ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २–६ ] अध्याय ३ ३०३
सूत्र २–६ ] अध्याय ३ ३०३
आपलोगोको भी दूँगा, आप यहीं ठहरिये ।' ( छा० उ० ५ । ११ । ५ )
महर्षि उद्दालक भी यज्ञकर्म करनेवाले थे, जिन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतुको ब्रह्म-
विद्याका उपदेश दिया था । ( छा० उ० छठा अध्याय पूरा ) याज्ञवल्क्य भी जो
ब्रह्मवादियोमे सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं, गृहस्थ और कर्म करनेवाले थे । इस प्रकार
श्रुतिमे वर्णित श्रेष्ठ पुरुषोका आचरण देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या
कर्मका ही अङ्ग है और कर्मोंके सहित ही वह पुरुषार्थका साधन है ।
सम्बन्ध—इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ करते हैं—
तच्छ्रुतेः ॥ ३ । ४ । ४ ॥
तच्छ्रुतेः = तद्विषयक श्रुतिमे भी यही बात सिद्ध होती है ।
व्याख्या—श्रुतिका कथन है कि 'जो ॐकाररूप अक्षरके तत्त्वको जानता है
और जो नहीं जानता, वे दोनो ही कर्म करते हैं, परन्तु जो कर्म विद्या, श्रद्धा
और योगसे युक्त होकर किया जाता है, वही प्रबल्तर होता है ।' ( छा० उ०
१ । १ । १० ) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याको कर्मका अङ्ग बतलाया है । इससे
भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है ।
सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ करनेके लिये प्रमाण देते हैं—
समन्वारम्भणात् ॥ ३ । ४ । ५ ॥
समन्वारम्भणात् = विद्या और कर्म दोनो जीवात्माके साथ जाते हैं, यह
कथन होनेके कारण ( भी ) यही बात सिद्ध होती है ।
व्याख्या—जब आत्मा शरीरसे निकलकर जाता है, तब उसके साथ प्राण,
अन्तःकरण और इन्द्रियाँ तो जाती ही हैं, विद्या और कर्म भी जाते हैं
( बृह० उ० ४ । ४ । २ ) । इस प्रकार विद्या और कर्म दोनोके सस्कारोको साथ
लेकर जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमे गमन बताया जानेके कारण यह
सिद्ध होता है कि विद्या कर्मका ही अङ्ग है ।
सम्बन्ध—फिर दूसरे प्रमाणसे भी इसी बातको सिद्ध करते हैं—
तद्वतो विधानात् ॥ ३ । ४ । ६ ॥
तद्वतः = आत्मज्ञानयुक्त अधिकारीके लिये; विधानात् = कर्मोंका विधान होनेके
कारण भी ( यही सिद्ध होता है ) ।
३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
व्याख्या—श्रुतिने ब्रह्मविद्याकी परम्पराका वर्णन करते हुए कहा है कि 'उस
ब्रह्मज्ञानका उपदेश ब्रह्माने प्रजापतिको दिया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने
प्रजावर्गको सुनाया । ब्रह्मचारी नियमानुसार गुरुकी सेवा आदि कर्तव्य कर्मोंका
भलीभाँति अनुष्ठान करते हुए वेदका अध्ययन समाप्त करे, फिर आचार्यकुलसे
समावर्तनसंस्कारपूर्वक स्नातक बनकर लौटे और कुटुम्बमे रहता हुआ पवित्र
स्थानमें स्वाध्याय करता रहे । पुत्र और शिष्यादिको धार्मिक बनाकर समस्त
इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित करे।' इन सब नियमोंको बताकर उनके
फलका इस तरह वर्णन किया है—'इस प्रकार आचरण करनेवाला मनुष्य अन्तमें
ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८ । १५ । १) । इस तरह
विद्यापूर्वक कर्म करनेके विधानसे यह बात सिद्ध होती है कि विद्या कर्मका अङ्ग है ।
सम्बन्ध—इतना ही नहीं; अपि तु—
नियमाच्च ॥ ३ । ४ । ७ ॥
नियमात्=श्रुतिमे नियमित किया जानेके कारण; च=भी (कर्म अवश्य
कर्तव्य है, अतः विद्या कर्मका अङ्ग है, यह सिद्ध होता है) ।
व्याख्या—श्रुतिका आदेश है कि 'मनुष्य शास्त्रविहित श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान
करते हुए ही इस जगत्मे सौ वर्षोंतक जीवित रहनेकी इच्छा करे । इस प्रकार
जीवनयात्राका निर्वाह करनेपर तुझ मनुष्यमे कर्म लिप्त नहीं होंगे । इसके सिवा
दूसरे प्रकारका ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे कर्म लिप्त न होवे ।'
(ईशा० २) इस प्रकार आजीवन कर्मानुष्ठानका नियम होनेसे भी यही सिद्ध होता
है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है ।
सम्बन्ध—इस प्रकार जैमिनिके मतका वर्णन करके सूत्रकार अपने सिद्धान्त-
को सिद्ध करनेके लिये उत्तर देते हैं—
अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ८ ॥
तु=किन्तु; अधिकोपदेशात्=श्रुतिमें कर्मोंकी अपेक्षा अधिक ब्रह्मविद्याके
माहात्म्यका कथन होनेके कारण; बादरायणस्य=व्यासजीका मत; एवं=जैसा
प्रथम सूत्रमें कहा था वैसा ही है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिमें विद्याकी अधिकता
दिखलायी गयी है ।