ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ५-७ ] अध्याय १ ५.
सूत्र ५-७ ] अध्याय १ ५.
बन सकता; क्योंकि वह चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान
( जड प्रकृति ) को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता ।
सम्बन्ध—ईक्षण या सङ्कल्प चेतनका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतन-
के लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते हैं 'अमुक
मकान अब गिरना ही चाहता है।' इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध
गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिके साथ मान लिया जाय तो क्या हानि है ?
इसपर कहते हैं—
गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥ १ । १ । ६ ॥
चेत् =यदि कहो; गौणः = ईक्षणका प्रयोग गौणवृत्तिसे ( प्रकृतिके लिये )
हुआ है; न = तो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्दका
प्रयोग है।
व्याख्या—ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमें ईक्षणका कर्ता आत्माको
बताया गया है; अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ नहीं हो
सकता। इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण मानना वेदके अनुकूल नहीं है।
सम्बन्ध—'आत्म' शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये भी
आता है; अतः उक्त श्रुतिमें 'आत्मा' को गौणरूपसे प्रकृतिका वाचक मानकर
उसे जगत्का कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १ । १ । ७॥
तन्निष्ठस्य = उस जगत्कारण ( परमात्मा ) में स्थित होनेवालेकी; मोक्षोपदेशात् =
मुक्ति बतलायी गयी है; इसलिये (वहाँ प्रकृतिको जगत्कारण नहीं माना जा सकता)।
व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी वल्लीके सातवे अनुवाकमे जो सृष्टिका
प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'तदात्मानं स्वयमकुरुत'—'उस
ब्रह्मने स्वयं ही अपने आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमे प्रकट किया।'
साथ ही यह भी बताया गया है कि 'यह जीवात्मा जब उस आनन्दमय परमात्मामे
निष्ठा करता—स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है।' इसी प्रकार
छान्दोग्योपनिषद्मे भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम कारणमे स्थित
होनेका फल मोक्ष बताया है; किन्तु प्रकृतिमे स्थित होनेसे मोक्ष होना कदापि सम्भव
६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमे 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है; इसीलिये
प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ।
सम्बन्ध—उक्त श्रुतियोंमें आया हुआ 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं
हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं—
हेयत्वावचनाच्च ॥ १ । १ । ८ ॥
हेयत्वावचनात्=त्यागनेयोग्य नहीं बताये जानेके कारण; च=भी (उस
प्रसङ्गमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है) ।
व्याख्या—यदि 'आत्मा' शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो
आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका
उपदेश दिया जाता; किन्तु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको
जगत्का कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है;
अतः परब्रह्म परमात्मा ही 'आत्म'शब्दका वाच्य है और वही इस जगत्का
निमित्त एवं उपादान कारण है ।
सम्बन्ध—'आत्मा' की ही भाँति इस प्रसङ्गमें 'सत्' शब्द भी प्रकृतिका
वाचक नहीं है; यह सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं—
स्वाप्ययात् ॥ १ । १ । ९ ॥
स्वाप्ययात्=अपनेमें विलीन होना बताया गया है, इसलिये (सत् शब्द भी
जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता)।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६ । ८ । १) मे कहा है कि 'यत्रैतत् पुरुषः
स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं
स्वपितीत्याचक्षते' अर्थात् 'हे सोम्य ! जिस अवस्थामे यह पुरुष (जीवात्मा) सोता
है, उस समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न (संयुक्त) होता है; स्व—
अपनेमें अपीत—विलीन होता है, इसलिये इसे 'स्वपिति' कहते हैं।'*
- यहाँ स्व (अपने) में विलीन होना कहा गया है; अतः यह सन्देह हो सकता
है कि 'स्व' शब्द जीवात्माका ही वाचक है, इसलिये वही जगत्का कारण है, परन्तु ऐसा
समझना ठीक नहीं है, क्योकि पहले जीवात्माका सत् (जगत्के कारण) से संयुक्त होना
बताकर उसी सत्को पुनः 'स्व' नामसे कहा गया है और उसीमे जीवात्माके विलीन