ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९
सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २२९
पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥ ३ । २ । ५ ॥
( जीवात्मामे भी ईश्वरके समान गुण है ) तु=किन्तु; तिरोहितम्=छिपे
हुए ( आवृत्त ) है; पराभिध्यानात्=( अतः ) परब्रह्म परमात्माका निरन्तर ध्यान
करनेसे ( वे प्रकट हों जाते है ); हि=क्योकि; ततः=उस परमात्माके सकाशसे
ही; अस्य=इसके; बन्धविपर्ययौ=बन्धन और उसके विपरीत अर्थात् मोक्ष है ।
व्याख्या—जीवात्मा ईश्वरका अंश है, इसलिये यह भी ईश्वरके सदृश गुणों-
वाला है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है; परन्तु इसके वे सब गुण तिरोहित है—
छिपे हुए हैं; इस कारण उनका उपयोग नहीं देखा जाता । उस परब्रह्म
परमेश्वरका निरन्तर ध्यान करनेसे जीवके वे छिपे हुए गुण पुनः प्रकट हो
सकते हैं ( श्वे० उ० १ । ११ ) । परमेश्वरकी आराधनाके बिना अपने-आप उनका
प्रकट होना सम्भव नहीं है, क्योकि इस जीवका अनादिसिद्ध बन्धन और उससे
मुक्त होना उस जगत्कर्ता परमेश्वरके ही अधीन है ( श्वे० उ० ६ । १६ ) ।
इसलिये वह स्वयं स्वप्नकी सृष्टि आदि कुछ नहीं कर सकता ।*
सम्बन्ध—इस जीवात्माके जो वास्तविक ईश्वरसम्बन्धी गुण हैं, वे क्यों
छिपे हुए हैं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
देहयोगाद्वा सोऽपि ॥ ३ । २ । ६ ॥
सः=वह तिरोभाव; अपि=भी; देहयोगात्=शरीरके सम्बन्धसे; वा=
ही है ।
व्याख्या—इस जीवात्मामे उस परब्रह्म परमात्माके स्वाभाविक गुण विद्यमान
रहते हुए भी जो उन गुणोंका तिरोभाव हो रहा है, वे गुण प्रकट नहीं हो
रहे हैं तथा यह जीवात्मा जो उन सब गुणोंसे सर्वथा अनभिज्ञ है, इसका मुख्य
कारण जीवात्माका शरीरके साथ एकताको प्राप्त हो जाना ही है । यही इसका
बन्धन है और यह अनादिकालसे है । इसीके कारण जन्म-जन्मान्तरोंके कर्म-
- साधकको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर उस परमदयालु, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म
परमेश्वरके आश्रित होकर निरन्तर उसका भजन-ध्यान करे और इस बन्धनसे छुटकारा
पानेके लिये भगवान्से प्रार्थना करे । इस जगत्रूप नाटकका सूत्रधार परमेश्वर जिसको
उस प्रपञ्चसे अलग करना चाहे, वही इससे अलग हो सकता है ।
२३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
संस्कारोसे परवश हुआ यह जीव नाना योनियोमे जन्म लेता और मरता है तथा
भाँति-भाँतिके दुःखोंका उपभोग कर रहा है ।
सम्बन्ध—यहाँतक स्वप्नावस्थापर विचार किया गया, उसमें प्रसङ्गवश
जीवात्माके बन्धन और उससे छूटनेके उपायका भी संक्षेपमें वर्णन हुआ । अब
जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थापर विचार करनेके लिये अगला प्रसङ्ग आरम्भ किया
जाता है । प्रायः यह कहा जाता है कि सुषुप्ति-अवस्थामें जीवात्माका ब्रह्मसे
संयोग होता है, इससे यह भ्रान्त धारणा हो सकती है कि सुषुप्ति भी समाधिके
सदृश कोई सुखप्रद अवस्था है । अतः इस भ्रमका निवारण करनेके लिये
कहते हैं—
तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ३ । २ । ७ ॥
तदभावः=(सुषुप्ति-अवस्थामे ) उस स्वप्नदृश्यका अभाव हो जाता है ( उस
समय जीवात्मा ); नाडीषु=नाडियोमे (.स्थित हो जाता है ); तच्छ्रुतेः=क्योकि
वैसा ही श्रुतिका कथन है; च=तथा; आत्मनि=आत्मामे भी ( उसकी
स्थिति बतायी गयी है ) ।
व्याख्या—पूर्व सूत्रोमे जो स्वप्नावस्थाका वर्णन किया गया है, उसका
उपभोग करते समय यह जीवात्मा कभी तो स्वप्नसे जग जाता है और कभी
फिर स्वप्नमे स्थित हो जाता है, पुनः जगता और फिर स्वप्नावस्थामें चला जाता
है ( बृह० उ०-४ । ३ । १० से १८ तक ) । इस प्रकार स्वप्नगत मानसिक
सुख-दुःखोंका उपभोग करते-करते कभी सुषुप्ति-अवस्था हो जानेपर स्वप्नके
दृश्योका अभाव हो जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि वे मायामात्र हैं; क्योंकि
बाह्यजगत्का अभाव नहीं होता, उसका कार्य ज्यो-का-त्यो चलता रहता है तथा जीवात्मा-
का शरीर भी सुरक्षित रहता है, इसलिये उसका सत् होना सिद्ध होता है । उस समय
जीवात्माको इस प्रपञ्चके उपभोगसे विश्राम मिलता है तथा शरीर और इन्द्रियोंकी
थकावट दूर होती है । वह अवस्था आनेपर जीवात्माकी स्थिति कैसी और कहाँ
रहती है, इस विषयमें श्रुति कहती है—'जब यह सुषुप्ति-अवस्थाको प्राप्त होता है,
तब कुछ भी नहीं जानता; इसके शरीरमे जो बहत्तर हजार हिता नामकी नाडियाँ
हृदयसे निकलकर समस्त शरीरमे व्याप्त हो रही है, उनमे फैलकर यह समस्त
शरीरमें व्याप्त हुआ शयन करता है।' ( बृह०उ० २ । १ । १९ ) दूसरी श्रुतिमे