ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३
सूत्र २०–२२ ] अध्याय ३ ३१३
स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ ३ । ४ । २१ ॥
चेत्=यदि कहो; उपादानात्=उद्गीथ आदि उपासनाओमे जो उनकी
महिमाके सूचक वचन है, उनमे कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिको लेकर वैसा
वर्णन किया गया है, इसलिये; स्तुतिमात्रम्=वह सब, केवल उनकी स्तुतिमात्र
है; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; अपूर्वत्वात्=क्योकि वे उपासनाएँ और
उनके रसतमत्व आदि गुण अपूर्व है ।
व्याख्या—यदि कहो कि 'यह जो उद्गीथ है, वह रसोका भी उत्तम रस है,
परमात्माका आश्रयस्थान और पृथिवी आदि रसोमे आठवाँ सर्वश्रेष्ठ रस है ।'
( छा० उ० १ । १ । ३ ) इस प्रकारसे जो उद्गीथके विषयमे वर्णन है, वह
केवल स्तुतिमात्र है, क्योकि यज्ञके अङ्गभूत उद्गीथको लेकर ऐसा कहा गया है ।
इसी प्रकार सभी कर्माङ्गभूत उपासनाओमे जिन-जिन विशेष गुणोका वर्णन है,
वह सब उस-उस अङ्गकी स्तुतिमात्र है, इसलिये विद्या कर्मका अङ्ग है; तो यह
कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके सम्बन्धसे बताये हुए गुण
अपूर्व है । जो अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त न हो, उसे अपूर्व कहते हैं । इन
उपासनाओ और उनके गुणोंका न तो अन्यत्र कहीं वर्णन है और न अनुमान
आदिसे ही उनका ज्ञान होता है; अतः उन्हे अपूर्व माना गया है, इसलिये
यह कथन स्तुतिके लिये नहीं, किन्तु उद्गीथ आदिको प्रतीक बनाकर उसमे
उपास्यदेवकी भावना करनेके लिये स्पष्ट प्रेरणा देनेवाला विधिवाक्य है ।
अतः विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है ।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको पुष्ट करते हैं—
भावशब्दाच्च ॥ ३ । ४ । २२ ॥
च=इसके सिवा; ( उस प्रकरणमे ) भावशब्दात्=इस प्रकार उपासना
करनी चाहिये इत्यादि विधिवाचक शब्दोका स्पष्ट प्रयोग होनेके कारण भी
( यही बात सिद्ध होती है ) ।
व्याख्या—केवल अपूर्व होनेसे ही उसे विधि-वाक्य माना जाता हो, ऐसी
बात नहीं है । उस प्रकरणमे 'उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ०
१ । १ । १ ) 'सामकी उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० २ । २ । १ )
इत्यादि रूपसे अत्यन्त स्पष्ट विधिसूचक शब्दोंका प्रयोग भी है । जैसे उनकी
३१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
अपूर्व विधि है, उसी प्रकार उन-उन उपासनाओंका अपूर्व फल भी बतलाया गया
है ( छा० उ० १ । १ । ७; १ । ७ । ९ और २ । २ । ३ ) । इसलिये यह
सिद्ध हुआ कि वह कथन कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी स्तुतिके लिये नहीं है,
उनको प्रतीक बनाकर उपासनाका विधान करनेके लिये है और इसीलिये
विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है ।
सम्बन्ध—भिन्न-भिन्न प्रकरणोंमें जो आख्यायिकाओंका ( इतिहासोंका )
वर्णन है, उसका क्या अभिप्राय है? इसका निर्णय करके विद्या कर्मका अङ्ग नहीं
है यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ ३ । ४ । २३ ॥
चेत् = यदि कहो; पारिप्लवार्थाः = उपनिषदोंमे वर्णित आख्यायिकाएँ
पारिप्लव नामक कर्मके लिये है; इति न = तो यह ठीक नहीं है;
विशेषितत्वात् = क्योंकि पारिप्लव-कर्ममे कुछ ही आख्यायिकाओंको विशेषरूपसे
ग्रहण किया गया है ।
व्याख्या—‘उपनिषदोंमे जो यम और नचिकेता, देवता और यक्ष, मैत्रेयी
और याज्ञवल्क्य, प्रतर्दन और इन्द्र, जानश्रुति और रैक तथा याज्ञवल्क्य और
जनक आदिकी कथाएँ आती हैं; वे यज्ञ-सम्बन्धी पारिप्लवनामक कर्मकी
अङ्गभूत है; क्योकि ‘पारिप्लवमाचक्षीत’ (‘पारिप्लव’ नामक वैदिक उपाख्यान कहे)
इस विधि-वाक्यद्वारा श्रुतिमे उसका स्पष्ट विधान किया है । अश्वमेधयागमे जो
रात्रिके समय कुटुम्बसहित बैठे हुए राजाको अध्वर्यु वैदिक उपाख्यान सुनाता है,
वही ‘पारिप्लव’ कहलाता है । इस पारिप्लव कर्मके लिये ही उपर्युक्त कथाएँ हैं ।’
ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है; क्योकि पारिप्लवका प्रकरण आरम्भ
करके श्रुतिने ‘मनुर्वैवस्वतो राजा’ इत्यादि वाक्योंद्वारा कुछ विशेष उपाख्यानोंको ही
वहाँ सुनानेयोग्य कहा है । उनमे ऊपर बतायी हुई उपनिषदोंकी कथाएँ नहीं आती
है । अतः वे पारिप्लव कर्मकी अङ्गभूत नहीं है । वे सब आख्यान ब्रह्मविद्याको
भलीभाँति समझानेके लिये कहे हुए ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग हैं । इसीलिये इन सब
आख्यानोंका विशेष माहात्म्य बतलाया गया है ( क० उ० १ । ३ । १६ ) ।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं—