ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ ७१
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ ७१
व्याख्या-उक्त प्रकरणमे जानश्रुतिको श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला और
अतिथियोंके लिये ही तैयार कराकर रक्खी हुई रसोईसे प्रतिदिन उनका सत्कार
करानेवाला बताया गया है। उसके राजोचित ऐश्वर्यका .भी वर्णन है, साथ ही
यह भी कहा गया है कि राजाकी कन्याको रैकने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। इन
सब बातोंसे यह सिद्ध होता है कि वह शूद्र नहीं, क्षत्रिय था। इसलिये यही
सिद्ध होता है कि वेद-विद्यामे जाति-शूद्रका अधिकार नहीं है। इसके सिवा,
इस प्रसङ्गके अन्तिम भागमे रैकने वायु तथा प्राणको सबका भक्षण करनेवाला
कहकर उन दोनोंकी स्तुतिके लिये एक आख्यायिका उपस्थित की है। उसमे
ऐसा कहा है कि 'शौनक और अभिप्रतारी चैत्ररथ-इन दोनोको जब भोजन
परोसा जा रहा था, उस समय एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी' इत्यादि। इस
आख्यायिकामे राजा जानश्रुतिके यहाँ शौनक और चैत्ररथको भोजन परोसे जाने-
की बात कही गयी है, इससे जानश्रुतिका क्षत्रिय होना सिद्ध होता है; क्योकि
शौनक ब्राह्मण और चैत्ररथ क्षत्रिय थे; वे शूद्रके यहाँ भोजन नहीं कर सकते
थे। अतः यही सिद्ध होता है कि जाति-शूद्रका वेद-विद्यामें अधिकार नहीं है।
सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं-
संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ १ । ३ । ३६ ॥
संस्कारपरामर्शात्=श्रुतिमे वेदविद्या ग्रहण करनेके लिये पहले उपनयन आदि
संस्कारोंका होना आवश्यक बताया गया है, इसलिये; च=तथा; तदभावाभि-
लापात्=शूद्रके लिये उन संस्कारोंका अभाव कहा गया है; इसलिये भी
( जाति-शूद्रका वेदविद्यामे अधिकार नहीं है )।
व्याख्या-उपनिषदोंमे जहाँ-जहाँ वेदविद्याके अध्ययनका प्रसङ्ग आया है,
वहाँ सब जगह यह देखा जाता है कि आचार्य पहले शिष्यका उपनयनादि
संस्कार करके ही उसे वेद-विद्याका उपदेश देते हैं। यथा-'तेषामेवैतां
ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥' ( मु० उ० ३ । २ । १० )
अर्थात् 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश दे, जिन्होने विधिपूर्वक
उपनयनादि संस्कार कराकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया हो।' 'उप त्वा नेष्ये'
('छा० उ० ४ । ४ । ५) 'तेरा उपनयन संस्कार करूँगा।' 'तꣲ होप-
७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
निन्ये।' ( श० ब्रा० ११ । ५ । ३ । १३ ) 'उसका उपनयन-
संस्कार किया।' इत्यादि । इस प्रकार वेदविद्याके अध्ययनमें उपनयन आदि
संस्कारोंका होना परम आवश्यक माना गया है तथा शूद्रोंके लिये उन संस्कारोंका
विधान नहीं किया है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रोंका वेदविद्यामे
अधिकार नहीं है ।
सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं—
तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १ । ३ । ३७ ॥
तदभावनिर्धारणे=शिष्यमे शूद्रत्वका अभाव निश्चित करनेके लिये;
प्रवृत्तेः=आचार्यकी प्रवृत्ति पायी जाती है, इससे; च=भी ( यही सिद्ध होता
है कि वेदाध्ययनमें शूद्रका अधिकार नहीं है ) ।
व्याख्या—जानश्रुति तथा रैक्वकी कथाके बाद ही सत्यकाम जावालका
प्रसङ्ग इस प्रकार आया है—'जबालाके पुत्र सत्यकामने गौतमनामक
आचार्यकी शरणमे जाकर कहा—'भगवन् ! मै ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक आपकी
सेवामे रहनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।' तब गौतमने उसकी जातिका
निश्चय करनेके लिये पूछा—'तेरा गोत्र क्या है ?' इसपर उसने स्पष्ट शब्दोमे
कहा—'मैं अपना गोत्र नहीं जानता । मैंने अपनी मातासे गोत्र पूछा था,
उसने कहा कि—'मुझे गोत्र नहीं मालूम है, मेरा नाम जवाला है
और तेरा नाम सत्यकाम है।' इसलिये मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि
'मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' तब गुरुने कहा—'इतना स्पष्ट और सत्य
भाषण ब्राह्मण ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।' इस प्रकार सत्य
भाषणरूप हेतुसे यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं है, उसे
आचार्य गौतमने समिधा लानेका आदेश दिया और उसका उपनयन-संस्कार
कर दिया।' ( छा० उ० ४ । ४ । ३-५ )
इस तरह इस प्रकरणमे आचार्यद्वारा पहले यह निश्चय कर लिया गया
कि 'सत्यकाम शूद्र नहीं, ब्राह्मण है, फिर उसका उपनयन-संस्कार करके
उसे विद्याध्ययनका अधिकार प्रदान किया गया; इससे यही सिद्ध होता है
कि शूद्रका वेद-विद्यामे अधिकार नहीं है ।