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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र २-३ ] अध्याय ३ २५७

सूत्र २-३ ] अध्याय ३ २५७
उत्पत्ति बतायी है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणोंसे और भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की
उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। इन सब वेदवाक्योंकी एकता नहीं हो
सकती। इसी प्रकार दूसरे विषयमे भी समझना चाहिये। ऐसा यदि कोई कहे
तो यह ठीक नहीं है, क्योकि यहाँ सभी श्रुतियोंका अभिप्राय जगत्की उत्पत्तिके
पहले उसके कारणरूप एक परमेश्वरको बताना है, उसीको 'सत्' नामसे कहा
गया है तथा उसीका 'आत्मा', 'आनन्दमय', 'प्रजापति' और 'अव्याकृत' नामसे
भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार एक ही तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली एक
विद्यामें वर्णनका भेद होना अनुचित नहीं है, उद्देश्य और फल एक होनेके कारण
उन सबकी एकता ही है।
सम्बन्ध—'मुण्डकोपनिषद्'में कहा है कि 'जिन्होंने शिरोव्रतका अर्थात् सिरपर
जटा धारणपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका विधिपूर्वक पालन किया हो, उन्हींको इस ब्रह्म-
विद्याका उपदेश देना चाहिये।' (३।२।१०) किन्तु दूसरी शाखावालोंने
ऐसा नहीं कहा है; अतः इस आथर्वणशाखामें बतायी हुई ब्रह्मविद्याका अन्य
शाखामें कही हुई ब्रह्मविद्यासे अवश्य भेद होना चाहिये।" ऐसी शङ्का होनेपर
कहते हैं—
स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च
सववच्च तन्नियमः ॥ ३ । ३ । ३ ॥
स्वाध्यायस्य = यह शिरोव्रतका पालन अध्ययनका अङ्ग है; हि=क्योंकि;
समाचारे = आथर्वणशाखावालोंके परम्परागत शिष्टाचारमें; तथात्वेन = अध्ययनके
अङ्गरूपसे ही उसका विधान है; च=तथा; अधिकारात् =उस व्रतका पालन
करनेवालेका ही ब्रह्मविद्या-अध्ययनमें अधिकार होनेके कारण; च=भी; सववत् = 'सव'
होमकी भाँति; तन्नियमः =वह शिरोव्रतवाला नियम आथर्वणशाखावालोंके लिये ही है।
व्याख्या—आथर्वण-शाखाके उपनिषद् (मु० उ० ३ । २ । १०) में कहा
गया है कि 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम्।'—'उन्हीं-
को इस ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये, जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका
पालन किया है।' उक्त शाखावालोंके लिये जो शिरोव्रतके पालनका नियम किया
गया है, वह विद्याके भेदके कारण नहीं; अपितु उन शाखावालोंके अध्ययन-
विषयक परम्परागत आचारमें ही यह नियम चला आता है कि जो शिरोव्रतका
वे० द० १७—

२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
पालन करता हो, उसीको उक्त ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये। उसीका
उसमे अधिकार है। जिसने शिरोव्रतका पालन नहीं किया, उसका उस ब्रह्म-
विद्याके अध्ययनमे अधिकार नहीं है। जिस प्रकार 'सव' होमका नियम उन्हींकी
शाखावालोंके लिये है, वैसे ही इस शिरोव्रतके पालनका नियम भी उन्हींके लिये है।
इस प्रकार यह नियम केवल अध्ययनाध्यापनके विषयमे ही होनेके कारण इससे
ब्रह्मविद्याकी एकतामे किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—सब उपनिषदोंमें एक परमात्माके स्वरूपको बतानेके लिये ही प्रकार-
भेदसे ब्रह्मविद्याका वर्णन है, यह बात वेदप्रमाणसे भी सिद्ध करते हैं—
दर्शयति च ॥ ३ । ३ । ४ ॥
दर्शयति च=श्रुति भी यही बात दिखाती है।
व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति'—'समस्त वेद
जिस परम प्राप्य परमेश्वरका प्रतिपादन करते है।' इत्यादि (क० उ० १ । २ । १५)
इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोमे भी है। तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान्ने
भी कहा है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (१५। १५) 'सब वेदोके द्वारा
जाननेयोग्य मै ही हूँ।' इस प्रकार श्रुति-स्मृतियोके सभी वचनोका एक ही उद्देश्य
देखनेमे आता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न नहीं है।
सम्बन्ध—यदि यही बात है तो एक जगहके वर्णनमें दूसरी जगहकी अपेक्षा
कुछ बातें अधिक बतायी गयी हैं और कहीं कुछ बातें कम हैं, ऐसी
परिस्थितिमें विभिन्न प्रकरणोंके वर्णनकी एकता कैसे होगी? इस जिज्ञासापर
कहते हैं—
उपसंहारोऽर्थभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ३ । ३ । ५ ॥
समाने=एक प्रकारकी विद्यामे; च=ही; अर्थाभेदात्=प्रयोजनमे भेद न
होनेके कारण; उपसंहारः=एक जगह कहे हुए गुणोंका दूसरी जगह उपसंहार
कर लेना; विधिशेषवत्=विधिशेषकी भाँति (उचित है)।
व्याख्या—जिस प्रकार कर्मकाण्डमे प्रयोजनका भेद न होनेपर एक शाखामे बताये
हुए यज्ञादिके विधिशेषरूप अग्निहोत्र आदि धर्मोंका दूसरी जगह भी उपसंहार (अध्याहार)
कर लिया जाता है, उसी प्रकार विभिन्न प्रकरणोंमें आयी हुई ब्रह्मविद्याके वर्णनमे