सुननेवाला पुरुष पानेवाले लोगोंके अधिकारके अनुसार
विभाग करके उन मुद्राओंका वितरण करेगा। उसी प्रकार इस श्रुतिके कथनका
भाव भी अधिकारीके अनुसार विभागपूर्वक समझना चाहिये। जो ब्रह्मज्ञानी है,
उसके कर्म तो यहां नष्ट हो जाते हैं। अत वह केवल विद्याके बलसे ही
ब्रह्मलोकको जाता है। उसके साथ कर्म नहीं जाते (मु० उ० १ । २ ।
११ ) और जो सांसारिक मनुष्य हैं या साधनभ्रष्ट है, उनके साथ विद्या और
कर्म दोनोंके ही मस्कार जाते हैं। वहाँ विद्याका अर्थ परमात्माका अपरोक्षज्ञान
नहीं; किन्तु केवल श्रवण, मनन आदिका अभ्यास समझना चाहिये। अत
इससे भी विद्या कर्मका अङ्ग हैं, यह सिद्ध नहीं होता।
सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसं जो छठे सूत्रमें प्रजापतिके वचनोका प्रमाण दिया
गया था, उसका उत्तर देते हैं—
अध्ययनमात्रवतः ॥ ३ । ४ । १२ ॥
अध्ययनमात्रवतः = जिसने विद्याका केवल अध्ययनमात्र किया है, अनुष्ठान
नहीं, ऐसे विद्वान्के विषयमें यह कथन है।
व्याख्या—प्रजापतिके उपदेशमे जो विद्यासम्पन्न पुरुषके लिये कुटुम्बमे जाने
और कर्म करनेकी बात कही गयी हैं, वह कथन गुरुकुलसे अध्ययनमात्र करके
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निकलनेवाले ब्रह्मचारीके लिये है। अतः जिसने ब्रह्मविद्याका केवल अध्ययन किया
है, मनन और निदिध्यासनपूर्वक उसका अनुष्ठान नहीं किया, ऐसे अधिकारीके
प्रति अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मोंका विधान है, जो कि सर्वथा उचित है;
किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग है।
सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे जो अन्तिम श्रुति-प्रमाण दिया गया है, उसका
उत्तर चार सूत्रोंमें अनेक प्रकारसे देते हैं—
नाविशेषात् ॥ ३ । ४ । १३ ॥
अविशेषात् = वह श्रुति विशेषरूपसे विद्वान्के लिये नहीं कही गयी है,
इसलिये; न = ज्ञानके साथ उसका समुच्चय नहीं है।
व्याख्या—वहाँ जो त्यागपूर्वक आजीवन कर्म करनेके लिये कहा है, वह
कथन सभी साधकोंके लिये समानभावसे है; ज्ञानीके लिये विशेषरूपसे नहीं है।
अतः उससे न तो यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका अङ्ग है और न
यही सिद्ध होता है कि केवल ब्रह्मविद्यासे परम पुरुषार्थ प्राप्त नहीं होता।
सम्बन्ध—यदि उस श्रुतिको समानभावसे सबके लिये मान लिया जाय तो
फिर उसके द्वारा ज्ञानीके लिये भी तो कर्मका विधान हो ही जाता है, इसपर
कहते हैं—
स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३ । ४ । १४ ॥
वा = अथवा यों समझो कि; स्तुतये = विद्याकी स्तुतिके लिये; अनुमतिः =
सम्मतिमात्र है।
व्याख्या = यदि इस श्रुतिको समानभावसे ज्ञानीके लिये भी माना जाय तो
उसका यह भाव समझना चाहिये कि ज्ञानी लोकसंग्रहार्थ आजीवन कर्म करता
रहे तो भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसमे कर्म लिप्त नहीं होते। वह उनसे सर्वथा
सम्बन्धरहित रहता है। इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा करनेके लिये यह श्रुति
कर्म करनेकी सम्मतिमात्र देती है, उसे कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं करती;
अतः यह श्रुति विद्याको कर्मोंका अङ्ग बतलानेके लिये नहीं है।
सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
कामकारेण चैके ॥ ३ । ४ । १५ ॥