ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २४ ] अध्याय १ ९७
सूत्र २४ ] अध्याय १ ९७
भगवद्गीतामें भी भगवान्ने जड प्रकृतिको सांख्योंकी भाँति जगत्का उपादान
कारण नहीं बताया है; किन्तु अपनी अध्यक्षतामे अपनी ही स्वरूपभूता
प्रकृतिको चराचर जगत्की उत्पत्ति करनेवाली कहा है ( गीता ९ । १० ) ।
जड प्रकृति जड और चेतन दोनोंका उपादान कारण किसी प्रकार भी
नहीं हो सकती । अतः इस वर्णनमे प्रकृतिको भगवान्की स्वरूपभूता
शक्ति ही समझना चाहिये । इसके सिवा, भगवान्ने सातवें अध्यायमे परा और
अपरा नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन करके ( ७ । ४-५ ) अपनेको
समस्त जड-चेतनात्मक जगत्का प्रभव और प्रलय बताते हुए ( ७ । ६ ) सबका
महाकारण बताया है ( ७ । ७ ) । अतः श्रुतियो और स्मृतियोके वर्णनसे यही सिद्ध
होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है।
सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये फिर कहते हैं—
अभिध्योपदेशाच्च ॥ १ । ४ । २४ ॥
अभिध्योपदेशात् = अभिध्या—चिन्तन अर्थात् संकल्पपूर्वक सृष्टि-रचनाका
श्रुतिमें वर्णन होनेसे; च = भी ( यही सिद्ध होता है कि जगत्का उपादान कारण
ब्रह्म ही है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमे जहाँ सृष्टिरचनाका प्रकरण है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है
कि ‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’ ( तै० उ० २ । ६ ) अर्थात् ‘उसने सकल्प
किया कि मैं एक ही बहुत हो जाऊँ, अनेक रूपोंमे प्रकट होऊँ।’ तथा
‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय’ ( छा० उ० ६ । २ । ३ ) ‘उसने ईक्षण—सकल्प किया
कि मै बहुत होऊँ, अनेक रूपोमे प्रकट हो जाऊँ।’ इस प्रकार अपनेको ही
विविध रूपोंमें प्रकट करनेका संकल्प लेकर सृष्टिकर्ता परमात्माके सृष्टिरचनामें
प्रवृत्त होनेका वर्णन श्रुतियोंमें उपलब्ध होता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि
परब्रह्म परमेश्वर स्वयं ही जगत्का उपादान कारण है । इसके सिवा, श्रुतिमे यह
भी कहा गया है कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।’
( छा० उ० ३ । १४ । १ ) अर्थात् ‘निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है; क्योकि
उससे उत्पन्न होता, उसीमे स्थित रहता तथा अन्तमे उसीमे लीन होता है, इस
प्रकार शान्तचित्त होकर उपासना ( चिन्तन ) करे।’ इससे भी उपर्युक्त बातकी
ही सिद्धि होती है ।
वे० द० ७—
९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
सम्बन्ध—उक्त मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं—
साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ १ । ४ । २५ ॥
साक्षात्=श्रुति साक्षात् अपने वचनोंद्वारा; च=भी; उभयाम्नानात्=
ब्रह्मके उभय ( उपादान और निमित्त ) कारण होनेकी बात दुहराती है,
इससे भी ( ब्रह्म ही उपादान कारण सिद्ध होता है, प्रकृति नहीं ) ।
व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद्मे इस प्रकार वर्णन आता है—‘एक समय
कुछ महर्षि यह विचार करनेके लिये एकत्र हुए कि जगत्का कारण कौन है ?
हम किससे उत्पन्न हुए हैं ? किससे जी रहे हैं ? हमारी स्थिति कहाँ है ?
हमारा अधिष्ठाता कौन है ? कौन हमें नियमपूर्वक सुख-दुःखमे नियुक्त करता
है ? उन्होने सोचा, कोई कालको, कोई स्वभावको, कोई कर्मको, कोई होनहार-
को, कोई पाँचो महाभूतोंको, कोई उनके समुदायको कारण मानते हैं, इनमे
ठीक-ठीक कारण कौन है ? यह निश्चय करना चाहिये । फिर उनके मनमे
यह विचार उठा कि इनमेसे एक या इनका समुदाय जगत्का कारण नहीं हो
सकता; क्योकि ये चेतनके अधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं है । तथा जीवात्मा भी
कारण नहीं हो सकता; क्योकि वह सुख-दुःखका भोक्ता और पराधीन है ।*
फिर उन्होने ध्यानयोगमे स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी अपने गुणोंसे
छिपी हुई अपनी ही स्वरूपभूता शक्तिका दर्शन किया; जो परमेश्वर
अकेला ही पूर्वोक्त कालसे लेकर आत्मातक समस्त कारणोंपर शासन करता है ।†
उपर्युक्त वर्णनमे स्पष्ट ही उस परमात्माको सबका उपादान कारण और
सञ्चालक ( निमित्त कारण ) बताया है । इसके सिवा, इसी उपनिषद्के
२ । १६ मे तथा दूसरे-दूसरे उपनिषदोमे भी जगह-जगह उस परमात्माको
सर्वरूप कहा है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही
इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है ।
- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः ।
अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥
कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या ।
संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥
( श्वेता० १ । १-२ )
† यह मन्त्र पृष्ठ ८० मे आ गया है ।