ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २९—३२ ] अध्याय २ १२३
सूत्र २९—३२ ] अध्याय २ १२३
तथा उस परब्रह्मके शासनमे सूर्य-चन्द्रमा आदिको दृढ़तापूर्वक स्थित
बताया जाना, (बृ० उ० ३ । ८ । ९) उसमे ज्ञान, बल और क्रियारूप
नाना प्रकारकी स्वाभाविक शक्तियोका होना, (श्वेता० ६ । ८) जगत्के कारण-
का अनुसन्धान करनेवाले महर्षियोंद्वारा उस परमात्मदेवकी आत्मभूता शक्तिका
दर्शन करना (श्वेता० १ । ३) इत्यादि प्रकारसे परब्रह्मकी शक्तियोको सूचित
करनेवाले बहुत-से वचन वेदमे मिलते हैं, जिनका उल्लेख पहले भी हो चुका
है। इस तरह अनेक विचित्र शक्तियोसे सम्पन्न होनेके कारण उस परब्रह्म
परमात्मासे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना अयुक्त नहीं है। श्रुतिमे जो ब्रह्मको
अवयवरहित बताया गया है, वह उसके स्वरूपकी अखण्डता बतलानेके उद्देश्य-
से है, उसकी शक्तिरूप अंशोके निषेधमे उसका अभिप्राय नहीं है; इसलिये
परमात्मा ही इस जगत्का कारण है, यही मानना ठीक है।
सम्बन्ध—पुनः शङ्का उठाकर उसका निराकरण करते हैं—
विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम् ॥ २ । १ । ३१ ॥
( श्रुतिमे उस परमात्माको ) विकरणत्वात्=मन और इन्द्रिय आदि
करणोंसे रहित बताया गया है, इसलिये, न=( वह ) जगत्का कारण नहीं है;
चेत्=यदि; इति=ऐसा कहो; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है।
व्याख्या—यदि कहो, 'ब्रह्मको शरीर, बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदि करणोंसे
रहित कहा गया है; (श्वेता० ६ । ८) इसलिये वह जगत्का बनानेवाला
नहीं हो सकता' तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि इसका उत्तर पहले 'सर्वोपेता
च तद्दर्शनात्' ( २ । १ । ३० ) इस सूत्रमे परब्रह्मको सर्वशक्तिसम्पन्न बताकर
दे दिया गया है। तथा श्रुतिने भी स्पष्ट शब्दोमे यह कहा है कि वह परमेश्वर
हाथ-पैर आदि समस्त इन्द्रियोसे रहित होकर भी सबका कार्य करनेमे समर्थ
है (श्वेता० ३ । १९)। इसलिये ब्रह्म ही जगत्का कारण है, ऐसा माननेमें
कोई आपत्ति नहीं है।
सम्बन्ध—अब पुनः दूसरे प्रकारकी शङ्का उपस्थित करते हैं—
न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ २ । १ । ३२ ॥
न=परमात्मा जगत्का कारण नहीं हो सकता; प्रयोजनवत्त्वात्=क्योकि
प्रत्येक कार्य किसी-न-किसी प्रयोजनसे युक्त होता है ( और परमात्मा पूर्णकाम
होनेके कारण प्रयोजनरहित है )।
१२४ वेदान्त-दर्शन [पाद १
व्याख्या-ब्रह्मका इस विचित्र जगत्की सृष्टि करनेसे कोई प्रयोजन नहीं
है; क्योंकि वह तो पूर्णकाम है। जीवोंके लिये भी जगत्की रचना करना
आवश्यक नहीं है; क्योंकि परमेश्वरकी प्रवृत्ति तो सबका हित करनेके लिये ही
होनी चाहिये। इस दुःखमय संसारसे जीवोंको कोई भी सुख मिलता हो, ऐसी
बात नहीं है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर जगत्का कर्ता नहीं
है; क्योंकि जगत्मे प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी प्रयोजनसे ही कार्य
आरम्भ करता है। बिना किसी प्रयोजनके कोई भी कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता।
अतः परब्रह्मको जगत्का कर्ता नहीं मानना चाहिये।
सम्बन्ध-पूर्वोक्त शङ्काका उत्तर देते हैं—
लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥ २। १ । ३३ ॥
तु=किन्तु (उस परब्रह्म परमेश्वरका विश्वरचनादिरूप कर्ममें प्रवृत्त होना तो);
लोकवत्=लोकमें आप्तकाम पुरुषोंकी भाँति; लीलाकैवल्यम्=केवल लीलामात्र है।
व्याख्या-जैसे लोकमे देखा जाता है कि जो परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं,
जिनका जगत्से अपना कोई स्वार्थ नहीं रह गया है, कर्म करने या न करनेसे
जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो आप्तकाम और वीतराग हैं, ऐसे सिद्ध महा-
पुरुषोंद्वारा बिना किसी प्रयोजनके जगत्का हित साधन करनेवाले कर्म स्वभावतः
किये जाते हैं; उनके कर्म किसी प्रकारका फल उत्पन्न करनेमे समर्थ न होनेके
कारण केवल लीलामात्र ही है। उसी प्रकार उस परब्रह्म परमात्माका
भी जगत्-रचना आदि कर्मोंसे अथवा मनुष्यादि-अवतार-शरीर धारण
करके भाँति-भाँतिके लोकपावन चरित्र करनेसे अपना कोई प्रयोजन
नहीं है तथा उन कर्मोंमे कर्तापनका अभिमान या आसक्ति भी नहीं है;
इसलिये उनके कर्म केवल लीलामात्र ही हैं। इसीलिये शास्त्रोंमें परमेश्वर-
के कर्मोंको दिव्य (अलौकिक) एवं निर्मल बताया है। यद्यपि हमलोगोंकी
दृष्टिमें संसारकी सृष्टिरूप कार्य महान् दुष्कर एवं गुरुतर है, तथापि परमेश्वरकी
यह लीलामात्र है; वे अनायास ही कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना और संहार कर
सकते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति अनन्त है, इसलिये परमेश्वरके द्वारा बिना
प्रयोजन इस जगत्की रचना आदि कार्य होना उचित ही है। *
- भगवान् केवल सङ्कल्पमात्रसे बिना किसी परिश्रमके इस विचित्र विश्वकी